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April 19, 2023

आखिर यह क्या है!

कविता 19-04-2023

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कुछ भी! 

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यह जो घर है मेरा, 

जो मुझमें रहता है,

यह वह, जो मैं हूँ,

जो इसमें रहता है,

कौन कहा करता है,

किसे कहा करता है!

कहाँ कहा करता है,

कहाँ सुना करता है! 

सूना सूना सा यह घर, 

जिसमें मैं रहता हूँ, 

सूना सूना सा यह मैं, 

जिसमें घर रहता है,

सूनापन ही तो है, 

सुना सुना करता है!

तन मन दोनों खिन्न,

भिन्न भिन्न विभिन्न,

शून्य एक असीम,

अन्तहीन निःसीम,

सुन्न सुन्न तन मन में,

गिरह हमारा सुन्न में!

शून्य कहा करता है, 

शून्य सुना करता है,

यदा हि पश्यन्त्येते,

तत्त्वविदः विमर्शिनः। 

शुनि चैव श्वपाके च,

पण्डिताः समदर्शिनः।

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September 23, 2017

’कुछ भी!’ दो शून्य एक साथ! 23/09/2017

दो  कविताएँ
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1. ’कुछ भी!’
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यह फूल खिला ये रंग उड़े,
आकर्षित तितली भृंग उड़े,
सुरभि-संदेसे फैले चहुँ ओर,
झोंके-समीर अनंग उड़े।
उमड़ी कल्पना भावना भी,
हम बहकर उनके संग उड़े,
सपने कौतूहल के सारे,
खुलकर बिखरे वे रंग उड़े ।
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2. लिखना / समझना
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मैं बाबा लिखूँगा,
तुम प्रणाम समझ लेना,
मैं माँ लिखूँगा,
तुम स्नेह समझ लेना,
मैं पानी लिखूँगा,
तुम प्यास समझ लेना,
मैं गीत लिखूँगा,
तुम प्रीत समझ लेना ...!
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