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September 21, 2015

नैन भए बोहित के काग.. . . . -सूरदास

नैन भए बोहित के काग.. . . .  
-सूरदास
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सूरदास चर्मचक्षुओं से वंचित थे । और शायद यही कारण है कि अपने अन्तर्चक्षु से उन्हें परमात्मा के दर्शन होते थे । और इस संसार के चर्मचक्षुयुक्त अन्तर्दृष्टिरहित लोगों की उपमा वे गोपिकाओं के रूप में दिया करते थे । उनका एक पद है जिसमें वे कहते हैं :
"मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे,
जैसे उड़ि जहाज को पँछी पुनि जहाज पर आवे..."
यहाँ भी जहाज के पँछी के रूप में वे संसार के वैराग्य-विवेक से रहित मनुष्यों के लिए पँछी की उपमा देते हुए कहते हैं कि वे घूम-फिरकर पुनः पुनः इन्द्रिय-सुखों रूपी अपने संसार में लौट आते हैं, जैसे समुद्र में दूर स्थित जहाज पर रहनेवाला पँछी घूम-फिरकर पुनः जहाज पर ही लौट आता है, किन्तु यदि कभी सौभाग्यवश उसका जहाज किसी ऐसे तट पर उसे ले जाता है जहाँ से वह अपने स्वाभाविक परिवेश, जँगल या वन-उपवन में पहुँच जाए, तो भूलकर भी पुनः जहाज पर नहीं लौटता, वैसे ही जिनके नयन श्याम के रूप से बँध जाते हैं वे पुनः भूलकर भी संसार की तुच्छ गर्हित विषय-वासनाओं की ओर नहीं लौटते । सूरदास जी कहते हैं कि मेरे मन को इस संसार में अनत (अनंत) सुख कैसे मिल सकता है, यह तो जहाज के पंछी की मज़बूरी है कि समुद्र पार कर दूर तट पर न जा पाने के ही कारण वह पुनः पुनः जहाज पर लौट आता है । इस पद में भी वही उदाहरण है । हमारे नेत्र-रूपी दो काग घूमफिरकर ’फ़ेसबुक’ / ’ट्विट्टर’ तथा गूगल / याहू पर लौट आते हैं जहाँ अनन्त सुख नहीं मिल सकता । अनन्त सुख तो श्याम के दर्शन में ही है। 
यह ’पोत-कपोत’ का सन्दर्भ तो भाषा-शास्त्रियों के लिए है, हमारे आपके जैसे लोगों के लिए नहीं ।          
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