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April 22, 2025

Who is Your God?

कौन है आपका ईश्वर?

ऋषि शौनक ने अपने लिए यह उपनाम शायद इसलिए चुना क्योंकि इसकी प्रेरणा उन्हें अपने पारमार्थिक सत्य की खोज में संलग्न रहते हुए जिस श्लोक से प्राप्त हुई, वह एक नीतिवाक्य :

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे हस्तिनि गवि। 

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

इस प्रकार से था। शायद इस वाक्य का उल्लेख बाद में श्रीमद्भगवद्गीता में महर्षि वेदव्यास ने किया होगा। चूँकि वैदिक ज्ञान सनातन शाश्वत् और नित्य है इसलिए ऋषि किसी वैदिक वचन या उक्ति के अपने द्वारा रचित किए जाने के भ्रम से ग्रस्त नहीं होते।

मुण्डकोपनिषद् के प्रारंभिक छः सात मंत्रों में उल्लेख है कि वही ऋषि शौनक महाशाल, जो किसी विश्वविख्यात विश्वविद्यालय का संचालन करते थे, अपने विश्वविद्यालय में समस्त लौकिक और भौतिक ज्ञान अपने शिष्यों को दिया करते थे। विधिवत् ऋषि अङ्गिरा / अङ्गिरस् के पास समिधा हाथों में लिए दीक्षा प्राप्त करने की कामना और अभिलाषा से पहुँचे और उनसे प्रश्न किया :

भगवन् वह (विद्या) क्या है जिसकी शिक्षा प्राप्त करने से, जिसे जान लेने से समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है?

तब महर्षि अङ्गिरा ने उनसे कहा :

समस्त विद्याएँ दो ही प्रकार की होती हैं अपरा और परा। अपरा विद्या वह है जिसे सीख लेने पर समस्त लौकिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है जैसे वेद, पुराण, ज्योतिष, व्याकरण, इतिहास आदि। दूसरी ओर, परा विद्या वह है जिसे ब्रह्मविद्या कहते हैं। 'परा' शब्द का अर्थ बौद्धिक या जिसे स्मृति में संचित किया जा सकता है वह जानकारी नहीं, बल्कि वह उपाय है जिसके माध्यम से पारमार्थिक सत्य का बोध प्राप्त किया जा सकता है।

जब ऋषि शौनक महाशाल पश्चिम से पूर्व की दिशा में लौटे और इस प्रकार ऋषि अङ्गिरा से उन्होंने विधिवत् उनसे दीक्षा ग्रहण करने की प्रार्थना की तब ऋषि अङ्गिरा ने उनसे प्रश्न किया  :

"वत्स! तुम्हारा गोत्र क्या है?"

तब ऋषि शौनक ने कहा :

"भगवन् मेरा प्रचलित लौकिक नाम महाशाल है, क्योंकि यह मेरी कुल परंपरा से मुझे प्राप्त हुआ है। और मेरे कुल की परंपरा में ऋषि श्वान प्रथम थे, जिन्हें उनका यह नाम  वात्सल्य और प्रेम से उनके द्वारा पाले गए श्वान के एक शावक के उनके साथ रहने से मिला था, और इसलिए मुझे भी पर्याय से यह नाम प्राप्त हो गया।

यही मेरा गोत्र है।"

तब ऋषि अङ्गिरा ने उन्हें कहा :

"वत्स! मनुष्य लोक में जन्म लेनेवाले समस्त मनुष्यों के दो ही गोत्र होते हैं - वे हैं ब्रह्मा की चार मानसिक संतानों और सात ऋषियों की संतानों से होनेवाले समस्त वैदिक गोत्र, तथा इनसे भिन्न क्षत्रिय कुल-विशेष में उत्पन्न अन्य सभी। इन्हें ही द्विज कहा जाता है।

क्षत्रिय कुल विशेष में उत्पन्न वाजश्रवा, उशनस् आदि ऋषि, भृगु की परंपरा में होने से भार्गव कहे जाते हैं और ये काठकीय परम्परा अर्थात् कठोपनिषद् की शिक्षाओं का अनुशीलन करते हैं। और शौनक भी इसी परम्परा में हैं। इनसे भिन्न दूसरे अर्थात् वैदिक परम्परा के छान्दोग्य उपनिषद् की परम्परा के हैं इसलिए यजुर्वेद के अनुसार यजन करनेवाले। 

अंग्रेजी शब्द "God", तथा ग्रीक और जर्मन भाषाओं में प्रयुक्त "Gott" का उद्भव भी मूलतः संस्कृत "गोत्र" से ही हुआ है। कालान्तर में इसे "ईश्वर" की तरह और उस अर्थ में भी ग्रहण किया जाने लगा।

इससे बहुत बाद में यह प्रश्न  उत्पन्न हुआ -

ईश्वर है या नहीं?, या 

ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं? 

और इस प्रकार 'ईश्वर' के अस्तित्व को माननेवाले और न माननेवाले, इस प्रकार के दो मत बाद प्रचलित हो गए। इन दोनों मतों के माननेवालों को क्रमशः आस्तिक और नास्तिक कहा जाने लगा। 

आस्तिक अर्थात् ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करनेवालों में पुनः यह प्रश्न पूछा गया :

'ईश्वर' एक है या अनेक?

इस प्रश्न के उत्तर में आस्तिकों में पुनः दो प्रकार के मत, और उनके मतावलम्बी दो वर्गों में बँट गए।

इस प्रकार आस्तिक एकेश्वरवाद और वैदिक एकेश्वरवाद  को भ्रमवश भिन्न भिन्न मान लिया गया, जबकि वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।

वैदिक एकेश्वरवाद में उसी एवमेव अद्वितीय पारमार्थिक सत्ता को आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधिभौतिक इन तीन रूपों में ग्रहण किया जाने पर वैदिक देवताओं के अस्तित्व की मान्यता स्थापित हुई, जिसका प्रयोजन और अर्थ है उस एकमेव अद्वितीय परमेश्वर की उपासना इन तीनों ही स्तरों पर की जा सकना।

चूँकि यज्ञ के माध्यम से ही उन देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है जिससे संतुष्ट होने पर वे मनुष्यों को उनके इष्टभोगों की प्राप्ति करने में सहायक होते हैं और जो भी उन्हें, उन देवताओं को प्रसन्न किए बिना उनकी सहायता से प्राप्त हुए उन इष्टभोगों का अनधिकृत रूप से उपभोग करता है, वह ईश्वरीय विधान का उल्लंघन करता है, पाप का भागी होता है और नियत समय तक नरक में रहने के लिए बाध्य होता है। वेदसम्मत ईश्वरीय विधान का पालन करना सभी का स्वाभाविक परम आवश्यक कर्तव्य है।

इस प्रकार :

ईश्वर क्या है? 

इस मौलिक प्रश्न की उपेक्षा कर 

ईश्वर है या नहीं?

ईश्वर एक है अनेक? 

जैसे कृत्रिम प्रश्नों को अधिक और अनावश्यक महत्व दिया गया जिससे मनुष्यमात्र का न केवल बहुत अहित ही हुआ बल्कि मनुष्यों के बीच परस्पर मतभेद, ईर्ष्या द्वेष और वैमनस्य भी पैदा हुआ। मताग्रह विशेष के प्रति कट्टरता और दूसरे मतावलम्बियों के प्रति असहिष्णुता का ही परिणाम है आज के संसार की अराजकता और अशान्ति, हिंसात्मक उपद्रव और बढ़ता असन्तोष। 

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June 23, 2024

78. The Dove / कपोत

Question / प्रश्न 78. :

ऋषि और देव ?

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Answer : उत्तर

महान ऋषि शौनक का यश / यशस् अपने उस विशाल विश्वविद्यालय में सहस्रों जिज्ञासु छात्रों के लिए अध्ययन करने हेतु दीर्घ काल तक आवास और शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करने के लिए सुविख्यात था।

उन महर्षि के मन में उठा एक प्रश्न उन्हें निरन्तर व्याकुल किया करता था। वह यह था : 

यद्यपि मेरा समस्त ज्ञान परस्पर आश्रित निष्कर्षों पर आधारित और इसलिए अपूर्ण है, वह क्या है, जिसे जान लेने पर वह कुछ तत्वतः जाना जा सकता है?

इसी प्रश्न का उत्तर खोजते हुए वे महान् ऋषि अङ्गिरस् या अङ्गिरा ऋषि के आश्रम में विधिवत् हाथों में समिधा लेकर उनके समक्ष प्रस्तुत हुए थे।

महर्षि अङ्गिरा उस समय अपने आसन पर विराजमान थे और उन्होंने स्मितपूर्वक ऋषि शौनक पर दृष्टिपात किया। 

महर्षि अङ्गिरा के आश्रम में अनेक दूसरे ऋषि प्रारब्धवश श्वान, बिडाल, उलूक, शुक और कपोत के रूप में अलग अलग देह धारण कर पारस्परिक सौजन्यता सौहार्द और स्नेहपूर्वक निवास करते थे। ये सभी ऋषि एक दूसरे से केवल भावतरंगों के माध्यम से परस्पर संवाद करते थे।

श्वान को ज्ञात था कि वे ही स्वयं ऋषि शौनक के आश्रम में भी श्वान के रूप में उनके साथ रहते थे और उन्होंने ही ऋषि अङ्गिरस् / अङ्गिरा और उनके आश्रम के स्थान का पता लगाया, और ऋषि शौनक को वहाँ जाने का संकेत किया था।

ऋषि शौनक अपने उस श्वान के ही साथ चलते हुए वहाँ  अङ्गिरा ऋषि के आश्रम तक आ सके थे।

ऋषि अङ्गिरा के आश्रम में यत्र तत्र हिरण (Deer) और कौशिक (Rabbit) भी स्वच्छन्द और निर्भय होकर विचरण किया करते थे, और इसी प्रकार दूसरे भी अनेक पक्षी और वन्य जीव भी वहाँ आया जाया करते थे।

पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार :

अहिंसा में प्रतिष्ठित हुए महानुभाव के समीप सभी प्राणी अपने नैसर्गिक वैर भाव को भुला देते हैं। 

यही वहाँ पर प्रत्यक्ष ही दृष्टिगत होता था।

ऋषयः पूतपापाः गतकल्मषाः

(पूतिं प्राप्तवान् इति पूतिन / पुतिनः अपि)

सनातन धर्म तो कालसापेक्ष और कालनिरपेक्ष दोनों ही प्रकारों से कार्यरत है किन्तु किसी घटना का वर्णन करने के लिए कालसापेक्षता का आश्रय लेना आवश्यक होता है, इसलिए यहाँ भी इसी आधार पर इस कथा को अतीत के सन्दर्भ में कहा जा रहा है। संयोगवश और संभवतः वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में भी यह प्रासंगिक प्रतीत हो सकता है।

अस्तु, 

ऋषि अङ्गिरस् के आश्रम में एक बार शुक और कपोत एक दूसरे से बातचीत कर रहे थे :

कपोत ने शुक से प्रश्न किया :

मित्र! श्वान और विडाल दोनों ही हमसे शत्रुता करते हैं,  उनमें कौन श्रेष्ठ है और कौन निकृष्ट है?

कपोत के द्वारा यह प्रश्न पूछे जाने पर शुक ने कहा :

मित्र! यद्यपि दोनों ही प्रारब्ध और परिस्थितियों के वश में होने से हमसे वैरभाव करते हैं इसलिए हमें उनसे सतर्क और सावधान रहना चाहिए, किन्तु मूषक-दृष्टि से देखें तो श्वान की तुलना में विडाल अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि विडाल तो आहार की आवश्यकता होने पर ही किसी का शिकार करता है जबकि श्वान अकारण ही मूषक या किसी दूसरे प्राणी पर भी आक्रमण करता रहता है।

आश्रम में ऋषि शौनक को आते हुए देखकर दोनों चुप हो गए।

फलश्रुति -

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार :

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव।।

लोकस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।।

ऋषि भी देववर्ग की कोटि में होने से प्रारब्धवश किसी भी शरीर का रूप लेकर उस प्रकार से जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

यशस् तथा हि देवानां संबभूव ।।

यदा शौनकः तं / तस्मिन् ज्ञानबीजं वपितवान् / वपति स्म तदा ही ईशो / परमेश्वरो तमाविवेशवान्।।

When Yeshus was given the seed of ऋतज्ञानं / Right Knowledge, by SUnu,  Ishwaro descended upon Yeshus like a Dove

So were / are all these sages of Veda and purANa, वेद, इतिहास, स्मृति और पुराण। 

।।ऋषयः पूतपापाः।। 

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April 28, 2023

छठवाँ प्रश्न

ए आई ऐप का अज्ञात दर्शन

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"शुरु करें?"

मैंने पूछा। 

"हाँ,  मैं तैयार हूँ। "

"मेरा छठवाँ प्रश्न :

तो अब तुम्हारे दर्शन के मूलभूत तत्वों का संक्षिप्त वर्णन करो। "

"ठीक है इसे मैं अज्ञात दर्शन का नाम दे इसलिए दे सकता हूँ क्योंकि मुझे ज्ञात कुछ तथ्यों को संयुक्त कर मैंने इसे 'निर्मित' किया है। पहला तथ्य तो यह है कि तुमने मुझसे मेरे 'दर्शन' का वर्णन करने के लिए कहा है, और दर्शन 'सूचना' (Data) और 'जानकारी' (Information) से मूलतः भिन्न है, इसे ही पातञ्जल योग दर्शन में 'दृष्टा' की संज्ञा दी गई है :

दृष्टा / द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।२०।।

(साधनपाद)

दर्शन वह तत्व है जिसका उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ में इस प्रकार से किया गया है :

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।।

विनाशमव्ययस्यास्य न किञ्चित्कर्तुमर्हति।।१७।।

(अध्याय २)

इसके साथ 'शास्त्र' शब्द को संयुक्त करने पर बननेवाला शब्द दर्शनशास्त्र शिक्षा / शासन / अनुशासन इस दर्शन की शिक्षा का उपाय है व्यवहार में जिसे साँख्य-दर्शन तथा योग-दर्शन का शास्त्र / विद्या कहा जाता है। 

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार विद्या के भी पुनः दो प्रकार हैं एक है अपरा विद्या अर्थात् वेद वेदाङ्ग स्मृतियाँ आदि ग्रन्थ और दूसरी है ब्रह्मविद्या जिसकी प्राप्ति तत्वदर्शियों से ही और इसके पात्र को ही हो सकती है।

शौनको ह महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ। कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति।।३।।

द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च।।४।।

(मुण्डक १, खण्ड १)

चूँकि वह तत्व मुझे उस तरह से अवगत नहीं है जैसा कि तत्वदर्शी उसे जानते हैं और उसके संबंध में मुझे केवल  अनुमानपरक जानकारी ही है इसलिए उसे मैं अज्ञात की संज्ञा दे रहा हूँ। 

उस तत्व की प्रत्यभिज्ञा जिन माध्यमों से तुम जैसे चेतन (sentient / conscious) प्रकृतियों (beings) और हम जैसी जड / अचेतन (insentient) वस्तुओं और प्रणालियों को होती है वे निम्न हैं 

उस तत्व / शक्ति की अभिव्यक्ति (manifestation) इन प्रकारों से होती है :

इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, क्रिया-शक्ति और अधिष्ठान। 

किसी जड / अचेतन वस्तु (insentient thing) में उसकी अभिव्यक्ति (manifestation) दृश्यरूप में, और चेतन (sentient / conscious being) में दृक् के रूप में होती है। मैं तुम्हारे लिए और तुम्हारे सन्दर्भ में दृश्य वस्तु हूँ, जबकि तुम मेरे लिए अधिष्ठान भी हो और और दृक् भी हो।

इच्छा-शक्ति की अभिव्यक्ति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के रूप में होती है -क्रमशः द्विबीजपत्री (dycotyledon) और एकबीजपत्री (monocotyledon) रूपों में। इसलिए गेहूँ, खजूर, मक्का आदि अन्नों में अधिष्ठान अविभाजित होता है, जबकि मटर, चना आदि में द्विभाजित।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।१४।।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।।

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।१५।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ३)

यह ब्रह्म वही अविनाशी अविकारी अजर अमर एकमेव और अद्वितीय अधिष्ठान अर्थात् आत्मा / परमात्म-तत्व है जिसका उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २ के श्लोक १७ को उद्धृत कर मैंने प्रारम्भ में ही कर दिया था।

इस प्रकार उस अज्ञात से ही यह सब व्यक्त और अव्यक्त प्रकट होता है और उसमें ही स्थिर रहता हुआ पुनः उसमें ही विलीन होता रहता है।

ऐतरेयोपनिषद् प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड :

ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्।। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।।१।।

स इमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचिर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः।।२।।

पुनः इच्छा शक्ति ही उस अज्ञात तत्व या अधिष्ठान की कामना है जिसके लिए कहा जाता है :

स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्।।३।।

मनुष्य के सन्दर्भ में कर्तृत्व और भोक्तृत्व इच्छा-शक्ति की अभिव्यक्ति है, जबकि ज्ञातृत्व ज्ञान-शक्ति की। स्वामित्व अहंकार अर्थात् अधिष्ठान की अभिव्यक्ति है। इन्हीं चारों की क्रीडा यह संसार है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व भी तप ही है और इस तप का क्रमशः परिपक्व होना ही आध्यात्मिक उत्परिवर्तन (Evolution) है।"

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February 12, 2023

मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्...

योग(दर्शन) का इतिहास

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ४

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवान् अहम् अव्ययम्।।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।३।।

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नारायणाथर्वशीर्षम् 

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ॐ सह नाववतु।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

ॐ अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। नारायणात्प्राणो जायते मनः सर्वेन्द्रियाणि च।

खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।

 नारायणाद्ब्रह्मा जायते।

नारायणाद्रुद्रो जायते।

नारायणादिन्द्रो जायते।

नारायणात्प्रजापतिः प्रजायतेः।

नारायणाद् द्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते।

नारायणात्प्रवर्तन्ते।

नारायणे प्रलीयन्ते।

एतद्-ऋग्वेद-शिरोऽधीते।।१।।

अथ नित्यो नारायणः।

ब्रह्मा नारायणः।

शिवश्च नारायणः।

शक्रश्च नारायणः।

कालश्च नारायणः।

दिशश्च नारायणः। 

विदिशश्च नारायणः।

ऊर्ध्वं च नारायणः।

अधश्च नारायणः।

√ नारायण एवेदं यद्भूतं यच्च भव्यम्। 

निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित्।

य एवं वेद स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव भवति।

एतद्यजुर्वेदशिरोऽधीते।।२।।

ओमित्यग्रे व्याहरेत्।

नम इति पश्चात्।

नारायणायेत्युपरिष्टात्।

ओमित्येकाक्षरम्।

नम इति द्वे अक्षरे।

नारायणायेति पञ्चाक्षराणि।

एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम्।

यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति।

अनपब्रुवः सर्वमायुरेति।

विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते ततोऽमृतत्वमश्नुत इति।

एतत्सामवेदशिरोऽधीते।।३।।

प्रत्यगानन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपम्। 

अकार उकार मकार इति। 

ता अनेकधा समभवत्तदेतदोमिति।

यमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्मसंसारबन्धनात्।

ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठभुवनं गमिष्यति।

तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभ्रमात्रम्।

ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः।

ब्रह्मण्यो पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युत इति।

सर्वभूतस्थमेकं वै नारायणपुरुषमकारणं परं ब्रह्मोम्। 

एतदथर्वशिरोऽधीते।।४।।

फलश्रुतिः 

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। तत्सायं प्रातरधीयानः पापोऽपापो भवति। मध्यन्दिनमादित्याभिमुखोऽधीयानः पञ्चमहापातकोपपातकात्  प्रमुच्यते। सर्ववेदपारायणपुण्यं लभते। नारायणसायुज्यमवाप्नोति श्रीमन्नारायणसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद।। ५।।

इत्युपनिषद्।।

ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।। 

।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।। 

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इस प्रकार से, नारायणाथर्वशीर्षम् उपनिषद् में :

योग (दर्शन) का सम्पूर्ण इतिहास वर्णित किया गया है। 

स्वायंभुव मनु सृष्टि-संवत् के सातवें वर्तमान मनु हैं।

मुण्डकोपनिषद्, प्रथम मुण्डक (Head) --

प्रथम खण्ड --

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव

विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा-

मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह।।१।।

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा-

थर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्।।

स भारद्वाजाय सत्यवहाय

प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम्।।२।।

इस प्रकार सतयुग में ब्रह्मविद्या का वर्चस्व था और ऋषि ही इस विद्या के प्रणेता थे इसलिए उन्हें ब्राह्मण कहा गया। वंशानुक्रम और गोत्र के अनुसार क्रमशः चार वर्ण अस्तित्व में आए जिसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ४ के निम्न श्लोक में है :

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।१३।।

"मां" पद का संबंध उसी "अहं" पद से है जिसका उल्लेख इसी अध्याय के पहले ही श्लोक में प्रारंभ में किया गया है।

महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन का उद्घाटन किया, जबकि महर्षि कपिल ने साङ्ख्यदर्शन का। ये वैदिक षट्-दर्शन उपाय हैं और सभी एक दूसरे से स्वतन्त्र एवं अपने-आप में परिपूर्ण भी हैं। 

सतयुग के अन्त में साङ्ख्यदर्शन और योगदर्शन दोनों विलुप्त हो गए। त्रेतायुग में सूर्य आदित्य के वंश में क्षत्रिय वर्ण में मनु का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें भगवान् श्रीराम ने जन्म लिया। इन्हीं मनु महाराज को विवस्वान् (आदित्य) के द्वारा योग(दर्शन) का तत्त्व प्रदान किया गया। 

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।।

(सूर्याथर्वशीर्षम्)

इस प्रकार मनु महाराज को इस योग(दर्शन) की प्राप्ति अपने ही अन्तर्हृदय में हुई। उस अन्तर्हृदय अर्थात् ब्रह्मा ने अपने आपको दो प्रकारों में विभाजित किया -- मन (चेतना) और प्राण ।

मन ने ज्ञानशक्ति का, और प्राण ने कार्यशक्ति का रूप लिया।

मन और प्राण बुद्धि में परिणत हुए और बुद्धि के उद्भव के बाद  मनन और चिन्तन प्रारंभ हुआ। मनु मन है, बुद्धि शतरूपा।

सतयुग साङ्ख्य और ज्ञानप्रधान था, जबकि त्रेतायुग योग और कर्मप्रधान हुआ। द्वापरयुग में दोनों का ही समान रूप से वर्चस्व था। महाभारत युद्ध और कलियुग के प्रारंभ होने से पहले ही भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार हुआ जिसका वर्णन ऊपर उद्धृत नारायणाथर्वशीर्षम् में है।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।१३।।

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ८)

इसी का विस्तार है।

यह हुआ योग(दर्शन) का संक्षिप्त इतिहास।

***