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November 27, 2013

ईशावास्योपनिषद् श्लोक 15

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । 
तत्ते पूषनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
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March 07, 2011

|| तदेजति तन्नैजति..||


~~~~~ तदेजति तन्नैजति... ~~~~~
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© Vinay Vaidya 



तारे ठहरे भी रहते हैं,
तारे चलते भी रहते हैं,
चंदा को साथ लिये,
सूरज ठहरा भी रहता है, 
सूरज चलता भी रहता है,
धरती को साथ लिये,
धरती ठहरी भी रहती है,
धरती चलती भी रहती है,
जीवन को साथ लिये,
तुम भी ठहरे भी रहो,
तुम भी चलते भी रहो, 
उन्नति को साथ लिये !
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(तदेजति तन्नैजति...-ईशावास्योपनिषत्)


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September 15, 2009

य एषु सुप्तेषु जागर्ति .

य एषु सुप्तेषु जागर्ति

कौन है वह जो 'इन' 'सोये-हुओं' में जागता है?
मैं इस सूक्ति को कुछ अलग अर्थ में देखता हूँ।
सोचता हूँ यह 'किसका' उल्लेख है?
कौन है, जो जागता है, -सोये हुओं के बीच ?
सोये हुए तो,
'-मैं जागता हूँ, ' नहीं कह सकते !
वे तो,
'मैं सो रहा हूँ,'
-ऐसा भी कहाँ कह सकेंगे?
निश्चित ही,
अवश्य ही,
'कोई' है,
जो 'जागृत' है ।
जो 'जानता' है, कि मैं सोया हुआ नहीं हो सकता ।
और 'दूसरे' ही 'सोये' हुए हैं ।
क्या शरीर ?
शरीर अपने स्वाभाविक कर्म में रत है ।
ऋतुओं की तरह ।
न जाने किसकी प्रेरणा से ?
"केन प्रेषितो अयं ?"
वह कुछ भी नहीं कहता,
न यह कि मैं जागता हूँ,
और न यह, कि मैं नहीं जाग रहा ।
बस चुपचाप अपना कार्य करता रहता है ।
फ़िर कौन?
क्या इन्द्रियाँ ?
वे तो मन का अनुगमन करती हैं,
-यंत्रवत ।
मन के जुड़ने से ही उन्हें 'सत्ता' मिलती है ।
हाँ यदि मन उनका दास हो जाए, तो मन उनके स्वरूप का हो जाता है,
-सोया-सोया सा,
-खोया-खोया सा ।
यंत्र ही हो बैठता है वह ।
क्या यंत्र कभी सोते हैं ?
या कभी जागते भी हैं ?
वे तो अपने स्वामी के संकेत से कार्य करने लगते हैं ।
किसी 'जागृत' सत्ता की प्रेरणा से स्फूर्त्त होकर !
किसी जागृत 'सत्ता' द्वारा 'प्राणों' को आंदोलित कर दिए जाने पर !
और,
क्या 'प्राण' भी यंत्रवत ही किसी 'देवता' का सान्निध्य पाने पर ही,
अपना कार्य नहीं करते हैं?
क्या उस 'जागृत' सत्ता को कोई 'सुप्त' कभी देख सकता है ?
'जागृत' अपना प्रमाण आप ही है ।
तो हम कर रहे थे ,
-इन्द्रियों की बात,
वे 'प्राणों' की गति से, और प्राणों को प्रेरित करनेवाले,
उस 'जागृत' या सुप्त मन की संलग्नता से ही अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होती हैं न ?
और 'मन' ?
क्या वह बुद्धि, स्मृति, इच्छा, संकल्प, और,
राग, द्वेष, से ही 'प्रवृत्त' नहीं हुआ करता ?
क्या वे सभी,
-यंत्रवत ही अपना कार्य नहीं करते ?
क्या वे 'जागृत' होते हैं ?
हाँ वे कार्य में संलग्न या उससे विलग्न अवश्य होते रहते हैं ।
क्या उनसे जुड़ा 'मन' सोया हुआ ही नहीं होता ?
किसी 'आदर्श', कल्पना, सुख-दु:ख या 'अवसाद' में,
'स्वप्नों' में डूबा हुआ ?
तो इन सब 'सोये-हुओं' में,
-'कौन' जागता है ?
"मैं" ?
जरूर हर-कोई जानता है,
-जब वह जागता है ,
जरूर हर कोई जागता है,
-जब वह जानता है ।
वह 'कौन' , कौन है ?
जो सदा है,
जो सदा-सर्वदा ही ऐसा है ।
-वह जागता भी अवश्य है ?
जो, सदा ।
जो मुक्त भी तो होता है,
कभी-कभी,
जब 'कोई' 'सो' रहा होता है,
और, जब हम उसे जगाने जाते हैं,
तो वह कहता है, -
'अभी मैं सो रहा हूँ, सोना चाहता हूँ।
जगाओ मत !'
क्या वह झूठ कहता है?
यदि वह झूठ कहता है, तो कैसे कह सकता था ?
यदि वह जाग रहा है, तो कैसे कह सकता था ?
'य एषु सुप्तेषु जागर्ति '
-ऋषि के वचन कितने अद्भुत हैं !
कितने सुंदर !
'य:' कहते ही, ऋषि,
उसे 'जागृत' कर देता है,
'अनावरित', और मुक्त,
'जो' सदा ही ऐसा है ।
- नित्य जागृत है ।
ऋषि,
क: एषु सुप्तेषु जागर्ति ,
स: एषु सुप्तेषु जागर्ति,
या,
अयं एषु सुप्तेषु जागर्ति ,
नहीं कहते !
जागृत चैतन्य को क: , स: की तरह से नहीं पहचाना जा सकता !
क्योंकि तब वह 'अपने ' से ही 'अन्य' हो जाता है !
चैतन्य तो 'अनन्य' होता है,
अहम्-इदं के विभाजन से रहित !
और इसीलिये , उसे स: अथवा अयं के रूप में भी नहीं ग्रहण किया जा सकता ।
य: का प्रयोग कितना सम्यक प्रयोग है !
तस्मै ऋषये नम इदं ।
किंतु यदि जागृत - चैतन्य सोये हुओं में जागता है , तो अवश्य ही वह उन सोये - हुओं से अभिन्न भी होता है ,
क्योंकि 'सोये-हुए' तो स्वयं को भी नहीं प्रमाणित कर सकते !!
कैसे ?
जागृत-आदि त्रयोन्मुक्तम , जागृत-आदि-मयं-स्तथा ,
ओंकारैक सु-संवेद्यो यत्पदं तन्नमाम्यहम !(मांडूक्य-उपनिषद् )
फ़िर ,
तत्-युष्मदोरस्मदि - संप्रतिष्ठा ,
तस्मिन्-विनष्टे -अस्मदि -मूल -बोधात ,
तत्-युष्मदस्मिं -मति वर्जितैका ,
स्थिति: ज्वलन्ती सहजात्मन: स्यात !! (सत् -दर्शनं , श्री रमण महर्षि )


ब्रह्म सजातीय, विजातीय, तथा स्वगत भेदों से रहित है ।
नित्य जागृत चैतन्य , आत्म-तत्त्व, ही इन सोये हुओं में जागता है ।


posted by Vinay Vaidya,


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