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September 13, 2024

namAmidevinarmade

त्वदीय पादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।।

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Question / प्रश्न 110

How Ancient Is narmadA?

नर्मदा कितनी प्राचीन है?

Answer  /  उत्तर :

।।ॐ नमः तत्सद्ब्रह्मणे।।



जिसे हम भौगोलिक अर्थ में एक नदी की तरह जानते हैं, वह नर्मदा नदी अवश्य ही पृथ्वी से अधिक प्राचीन नहीं है, किन्तु जिसे हम पुराणों के माध्यम से जानते हैं उसके स्वरूप की तीन कलाएँ व्यक्त जगत् में दृष्टिगत हो सकती हैं। चूँकि वेद, पुराण, स्मृतियाँ, और षट्-दर्शन भी केवल तीन ही कलाओं से व्यक्त जगत में पाए जाते हैं, इसलिए मनुष्य की अल्प और अपरिष्कृत बुद्धि के लिए उन तीनों प्रकारों / कलाओं  / (genres) में विरोधाभास प्रतीत हो सकता है क्योंकि मनुष्य की भौतिक बुद्धि काल की तीन काल की इन कलाओं को समय के अतीत, वर्तमान और आगामी एक-रेखीय आयाम में ही देख सकती है जबकि काल की गति सातों लोकों भूः भुवः स्वः महः जनः तपः और सत्यम् में भिन्न भिन्न है।

पुनः ब्रह्म के भी क्रमशः दो नाम और रूप सकल और निष्कल हैं। सकल ब्रह्म तो ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के रूपों में अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डों की सृष्टि, परिपालन और लय करता है, जबकि निष्कल केवल निश्चल साक्षी के रूप में कालनिरपेक्ष वास्तविकता है। 

काल भी पुनः क्रमशः अचल अटल और चर इन दो रूपों में अपना कार्य करता है। इसे चर रूप की गति भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः और तपः इन छः लोकों में तो भिन्न भिन्न हैती है किन्तु सातवें लोक "सत्यम्" में इसका कोई कार्य शेष नहीं रहता।

इसी प्रकार स्वयं ब्रह्मा भी स्वरूपतः कालनिरपेक्ष और कालसापेक्षता इन दो, क्रमशः अव्यक्त और व्यक्त रूपों में सदा प्रकट ही रहते हैं।

ब्रह्म के अनेक और असंख्य व्यक्त प्रकारों में व्यक्त चेतना जीव के रूप में सतत अभिव्यक्त और अभिव्यक्त होती रहती है और इसलिए सापेक्ष दृष्टि से इनमें से प्रत्येक का ही अस्तित्व इन सातों ही लोकों :

क्रमशः भूः, भुवः, स्वः, जनः, महः, तपः और सत्यम् में सार्वकालिक होता है।

पुनः प्रत्येक ही जीव (जो कि अपरिहार्यतः पदार्थ और चेतना का अविभाज्य और संयुक्त रूप होता है) किसी भी समय इन सातों लोकों में अस्तित्वमान होता है और प्रत्येक में ही पुनः चेतना की भिन्न भिन्न प्रकार की चार कलाओं में (जिनमें से प्रत्येक ही शेष तीनों का निषेध करती है), अवस्थित होता है।

ये चार कलाएँ ही चेतना की जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और समाधि अर्थात् तुरीय। और प्रत्येक मनुष्य अनुभव से भी जानता ही है कि किसी भी समय वह इनमें से किसी एक में ही अवस्थित होता है। अर्थात् जब वह जाग्रत होता है, तब स्वप्न अथवा सुषुप्ति में नहीं होता, जब वह स्वप्न देख रहा होता है तब वह न तो जाग्रत और न ही सुषुप्त होता है, और इसी तरह जब वह सुषुप्त होता है तब भी न स्वप्न देख रहा होता है और न ही जाग्रत होता है। संकल्पपूर्वक ध्यान इत्यादि के प्रयासों, दैवी संयोग या प्रारब्धवश वह क्रमशः समाधिस्थ या अचेत भी हो सकता है। इसे तुरीय दशा कहा जाता है। 

इसी प्रकार प्रत्येक जीव के रूप में उद्भूत चेतना विशेष (आत्मा) एक ही समय में उपरोक्त सभी सातों लोकों में और किसी एक मानसिक दशा (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अधिष्ठित होती है। भूः भूलोक इन्द्रियगम्य अनुभवों और ज्ञान का लोक है, भुवः - मानसिक लोक है जिसे मनो, बुद्धि, और चित्त के माध्यम से अनुभव किया जाता है अर्थात भुवर्लोक या वह स्थान जहाँ पर प्रत्येक ही जीव प्रारब्ध की गति से नियंत्रित होकर सुख दुःखों आदि का भोग यंत्रवत् किया करता है। स्वर्लोक अर्थात् स्वः या स्वयं और संसार दोनों की युगपत् प्रतीति जहाँ होती है। यही मनुष्यों और सभी जीव जन्तुओं में अपने विशिष्ट होने की कल्पना उत्पन्न होती है। इससे उच्चतर वे लोक हैं जिन्हें महः, तपः और सत्यम् कहा जाता है। जब कोई मनुष्य या उन्नत चेतना किसी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर कोई असाधारण संकल्प और वैसा कार्य करती है तो वह जिस लोक में होती है उसे महः कहा जाता है जिसका वर्णन गीता के दसवें अध्याय "विभूति योग" में प्राप्त हो सकता है। जनः वह लोक है जिसमें सभी पुण्यवान या पतित जन्म लेते हैं और सहभागिता भी करते हैं। वाल्मीकि रामायण में "जनस्थान" के रूप में इसका बहुत अच्छा उल्लेख है। ब्रह्मा (आब्रह्म) की ही तरह नर्मदा का स्वरूप भी इसी प्रकार कालनिरपेक्ष और कालसापेक्ष तथा इन सभी लोकों में समान रूप से पाया और अपनी पात्रता होने पर अनुभव भी किया जा सकता है।

ब्रह्मा जब विष्णु की नाभि से कमल के पुष्प में अवतीर्ण हुए और अपने चार आननों से चतुर्दिक् देखा तो आश्चर्य और कौतूहल से भर गए। तब उन्हें अपनी सृष्टि होने का भान हुआ और उनमें उस कारण, तत्व और प्रयोजन को जानने की उत्सुकता, उत्कंठा और जिज्ञासा हुई जिससे उनकी सृष्टि हुई। उन्होंने भूः, भुवः और स्वः तक को तो जान लिया था किन्तु इस जिज्ञासुरपि महत्वाकाँक्षा के ही कारण वे महः लोक और तपः लोक से भी परिचित हो गए। सृष्टि होने ही जन्मरूपी जनस्थान या जनः लोक से तो वे प्रारंभ ही से अवगत थे।

तब उन्हें तपःलोक प्राप्त हुआ और वे नर्मदा के सप्तधारा तट पर निवास करते हुए कठोर तप करने लगे। नर्मदा के इस स्थान को इस प्रकार से ब्रह्म कला या ब्रह्मकलाम् / ब्रह्मकलां नाम प्राप्त हुआ और कालान्तर में विरूपित हो जाने से उसे ही बरमन कलान का नाम प्राप्त हुआ। 

संक्षेप में, नर्मदा स्वरूपतः तो भगवान् ब्रह्मा से भी पूर्व और प्राचीन समय से है।

संभवतः स्कन्द पुराण के रेवाखण्ड में जिसे नर्मदा पुराण भी कहा जाता है इसका उल्लेख पाया जा सकता है।

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August 06, 2024

और, ठीक आठ साल बाद,

अब,

आज 06 अगस्त है। परसों 04 08 2024 के दिन दोपहर 02 बजे उज्जैन से चला था और कल 05 08 2024 के दिन सुबह 05:30 के लगभग यहाँ पहुँचा।

वर्ष 2016 के मार्च माह की 19 तारीख को उज्जैन से नर्मदातट पर स्थित केवटग्राम नावघाटखेड़ी के लिए निकला था जहाँ पर 31 07 2016 पर स्वास्थ्य बिगड़  गया था और वहाँ आगे रह पाना असंभव हो गया था। एक मित्र को फोन पर बताया तो उन्होंने एम्बुलेंस भेज दी, जो इलाज के लिए इंदौर-खंडवा-रोड पर स्थित चिकित्सालय ले गई। ठीक हो जाने पर अगस्त 2016 की 05 तारीख को मैं देवास चला गया। देवास से वर्ष 2019 के नवंबर में किसी दिन पुनः उज्जैन के लिए वहाँ से रवाना हुआ। उज्जैन में रहने के उस दौरान कोरोना फैला और वर्ष 2023 के मई माह तक उज्जैन में रहा। फिर एक मित्र के गाँव चला गया।  उस गाँव में 2024 के मार्च माह तक रहने के बाद पुनः उज्जैन चला आया। मार्च-अप्रैल 2024 के बाद 05-08-2024 तक जैसे तैसे उज्जैन में रहने के बाद तय पाया कि उज्जैन में आगे और रहना संभव नहीं है, इसलिए 05-08-2024 के दिन वहाँ से निकला और कल याने अगस्त  06-08-2024 के दिन सुबह यहाँ पहुँचा। 2016 का वह एक सप्ताह और 2024 का यह सप्ताह आश्चर्यजनक रूप से समान थे। बिल्कुल ही समान और मानों वैसी ही मानसिक और शारीरिक स्थितियों की पुनरावृत्ति भर हो रही है ऐसा लगता है।

नर्मदा-तट पर पहले वर्ष 1984 में एक दिन के लिए, और फिर 1991-92 में अनेक बार आया और वहाँ से अन्यत्र जा चुका था किन्तु इस बार का यहाँ का आना अप्रत्याशित और आकस्मिक संयोग ही जान पड़ता है। आभास होता है कि अपनी शेष आयु यहीं पर बिता सकूंगा।।

नर्मदे हर!!

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May 12, 2023

श्रीरामचन्द्रचरणौ

नर्मदा परिक्रमा संक्षिप्त 

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पुनः एक बार उस परिक्रमा पथ पर, जहाँ पता नहीं कितने दीर्घ काल से असंख्य श्रद्धालु सांसारिक पापात्मा, पुण्यात्मा, योगी, तपस्वी, माँ नर्मदा की प्रदक्षिणा करते आ रहे हैं, उसके साथ मैं बाबा भोलेनाथ की समाधि पर जा पहुँचा।

उस दिन वहाँ एक और वृद्ध व्यक्ति से भेंट हुई । पता चला यह तो वही भक्त थे जो कि बाबा के अंतिम समय तक उनके साथ थे। बहुत दूर से वे आए थे और शायद ही इसके बाद कभी आ सकेंगे, क्योंकि उनकी उम्र भी बहुत अधिक थी। उन्हें भी पता था कि वे संभवतः आखिरी बार समाधि के दर्शन के लिए आए हैं।

हम दोनों पास ही धरती पर बैठ गए। उन्हें न तो ठीक से सुनाई देता था और न ही दिखाई देता था। जब हम वहाँ पहुँचे तो यह देखकर मुझे और उसे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ कि वे समाधि पर, उस चबूतरे पर बैठकर श्रीरामरक्षा-स्तोत्र का पाठ कर रहे थे।

उनका पाठ पूरा हो जाने पर हमने उन्हें प्रणाम किया तो बोले :

"आ गए सही स्थान पर।"

हम दोनों कुछ नहीं बोले, तो वे ही बोलने लगे 

"यही मेरा गुरुमंत्र है जो मुझे बाबा से प्राप्त हुआ था।

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। 

रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम

श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम

श्रीराम राम शरणं भव राम राम।।२८।।

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि

श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि

श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये।।२९।।

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः

स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-

र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।३०।।

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।। 

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।८।।

कविः पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।९।।

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तः योगबलेन चैव।।

भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।

।।१०।।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहणेन प्रवक्ष्ये।।११।।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।१३।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ८)

फिर हमारी तरफ देखते हुए बोले -

इन दोनों पाठों की फलश्रुति समान ही है।।

यही बाबा भोलेनाथ से हमें प्राप्त हुआ था। 

कहते हुए फिर धीरे धीरे चलते हुए वहाँ से चले गए।

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May 11, 2023

बाबा भोलेनाथ

एक अनसुलझा रहस्य

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नर्मदा किनारे पर परिक्रमा पथ पर उसके साथ टहलते हुए हम दोनों रुक गए।

उसने पूछा : "यहाँ से एक किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर ही एक स्थान है। वैसे तो वहाँ पूर्णिमा और अमावस्या के दिन कुछ यात्रियों के अलावा कोई नहीं आता जाता, किन्तु कुछ और लोग जिन्हें इस स्थान का महत्व ज्ञात है कभी कभी और जब भी यहाँ आते हैं, श्रद्धावश ही सही, समाधि के दर्शन करने वहाँ अवश्य जाया करते हैं।"

"हाँ चलते हैं! हम भी अनायास प्राप्त हुए इस सौभाग्य से वंचित क्यों रहें!"

एक चबूतरा था, जिस पर एक शिवलिङ्ग स्थापित था। पास ही खड़ी चट्टान पर धुँधले अक्षरों में लिखा था :

"बाबा भोलेनाथ की समाधि यहाँ है।"

हमने प्रणाम किया और वहाँ पड़े चने-चिरौंजी के एक दो दाने उठाकर मुँह में डाले।

लौटते हुए उसने बताया कि वैसे तो यह समाधि बहुत पुरानी भी नहीं है। एक बार बाबा भोलेनाथ यहाँ से कुछ दूर स्थित किसी स्थान से यहाँ आने के लिए किसी बस में सवार हुए थे। बस में काफी जगह थी और भीड़ भी नहीं थी। बाबा को कुछ लोग तो बहुत बड़ा संत या महात्मा मानते थे, कुछ लोग उनका मजाक भी उड़ाते थे। जब वे बस की प्रतीक्षा में सड़क किनारे और दो तीन लोगों के साथ खड़े थे तो सबसे कह रहे थे : इस बस में मत चढ़ना, इसका एक्सीडेंट होनेवाला है। लोग कौतूहल, भय और संदेहपूर्वक उनकी बातों को चुन रहे थे। कुछ लोग उनकी बात मान रहे थे और उस बस के आने पर भी उस पर नहीं चढ़े। जब बाबा खुद भी अपने एक भक्त के साथ बस पर चढ़ गए तो लोगों को आश्चर्य हुआ पर कोई क्या कह सकता था। दूसरे दिन सुबह खबर आई कि बस का ब्रेक फेल हो जाने से वह लुढ़क गई और उसमें ड्राइवर और कंडक्टर के अलावा तीन चार लोग ही बचे किन्तु बाकी बहुत घायल हुए जिनमें से भी दो तीन की मृत्यु हो गई। बाबा के साथ उनका जो भक्त बैठा था, उसे और बाबा को भी खरोंच तक नहीं आई। बाबा ने तो बस में बैठते ही समाधि लगा ली थी और उनका भक्त हमेशा की ही तरह उनके साथ शान्ति से बैठा हुआ था। जिस समय बस दुर्घटनाग्रस्त हुई, तब भी वे दोनों इसी स्थिति में थे। उनके भक्त का ध्यान जब उन पर गया तब भी वे समाधि में ही डूबे प्रतीत हो रहे थे। सहायता के लिए आसपास के कुछ ग्रामीण आए तो लोगों को पता चला कि बाबा को कहीं चोट लगना तो दूर, खरोंच तक नहीं आई थी। लेकिन फिर पता चला, उसी हालत में बाबा का देहान्त हो चुका था। काफी लोग इकट्ठे हो गए थे और डॉक्टर ने भी जब उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी तो उनका अंतिम संस्कार पहले से ही जैसा कि उनके द्वारा बताया गया था, उसी अनुसार वैसे ही कर दिया गया। फिर उनकी कुछ अस्थियाँ तो नदी में कहीं विसर्जित कर दी गईं और कुछ को यहाँ धरती में समाधि दे दी गई। और एक कच्चा-पक्का चबूतरा उस पर बना दिया गया। और उस पर एक शिवलिङ्ग स्थापित कर दिया गया। आज भी लोग इस बारे में कभी कभी चर्चा किया करते हैं।"

तब तक हम वहाँ से परिक्रमा-पथ पर लौट आए थे।

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April 19, 2023

नर्मदे हर!!

नर्मदे हर!! 

ॐ नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय!

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वर्ष 1991 के अगस्त मास के किसी दिन तय हुआ कि नर्मदा के तट पर स्थित महेश्वर और मंडलेश्वर की यात्रा करना है। यात्रा के लिए सिर्फ एक झोला (शोल्डर बैग), चोला (धोती) और एक कमंडल साथ रखने की जरूरत थी। और हाँ कुछ पैसे, बस के किराए के लिए। अनुमान से एक सौ पचास रुपये रखे और चल पड़ा। महेश्वर में माता नर्मदा के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर मन भाव विभोर हो उठा। सुन्दर स्वच्छ घाट और नदी का विस्तीर्ण पाट! एक बड़ा सा शिव-मन्दिर जहाँ दो नग्नप्राय साधु मन्दिर में सो रहे थे। मन थोड़ा विचलित और उद्विग्न हुआ। इसलिए वहाँ से तत्काल ही बाहर निकल आया। घाट पर माता अहल्याबाई की समाधि की स्थिति देखकर आँखों में आँसू आ गए। देखरेख करनेवाला कोई नहीं था वहाँ। पास में एक महल भी है, अब तो ठीक से स्मरण नहीं रहा, लेकिन इतना स्मरण है, कि इस बारे में किसी से कुछ बात भी की थी।

नदी का प्रवाह वहाँ इतना धीमा है मानों जल बह ही न रहा हो!

और तत्काल ही मन और चित्तवृत्ति का प्रवाह भी वैसा ही धीमा और शान्तिपूर्ण हो गया।

ओंकारेश्वर में नर्मदा के प्रवाह में निरन्तर नाद सुनाई पड़ता है, उस स्थान पर कोई तपस्वी ही लंबे समय तक रह सकता है। महेश्वर में दूसरा कोई मेरे जैसा साधारण व्यक्ति भी लंबे समय तक रह सकता है। रास्ते में मिले एक साधु ने मुझसे यही कहा था :

"नर्मदा की परिक्रमा इसलिए महत्वपूर्ण है, और परिक्रमा करने का यह सौभाग्य भी किसी किसी को ही मिलता है।"

नर्मदे हर!

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May 18, 2016

नर्मदे हर !

इस बार 
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संभवतः प्रथम शिप्रा-स्नान मैंने 1956 के सिंहस्थ में किया होगा । क्योंकि तब मेरी आयु 2 या ढाई वर्ष के लगभग थी और आगर से उज्जैन आना छोटी लाइन की रेलगाड़ी से होता था । यह बहुत संभव है कि आगर से माता (माई)-पिता (अण्णा) और भाई बहनों के साथ मेरा उज्जैन आना हुआ हो । पर कुछ याद नहीं आता ।
कभी किसी से पूछा हो, या किसी ने बताया हो, यह भी याद नहीं । 
1980 में दूसरे, 1992 में तीसरे और 2004 में चौथे सिंहस्थ में मैं उज्जैन में था । इस सिंहस्थ में माँ नर्मदा ने मुझसे कहा : "बेटा! इस सिंहस्थ में मैं स्वयं ही उज्जैन जा रही हूँ इसलिए तुम उज्जैन छोड़कर यहाँ मेरे पास ही आ जाओ !" 
और मैं माँ नर्मदा की आज्ञा कैसे टाल सकता था ?
इसलिए मैं यहाँ (नावघाट-खेड़ी ग्राम) आ गया ।
और माई की ऐसी कृपा कि यहाँ आने के बाद कुछ दिनों में ही माई की स्तुति में यह रचना  मुझसे बन पड़ी ! 
एक संकेत देना चाहूँगा :
'अहं-स्फूर्ति' और 'अहं-वृत्ति' का सन्दर्भ श्री रमण महर्षि के उपदेशों के तारतम्य में दृष्टव्य है ।     
माई की महिमा मैं बालक क्या जान सकता हूँ ?
और वर्णन तो बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी भी कहाँ कर पाते हैं ??
नर्मदे हर !
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