May 14, 2022

श्रेय और प्रेय

अधिकारी और पात्र

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द्वितीया वल्ली के प्रारंभिक ६ मंत्रों में स्पष्ट किया गया कि संसार में लगभग प्रत्येक ही मनुष्य प्रायः प्रेय से ही परिचालित होता है, और बिरला कोई ही प्रेय (प्रिय प्रतीत होनेवाली किसी वस्तु) की अनित्यता और नश्वरता को जानकर, अपेक्षाकृत नित्य किसी ऐसी वस्तु को जानने और पाने का इच्छुक होता है, जो शायद उसे स्थायी सुख प्रदान कर सके। फिर ऐसे ही इने-गिने मनुष्यों में से कोई यह भी अनुभव करने लगता है कि यहाँ तो सभी कुछ क्षणिक है, सारे संबंध, स्मृतियाँ, बुद्धि, धन-संपत्ति, यश आदि सभी तात्कालिक होते हैं। तो क्या जीवन केवल मृगतृष्णा और मृग-मरीचिका ही है? उसे यह तो दिखाई देता है कि संसार में नित्य जैसी कोई वस्तु है ही नहीं, न हो भी सकती है। फिर भी आश्चर्य यह कि ऐसा कोई नित्य संसार तो दिखाई ही देता है! तब उसे (अ)नित्य संसार और संसार की हर वस्तु से वैराग्य हो जाता है, किन्तु फिर भी उसकी बुद्धि में यह नहीं कौंधता कि संसार नित्य क्यों प्रतीत होता है। बहुत चिन्तन करने के बाद उसका ध्यान इस तथ्य पर जाता है, कि उसकी स्वयं की अपनी निजता के नित्य होने का सहज-स्वाभाविक उसका भान ही आभासी संसार के नित्य होने की भावना का रूप ले लेता है, और इसीलिए उसे संसार नित्य प्रतीत होता है। तब उसका ध्यान स्वयं पर जाता है और इस 'स्वयं' में वह क्या है, जो कि नित्य है, इसे जानने के प्रयास में वह संलग्न हो जाता है। वह जानता ही है कि, बुद्धि, विचार, भावनाएँ, धारणाएँ, मान्यताएँ, स्मृति, और शरीर आदि सभी क्षणिक रूप से प्रकट और अप्रकट होते रहते हैं, मन की तीनों अवस्थाएँ -- जागृत, स्वप्न तथा गहरी स्वप्नरहित निद्रा भी सदा नहीं रहती। फिर भी सबमें समान रूप से यह जो विद्यमान 'मैं' भावना है, वही अवश्य अपेक्षाकृत नित्य है। किन्तु यह 'मैं' रूपी भावना भी कभी प्रकट, तो कभी नेपथ्य में होती है और केवल तभी, जब वह किसी वृत्ति के साथ मिश्रित हो जाती है, -तभी उसे अपने आपकी तरह मान लिया जाता है। यह भी विचारणीय है, कि जैसे और दूसरी असंख्य भावनाओं आदि को स्वतंत्र रूप में देखा या अनुभव किया जाता है, यह 'मैं' नामक भावना स्वतंत्र रूप से नहीं पाई जाती। इसका केवल अनुमान ही किया जाता है, और फिर इसे किसी अन्य भावना / अनुभूति से जोड़कर ही मनुष्य स्वयं अपने आपको पुनः पुनः भिन्न भिन्न प्रकार से व्यक्त करता है। 

जैसे कि जब मनुष्य का मन दुःखी, चिन्तित, प्रसन्न, व्याकुल  आदि होता है, तो वह कभी तो कहता है कि "मेरा मन दुःखी, चिन्तित, प्रसन्न, व्याकुल आदि है, और कभी तो यह भी कहा करता है कि "मैं दुःखी, चिन्तित, प्रसन्न, व्याकुल आदि हूँ।"

इस प्रकार प्रमादवश (negligence / ignorance) के ही कारण, केवल 'मैं' और 'मन' के पारस्परिक संबंध पर ध्यान न देने से ही, वह इस प्रकार से दो प्रकार के भिन्न भिन्न वक्तव्य देता है। 

जब वह 'मैं' नामक वस्तु और 'मन' नामक वस्तु को एक दूसरे से नितान्त भिन्न और स्वतंत्र, दो पृथक् पृथक् वस्तुओं की तरह से जान लेता है, तो समस्त द्वन्दों से रहित अपनी सहज अवस्था में स्थिर हो जाता है।

किन्तु ऐसी अवस्था की उपलब्धि करना अत्यन्त ही दुर्लभ है, और केवल किसी योग्य, अधिकारी पुरुष के द्वारा इंगित किए जाने पर ही, कोई योग्य और पात्र व्यक्ति तत्काल ऐसी अवस्था में अविचल रूप से सुस्थिर हो जाता है।

इस कथा में यमराज और नचिकेता क्रमशः ऐसे ही दो महान तत्वदर्शी और जिज्ञासु, -- अधिकारी और पात्र हैं।

इस मंत्र ६,

न साम्परायः प्रतिभाति बालं

प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।। 

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

पुनः पुनर्वशमापद्यते मे।।६।।

में आत्म-ज्ञान के अनधिकारी पुरुषों का वर्णन करने के बाद, यमराज नचिकेता से आत्मतत्त्व की दुर्लभता और दुर्दर्शता का वर्णन इस प्रकार से करते हैं :

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः 

शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।। 

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-

श्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।।७।।

न नरेणावरेण प्रोक्त एष

सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः।।

अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति

अणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात्।।८।।

नैषा तर्केण मतिरापनेया

प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।।

यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि

त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा।।९।।

यमराज नचिकेता से कहते हैं :

यह आत्म-तत्व जिसके बारे में सुनना तक अधिकांश लोगों के भाग्य में नहीं होता, और यदि ऐसे बहुत से भाग्यशाली लोगों में किसी का ऐसा भाग्य होता भी है, कि वह इस विषय में सुन भी लेता है, तो भी सुनने के बाद भी इसे जान-समझ नहीं पाता। इसे कुशलतापूर्वक कह सके, ऐसा वक्ता जो इसे जानता भी हो, मिल पाना और भी अद्भुत् और आश्चर्य की ही बात है, और वह जिसे इसका उपदेश देता है, ऐसा कुशल शिष्य मिल पाना भी इतना ही दुर्लभ एक आश्चर्य ही है।...७,

किसी अन्य के द्वारा अपने से कहा गया आत्म-तत्व का रहस्य आसानी से समझ में भी नहीं आता, किन्तु ध्यान देकर इस पर चिन्तन किए जाने से यह अवश्य ही सुविज्ञेय है। चूँकि यह तत्त्व मानों सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, और अणु से भी सूक्ष्म है, और चूँकि तर्क का विषय नहीं है, अर्थात् तर्क से इसे ग्रहण किया जाना या किसी को समझाया जाना संभव नहीं है, इसलिए किसी और के द्वारा इसकी शिक्षा दिए जाने पर भी, किसी की इसमें गति नहीं होती, अर्थात् कोई इसे नहीं ग्रहण कर पाता।...८,

और इसे केवल तर्कबुद्धि की सहायता से भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। प्रिय नचिकेता! अन्य किसी के द्वारा अच्छी तरह से बतलाए जाने पर भी यह भलीभाँति बुद्धि में नहीं पैठता। किन्तु वह बुद्धि जो तुम्हें प्राप्त है, ऐसी प्रखर, सूक्ष्म बुद्धि जिसे प्राप्त है, ऐसा कोई धीर अवश्य ही इसे ग्रहण कर लेता है। नचिकेता! तुम्हारे जैसा सत्य पर धैर्यपूर्वक अविचल तथा अटल रहनेवाला प्रश्नकर्ता ही हमें सदैव मिलता रहे!...९।।

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