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August 27, 2021

आग और धुआँ

कविता : 27-08-2021

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काबुल 

आग भी कैसी अजीब सी आग है यह, 

ठीक से जलती भी नहीं, बुझती भी नहीं ,

बस धुआँ-धुआँ हो रही है, अधसुलगी सी, 

न फैलती है, न सिमटती है, न बिखरी है, 

घास भी तो है गीली, और जमीं भी नम है,

हवा बस ठहरी सी हुई है, उदास है मौसम।

साँस आती, जाती भी नहीं, रूह बेचैन, 

दिल है ग़मग़ीन, घुटता जा रहा है दम।

ये आग किसने लगाई है, किसकी लगाई है, 

न जल भी रही है शिद्दत से, न बुझ रही है। 

अनबुझे अधजली सीली हुई सिगरेट जैसी, 

काश बुझ ही जाती, या कि जल ही जाती अगर,

किसी तरह आ जाता, चैन रूह को किसी तरह।

पूरी दुनिया ही या सभी कुछ, इस आग में जल जाए, 

अच्छा होगा कि किसी भी तरह, सुकून अगर मिल जाए, 

जीते-जी ना भी मिल पा रहा हो चैन अगर, 

रूह को मर कर भी काश चैन आ जाए।

अभी अगर अंधेरा नहीं, तो रौशनी भी नहीं,

मौत भी नहीं अगर, और जिन्दगी भी नहीं, 

तो एक बेचैनी में है रूह यहाँ पर लेकिन, 

लगती निजात की, कहीं कोई उम्मीद नहीं! 

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April 15, 2021

आग लगने पर,

कविता

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आग लगने पर चले हैं खोदने कुआँ, 

तय नहीं, पानी मिलेगा या नहीं!

इस समय तो व्यस्त हैं फुरसत कहाँ, 

आग बुझ जाए तो यही काफी है!

अंगार थे छिपे हुए राख के नीचे,

और सब थे ध्यानमग्न, ध्यान में डूबे!

आग कैसे लग गई, फ़ुरसत से सोचेंगे,

बच सके कोई अगर तो यत्न करेंगे ।

इस समय यही किया जा सकता है,

अब कहाँ पर दूसरा कुछ रास्ता है! 

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