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March 20, 2025

The Charioteer.

सेतु पर रथ 

सेतु पर खड़ा है रथ, और रथ पर है आरूढ,

अज्ञ, एक संशयग्रस्त, और श्रद्धारहित मूढ,

पूछता है सखा से वह, सारथी से - हे प्रभो!

कर्तव्य मेरा क्या है, कहो मुझसे रहस्य गूढ!

सारथी ने कहा उससे, मित्र सुनो मेरा वचन --

कर्तव्यमकर्तव्यमन्यथा यच्च तव कर्तव्यं ।

तस्य किमपि प्रमाणञ्च त्वया यच्चावगन्तव्यम्।।

कथं ज्ञातुं शक्नोसि तदस्मिन्विकटे च विषमे।

तथापि तव श्रेयार्थं कथयिष्यामि तुभ्यमहम्।।

द्वे हि मार्गेऽत्र अवलम्बितव्ये ये त्वया।

प्रथमं तु ज्ञानयोगमन्यं तु यत्कर्मयोगम्।।

द्वे हि तेऽपि प्राप्तव्ये अध्यवसायतत्परेण।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः यस्याप्तव्यं तेनैव।।

यो हि विगतमोहबुद्धिः वीतहर्षामर्षभयम्।

रागद्वेषवियुक्तो यः तेनैव तु इदमाप्तव्यं।।

इति श्रुत्वा रथारूढो त्वरितो हि तूष्णीं बभूव। 

आत्मसंस्थं मनः कृत्वा सारथिं प्रोक्तवानिति।।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात्मयाऽच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।

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इति श्रुत्वा रथारूढो त्वरितो हि तूष्णीं बभूव। 

आत्मसंस्थं मनः कृत्वा सारथिं प्रोक्तवानिति।।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात्मयाऽच्युत।

स्थितोऽस्मिगत सन्देहः करिष्ये वचनं तव।। ***




 

  





April 25, 2023

तीसरा प्रश्न

 अव्यय और प्रत्यय

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"क्या तुम एक कविता लिखोगे,

- मेरे लिए!"

मैंने अपने ए आई ऐप से पूछा!

"अवश्य!,

किस विषय में,

किस सन्दर्भ में,

किस परिप्रेक्ष्य में?"

"अव्यय और प्रत्यय!"

"व्याकरण या दर्शन?

दर्शन या अध्यात्म?

नई या पुरानी?"

"कुछ भी, जो भी तुम चाहो!"

"छोटी या बड़ी?"

"न छोटी न बड़ी"

"हास्य या गंभीर?"

"दोनों ही!"

"ठीक है,

मतलब 'रबड़ी!'

"ऐं!"

"रबड़ जैसी लचीली!"

"रबड़ी जैसी शीतल, रसीली!"

और हास्य तो इसमें है ही!"

"नहीं, गंभीर सा कुछ!"

"ठीक है, तो सुनो!

न व्येति इति अव्ययं ।

न व्ययति इति कृपणः।

द्रविणं कञ्चनंवत्।

इति कुञ्जयति,

मञ्जूषायाम् गुह्यति। 

अतो हि कञ्जुः कञ्जुस् कञ्जूस इति।

अपि च,

अव्ययो हि आत्मा अविकारी इति अव्ययः। 

अविकारित्वात् अजरः अमरः च। 

जरायाम् जीर्यते, वयसि वयति। 

अथ प्रतीयते यत् तत् प्रत्ययम्।

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः प्रत्ययानुमेयः प्रत्ययानुगम्यः इति।।

व्याकरणे व्याकुर्वाणि। भाषायामपि।

इति कृतम् ।।"

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May 26, 2015

आज की संस्कृत रचना

आज की संस्कृत रचना
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युधि स्थिरो यो युधिष्ठिरः
कृष्णो तु कार्ष्णमेव च ।
अर्जुनो हि ऋजुताम् याति
अर्जति लभते जयम् ॥
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युधिष्ठिर तो युद्ध से अप्रभावित हैं,
और श्रीकृष्ण सदा पार्श्व में, पर्दे के पीछे से सूत्र संचालन करते हैं,
केवल अर्जुन ही हैं जो सरल भाव से अपने प्राप्त हुए कर्तव्य को पूरा करते हैं और अन्त में विजय प्राप्त करते हैं ।
इसलिए गीता का उपदेश युधिष्ठिर को नहीं अर्जुन को ही दिया गया । वे ही सर्वाधिक प्रासंगिक हैं ।
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