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December 01, 2021

सैरन्ध्री





भूमिरश्मा 

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घर के सामने पार्क बन रहा है। पिछले दो वर्षों में नया कुछ नहीं बना। वही दो चैत्य हैं चौकोर, आसपास चंपा के वृक्ष, एकमात्र सुपारी का ऊँचा वृक्ष। 

इस बारिश में उस पार्क में बीचोंबीच नीम-वट-पीपल को एक साथ रोपकर उसे जालीदार ट्री-गार्ड से ढँक दिया गया है।

पार्क के जिस चौकोर लॉन के बीचोंबीच ये तीन वृक्ष रोपे गए हैं, उसके चारों कोनों पर सीमेन्ट की बड़ी-बड़ी सरन्ध्र ईंटों से बने चार बड़े टैंक / हौज तैयार किए गए हैं। 

ये टैंक किसलिए बने हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। अब लगता है शायद उनमें कोई वृक्ष लगाए जाएँगे। चौकोर हिस्से के एक सिरे पर कुएँ जैसी, तीन फुट व्यास की, एक फुट ऊँची रचना है, जिसमें अभी कचरा जमा होता है, लेकिन लगता है कि उसमें बाद में कुमुदिनी रोपी जाएगी ।

उन ईंटों के छोटे-बड़े अनावश्यक बचे हुए टुकड़े पार्क में बिखरे पड़े हैं । एक टुकड़ा मैं भी उठा लाया।

सोचा उस पर कुछ उत्कीर्ण कर उसमें छिपी किसी प्रतिमा को उभारकर साकार करूँ। फिर यह भी लगा कि उस पर कलर-पेंसिलों से कोई प्राकृतिक दृश्य निर्मित करूँ।

गूगल-सर्च में प्यूमिस स्टोन जैसी उस रचना के संबंध में पढ़ा कि ज्वालामुखी के लावा से भी ऐसा प्यूमिस पत्थर बनता है। फिर उसे ध्यान से देखा तो लगा कि उस मानव-निर्मित पत्थर / ईंट को बनाने के लिए सीमेन्ट में पानी मिलाकर एक गाढ़ा मिश्रण बनाया गया होगा, और उसमें ब्लो-पाइप से हवा प्रवाहित कर उसे सरन्ध्र रूप दिया गया होगा। 

मेज पर वह टुकड़ा अब भी रखा हुआ है। 

रात्रि में सोने से पहले उस पर दृष्टि पड़ी तो लगा वह पत्थर / ईंट मुझसे कुछ कह रही है। लेकिन मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया।

रात्रि में स्वप्न में वह मुझे घूँघट में छिपी किसी राजपरिवार की एक स्त्री जैसी दिखलाई पड़ी। उसकी हँसी की आवाज सुनते ही मेरा ध्यान उस पर गया। 

"मैं सैरन्ध्री हूँ!"

उसने कहा।

मैं नहीं जानता था कि सैरन्ध्री का क्या अर्थ है। 

"अच्छा!"

मैंने इतना ही कहा। 

"द्रौपदी"

उसने तुरंत अपना परिचय स्पष्ट किया। 

"फिर तुमने अपना नाम सैरन्ध्री क्यों बताया?"

"वह इसलिए, क्योंकि तुम मुझे तराशकर मुझ पर कोई आकृति उकेरने या रंग आदि के लेप से मुझ पर कोई आवरण चढ़ाने के बारे में सोच रहे हो।  है न? !"

"पर मैं तो तुम्हें गणेश या बुद्ध, राम या शालभंजिका का रूप देना चाह रहा था।"

"नहीं!  मैं जैसी हूँ वैसी ही रहना और दिखलाई देना चाहती हूँ!"

इतना सुनते हुए मेरी आँख खुल गई। 

मेज पर वह शिला, भूमिरश्मा अब भी वैसी ही अमूर्त प्रतिमा की तरह मौन थी ।

मैं फिर सो गया।

सुबह उठा, तो लगा अब उसे किसी प्रतिमा का रूप देकर और अधिक विरूपित करना उसका अपमान होगा।

अब यह वहीं रहेगी।

शायद कोई उसके बारे में कोई जिज्ञासा या अनुमान करेगा या प्रश्न भी पूछेगा ।

पर मैं भी उसकी तरह मौन ही रहूँगा।

***