April 25, 2023
चौथा प्रश्न
September 11, 2021
प्रतिलिपि / प्रतिच्छाया
निर्णय, भान, विषयी और विषय...
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कोई विषय हमें आकर्षित करता है । कोई विचार हमें आकर्षित करता है। कोई विषय हमें विकर्षित करता है। कोई विचार हमें विकर्षित करता है। कोई विषय / विचार हममें कोई भावना जाग्रत करता है। कोई विषय / विचार हमें छूता तक नहीं। कोई विषय / विचार स्मृति से एकाएक ऊपर उभर आता है।
अच्छे और बुरे की भावना, प्रिय और अप्रिय की भावना, लज्जा या शर्म, संशय, चिन्ता, व्यग्रता, व्याकुलता, सुरक्षा, क्रोध, लोभ, असमंजस, आशा और निराशा, ग्लानि और ऐसी दूसरी भी कई भावनाएँ कभी किसी विषय के सामने आते ही प्रायः जाग्रत हो उठती हैं। इनमें से शायद सर्वाधिक विशिष्ट और इनसे कुछ भिन्न और विलक्षण भावना भी होती है जिसे भविष्य अथवा भूतकाल कहा जाता है। इस पूरी वास्तविकता पर शायद ही कभी हमारा ध्यान जाता हो । पर यही तो जीवन की रीत ही है और अगर कहें कि हर किसी के ही साथ ही ऐसा हुआ करता है, तो यह कहना गलत न होगा। हम इस विषय में सचेत रहें या न रहें, जीवन की यह गतिविधि कभी रुकती नहीं।
या तो हम जीवन की इस गतिविधि के प्रति सजग और सचेत होते हैं, या बाहरी परिस्थितियों के, या अपने संस्कारों के दबाव में भावनाओं को किसी हद तक वश में कर लेते हैं। फिर भी, जब इस प्रकार से किन्हीं भावनाओं को, या किसी एक को भी वश में कर लिया जाता है, तो वे मन की गहराई में कुंठित और दबी रहकर कुलबुलाती रहती हैं, और अनुकूल परिस्थिति होते ही अचानक फूट पड़ती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के होने में वैसे तो समय लगता है, किन्तु क्या 'समय' भी एक विचार या भावना (या एक साथ दोनों ही) नहीं होता? समय, जिसे अभी अभी 'प्रक्रिया ' पर आरोपित किया गया है! इस 'समय' नामक वस्तु की क्या कोई भौतिक सत्ता होती है? क्या दूसरी भौतिक राशियों की तरह से इसकी माप-जोख की जा सकती है? क्या इसे मापने या तौलने का विचार या कल्पना निरर्थक और हास्यास्पद नहीं है? किन्तु हम सभी इस बारे में इतने अभ्यस्त होते हैं, और इतने अधिक इतनी पूरी तरह से आश्वस्त, सुनिश्चित होते हैं कि कभी शायद ही इस पर हमारा ध्यान जाता हो, कि 'समय' नामक किसी वस्तु की क्या कोई वास्तविकता है!
भावना एक जीवंत (alive or live) प्राणवान, जीता-जागता तथ्य होता है, कोई जड, या भौतिक इन्द्रियग्राह्य वस्तु नहीं होता, किन्तु इसे नाम या शब्द दिए जाते ही 'विचार' जन्म लेता है, और तब, भावना ही विचार की सहायता से स्मृति में रूपान्तरित हो जाती है। एक ही समय पर अनेक भावनाओं की स्मृति होने पर उनकी परस्पर तुलना की जाने लगती है, जो कि विचार के ही माध्यम से घटित होता है।
भावना को शब्द या नाम दिए जाते ही,
"मुझे पता है!" या "पता है!"
इस प्रकार का ज्ञान (या ज्ञान का भ्रम) हममें पैदा हो जाता है।
फिर ऐसी ही किसी भावना से प्रेरित व्यवहार या आचरण को 'कार्य' / 'कर्म' कहा जाता है और पुनः उस कार्य तथा ऐसे ही असंख्य कार्यों को घटना के रूप में 'अपनी' स्मृति में संजो लिया जाता है।
इसी तरह की एक और सर्वाधिक प्रमुख भावना, जो कि निरंतर ही उत्पन्न होती और पुनः पुनः विलीन भी होती रहती है, वह है - 'अपने' होने, या अस्तित्व में होते हुए भी अस्तित्व से कुछ भिन्न, अलग और पृथक् भी होने की भावना। यही भावना, अपनी इस आभासी निरंतरता से, बुद्धि में अपने कुछ विशेष, और अस्तित्व / संसार से पृथक् कुछ होने के अनुमान, और फिर स्मृति में ढल जाती है, जो क्रमशः दृढ और स्थायी (जैसी) लगने लगती है।
इसे ही बोलचाल में "मैं" शब्द से व्यक्त किया जाता है, और फिर इस तरह से 'अपने' व्यक्तित्व का जन्म होता है। यद्यपि यह "मैं" सबके लिए (और हरेक के लिए भी) अपने नितान्त निजि प्रयोग की वस्तु होता है, फिर भी बातचीत में सभी इस शब्द का प्रयोग किया करते हैं। किन्तु इस प्रकार से इस शब्द के जिस तात्पर्य का भान और बोध होता है, उससे मनुष्य 'अपने' और अपने संसार के बीच आभासी, कृत्रिम विभाजन की एक काल्पनिक दीवार खड़ी कर लेता है।
इस प्रकार से असंख्य व्यक्तियों के अपने अपने संसार होते हैं, जो एक दूसरे से यद्यपि अत्यंत भिन्न और पृथक् होते हैं, फिर भी एक सर्वसम्मत भौतिक संसार / विश्व (objective world) सबका भी अवश्य होता ही है, जिसे सभी एक ही मानते हैं और इस बारे में किसी का किसी से कोई मतभेद भी नहीं होता। जिसे हर मनुष्य अपनी जाग्रत अवस्था में अनुभव करता है। मनुष्य-मात्र में अपने स्वयं के, और अपने संसार के बीच का यह कृत्रिम, काल्पनिक, वैचारिक विभाजन "मैं" शब्द के (असावधानी से किए जानेवाले) सतत प्रयोग से निरंतर दृढ होता रहता है। यह भी कहा और पूछा जा सकता है कि (क्या) पशु-पक्षियों आदि तथा अन्य जीवित कहे जानेवाले 'चेतन' / sentient प्राणियों में भी ऐसी भावना, उस भावना की ऐसी निरंतरता, तथा उसकी कोई स्मृति होती होगी, और क्या वह केवल शरीर और शरीर की स्मृति तक ही सीमित होती होगी? उनके पास भी कहने अथवा सोचने के लिए "मैं" जैसा, या ऐसा कोई और शब्द होता होगा, जिससे वे अपनी स्मृति में स्वयं की एक ऐसी छवि बना सकें, -जैसे कि मनुष्य बना लिया करता है?
इस समूची स्थिति / वास्तविकता का भान / बोध हो जाने पर और इस प्रकार से इसका अवलोकन कर लेने पर, क्या हममें / मन में कोई नई भावना जाग्रत होती है?
स्पष्ट है कि 'मन' भी ऐसा ही एक शब्द भर है, जो भावना के प्रभाव की तरह, भावना के अर्थ का द्योतक है, - न कि ऐसी कोई वास्तविकता या सत्य (Reality or truth).
क्या यह मन, मूलतः एक भावना ही नहीं है, जो यद्यपि क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहा होता है, किन्तु उसका अस्तित्व नहीं मिटता। इस विवेचना को विचार की सहायता से किसी शास्त्र से संबद्ध (relate) कर, शास्त्ररूपी वैचारिक क्रम या सिद्धान्त का रूप भी शायद दिया जा सकता हो, और भ्रम को और अधिक दृढता प्रदान की जा सकती हो, लेकिन वह सब केवल वैचारिक भूल भुलैया में अंतहीन भटकाव भी हो सकता है।
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विषय (object) और (subject) के रूप में जागरूक होना, सचेत होना, भान होना, -क्या पुनः भावना ही नहीं है?
कभी हम सचेत होते हैं, जो भान होने से ही संभव होता है। कभी हम अचेत होते हैं, तो उस अवस्था में - "भान नहीं था, और हम चेतनारहित थे", -ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पुनः सचेत होने पर हमें स्पष्टता से तथा निश्चयपूर्वक पता होता है कि तब भी हम थे ही, और हममें अपने होने का भान भी अवश्य ही था! इसकी तुलना हम अपनी निद्रावस्था से कर इसे और भी बेहतर समझ सकते हैं।
कभी हम जानकारी / विचार का सहारा लेकर सचेत होते हैं, जो शायद यांत्रिक, स्मृति से सीमित और अभ्यासजनित होता है। किन्तु अपने होने का स्वाभाविक भान, अस्तित्व के प्रति सचेत होना, यह सजगता, यह जागृति क्या अभ्यासजनित होती है!
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July 31, 2021
चेतना, विचार और अस्तित्व
पिछले पोस्ट का शीर्षक था :
विचार और अस्तित्व
उसी क्रम में, 'चेतना' के सन्दर्भ में देखें तो अस्तित्व ही चेतना है, और चेतना ही अस्तित्व है। चेतना के लिए अन्य शब्द 'भान' का प्रयोग किया जाता है या किया जा सकता है।
पातञ्जल योग सूत्र में तथा संस्कृत के व्याकरण शास्त्र में प्रत्यय शब्द का प्रयोग,
"प्रतीयते विधीयते इति प्रत्ययः" के अनुसार प्रयुक्त होता है।
इस प्रकार किसी शब्द के साथ किसी प्रत्यय को संयुक्त करने पर उस शब्द के तात्पर्य के बदलने का कार्य प्रत्यय के माध्यम से होता है। अंग्रेजी भाषा में इसे suffix, prefix, infix कहा जाता है। Arabic भाषा में और उसी रीति से उर्दू में केवल प्रत्यय के ही प्रयोग से असंख्य शब्द बनाए जाते हैं जिनसे ऐसे व्युत्पन्न शब्द के विशेष अर्थ को व्यक्त किया जाता है।
किन्तु पातञ्जल योग सूत्र में प्रत्यय का तात्पर्य है 'बोध', जो कि भावगत, विचारगत, बुद्धिगत हो सकता है। कोष के अनुसार इस शब्द का अर्थ है ज्ञान जो अंग्रेजी भाषा के perception शब्द का समानार्थी है।
ज्ञान के तीन पक्ष हैं ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञात अर्थात्
Knower, whatever that one may try to know, and the known.
ज्ञाता पुनः कोई चेतन सत्ता (entity) ही होता है जो किसी दूसरे को जानने या न जानने की स्थिति में भी अपने आप के बोध से युक्त होता है। यह बोध मूलतः न तो भावगत, न विचारगत और न ही बुद्धिगत हो सकता है क्योंकि यह भाव, विचार या बुद्धि के अभाव में भी विद्यमान होता ही है । जैसे ही इस सहज और स्वाभाविक बोध में अन्य अपने से भिन्न किसी दूसरे विषय का प्रवेश होता है तत्क्षण ही उस भिन्न विषय / वस्तु (object) को 'यह' 'वह' अथवा 'तुम' के रूप में अनुभव किया जाता है। इसी के साथ युगपत् (simultaneously) अपने आपको 'मैं' अर्थात् 'अहं' के रूप में स्वीकार किया जाता है।
संस्कृत के व्याकरण के अन्तर्गत 'मैं', 'तुम' तथा 'यह', 'वह', 'जो', 'कौन' ही क्रमशः उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष तथा अन्य पुरुष के रूप में अस्मत् / अस्मद्, युष्मत् / युष्मद् और तत् / अदस् इत्यादि सर्वनाम प्रत्यय होते हैं ।
अस्मद् से अस्मि तथा I AM, युष्मद् से YOU तथा तत् से THAT, इदम् से IT की समानता से यह कहा जा सकता है कि यह केवल संयोगजन्य (coincidental) नहीं है। एक और प्रत्यय है 'त्वं' जो 'त्व' की तरह GREEK / LATIN 'THOU' का मूल है। 'WE' का साम्य और अर्थ 'वयं' से दृष्टव्य है।
बोध का अस्तित्व और अस्तित्व का बोध / ज्ञान / प्रत्यय, भाषा के उद्भव से भी पूर्व से ही स्वप्रमाणित ही है ।
यह बोध ही वह अधिष्ठान है जिसे चेतना कहा जाता है, जो कि अहं, त्वं, तत्, इदं आदि प्रत्ययों से युक्त होते ही अपने और अपने संसार का कारण होता है।
गीता के अध्याय १० तथा अध्याय १३ में इस शब्द का प्रयोग इन दो श्लोकों में दृष्टव्य है, :
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।।
तथा,
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतः।।६।।
इस प्रकार चेतना वस्तुतः शुद्ध बोधस्वरूप चैतन्य होते हुए भी, विकार से युक्त होने पर जीव-चेतना के रूप में उसे क्षेत्र कहा गया है, जबकि जीव-चेतना में प्रतिबिम्बित उस चैतन्य को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।
प्रसंगवश यहाँ अध्याय १३ के ही इन दोनों श्लोकों का उल्लेख किया जा सकता है :
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।१।।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।२।।
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June 30, 2021
अस्तित्व और भान
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भान, प्रेम और ज्ञान
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अस्तित्व का भान अस्तित्व से अभिन्न है।
अस्तित्व है तो उसका भान है, और निःसन्देह भान का अस्तित्व ही भान है। इस प्रकार भान और अस्तित्व एक ही वस्तु को दिए गए दो अलग अलग शब्द मात्र हैं।
किन्तु यह सत्य भी इतना ही रोचक तथ्य है कि अस्तित्व और उसके भान में जिसका अस्तित्व है, वह उससे अभिन्न है जिसे कि अस्तित्व का भान है।
इसलिए ऐसे अस्तित्व और इस भान में अपने-पराये अर्थात् 'मैं' तथा 'मुझसे भिन्न' जैसा कोई विभाजन होता ही नहीं ।
किन्तु जब इसी अस्तित्व अर्थात् भान में बुद्धि के सक्रिय होने पर 'मैं' नामक विचार उठता है तो जो ज्ञानरूपी आभास पैदा होता है उस ज्ञानरूपी आभास में ही पुनः 'मैं' नामक विचार का रूपान्तरण 'मैं' के कर्ता, विचारकर्ता, अनुभवकर्ता, तथा स्वामी होने के रूप में प्रतीत होने लगता है।
स्पष्ट है कि अस्तित्व तथा भान किसी 'चेतना' के अन्तर्गत संभव होते हैं। यह चेतना मूलतः तो यद्यपि ज्ञान-अज्ञान-निरपेक्ष, नित्य, शाश्वत, चिरन्तन, काल-स्थान-निरपेक्ष अधिष्ठान-मात्र ही होती है, किन्तु किसी शरीर-विशेष से इसका संबंध होने पर इसे इसके निर्वैयक्तिक स्वरूप से भिन्न वैयक्तिक प्रकार की तरह बुद्धि के अन्तर्गत स्वीकार कर लिया जाता है।
इस प्रकार से 'मैं' के अस्तित्व को ज्ञान के माध्यम से एक स्वतंत्र सत्ता की तरह अपने-आपका अस्तित्व समझ लिया जाता है।
यह 'मैं' अर्थात् आभासी सतत विकारशील स्वतंत्र सत्ता जब अपने स्रोत को खोजने में प्रवृत्त हो उठती है, तो इसका ध्यान ज्ञान-अज्ञान-निरपेक्ष उस भान की ओर जाता है जो कि इसका अविकारी अस्तित्व और इसकी वास्तविक निजता है।
अपनी यह निजता ही अस्तित्व, अस्तित्व का भान, तथा वह प्रेम है जो अविकारी, परस्पर अविभाज्य तथा अनिर्वचनीय है।
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