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....................... शिल्पी ......................
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~(प्रस्तुत कविता यूँ तो अचानक ही भीतर से उमग उठी,
~लेकिन पढ़ने पर मुझे लगा कि यह,
~श्री जे.कृष्णमूर्ति
~पर काफी हद तक सही रूप से लागू होती है ।)
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अपने हाथों में लिए हथौड़ी-छैनी,
सुबह-सुबह,
निकला था किसी पत्थर की तलाश में ।
जा पहुँचा था पहाड़ के नज़दीक ।
देख रहा था, पत्थरों में छिपी उन अनगिनत सुन्दरताओं को,
जो अनावृत्त होने के लिए बेकल थीं ।
हाँ मानता हूँ,
उनके आवरण किसी और की दृष्टि से उन्हें ओझल रखते थे,
और यह ज़रूरी भी था,
अपावन नज़रों से उन्हें बचाने के लिए,
लेकिन मेरे लिए,
मानों वे मूक निमंत्रण थीं,
क्योंकि मैं उन्हें विस्मित होकर देखता था ।
और यह भी,
कि मैं उनमें से कुछ के ही सौन्दर्य को,
दुनिया की नज़रों के सामने ला सकता था,
क्योंकि छैनी पर एक भी गलत वार,
कर सकता था उन्हें भग्न बाहर तक,
-और मुझे भीतर तक ।
यह किसी चट्टान से अपने आप को उकेरने जैसा था ।
और जब तक इतनी सावधानी से काम न कर सकूँ,
तब तक मैं उन्हें बस देखता ही रहता हूँ ,
-अलग-अलग कोणों से,
-हर ओर से ।
अभी, अभिभूत सा होकर देख ही रहा था,
कि वे लोग आये ।
वे राजा के आदमी थे,
'-शुरू करो काम !'
वे बोले ।
हमें पहाड़ों से राह निकालनी है ।
साथ के मजदूरों ने पहाड़ को तोड़ना शुरू किया,
मैं देखता रह गया,
मेरी असंख्य प्रतिमाएँ,
मेरे सामने टूट रहीं थी,
और वे तोड़ रहे थे पत्थर,
-नए रास्ते खोलने के लिए ।
और शाम होते-होते,
वे चले गए थे ।
फिर कुछ दूसरे लोग आये,
वे जानते थे कि मैं शिल्पी हूँ,
और वे मेरी प्रशंसा करने लगे ।
पर मैं जानता था उनका कपट,
वे चाहते थे कि मैं उनकी चाही गईं प्रतिमाएँ ही उकेरूँ,
और मैं मजबूर था,
क्योंकि मैं जिन प्रच्छन्न प्रतिमाओं को देख रहा था,
उन चट्टानों में,
वे चाहते थे उससे बहुत अलग,
बिलकुल ही अलग,
कुछ और ।
फिर मैं लौट आया,
बिना कोई प्रतिमा उकेरे ।
मैं उन्हें क्या कह सकता था ?
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December 24, 2009
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