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July 07, 2024

84 विचार, विश्वास और विवेक

Question  /  प्रश्न 84 :

What is Destiny, Thought (noun and verb), Belief (idea / concept) and the Discrimination?

And, What is the Fate / whatever that happens / the Event?

प्रश्न : नियति, विचार (संज्ञापद और कर्मपद तथा क्रियापद), विश्वास और विवेक क्या है?

और प्रारब्ध क्या है? 

Answer   /  उत्तर :

Scaler / अदिश and और Vector /  सदिश :

मात्रा Quantum, quantity

बल Force, और 

वेग Velocity.

--

A Scaler quantity (अदिश राशि) is the value of quantum (मात्रा)  and is independent of  direction, while vector / (सदिश राशि) has a direction. An example of this is :

Speed and velocity.

We can say that a car is moving with the speed of 60 km per hour, when there is no direction has been mentioned.

We can likewise say the speed of light or sound is a particular fixed quantity. 

But when we talk about its direction, the speed is considered in terms of velocity : northwards or eastwards, towards or from a direction.

It's implied that there is energy involved in this movement of an object.

The Force (बल) is the action exerted and applied onto the object.

This is the Physics of Matter, Mass and Energy.

This is verily the Physical Science.

The same principle could be helpful in  understanding the Physics of Mind too because Matter and Mind both of the two are the aspects of the Known while the knowing is the consciousness where-in this phenomenon takes place.

Basically the perception that is an event is a non-verbal aspect of phenomenon.

The verbal aspect of an event is only the description in the form of Thought as a noun and also as a verb.

A noun is independent of Time, a verb is essentially with reference to Time.

Thought is a perceptible event either as a noun or as a verb in assumed Time.

The Knowing though is independent of Thought and Time, it's with or without Thought.

Is there something / someone, a Knower that could said to exist and be apart and different from Thought and at the same  time other than and from Knowing?

Isn't this assumed Knower again only an unquestioned, Unexamined idea or a  concept only that too is Known in and because of consciousness where there is no division of object and subject exists.

Only from and out of the consciousness arises the experience / perception of an object and according to the multiplicity of perceived objects, a subject appears to have existence and is accepted as the self.

The phenomenon of emergence of many verbal thoughts depends on so many words, and a language how-so-ever primitive or a developed one. 

This phenomenal Thought, the memory, the information is knowledge.

The memory of the self and the multiple objects constitutes an imaginary, and so an assumed world of the self or oneself. 

Every individual has one's own such an objective world independent of all such so many worlds of all the so many other  individuals.

Once came into existence, the superficial idea of this self at once assumes as the core truth and the only Reality.

This self, the individual strung upon the memory assumes continuity of the world and oneself, though changing, it remaines fixed as well.

After the arrival of the verbal thoughts, this becomes a firm and strong ground for the belief - a set of so many thoughts and ideas all the time giving rise to what is called concepts.

Concepts then carve out a religion where it needs repeated affirmations always.

Accordingly a Faith gets divided into so many factions though looks as if it is one and whole a Single Reality.

The Single Reality though One, survives with the help of the middlemen who try to explain and interpret the Book that is again a compilation of words only.

This is how Thought, Belief and Faith rule over the minds of men.

Thought is the Energy, Belief is the Force and Faith is the Speed with or without a direction. With Direction, it is called a Religion.

An altogether different movement in the consciousness  / at the individual level of the man and at the collective level of the human Mind, however goes on in the abeyance where nothing happens.

No event, no happening, no conflict, nor thought, idea, no belief nor Faith, beyond Time. This may be called the Awareness or the Attention.

Attention and consciousness together are two aspects of Reality. Either of them isn't found in the absence of the other.

With the emergence of Discrimination / (विवेक) an altogether new understanding emerges out and in the light of this new revelation is the ending of all conflict. 

Summarily, in a nutshell this may be the Answer to the Question 84.

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July 18, 2023

सम्यक् निष्ठा

निष्ठाएँ और विवेक 

सफलता के मद (नशे) में चूर मैं तब तक आगे बढ़ता रहा जब तक कि रास्ते के पत्थरों से ठोकरें खाकर और काँटों से मेरे दोनों पैर छिलकर लहूलुहान नहीं हो गए। 

उसी रास्ते पर उस पत्थर ने भी मेरा स्वागत किया जिसने मेरे काँच के महल पर आघात किया था। मेरा वह काँच का महल जब ध्वस्त हो चुका तो मेरा ध्यान पत्थर फेंकने वाले पर गया और मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी। युगों जैसी लंबी एक पूरी रात भर मैं व्याकुल रहा। सुबह होने से जरा पहले नींद आ गई और मन से सारा मैल आँखों की राह बहकर निकल गया। दूसरे ही दिन मैं उससे मिलने गया। वह एक भला और सज्जन मनुष्य या कहें तो सन्त-पुरुष था। किन्तु जीवन भर जिन बहुत से सन्तों और धार्मिक व्यक्तियों से मैं अब तक मिला था उन सबसे इस अर्थ में बहुत अलग था कि अध्यात्म, ईश्वर या गुरु जैसे शब्दों का प्रयोग शायद ही कभी उसके मुँह से मैंने सुना हो।

पहली मुलाकात के लिए, बहाने से मैंने उसे अपने शिक्षा संस्थान में नौकरी देने का प्रलोभन दिया था। मुझे उसकी शैक्षिक योग्यता का अनुमान भी लगाना था। क्योंकि उस पर मैं एकाएक भरोसा भी नहीं कर सकता था। यह भी हो सकता था कि अनेक तथाकथित महान ज्ञानियों और विद्वानों की तरह वह भी कोरा बौद्धिक पण्डित भर हो। किन्तु पहले उसने मेरे उस संस्थान और वहाँ की शिक्षा प्रणाली का अवलोकन करना चाहा, जिसे मैंने भी खुशी खुशी स्वीकार कर लिया।

उसकी प्रतिक्रिया जानकर मैं सन्न रह गया। मेरे पैरों तले की धरती खिसक गई। फिर मुझे यह स्पष्ट हो गया, इसी बहाने से मेरा भाग्य मुझ पर मुस्कुराने जा रहा था। फिर मैंने तय किया, इससे मुझे बहुत कुछ सीखना है। तो मैंने उससे मिलना ठान लिया। उसने मुझे नहीं छोड़ा तो मैं भी अब उसे नहीं छोड़ूँगा। मन ही मन यह निश्चय कर लिया।

"मेरा मार्ग क्या है?"

उससे मिलते ही मैंने सवाल दागा।

"कहाँ जाना है आपको?"

"गीता में परम श्रेयस् की प्राप्ति के लिए दो ही प्रकार की निष्ठाओं का उल्लेख किया गया है। एक तो सांख्यनिष्ठा, दूसरा निष्काम कर्म करते हुए अपना सब कुछ ईश्वरार्पित कर देना। मेरे लिए कौन सा ठीक है?"

"दोनों ही मार्गों पर चलकर एक ही फल प्राप्त होता है, किन्तु दोनों ही मार्गों पर चलने का सामर्थ्य बुद्धि से नहीं, विवेक के जागृत होने पर ही होता है। और विवेक के भी क्रमशः दो रूप होते हैं :

बुद्धि के प्रयोग से नित्य और अनित्य के भेद को जानना, और इस प्रकार से जानने के बाद 'सत्' और 'असत्' के भेद पर ध्यान देना।

सत् "जो है।" -- "What Is",

असत् "जो प्रतीत होता है।" -- "What appears and subsequently disappears".

नित्य और अनित्य के भेद को तो रुचि होने पर बच्चा भी समझ सकता है किन्तु 'सत्' और 'असत्' के भेद को तो  सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर ही समझा जा सकता है। जो कि संसार के प्रति अत्यंत और दृढ वैराग्य हो जाने के बाद ही संभव है।"

"संसार के प्रति ऐसा वैराग्य किस प्रकार से जागृत किया जा सकता है?"

"चिन्तन, मनन और निदिध्यासन से।"

"विस्तार से बताइये!"

"जैसा पहले कहा, नित्य और अनित्य के भेद को तो एक बच्चा भी जानता है, किन्तु वह 'जानना' बौद्धिक समझ है। इस भेद पर निरंतर चिन्तन करना और यह जान लेना कि समस्त दृश्य पदार्थ जड और अनित्य हैं, जबकि उन्हें जाननेवाला दृष्टा 'चेतन' अर्थात् चित् / चित्त स्वप्रमाणित है और जो कि अपना प्रमाण भी स्वयं है, यही नित्य है। यही सूक्ष्म बुद्धि है। किन्तु इसी सूक्ष्म बुद्धि के शुद्ध और एकाग्र होने पर जो प्रकाश बुद्धि में फैलता है वह विवेक है।"

मुझे पातञ्जल योगसूत्र साधनपाद याद आया :

योगाङ्गानुष्ठादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।२८।।

और मैंने तुरन्त ही उत्साहपूर्वक इस योगसूत्र का उल्लेख उसके समक्ष कर दिया।

उसने मेरा उत्साहवर्धन करते हुए कहा :

"हाँ, पातञ्जल योगदर्शन के संदर्भ में ऐसा कह सकते हैं कि धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से किसी वृत्ति के निरोध परिणाम, एकाग्रता परिणाम, समाधि परिणाम के सिद्ध होने पर,

"त्रयमेकत्र संयमः।।४।।"

(विभूतिपाद) 

के अनुसार चिन्तन, मनन और निदिध्यासन के संयुक्त हो जाने पर यही दोषरहित बुद्धि, विवेक-ख्याति के रूप में प्रकट हो उठती है।"

यह सुनते ही मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मुझे स्वयं की अपनी निष्ठा की परीक्षा करने का अवसर अनायास ही मिल गया।

क्योंकि जिसे मैं "निर्वेद" की तरह समझ रहा था, उसकी वास्तविकता मुझ पर प्रकट हो चुकी थी। बुद्धि में स्थित  "ईश्वर", "मैं" / "आत्मा" और "गुरु" के कल्पित भेद का पूर्णतः निवारण हो चुका था।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २)

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August 03, 2022

भय और संवेदनशीलता

निर्भयता और स्वतन्त्रता

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भय एकमात्र बन्धन है जो जीवन की सरल, सहज, स्वाभाविक अभिव्यक्ति को अवरुद्ध, कुंठित, और विकृत भी कर देता है । भय तो मन की प्रकृति-प्रदत्त एक प्रवृत्ति-विशेष है, जो इसका द्योतक है कि अस्तित्व पर कोई संकट उपस्थित है जिसका कि सामना करना है। शरीर में पहले से ही प्रकृति-प्रदत्त यह प्रवृत्ति अवचेतन स्तर पर विद्यमान होती है और फिर यही चेतन मन में  भी व्यक्त होकर स्मृति में संचित हो जाती है। इस दृष्टि से भय का प्रभाव दो प्रकार से होता है। एक, तात्कालिक आवश्यकता के रूप में होनेवाली त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में, दूसरा स्मृति में संचित पहले के संकटों और उनसे रक्षा के लिए किए गए अपने विभिन्न अनुभवों के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न हुए, संभावित और प्रतीत होनेवाले नए और काल्पनिक संकटों से रक्षा के लिए की जानेवाली प्रतिक्रिया के रूप में। इस प्रकार से, भय चेतन और अवचेतन इन दो प्रकारों में स्मृति से उत्पन्न होता है। भविष्य का भय, आशा, आशंका आदि ऐसे ही मानसिक भय मात्र होते हैं, जो कि समय की आवश्यकता के अनुसार पैदा होते रहते हैं। परिस्थिति का, समाज का, लोगों का, विपरीत विषम संकटों आदि का भय, इस प्रकार वास्तविक या काल्पनिक हो सकता है। किन्तु इसका सही आकलन न कर पाने से व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन जटिल और मुश्किल हो जाता है। एक दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा होता है, और मनुष्य सामाजिक बाध्यताओं से भयग्रस्त हो जाता है। उसी भय का सन्दर्भ-बिन्दु की तरह से  प्रयोग कर तमाम राजनैतिक महत्वाकाँक्षाएँ जागृत हो उठती हैं, जो मनुष्य-मात्र को प्रभावित करती हैं। उसी आधार से जुड़कर अलग अलग परंपराएँ जन्म लेती हैं और पनपती भी हैं। इन्हीं भिन्न भिन्न परंपराओं के बीच परस्पर संदेह, संशय, अविश्वास और मतभेद होने से मनुष्यों के बीच तमाम ध्येय, भय, संकल्प  आशंकाएँ, आदि पैदा हो जाते हैं। शायद यही हमारा सामूहिक अतीत, वर्तमान और भविष्य भी है।

यदि इस तथ्य पर ध्यान दिया जाए तो बहुत से अनावश्यक और काल्पनिक संकटों के अतिरंजित भयों से सिर्फ बचा ही नहीं जा सकता, बल्कि अपनी संपूर्ण मानवीय सभ्यता की और समूचे मानवीय अस्तित्व की रक्षा भी की जा सकती है। इसके लिए जरूरत है, -बुद्धि के साथ साथ संवेदनशील होने की, विवेक के आविष्कार और उसके प्रयोग से बुद्धि के दोषों को दूर करने की, क्योंकि बुद्धि कितनी भी अधिक सूक्ष्म, कुशल और सक्षम क्यों न हो, तर्क का ही क्षेत्र है, और तर्क भी पुनः छल, कुतर्क, कपट या दुराग्रह भी हो सकता है, जिससे लगभग प्रत्येक, बड़े से बड़े बुद्धिजीवी की बुद्धि भी मलिन या मोहित हो जाया करती है। प्रायः किसी भी ध्येय, आदर्श, सिद्धान्त-विशेष से बँधे बुद्धिजीवी भी अपनी बुद्धि में विद्यमान अन्तर्विरोधों, अज्ञान और संशयों से अनभिज्ञ हुआ करते हैं, और अपने मत पर एक हद तक दृढता से डटे रहते हैं। यही कारण है कि तमाम बुद्धिजीवियों में परस्पर गहरे मतभेद दिखाई देते हैं। यह स्थिति उनमें संवेदनशीलता की कमी से ही पैदा होती है। संवेदनशीलता बुद्धि का विषय कदापि नहीं होती, बल्कि मनुष्य में किसी विषय के संबंध में ही होती है, बिलकुल नहीं होती, या कम या अधिक अंशों में हो सकती है। किसी भी प्रकार की संवेदनशीलता मूलतः तो विषय-निरपेक्ष ही होती है, किन्तु उसे किसी विषय के साथ जोड़ते ही कोई और विशेष रूप ग्रहण कर लेती है। उदाहरण के लिए, हिंसा-अहिंसा के बारे में विचार करते समय मनुष्य उसे पाप-पुण्य के सन्दर्भ में, या फिर नैतिकता / अनैतिकता के सन्दर्भ  में परिभाषित करने लगता है। तब उसे धर्म-अधर्म की कसौटी पर सही-गलत कहा-समझा और समझाया जाता है। जैसे युद्ध छिड़ जाने पर शत्रु को मार डालने, या शत्रु के हाथों मर जाने को कर्तव्य माना जाता है, और उस परिस्थिति में हिंसा-अहिंसा पर ध्यान देने का कोई महत्व नहीं रह जाता है। सामान्य अर्थ में जिसे संवेदन-शीलता कहा जाता है, उसे बुद्धि की कसौटी पर इसीलिए तय नहीं किया जा सकता। 

बुद्धिजीवियों की संवेदनशीलता इस तरह, भिन्न भिन्न प्रकार की होती है इसलिए, किसी तथ्य को उनकी बुद्धि भिन्न भिन्न प्रकार से ग्रहण करती है। लेकिन, क्या इससे तथ्य बदल सकता है? किन्तु यदि उनमें संवेदनशीलता है तो वे तथ्य को और अधिक अच्छी तरह से समझ सकेंगे, और तब उनके बीच विद्यमान सारे अन्तर्विरोधों को दूर कर पाना संभव है।

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June 07, 2022

आत्मानुसन्धान

सूक्ष्मदर्शी जिज्ञासु और तत्ववेत्ता

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मेरे अन्य ब्लॉग prashastasamagra में पिछले दो दिनों में मैंने "चतुःश्लोकी भागवतम्" पोस्ट किया।

अत्यन्त संक्षिप्त "चतुःश्लोकी भागवतम्"  स्तोत्र में श्रीभगवान् द्वारा ब्रह्माजी को आत्मा अर्थात् परमात्मा के तत्व का, एवं उस तत्त्व के साक्षात्कार का, अर्थात् आत्मानुसन्धान करने का क्या तरीका है, -इसका उपदेश दिया गया है। आत्मानुसन्धान की प्रक्रिया वैसे तो दुरूह जान पड़ती है, किन्तु जो मनुष्य ज्ञान-अज्ञान से ऊपर उठकर विवेक अर्थात् विज्ञान का आश्रय लेता है, उसे अनायास ही वैराग्य की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि वैराग्य नित्य-अनित्य के अभ्यास का स्वाभाविक परिणाम ही है। ऐसे ही विवेक और उससे फलित वैराग्य से युक्त किसी जिज्ञासु को ही "अन्वय-व्यतिरेक" के अभ्यास का निर्देश दिया जाता है, और आत्मा या परमात्मा यद्यपि दुर्दर्श है, फिर भी इस उपाय से पात्र के लिए अवश्य ही प्राप्य है। पात्र वह है, जिसने इससे पूर्व नित्य-अनित्य का चिन्तन दीर्घकाल तक एकाग्र चित्त से किया होता है।

आत्मा चूँकि अपने आप से भिन्न वस्तु नहीं है, और 'स्व' अर्थात् अहंकार अपना व्यक्तिगत और स्वतंत्र अस्तित्व होने की कल्पना मात्र, इसीलिए आत्म-साक्षात्कार बहुत कठिन प्रतीत होता है। यह कल्पना भी चूँकि बुद्धि (विज्ञानमय-कोष) में ही उठती है, इसलिए इस कल्पना का लय होते ही प्रत्येक मनुष्य को अपनी आत्मा का परोक्ष अनुभव हो जाता है, जो कि उसकी स्मृति में संचित होकर व्यक्तिगत 'स्व' का रूप ले लेता है। लय और विनाश, यही दोनों इस अहंकार के मिटने के प्रकार हैं, लय में अहंकार से निवृत्ति अस्थायी रूप से होती है, जबकि विनाश में अहंकार की मृत्यु ही हो जाती है :

चित्तवायवश्चित्क्रियायुता।।

शाखयोर्द्वयी शक्तिमूलका।।१२।।

लयविनाशने उभयरोधने।।

लयगतं पुनर्भवति नो मृतम्।।१३।।

(श्रीरमण महर्षि कृत उपदेश-सार)

यमराज कहते हैं :

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।। 

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।।१२।।

एषः सर्वेषु भूतेषु गूढः आत्मा न प्रकाशते। दृश्यते तु-अग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।।

यह गूढ आत्मा किसी को भी प्रत्यक्षतः तो नहीं दिखलाई देती, किन्तु यदि शुद्ध और सूक्ष्म बुद्धि से इसे जानने का यत्न किया जाए, तो सूक्ष्मदृष्टि से युक्त मनुष्यों द्वारा इसे अवश्य देख लिया जाता है।

इसे और भी स्पष्ट करते हुए वे नचिकेता से कहते हैं :

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि।। 

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि।।१३।।

यच्छेत् वाङ्-मनसी प्राज्ञः तत् यच्छेत् ज्ञानः आत्मनि। 

ज्ञानं आत्मनि महति नियच्छेत् तत् यच्छेत् शान्त आत्मनि।। 

(यहाँ मनसि का 'मनसी' प्रयोग छान्दस् है -- मनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम् ... शाङ्करभाष्य)

प्राज्ञ अर्थात् आत्मा के जिज्ञासु को चाहिए, कि सबसे पहले वह वाणी का लय मन में करे, मन का लय ज्ञान में अर्थात् बुद्धिरूपी आत्मा में करे, फिर बुद्धिरूपी आत्मा का भी लय महत् आत्मा अर्थात् 'चित्' / चेतना / चैतन्य में और इसके अनन्तर उस 'चित्' का भी लय शान्त-आत्मा अर्थात् 'सत्' में करे।

यह प्रक्रिया अवश्य ही बहुत कठिन है किन्तु यही वह तरीका है जिसका उपदेश यमराज द्वारा उनके सर्वाधिक सुयोग्य और प्रिय शिष्य को दिया गया है। 

आगे वे उसका उत्साह-वर्धन करते हुए उससे कहते हैं :

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया ...

दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।१४।।

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया । दुर्गं पथः तत् कवयः वदन्ति।। 

हे नचिकेता! उठो, जागो! श्रेष्ठ पुरुषों के उद्बोधन से शिक्षा ग्रहण करो! (आत्मानुसन्धान का) यह पथ तलवार की धार पर चलने जैसा असि-धार व्रत की तरह ही अत्यन्त ही कठिन है। तत्वदर्शी ऐसा कहते हैं।

दुरत्यया :

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।। 

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ७)

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May 31, 2022

विवेक और अविवेक

तितीर्षु / तितीर्षा / तृषा

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यमराज मंगल कामना को अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं :

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्।।

अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत्ँशकेमहि।।२।।

यः सेतुः ईजानानां अक्षरं ब्रह्म यत् परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि।। 

जो नाचिकेत / त्रिणाचिकेत / पञ्चाग्नि नामक अग्नि / विद्या है, जो कि अक्षर परम ब्रह्म है, उस विद्या रूपी सेतु से संसार से पार जाने के अभिलाषी हम उपासक, उस सेतु के माध्यम से अभय पद रूपी ब्रह्म को प्राप्त कर सकें।

इस अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए, 

आत्मान्ँ रथिनं विद्धि शरीर्ँ रथमेव तु।। 

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।३।।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथं एव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहं एव च।।

आत्मा अर्थात् स्वयं अपने-आप को रथ पर आरूढ के रूप में जानो, शरीर को उस रथ की तरह, जिस पर तुम आत्मा के रूप में आरूढ हो। बुद्धि को उस रथ को चलानेवाला सारथी समझो, और मन को उन अश्वों की वल्गा (लगाम / bridle) जो कि इस शरीर रूपी रथ में जुते हुए हैं।

कौन से अश्व? 

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयान्ँस्तेषु गोचरान्।।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तूत्याहुर्मनीषिणः।।४।।

इन्द्रियाणि हयान् आहुः विषयान् तेषु गोचरान्। आत्मा-इन्द्रिय-मनः-युक्तं भोक्ता-इति-आहुः-मनीषिणः।।

इस शरीर रूपी रथ में इन्द्रियों को हय, अर्थात् अश्व कहा जाता है, विषयों को वह भूमि जिस पर वे अश्व चलते हैं, क्योंकि विषय ही वह क्षेत्र है, जिसमें मनुष्य की इन्द्रियाँ गतिशील होती हैं।  इन्द्रियों और मन से युक्त होने पर आत्मा ही विविध भोगों का भोक्ता है, ऐसा मनीषी कहते हैं।।

अविवेकी पुरुष की गति

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यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।।

तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः।।५।।

यः तु अविज्ञानवान् भवति अयुक्तेन मनसा सदा।  तस्य इन्द्रियाणि अवश्यानि दुष्ट-अश्वाः इव सारथेः।।

जिस मनुष्य (अर्थात् आत्मा) का सारथी (बुद्धि) विवेक-हीन होता है, और इसी तरह जिसका मन भी अयुक्त, असामञ्जस्य अर्थात् विसंगति से युक्त होता है, उसकी इन्द्रियाँ भी उन अश्वों की ही तरह उसके वश से बाहर होती हैं, जैसे किसी रथ में जोते हुए वे अश्व जिन पर सारथी का नियंत्रण नहीं होता।

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विवेकशील पुरुष की गति

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यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा।। 

तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः।।६।।

यः तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्य इन्द्रियाणि वश्यानि सद् अश्वा इव सारथेः।। 

अविवेकी पुरुष की तुलना में, जिस पुरुष (आत्मा) की बुद्धि / सारथी, विवेक से युक्त, और जिसका मन सामञ्जस्यपूर्ण होता है, उसकी इन्द्रियाँ भी उस रथ में जुते अश्वों की ही तरह उसके अनुशासन और नियंत्रण में होती हैं जिसका सारथी अपने रथ का संचालन कुशलता से करता हो। 

अविवेकी और विवेकी पुरुष की गति क्रमशः कैसी होती है, अब इसका वर्णन किया जाता है :

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः।।

न स तत्पदमाप्नोति स्ँसारं चाधिगच्छति।।७।।

यः तु अविज्ञानवान् भवति अमनस्कः सदा अशुचि। न सः तत् पदं आप्नोति संसारं च अधिगच्छति।। 

जो मनुष्य अविवेकसे युक्त बुद्धि का आश्रय लेता है, जिसका मन विशृङ्खल और अस्त-व्यस्त होता है, जो सदा अशुद्ध होता है, वह उस परमात्मा, परम पद को तो प्राप्त नहीं करता, किन्तु संसार में ही रहता है (और इस दुःखालय रूपी) संसार में सदैव शोक से ग्रस्त होता है। 

इसकी तुलना में :

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः।।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते।।८।।

यः तु विज्ञानवान् भवति स-मनस्कः सदा शुचिः। सः तु तत् पदं आप्नोति यस्मात् भूयः न जायते।।

किन्तु जो विवेकशील बुद्धि और श्रेष्ठ मनवाला, सदैव शुद्ध होता है, वह उस परमात्मा को, उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, जिसे प्राप्त करने के बाद पुनः जन्म नहीं होता।

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