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August 15, 2023

Question / प्रश्न 37

उसके 'नोट्स'

-- क्रमशः --

--

Question / प्रश्न 37.

वह लिखता है :

सबसे बड़ा सवाल जिसने मुझे विचलित कर रखा था, आत्महत्या के औचित्य / अनौचित्य का यह प्रश्न था। परन्तु इस ओर ध्यान जाते ही, कि इस प्रश्न की वैधता ही संदिग्ध है, मेरा मन तुरन्त ही शान्त हो गया। यह शान्ति किसी भी प्रकार के विचार, कल्पना, तर्क, निश्चय, निष्कर्ष, किसी भी नए या पुराने सिद्धान्त, अनुमान या धारणा आदि पर आधारित कोई नई एक और बौद्धिक वैचारिक प्रतिक्रियामात्र न होकर, तथ्य को स्पष्टता से देख पाने में खड़े अवरोध के दूर हो जाने से दिखलाई दे रही वास्तविकता ही थी। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता है कि यह शान्ति कहीं से आने या जाने वाली कोई वस्तु थी या है। किन्तु इसका आविष्कार तो किया ही जा सकता है। और इस आविष्कार के हो पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि किसी भी प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले यह देखा जाए कि कहीं प्रश्न में ही तो कोई बुनियादी भूल तो नहीं है? जीवन के बड़े से बड़े प्रश्नों पर गंभीर चिन्तन करते समय प्रायः इस तरफ ध्यान ही नहीं जा पाता है, इसकी कल्पना तक नहीं हो पाती कि प्रश्न में ही तो कहीं कोई भूल नहीं है? फिर भी कभी कभी या संयोगवश ही, या फिर मन के बहुत शान्त होने की स्थिति में अनायास यह संभव हो जाता है।

न कर्तृत्वं न कर्माणि

लोकस्य सृजति प्रभुः।।

न कर्मफलसंयोगं

स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं

न चैव सुकृतं विभुः।।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं

तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तदज्ञानं

येषां नाशितमात्मनः।।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं

प्रकाशयति तत् परम्।।१६।। 

श्रीमद्भगवद्गीता में अध्याय ५ के उपरोक्त  श्लोकों को पढ़ते ही इस ओर ध्यान गया कि आत्महत्या के औचित्य या अनौचित्य के इस प्रश्न में क्या भूल थी।

उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल के स्वतंत्र  अस्तित्व की इस अवधारणा में ही मूलतः कोई त्रुटि है। और इन तीनों अवधारणाओं का आधार स्वतन्त्र कर्ता की अवधारणा ही है।

आत्महत्या के औचित्य या अनौचित्य के सन्दर्भ में, अज्ञानवश पहले ही से यह मान लिया जाता है कि आत्महत्या करनेवाला इस कर्म को करने के लिए स्वतन्त्र है।

इसलिए यह पूछना, कि आत्महत्या करना पाप है या नहीं, मूर्खता है या बुद्धिमानी है, इसीलिए गलत है क्योंकि आत्महत्या एक ऐसा कर्म है जो केवल परिस्थितियों और उन पाँच निमित्तों का परिणाम / फल है जिन्हें गीता के अध्याय १८ में इस प्रकार से वर्णित किया गया है :

पञ्चैतानि महाबाहो

कारणानि निबोध मे।।

साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि

सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता

करणं च पृथग्विधम्।।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा

दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्-

कर्म प्रारभते नरः।।

न्याय्यं वा विपरीतं वा

पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

तथा सति कर्तार-

मात्मानं केवलं तु यः।।

पश्यत्यकृत्बुद्धित्वा-

न्न पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

***


  



July 30, 2023

The Mediocrity

आम आदमी

आम आदमी के बारे में वह भी सोचता था और इसलिए भी उसका अध्यात्म और धर्म के उस प्रकार पर भरोसा नहीं जो कि आम आदमी की मानसिकता के सन्दर्भ में सामाजिक स्तर पर दिखाई देता है। उसके इस चिन्तन में उसे किसी ईश्वर की मान्यता भी अनावश्यक प्रतीत होती थी। 'नोट्स' में उसने आगे लिखा था :

सांख्य-दर्शन की दृष्टि से भी किसी ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं हो सकता है। इसी तरह चूँकि ईश्वर के 'न होने' को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता, इसलिए और जैसा कि योग-दर्शन समाधिपाद में औपचारिक रूप से 'ईश्वर' को परिभाषित करते हुए कहा गया है :

ईश्वरप्रणिधानाद्वा।।२३।।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।। 

-- ।।२४।।

उसका संशय निराधार है, यह भी नहीं कह सकते।

उसने आगे लिखा था, फिर :

ईश्वर-अंश जीव अविनाशी।।

इस उद्धरण के अर्थ की व्याख्या भी भिन्न भिन्न प्रकार से की जा सकती है और किसी पुरुष-विशेष के 'ईश्वर' होने के मत को अकाट्य सत्य की तरह कैसे स्वीकार किया जा सकता है? और 

"जीव ईश्वर का ही अंश है, क्या यह भी वैसे ही सत्य नहीं है, जैसे कि :

"ईश्वर जीव का ही अंश है?" 

याद आया महर्षि रमण कृत 'उपदेश-सारः' :

ईशजीवयोर्वेषधीभिदा।।

सत्सवरूपतः वस्तुकेवलम्।।

इसका तात्पर्य यह कि मनुष्यों की अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार ईश्वर और जीव के बीच भेद या अभेद होने की, जैसी भी कल्पना हो, दोनों ही मूलतः एकमेव सत् के ही दो रूप हैं। इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता है कि वैसे उसका झुकाव 'सांख्यनिष्ठा' की ही ओर अधिक था, किन्तु जब तक वह न पूछता, इस बारे में मैं उससे कैसे कुछ कह सकता था? ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि जिसे ईश्वर कहा जा सकता है वह एक मान्यता है या अनुभव, भावना है या अनुभूति, इन्द्रियगम्य-मनोगम्य, या बुद्धिगम्य कोई विषय है, अपने से भिन्न या अभिन्न दूसरी कोई सत्ता। ईश्वर के विषय में स्वयं मुझे भी यह दुविधा है क्योंकि वह जीव की ही तरह "प्रभु" और "विभु" दोनों ही है, जैसा कि गीता में अध्याय 5 के निम्नलिखित श्लोकों में वर्णन किया गया है :

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।

अर्थात् अपने हृदय में उत्पन्न इस अज्ञान को जिसने ज्ञान से नष्ट कर दिया है, उसके लिए वह परम-तत्व परमात्मा या परमेश्वर, आदित्य अर्थात् सूर्य जैसा प्रत्यक्ष हो जाता है।

"इसलिए भी ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं इसे मान्यता या तर्क-वितर्क से नहीं जाना जा सकता है।"

यह उसका निष्कर्ष था। 

उसके 'नोट्स'  में यह सब पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।

***


July 27, 2023

जादू की छड़ी!

The Magic Scale! 

--

यहाँ तक तो सब ठीक ही था। उसके 'नोट्स' पढ़ते पढ़ते मेरा ध्यान इस सच्चाई की ओर गया, कि वह जिस ओर अग्रसर था, वह उस संसार से तालमेल करने की उसकी कोशिश थी, जिसका अस्तित्व उसके ही मन की कल्पना था। वैसे इस तथ्य पर उसका ध्यान नहीं जा सका था कि मन नामक तत्व ही असंख्य रूपों और आकृतियों में उस तरह से अभिव्यक्त होता है, जैसे आकाश असंख्य और भिन्न भिन्न जलाशयों में यद्यपि पृथक् और अलग अलग प्रतीत होता है, फिर भी सबकी एकमात्र आधारभूत और अखण्डित वास्तविकता होता है। उसे एक अथवा अनेक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसके परिप्रेक्ष्य में 'दूसरा' भी कहाँ हो सकता है? इसी प्रकार प्रत्येक जैव-प्रणाली (organism) में यह मन पृथक् पृथक् प्रतीत होता है, वस्तुतः एकमेवोऽद्वितीय होता है। आकाश और असंख्य जलाशयों में प्रतिबिम्बित उसकी भिन्न भिन्न छवियाँ उस आकाश को छूती तक नहीं, और ऐसे प्रत्येक जलाशय में जो आकाश दिखाई देता है वह जल की उपस्थिति से ही होता है। जल के सूखते ही न तो छवि और न वहाँ प्रतीत होनेवाला कोई आकाश दिखाई दे सकता है। किसी भी आधारभूत मन से संबद्ध जैव-प्रणाली में वैसे ही किसी सापेक्ष संसार के होने की मान्यता जागृत होती है, मन के उस अंश में 'स्व' के रूप में मन के उस संसार से जुड़े किसी अस्तित्व का आभास भी, -अर्थात् उस आकाश का प्रतिबिम्ब भी उत्पन्न हो उठता है। यद्यपि संसार क्षण क्षण ही बदलते हुए और सतत ही नए नए रूप में जाना जाता है, 'स्व' का आभास समय से अछूता रहता है और समय  भी मान्यता है इस तथ्य पर किसी का ध्यान नहीं जा पाता है। संसार समय के और समय संसार के सन्दर्भ में तो परस्पर और सापेक्षतः परिवर्तनशील हैं, किन्तु 'स्व' का यह आभास उन दोनों ही की पृष्ठभूमि की तरह साथ रहकर भी अदृश्य, अपरिवर्तनशील वास्तविकता है। 'स्व' का यह आभास भी पुनः संसार के ही साथ साथ प्रकट और विलुप्त होता रहता है और संसार की प्रतीति और 'स्व' के आभास में से किसी एक के न होने की स्थिति में दूसरा भी अस्तित्वमान नहीं हो सकता। इस प्रकार एक साथ, अपरिहार्यतः सह-अस्तित्वमान होना उनके वस्तुतः एक ही सत्य होने की ओर संकेत करता है। उनके उस समान और अन्तर्निहित, अपरिवर्तनशील सत्य को कोई 'स्व' कभी जान ही कैसे सकता है?

इतना लिख लेने के बाद अब लिखने या कहने के लिए और क्या है?

किन्तु फिर भी जब तक उसके 'नोट्स' उपलब्ध हैं, कुछ न कुछ लिखने का बहाना तो होगा ही! 

***


July 23, 2023

उसके 'नोट्स'

श्रद्धा त्रिविधा भवति 

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उसके 'नोट्स' पढ़ते हुए याद आया, वह कितना निश्छल था। वह महत्वाकाँक्षी भी अवश्य ही था, महत्त्वाकाँक्षा का जन्म उसमें स्वार्थबुद्धि के कारण नहीं बल्कि सिर्फ इसलिए हुआ था, क्योंकि वह आदर्शवादी भी था, और उसकी यह महत्त्वाकाँक्षा मूलतः उसके आदर्शों से उत्पन्न हुई सिद्धान्तवादिता का ही परिणाम थी।

वह पूछ रहा था : "क्या आदर्शवादी होना गलत है?"

क्या आदर्शवादी होने का अर्थ यही नहीं है कि मन "जो है", उसे जाने और समझे बिना ही उसका मूल्याँकन कर रहा है, उसके औचित्य और अनौचित्य को तय कर रहा है, और स्मृति के आधार पर, -जो होना चाहिए, उसका आग्रह कर रहा है?

वह बहुत देर तक चुप रहा। वह मेरी बातें सुन तो रहा था किन्तु बहुत सावधान भी था कि मेरी बातों का प्रत्युत्तर कहीं वह स्मृति से उत्पन्न प्रतिक्रिया से न देने लगे। वह बहुत शान्तचित्त था। खिड़की से बाहर, शाम की धूप वृक्षों की फ़ुनगियों पर सोना उँडेल रही थी। पर "सोना उँडेल रही थी" ऐसा कहना भी तो "जो है" उस पर एक टिप्पणी ही तो है! लगता है शायद इसीलिए कहा जाता है :

"All art is imitation."

ऐसा करना, "जो है" उसका वर्णन करते हुए एक सीमा तक तो उसे व्यक्त और प्रतिबिम्बित भी कर सकता है, किन्तु इस तरह "जो है" उससे अलंघ्य दूरी भी बना लेता है, क्योंकि "जो है" अकथ्य, अनिर्वचनीय है, और भाषा की परिसीमा में नहीं बँध सकता।

"क्या आदर्शवाद श्रद्धा ही नहीं होता?"

"क्या सत्य की प्राप्ति के लिए श्रद्धा का होना आवश्यक नहीं है?"

"सत्य क्या कोई नवीन वस्तु है, जिसकी प्राप्ति की जाना है? क्या असत्य का निवारण और निराकरण ही, सत्य के उद्घाटन के लिए पर्याप्त नहीं होता?"

वह फिर लंबे समय तक चुप रहा।

"लगता है कि "विचार", कितना भी श्रेष्ठ क्यों न हो, सत्य को तत्क्षण ही आवरित कर लेता है, उसके सहज दर्शन में अवरोध बन जाता है, जबकि स्मृति से उत्पन्न किसी भी विचार-मात्र से नितान्त रहित, ध्यानपूर्ण अवधान /  (attention), - "जो है" का मूल्याँकन न करते हुए ही अनायास उसे जान लेता है। जाहिर है कि यह "जानना" कोई बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि सत्य का, अर्थात्  - "जो है" का नित नवीन आविष्कार है।

श्रद्धा भी विचार की ही उत्पत्ति है। विचार ही आदर्शों को परिभाषित, स्थापित करता है और मनुष्य अपने आपको (या अपनी कल्पित स्व-प्रतिमा) को आदर्शों के अनुरूप किसी मानसिक छवि में ढालने का यत्न करने में संलग्न हो जाता है।"

मुझे याद आया :

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो योत्रयच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

(अध्याय १७)

श्रद्धा इसलिए तीन प्रकार की - सात्विक, राजसिक और तामसिक होती है :

त्रैगुण्यविषयावेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।४५।।

(अध्याय २)

***


July 19, 2023

नियति और प्रारब्ध

'नोट्स'  3 और 4

जिसे मैं 'निर्वेद' समझ रहा हूँ, उस दशा का साक्षात्कार हो जाने के बाद भी संसार के सन्दर्भ में 'मन' / व्यक्ति के रूप में होने के अपने सीमित अस्तित्व का आभास बुद्धि का आश्रय लेकर नई नई कल्पनाएँ सृजित करते रहने से पीछे नहीं हटा और पुनः पुनः अपने स्वयं के, संसार और संसार से अपने संबंध के बारे में बहुत सी, स्मृतियों और धारणाओं की सत्यता पर प्रश्न तक उठाने से बचता रहा।

जैसे प्रारब्ध और नियति की कल्पना या अवधारणा, जो मूलतः इस दृष्टि से भ्रामक है कि इनमें से प्रथम (प्रारब्ध) को 'कर्म' की तरह परिभाषित और स्वीकार किया जाता है, जबकि नियति को घटना-विशेष। और 'कर्म' भी पुनः 'कर्ता' की ही तरह क्या केवल एक वैचारिक / बौद्धिक कल्पना ही नहीं है? किसी व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य में उसके कर्म को उसका 'संचित कर्म' कहा जाता है, 'प्रारब्ध' या क्रियमाण वह कर्म है जो 'संचित कर्म' के फल के रूप में वर्तमान में व्यक्ति को प्राप्त हो रहा है, और कर्तृत्व-बुद्धि होने पर वह इस समय किए जानेवाले किसी भी कर्म की प्रेरणा भी बन जाता है, कर्तृत्व बुद्धि को ही व्यक्ति-विशेष का 'संस्कार' भी कह सकते हैं।

बुद्धि से मोहित (one who is identified with intellect) मनुष्य में अपने आप के स्वतंत्र कर्ता होने की कल्पना उठती है, जिससे नियंत्रित और परिचालित होकर वह उस कर्म के कल्पित परिणाम को सुखप्रद या दुःखप्रद भी मान लेता है, फिर भी अनुभव से भी स्पष्ट है कि कर्म और उससे प्राप्त होनेवाले उसके फल के बीच  कार्य-कारण का सिद्धान्त कभी लागू होता है, पर सदा ही ऐसा नहीं होता। जब किसी कर्म को किया जाता है, उस समय उसके जिस परिणाम की प्राप्ति की आशा की जाती है, उससे भिन्न और विपरीत, बिलकुल अनपेक्षित भी कोई परिणाम कभी कभी मिल जाता है। इस विषय में कुछ सुनिश्चित नहीं हो सकता। आगामी या भावी कर्म संचित और क्रियमाण के संयुक्त फल का रूप होता है।

नियति वह है जो किसी अंतिम परिणाम की द्योतक होती है। प्रारब्ध व्यक्ति-विशेष की स्मृति में स्थित उसका भाग्य होता है, जबकि नियति समष्टि घटनाक्रम।

नीयते या यत्र च नियतीति।।

यद्यपि समष्टि घटना का कोई साक्षी भी नहीं है और कोई मनुष्य ही इसकी कल्पना करता है, व्यक्ति की स्मृति के सन्दर्भ में स्मृति के साक्षी का अस्तित्व तो स्वतःप्रमाणित वास्तविकता ही है।

स्मृति और इसकी तरह की सभी अन्य वृत्तियों के किसी साक्षी का अस्तित्व भी इसी प्रकार स्वतःसिद्ध ही है, यही 'अहंकार' अर्थात् 'अहं-वृत्ति' का भी साक्षी है। 'अहं वृत्ति' भी जो समस्त अन्य वृत्तियों में विद्यमान वृत्ति है फिर भी यह एक आभास है।

उपदेश सार के अनुसार :

वृत्तयस्त्वहंवृत्तिमाश्रिताः।।

वृत्तयो मनो विद्ध्यहं मनः।।

और विवेक चूडामणि के अनुसार :

अस्ति कश्चित् स्वयं नित्यं अहं-प्रत्ययलम्बनः।।

अवस्था-त्रय साक्षी सन् पञ्च-कोषविलक्षणः।।१२५।।

साक्षी के सन्दर्भ में न तो कर्म, न कर्ता, और न कर्मफल जैसी कोई वस्तु हो सकती है।

अहं-स्फूर्ति (चित् / चैतन्य) के ही चित्त / अहं-प्रत्यय / अहं-संकल्प के रूप में बदलते ही मनुष्य में स्वयं अपने आपके दूसरों से भिन्न होने की, एक विशिष्ट और स्वतंत्र व्यक्ति होने की भावना जन्म लेती है, श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय २ के अनुसार :

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैवं दहति पावकः।।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।२३।।

अच्छेद्योऽयमदाह्ऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।२४।।

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योयमविकार्योऽयमुच्यते।।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।२५।।

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे ध्रुवम्।।

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।२६।।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मत्स्य च।।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।२७।।

इन 'नोट्स' को लिखने का प्रयोजन यही कि इस प्रकार मेरा आध्यात्मिक अनुसंधान अनवरत चलता रहे।

***



July 18, 2023

सम्यक् निष्ठा

निष्ठाएँ और विवेक 

सफलता के मद (नशे) में चूर मैं तब तक आगे बढ़ता रहा जब तक कि रास्ते के पत्थरों से ठोकरें खाकर और काँटों से मेरे दोनों पैर छिलकर लहूलुहान नहीं हो गए। 

उसी रास्ते पर उस पत्थर ने भी मेरा स्वागत किया जिसने मेरे काँच के महल पर आघात किया था। मेरा वह काँच का महल जब ध्वस्त हो चुका तो मेरा ध्यान पत्थर फेंकने वाले पर गया और मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी। युगों जैसी लंबी एक पूरी रात भर मैं व्याकुल रहा। सुबह होने से जरा पहले नींद आ गई और मन से सारा मैल आँखों की राह बहकर निकल गया। दूसरे ही दिन मैं उससे मिलने गया। वह एक भला और सज्जन मनुष्य या कहें तो सन्त-पुरुष था। किन्तु जीवन भर जिन बहुत से सन्तों और धार्मिक व्यक्तियों से मैं अब तक मिला था उन सबसे इस अर्थ में बहुत अलग था कि अध्यात्म, ईश्वर या गुरु जैसे शब्दों का प्रयोग शायद ही कभी उसके मुँह से मैंने सुना हो।

पहली मुलाकात के लिए, बहाने से मैंने उसे अपने शिक्षा संस्थान में नौकरी देने का प्रलोभन दिया था। मुझे उसकी शैक्षिक योग्यता का अनुमान भी लगाना था। क्योंकि उस पर मैं एकाएक भरोसा भी नहीं कर सकता था। यह भी हो सकता था कि अनेक तथाकथित महान ज्ञानियों और विद्वानों की तरह वह भी कोरा बौद्धिक पण्डित भर हो। किन्तु पहले उसने मेरे उस संस्थान और वहाँ की शिक्षा प्रणाली का अवलोकन करना चाहा, जिसे मैंने भी खुशी खुशी स्वीकार कर लिया।

उसकी प्रतिक्रिया जानकर मैं सन्न रह गया। मेरे पैरों तले की धरती खिसक गई। फिर मुझे यह स्पष्ट हो गया, इसी बहाने से मेरा भाग्य मुझ पर मुस्कुराने जा रहा था। फिर मैंने तय किया, इससे मुझे बहुत कुछ सीखना है। तो मैंने उससे मिलना ठान लिया। उसने मुझे नहीं छोड़ा तो मैं भी अब उसे नहीं छोड़ूँगा। मन ही मन यह निश्चय कर लिया।

"मेरा मार्ग क्या है?"

उससे मिलते ही मैंने सवाल दागा।

"कहाँ जाना है आपको?"

"गीता में परम श्रेयस् की प्राप्ति के लिए दो ही प्रकार की निष्ठाओं का उल्लेख किया गया है। एक तो सांख्यनिष्ठा, दूसरा निष्काम कर्म करते हुए अपना सब कुछ ईश्वरार्पित कर देना। मेरे लिए कौन सा ठीक है?"

"दोनों ही मार्गों पर चलकर एक ही फल प्राप्त होता है, किन्तु दोनों ही मार्गों पर चलने का सामर्थ्य बुद्धि से नहीं, विवेक के जागृत होने पर ही होता है। और विवेक के भी क्रमशः दो रूप होते हैं :

बुद्धि के प्रयोग से नित्य और अनित्य के भेद को जानना, और इस प्रकार से जानने के बाद 'सत्' और 'असत्' के भेद पर ध्यान देना।

सत् "जो है।" -- "What Is",

असत् "जो प्रतीत होता है।" -- "What appears and subsequently disappears".

नित्य और अनित्य के भेद को तो रुचि होने पर बच्चा भी समझ सकता है किन्तु 'सत्' और 'असत्' के भेद को तो  सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर ही समझा जा सकता है। जो कि संसार के प्रति अत्यंत और दृढ वैराग्य हो जाने के बाद ही संभव है।"

"संसार के प्रति ऐसा वैराग्य किस प्रकार से जागृत किया जा सकता है?"

"चिन्तन, मनन और निदिध्यासन से।"

"विस्तार से बताइये!"

"जैसा पहले कहा, नित्य और अनित्य के भेद को तो एक बच्चा भी जानता है, किन्तु वह 'जानना' बौद्धिक समझ है। इस भेद पर निरंतर चिन्तन करना और यह जान लेना कि समस्त दृश्य पदार्थ जड और अनित्य हैं, जबकि उन्हें जाननेवाला दृष्टा 'चेतन' अर्थात् चित् / चित्त स्वप्रमाणित है और जो कि अपना प्रमाण भी स्वयं है, यही नित्य है। यही सूक्ष्म बुद्धि है। किन्तु इसी सूक्ष्म बुद्धि के शुद्ध और एकाग्र होने पर जो प्रकाश बुद्धि में फैलता है वह विवेक है।"

मुझे पातञ्जल योगसूत्र साधनपाद याद आया :

योगाङ्गानुष्ठादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।२८।।

और मैंने तुरन्त ही उत्साहपूर्वक इस योगसूत्र का उल्लेख उसके समक्ष कर दिया।

उसने मेरा उत्साहवर्धन करते हुए कहा :

"हाँ, पातञ्जल योगदर्शन के संदर्भ में ऐसा कह सकते हैं कि धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से किसी वृत्ति के निरोध परिणाम, एकाग्रता परिणाम, समाधि परिणाम के सिद्ध होने पर,

"त्रयमेकत्र संयमः।।४।।"

(विभूतिपाद) 

के अनुसार चिन्तन, मनन और निदिध्यासन के संयुक्त हो जाने पर यही दोषरहित बुद्धि, विवेक-ख्याति के रूप में प्रकट हो उठती है।"

यह सुनते ही मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मुझे स्वयं की अपनी निष्ठा की परीक्षा करने का अवसर अनायास ही मिल गया।

क्योंकि जिसे मैं "निर्वेद" की तरह समझ रहा था, उसकी वास्तविकता मुझ पर प्रकट हो चुकी थी। बुद्धि में स्थित  "ईश्वर", "मैं" / "आत्मा" और "गुरु" के कल्पित भेद का पूर्णतः निवारण हो चुका था।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २)

***  

   



July 17, 2023

जीवन का उत्स

'नोट्स'  : क्रमशः 3,

"सफलता" का मद क्या है?"

इसे कोई कैसे जान सकता है?

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

(अध्याय ७)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार प्राणिमात्र जन्म से ही इच्छा और द्वेषरूपी द्वन्द्व और मोहित बुद्धि से युक्त होता है। फिर "मैं" उसका अपवाद कैसे होता?

हाँ कूर्म, कच्छ, वराह, नृसिंह, वामन, भार्गव, राम, कृष्ण-बलराम और कल्कि अवश्य ही अवतार होते हैं इसलिए उनका "अवतरण" होता है न कि "जन्म"। यहाँ "बुद्ध" की गणना नहीं की गई है क्योंकि "बुद्ध" यद्यपि अवतार हो सकते हैं, किन्तु उनके अनुयायी ही इसे स्वीकार नहीं करते। "ब्राह्मण" यद्यपि उन्हें "अवतार" मानते हैं, बौद्ध परंपरा वेद-विरोधी होने से अवतारवाद के "सिद्धान्त" से सहमत नहीं है। ऐतिहासिक दृष्टि से "कृष्ण" के ही साथ  "बलराम" को भी "विष्णु" का अवतार माना जाता है। यही दोनों और उनकी बहन सुभद्रा को वैसे ही अवतरित माना जाता है, जैसे राम के साथ लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न  और सीता को भी क्रमशः "विष्णु" और "लक्ष्मी" के ही रूप में "अवतार" माना जाता है। इस दृष्टि से "बलराम" और "बुद्ध" एक दूसरे के विकल्प, और "विष्णु" के नवें "अवतार" हो सकते हैं।

"सफलता" का मद उसी सम्मोह का परिणाम है जो कि मनुष्य में इच्छा तथा द्वेष का कारण होता है। "अवतार" तो विधि के विधान के अनुसार किसी विशेष प्रयोजन के लिए मनुष्य या अन्य आकृति में प्रकट और विलुप्त होते हैं। मैंने भी एक सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लिया, तो मैं भला "सम्मोह" से कैसे बच सकता था?

इसलिए मुझे कार्य-कारण के सिद्धान्त की संकीर्णता या मर्यादा का आभास है।

मेरे शीशमहल पर पत्थर फेंककर किसी ने उसे चूर-चूर कर दिया इससे मुझे दुःख तो हुआ, परन्तु खिन्न कदापि नहीं हुआ। उस दुःख के बाद दुःखों से मुक्ति भी हो गई।

जब तक मनुष्य इच्छा और द्वेष से युक्त होता है तब तक वह भाग्य और भाग्य विधाता के हाथों का खिलौना होता है। और इच्छा तथा द्वेष, मोहित बुद्धि की डोर में बाँधकर उसे नियंत्रित और संचालित करते रहते हैं।

भाग्य और भाग्य विधाता, एकमेव वास्तविकता के ही दो पक्ष हैं। किन्तु मोहित बुद्धि से ग्रस्त होने से उन्हें परस्पर  एक दूसरे से अलग मान लिया जाता है।

हर मनुष्य इसी प्रकार से अपना जीवन जीता रहता है। और इतना ही नहीं, यहाँ तक कि "ईश्वर" / "अवतार" स्वयं भी विधि के विधान से संचालित होता है, किन्तु उसके लिए यह लीला या नाटक होता है, जबकि मनुष्य और दूसरे भी सभी जीव अपनी बुद्धि से मोहित होने के कारण अपने आपको अपने संसार में, संसार से पृथक्  उसका ही एक ऐसा अंश मान लेते हैं जिसकी स्वतंत्रता सीमित है। "ईश्वर" और "अवतार" इस मान्यता से रहित होते हैं।

इसलिए "ईश्वर" का इष्ट-रूप में स्मरण, चिन्तन, मनन और प्रणिधान से मनुष्य अन्ततः उससे अपनी अनन्यता को जान लेता है। पातञ्जल योगसूत्र, समाधिपाद-२३ :

ईश्वर प्रणिधानाद्वा ।।

में यही कहा गया है।

जब कोई चेतन अस्तित्व जीव-भाव से तादात्म्य कर लेता है और अपने स्वतंत्र कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता और स्वामी होने की बुद्धि को अपने इष्ट "ईश्वर" के प्रति समर्पित कर देता है, तो अनायास ही जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है।

इसलिए अध्यात्म के किसी जिज्ञासु के लिए परम श्रेयस् की प्राप्ति के लिए दो ही प्रकार की निष्ठाएँ हो सकती हैं :

लोकेऽस्मिन्द्विधानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

मैं इच्छा और संकल्प के द्वन्द्व में झूलता हुआ इस तथ्य को भूल रहा था। यही "सफलता" का मोह और मद था, जिसका उस पत्थर फेंकनेवाले ने निवारण कर दिया।

***