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February 02, 2025

AmnAya.

आम्नाय (मार्ग)

उसने प्रायः पशु पक्षियों की ध्वनियों को ध्यान से सुना था और फिर अपने दोनों नेत्रों और दोनों कानों को बन्द कर वह मुख से उनके उच्चारण का प्रयास किया करती थी। फिर उसे यह सूझा कि मुख से उनका उच्चारण करने से कहीं अधिक अच्छा यह होगा कि मुख को बन्द रखकर, उनकी स्मृति से अपने भीतर ही उन ध्वनियों को सुनने का प्रयास किया जाए। तब उनमें एक ऐसे ध्वनि-क्रम का उसे पता चला जिसे आज के पाश्चात्य संगीत शास्त्र में 

c d e f g h a b  से,

तथा वैदिक रीति से क्रमशः

सारंग, ऋषभ, गांधार, मध्यम्, पञ्चम्, धैवत् और निषाद से व्यक्त किया जाता है। 

स्पष्ट है कि उसे यह ज्ञान तब अनायास ही अपने भीतर ही प्राप्त हुआ था और तब वह उसे उन स्वरों को दोहराने का मन होने लगा। और तब उसने उस प्रथम वाद्य यंत्र की रचना की जिसमें बाँस की एक पोली नली पर भिन्न भिन्न दूरियों पर छिद्र किए और एक सिरा पूरी तरह खुला रखते हुए दूसरे पर कोई अवरोध जैसे कोई पत्ता आदि फँसाया। यह कल्पना उसे उन्हीं पशु पक्षियों की ध्वनियों पर ध्यान देने से आई क्योंकि तब उसे लगा कि उनकी कंठनली में भी ऐसा ही कुछ पर्दा (diaphragm) होने के कारण उन ध्वनियों के कम्पन भिन्न भिन्न होते होंगे। हम जैसे तथाकथित रूप से उन्नत मनुष्यों के लिए इसका अनुमान और आकलन कर पाना कठिन ही होगा कि यह सब उसने कैसे किया होगा, और यह समझ पाना भी कि बुद्धि अर्थात् किसी शाब्दिक विचार प्रणाली के द्वारा भी ऐसा कर पाना संभव नहीं है। क्योंकि विचार या 'बुद्धि' मानसिक चित्तवृत्ति का एक रूप अर्थात् 'प्रत्यय' होता है जिसका संवेदन मुख्यतः और केवल प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा तथा स्मृति इन्हीं पाँचों प्रकारों में हुआ करता और जाना जाता है। उसके पास भी यद्यपि अन्य सभी प्राणियों की ही तरह वह आधारभूत चेतना   Interface तो था, जिसे चेतना या भान अथवा बोध शुद्ध संवेदन के रूप में हर कोई जानता ही है किन्तु वस्तुओं (objects) और विषयी (subject)  के लिए प्रयुक्त किए वे ध्वन्यात्मक पद (words) नहीं थे जिनके माध्यम से हम मनुष्यों में 'जानकारी' रूपी कृत्रिम ज्ञान की एक प्रणाली बनती और सक्रिय हो जाया करती है। यह कृत्रिम ज्ञान उस स्वाभाविक 

चेतनाभान, अथवा अथवा बोध 

पर आवरित होकर अपना स्वयं का एक स्वतंत्र अस्तित्व होने का भ्रम Artificial intelligence  निर्मित कर लेता है।

उसमें इस प्रकार के किसी भ्रम ने अभी अपना सिर तक नहीं उठाया था। इसलिए वह ऐसे यांत्रिक और कृत्रिम ज्ञान से नितान्त अनभिज्ञ और अपरिचित थी।

और तब एक दिन वह अचानक एक अद्भुत् प्रतीति पर मुग्ध हो उठी जब उसने दो स्वरों के बीच के उस शून्य को पहचान लिया जो सब स्वरों में उनके आधार की तरह से विद्यमान तो होता है, फिर भी वह कोई ध्वनि-विशेष नहीं होता। उसे जान पड़ा कि वह शून्य जो सबमें अन्तर्निहित और सबसे अप्रभावित रहता है, सबमें ओतप्रोत है, और फिर भी सब से विलक्षण है और उसका उच्चारण करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

तब तक वह चित्र-लिपि में उन वस्तुओं और घटनाओं रूपी अपने अतीत को चट्टानों और रेत पर उकेरा करती थी, जो समय के साथ धीरे धीरे धुँधले होकर या वैसे ही विलुप्त हो जाया करते थे और उस पर इन सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।  हर दिन,  हर पल वह वैसी ही तरोताजा और निर्मल, निर्दोष और उत्फुल्ल रहती थी जैसे कोई सद्योजात शिशु हुआ करता है।

यह समाम्नाय था !

उस अतिथि मित्र के आगमन के बाद ही उसे यह पता चल कि ध्वनियों को चित्रों के माध्यम से भी व्यक्त किया जा सकता है और वह यह जानकर रोमांचित हो उठी कि

अक्षरसमाम्नाय

भी कुछ होता है! 

***

February 18, 2023

महाशिवरात्रि पर,

अक्षरसमाम्नाय और संस्कृत का भाषावैभव

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आज बहुत से जरूरी काम करने थे। कल शाम से ही बिजली गुल थी। सुबह बिजली आई तो सबसे पहले मोबाइल की बैटरी चार्ज की। रूटीन काम निपटाए। खाना बनाया, दोपहर एक बजे फुरसत मिली तो डेढ़ घंटे सोया। चाय पी। कुछ करने का मन नहीं था, तो यूँ ही कुछ न करते हुए कुर्सी पर बैठा रहा। पास के मन्दिर में अखण्ड रामायण (रामरचितमानस / रामचरितमानस) का पाठ चल रहा था, सुनता रहा। चूँकि वॉल्यूम ऊँचा था, ढोल- नगाड़े भी भज रहे थे तो शब्द साफ नहीं सुनाई दे रहे थे। केवल स्वरों को ध्यानपूर्वक सुना तो पता चला राग यमन कल्याण के स्वरों में कुछ गाया जा रहा था। डेढ़ घंटे बाद जब गायन समाप्त हुआ तो रामचरितमानस का पाठ फिर सुनाई देने लगा। कमरे में वॉक करते हुए टेबल पर रखी स्तोत्ररत्नावलि पर ध्यान गया तो शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र पढ़ा। गायन के समाप्त होने पर पुनः एक बार रामचरितमानस का पाठ सुनाई देने लगा। इससे अनुमान लगाया कि गायन और पाठ साथ साथ चल रहे थे। न तो बाहर जाने का मन हो रहा था, न घर में बैठे रहने का। फिर मन बदल गया, सोचा कुछ समय बाहर टहल लिया जाए। लौटते हुए कुछ पड़ोसी सपरिवार कहीं जाते दिखाई दिए। पति-पत्नी के साथ उनके तीन बच्चे। बड़ी लड़की 12 वर्ष की, उससे छोटा उसका भाई 10 वर्ष का और सबसे छोटी उनकी बहन 5 वर्ष की उम्र के हैं। जाते जाते बड़ी लड़की उत्साहपूर्वक बोली :

"भोलेबाबा की शादी में जा रहे हैं!"

आज भोलेबाबा जगत्पिता शिव और माता भवानी जगज्जननी पार्वती का विवाहोत्सव जो है!

घर लौटते हुए याद आया सूरी नागम्मा लिखित :

"रमणाश्रम के पत्र" /

"Letters from Sri Ramanasramam"

का वह प्रसंग जब तिरु-अण्णामलै में रुद्र- दर्शन के दिन भगवान् अरुणाचल की पालकी श्री रमणाश्रम के सामने से गुजरी तो श्री रमण ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया और बोले :

अप्पक्कु पिळ्ळै अडक्कु / அப்பக்கு பிள்ளை அடக்கு ।

अर्थात् पुत्र ने पिता के दर्शन किए। 

मुझे नहीं पता कि उपरोक्त तमिऴ और नागरी लिपि में लिखा शुद्ध है या अशुद्ध है क्योंकि जब मैंने उस पुस्तक को खोजने का प्रयास किया तो मुझे वह नहीं मिली। फिर मैंने माइक्रोसॉफ्ट के ट्रान्सलेटर ऐप से चेक किया तो भी मुझे सफलता नहीं मिली फिर उस ऐप में अपने தமிழ் भाषा के ज्ञान को परखने जानने के लिए कुछ खोजा तो आश्चर्य हुआ।

Excellent, Wonderful, Splendid,

इनका तमिऴ अनुवाद अद्भुतम् , आश्चर्यम् जैसे संस्कृत शब्दों के सजात / सज्ञात / cognates थे तो दूसरे भी अनेक शब्द ऐसे ही जान पड़े। तमिऴ लिपि नागरी से वैसे ही मिलती जुगती है, जैसे कि पूरे भारत की अन्य भाषाओं की लिपियाँ। हाँ तमिऴ लिपि का स्वरविन्यास (phonetic protocol) कुछ भिन्न है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि तमिऴ भाषा संस्कृत से भी अधिक प्राचीन है। वैसे इस तथ्य पर ध्यान दें कि तमिऴ को विभिन्न प्रयोजनों के लिए ब्राह्मी तथा ग्रन्थलिपि में भी लिखा जाता है, तो स्पष्ट हो जाएगा कि यह अनुमान भी संस्कृत और भारतीय भाषाओं से द्वेष रखनेवाले विदेशियों के ही द्वारा 'रचा' गया है ताकि तमाम भारतीय भाषाओं का एक ही स्रोत होने की सच्चाई पर पर्दा डाल दिया जा सके और जनमानस में संस्कृत के प्रति विरोध की भावना जागृत की जा सके।

निष्कर्ष यही कि अगर हम अधिक से अधिक भाषाएँ सीखें तो हमें वास्तविकता क्या है, इसका पता चलेगा और हम अपनी भाषा, संस्कृति और 'धर्म' को अच्छी तरह जान सकेंगे। अभी तो हमसे कहीं अधिक अच्छी तरह तो इसे वे विदेशी ही जानते हैं, जो कि हमारी कमज़ोरी का लाभ उठाकर हमें हानि पहुँचाना चाहते हैं।

संस्कृत भाषा के व्याकरण का आधार तो वही अक्षरसमाम्नाय है जिसका उपदेश स्वयं भगवान् शिव ने ही सनक और पाणिनी आदि ऋषियों को दिया था! 

***


December 07, 2014

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ - 3

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ - 3
__________________________

पिनाकपाणिन् असौ।
पिदधाति बाणम् ॥
वितनोति प्रत्यञाम् ।
प्रति चिनोति वर्णान् ।
प्रति अञ्चते वर्णैः।
क्षिपति तान् दिग्-दिगन्तान् ।
अस्यति शास्ता तथा,
पिनाकपाणि कोऽपि ।
अक्षर समाम्नायम् तदिदम् परिव्रजेत् ।
प्रत्याहरेत् हरः
आदिरन्त्येन सहेता ।
अ इ उ ण् ।
ऋ लृ क् ।
ए ओ ङ् ।
ऐ औ च् ।
ह य व र ट् ।
ल ण् ।
ञ म ङ ण म् ।
झ भ ञ् ।
घ ढ ध ष् ।
ज ब ग ड द श् ।
ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
क प य् ।
श ष स र् ।
ह ल् ।।
--
समर्पयति शिवो महाकालो,
अक्षर समाम्नायमिदम्
ऋषिभ्यः ॥ 
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि ॥
--
॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥
भावार्थ :
--

पिनाकपाणी वह,
बाणों को,
खोलता-छिपाता है, 
खींच ता है,
प्रत्यञ्चा धनुष की ।
वर्णों को चुनता / चिह्नित करता है,
उनकी संयुति करता है,
परस्पर ।
उछाल देता है उन्हें,
दिग्-दिगन्तों में ।
शास्ता इस तरह से,
पिनाकपाणि कोई !
यह अक्षर-समाम्नाय,
प्रसरित होता है,
इस तरह ।
प्रत्याहरण करते हैं हरः,
आदिरन्त्येन सहेता ।
आदि को अन्त्य से युक्त कर,

अ इ उ ण् ।
ऋ लृ क् ।
ए ओ ङ् ।
ऐ औ च् ।
ह य व र ट् ।
ल ण् ।
ञ म ङ ण म् ।
झ भ ञ् ।
घ ढ ध ष् ।
ज ब ग ड द श् ।
ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
क प य् ।
श ष स र् ।
ह ल् ।।
--
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि ॥
--
अणादि संज्ञाओं के तात्पर्य के सूचक,
इन माहेश्वर सूत्रों को,
अर्पित कर देते हैं शिव,
यह अक्षरमणिमाल
ऋषियों को!
-- 
॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥
उज्जैन / 07 /12 /2013 

December 01, 2014

॥ अज्ञातपथगामिन् कोऽपि ॥ -2

॥ अज्ञातपथगामिन्  कोऽपि  ॥ -2
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स विहरति वने कान्तारे पथान् दुर्गमाञ्च  ।
अपि दूरे अंतरिक्षम् आत्मनि स्वेन स्वया ॥1
सर्वम् हि इह तस्य बहिः तस्य अंतरेव ।
सर्वम् तु अपि तस्य न तस्य अंतरेण ॥2
नादयति स्वरै: ढक्काम् नटराज शिवो ।
प्रसारयति नादम् त्रिलोकेषु अथ अन्तरे ॥3
देवाः ऋषयः गन्धर्वाः मनुजाः यक्षरक्षांसि ।
प्रार्थयन्ति तम् कमप्यज्ञातपथगामिनम्  ॥4
प्रसीदयन्ति तम् दिव्यस्तुवनैः तस्मै तदापि ।
न शक्नुवन्ति द्रष्टुम् तमज्ञातपथगामिनम् ॥5
उद्धर्त्तुकामः सनकादि सिद्धान्
एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ।
नृत्तावसाने नटराजराजो
ननाद ढक्काम् नवपञ्चवारम् ॥6
कटाक्षेण दृष्ट्वा तान् एकदा सः विहसित्वा ।
ननाद ढक्काम् मुदितो शिवो नवपञ्चवारम् ॥7
इति ।
अक्षर समाम्नाये  अइउण् च प्रथमाः स्युः ।
ऋलृक् द्वितीयास्तथा एओङ् तृतीयाः अपि  ॥8
ऐऔच् चतुर्थाः सन्ति पञ्चमाः हयवरट् तथा ।
लण् च  ञमङणम्  एतानि षष्ठसप्तमाः  ॥9
ततः झभञ् घढधष् इति अष्टमा तथा नवमाः ।
एताः प्रदर्शिताः ताभ्यः ऋषिभ्यः  समाम्नायाः ॥10    
तदनन्तरे जबगडदश्दशमा खफछठथचटतवाः इति ।
कपय् शषसर् हलाः एताः पञ्चाभिः शिवेन ॥11
एतमक्षरसमाम्नायम् श्रुत्वा ऋषिभिः अन्तरे ।
अज्ञातपथगामिनम् नत्वा ससर्जुः संस्कृतामिमाम् ॥12
--
फलश्रुतिः
चतुर्दशसमाम्नाये यो पठेदिदमक्षरम्  ।
चतुर्दशभुवनेषु सः प्राप्नुयात्  शारदाकृपाम् ॥
--         
भावार्थ :
स विहरति वने कान्तारे पथान् दुर्गमाञ्च  ।
अपि दूरे अंतरिक्षम् आत्मनि स्वेन स्वया ॥1
भावार्थ :
वह अज्ञात पथ पर चलनेवाला (भगवान शिव) वनों और बीहड़ों के दुर्गम रास्तों पर भ्रमण करता है । वह सुदूर अंतरिक्ष में भी अपनी ही आत्मा से अपने ही भीतर विचरता है । ॥ 1.
--
सर्वम् हि इह तस्य बहिः तस्य अंतरेव ।
सर्वम् तु अपि तस्य न तस्य अंतरेण ॥2. 
भावार्थ :
यह सम्पूर्ण जगत उससे बाहर और उसके ही भीतर है । सब उसी का उसी से है, उसके बिना कुछ नहीं । ॥ 2.
--
नादयति स्वरै: ढक्काम् नटराज शिवो ।
प्रसारयति नादम् त्रिलोकेषु अथ अन्तरे ॥3.
भावार्थ :
(वे) नटराज शिव अपने डमरू से स्वरों को निनादित करते हैं  । वे स्वर तीनों  लोकों तथा अपने हृदय में गूँजते हैं । ॥ 3.
--
देवाः ऋषयः गन्धर्वाः मनुजाः यक्षरक्षांसि ।
प्रार्थयन्ति तम् कमप्यज्ञातपथगामिनम्  ॥4.
भावार्थ :
देव, ऋषि, गन्धर्व, मनुष्य, यक्ष तथा राक्षस सभी उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव) की प्रार्थना करते हैं । ॥ 4.
--
प्रसीदयन्ति तम् दिव्यस्तुवनैः तस्मै तदापि ।
न शक्नुवन्ति द्रष्टुम् तमज्ञातपथगामिनम् ॥5.
भावार्थ :
यद्यपि अनेक दिव्य स्तोत्रों से उन्हें प्रसन्न करते हैं, तथापि उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव)  को कोई नहीं देख पाता । ॥ 5.
--
उद्धर्त्तुकामः सनकादि सिद्धान्
एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ।
नृत्तावसाने नटराजराजो
ननाद ढक्काम् नवपञ्चवारम् ॥6.
भावार्थ :
(ऐसे ही किसी समय) सनक सनन्दन आदि सिद्धू का उद्धार करने हेतु  उस अज्ञातपथगामी (नटराज भगवान शिव) ने उनकी कामना की पूर्ति के लिए नृत्य करते हुए अंत में अपने डमरू को मुदित होकर नौ तथा पाँच, अर्थात चौदह बार बजाया । ॥ 6.
--
कटाक्षेण दृष्ट्वा तान् एकदा सः विहसित्वा ।
ननाद ढक्काम् मुदितो शिवो नवपञ्चवारम् ॥7.
--
भावार्थ :
एक बार स्मितपूर्वक उन्हें कटाक्ष से देखते हुए भगवान शिव ने नौ तथा पाँच संकेतों से उन्हें अक्षर समाम्नाय की दीक्षा प्रदान की।  ॥ 7.   
इति  ।
--
अक्षर समाम्नाये  अइउण् च प्रथमाः स्युः ।
ऋलृक् द्वितीयास्तथा एओङ् तृतीयाः अपि  ॥8.
भावार्थ :
(शिवोक्त इस) अक्षर समाम्नाय में  अइउण् प्रथम हैं । ऋलृक् द्वितीय तथा एओङ् तृतीय हैं  ॥8.
--
ऐऔच् चतुर्थाः सन्ति पञ्चमाः हयवरट् तथा ।
लण् च  ञमङणम्  एतानि षष्ठसप्तमाः  ॥9.
भावार्थ :
ऐऔच् चतुर्थ  तथा हयवरट् पञ्चम । लण् तथा ञमङणम् क्रमशः छठे और सातवें हैं ॥9
--
ततः झभञ् घढधष् इति अष्टमा तथा नवमाः ।
एताः प्रदर्शिताः ताभ्यः ऋषिभ्यः  समाम्नायाः ॥10.
भावार्थ :
इसके बाद झभञ् तथा घढधष् ये क्रमशः आठवें तथा नवें हैं । इस प्रकार से उन भगवान शिव ने उन ऋषियों के लिए इस अक्षरसमाम्नाय प्रदान किया  ॥10.
--
तदनन्तरे जबगडदश्दशमा खफछठथचटतवाः इति ।
कपय् शषसर् हलाः एताः पञ्चाभिः शिवेन ॥11. 
इसके पश्चात जबगडदश् दसवें खफछठथचटतव् ग्यारहवें आदि हैं ।
कपय् शषसर् तथा हल् ये बारहवें तेरहवें तथा चौदहवें हैं, इस प्रकार शेष पाँच का स्वरूप  भगवान शिव ने उन्हें स्पष्ट किया । ॥11.
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एतमक्षरसमाम्नायम् श्रुत्वा ऋषिभिः अन्तरे ।
अज्ञातपथगामिनम् नत्वा ससर्जुः संस्कृतामिमाम् ॥12.
भावार्थ :

अपने ही अन्तर्हृदय में ऋषियों ने इसे सुना, सुनकर उस अज्ञातपथगामी (भगवान शिव) को प्रणाम किया और संस्कृत भाषा के वैखरी स्वरूप को लोक के लिए उद्घाटित किया।
--
फलश्रुतिः
चतुर्दशसमाम्नाये यो पठेदिदमक्षरम्  ।
चतुर्दशभुवनेषु सः प्राप्नुयात्  शारदाकृपाम् ॥
भावार्थ :
भगवान शिवप्रदत्त इस चौदह सूत्रयुक्त अक्षरसमाम्नाय का जो मनुष्य पाठ करता है, उस पर चौदह भुवनों में माँ शारदा के कृपा रहती है।    
--        

॥ ॐ शिवार्पणमस्तु ॥