सत्तर का दशक
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इसी hindi-ka-blog में पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा होगा कि वर्ष 1970 में मेरी स्कूल की शिक्षा पूरी होने पर मैं एक छोटे शहर में रहने लगा जहाँ पर एकमात्र कॉलेज में ग्रैजुएशन / B. Sc. प्रथम वर्ष में मुझे PCM विषयों में प्रवेश मिला। गाँव में स्कूल में पढ़ते रहने के समय तक मैंने कभी चप्पल नहीं पहनी थी। कभी कभी कोई करीब कर ले आता भी तो उसे पहनकर कहीं जाने पर वहाँ उसे उतारने के बाद लौटते समय फिर उसे पहनना भूल जाता था लेकिन कॉलेज में प्रवेश प्राप्त होने के बाद से चप्पल पहनना आदत बन गया। एन. सी. सी. अनिवार्यतः करना ही था और और हर छात्र को उसके लिए एक ड्रेस, कैप, बेल्ट और शूज़ भी मिलते थे लेकिन उनका उपयोग सिर्फ गुरुवार और शुक्रवार के दिन शाम के समय में परेड के लिए जाते समय करना होता था। उस छोटे शहर में वैसे कॉलेज इतना दूर नहीं था कि पैदल न जाया जा सके, लेकिन चूँकि मेरे बड़े भाई की साइकल मेरे पास थी और वह मुम्बई में IIT में M. Tech कर रहा था इसलिए साइकल का उपयोग मैं ही किया करता था। पिताजी रिटायर होने के बाद पास के अपेक्षाकृत एक बड़े शहर में गैर सरकारी स्कूल में शिक्षक का कार्य करने लगे थे। तो साइकल मेरे लिए एक अनपेक्षित गिफ्ट ही था। और इस गिफ्ट के कुछ दायित्व भी प्राप्त हुए थे जैसे आटा चक्की पर जाकर गेहूँ पिसवाना, बाजार से सामान लाना, घर के किसी दूसरे काम के लिए कहीं जाना आना आदि। तीन वर्ष उस छोटे शहर में बीत गए जिसमें से एक वर्ष यूँ ही व्यर्थ हो गया। इसके पीछे मेरी जिद भी एक बड़ी वजह थी। वह यह कि कॉलेज की शिक्षा के लिए हिन्दी माध्यम को छोड़कर अंग्रेजी माध्यम को मैंने चुना था। मुझे पहले ही पता था कि अंग्रेजी से अभ्यस्त होने के लिए एक वर्ष का sacrifice करना पड़ सकता है। और इसलिए मैं न तो निराश था और न दुःखी। फिर धक्का परेड में शामिल होकर अंततः चार वर्ष में ग्रैजुएशन कर ही लिया। अंतिम चौथे वर्ष में जब अध्ययनरत था तब एक दिन शहर के दूसरे सिरे पर स्थित एक चौराहे पर किसी भवन की ऊपरी मंजिल पर टँगे एक बोर्ड पर नजर पड़ी -
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