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March 18, 2015

प्रसंगवश / जीवन-मृत्यु

प्रसंगवश / जीवन-मृत्यु
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© Vinay Kumar Vaidya,
(vinayvaidya111@gmail.com)
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" जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है । मृत्यु का बोध ही जीने की कला सिखाता है,..."
मुझे इस वाक्य में एक गहरी भूल दिखलाई देती है, क्या जीवन का अंत है? हम लोगों को मरते हुए देखते हैं और सोचने लगते हैं कि यह जीवन का अंतिम सत्य है, और मेरा भी यही होगा. क्या किसी ने कभी 'जीवन' का अंत देखा है? जिसे हम 'जीवन' कहते हैं, क्या उसका 'आरम्भ' है? किसी ने कभी देखा? क्या जीवन निरंतर ही एक सतत 'सत्य' नहीं है? किन्तु हम 'जीवन' का एक मानसिक-चित्र बना लेते हैं, जो या तो कल्पना, धारणा, विचार या प्रतिक्रिया मात्र होता है, न कि वह जिसके सम्बन्ध में हमारे मन में यह कल्पना, धारणा, विचार या प्रतिक्रिया पैदा होती है. समस्या यह है कि हम जीवन से अभिन्न हैं, किन्तु इस कल्पना, धारणा, विचार या प्रतिक्रिया के जन्म के बाद इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हम कोई 'व्यक्ति-विशेष' हैं, कोई 'शरीर-विशेष', मनुष्य, स्त्री, पुरुष, अमीर-गरीब, बच्चे, युवा, वृद्ध आदि हैं,... इस भ्रम का ही वस्तुतः 'जन्म' है, और 'मृत्यु' भी इस भ्रम की ही है, या कहें कि 'जन्म' और 'मृत्यु' 'विचार' / ख़याल भर है.
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पुनश्च :
मुझसे एक प्रश्न पूछा गया :
'जीवन का अंत या प्रारम्भ है कि नहीं यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस का मुद्दा है.' ...
एक सरल प्रश्न : क्या 'जीवन' की अनुपस्थिति में किसी बहस की कोई संभावना है? मतलब यही कि बहस का आरम्भ और अंत होने के लिए कोई 'बहस करनेवाला' होना तो अपरिहार्यतःआवश्यक है, मतलब यह कि 'जीवन' स्वतः-प्रमाणित यथार्थ है, भले ही उसके स्वरूप को भौतिक वस्तुओं की तरह अनुभव या सिद्ध न भी किया जा सके. जब आप कहते हैं 'हम जो शरीर धारण किए हैं....,' तब आप कहें या न कहें, यह स्पष्ट ही है कि आप शरीर भर नहीं, बल्कि उस शरीर से भी सूक्ष्म और विराट वह तत्व हैं, जो शरीर के जन्म से शरीर की मृत्यु तक अपरिवर्तित रहता है, जन्म से पहले या मृत्यु के बाद क्या है, इस बारे में मैं भी कुछ नहीं कह रहा.. मैं तो इस दौरान जो है, उसकी बात कर रहा हूँ. और उस रूप में हमारा यथार्थ कोई नश्वर वस्तु नहीं हो सकता, भले ही हम अपने को शरीर और व्यक्ति मानकर नश्वर मान बैठें और जन्म-मृत्यु को सत्य मानकर दार्शनिक अंतहीन तर्क-वितर्क करते रहें, जब तक हम इस यथार्थ पर ध्यान नहीं देते तब तक उस तर्क-वितर्क /बहस से चाहकर भी नहीं भाग सकते. वह प्रश्न अंत (मृत्यु) तक हमारे सामने मुंह बाए खडा रहेगा....
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October 26, 2014

आज की कविता : 26 /10/2014 / दुःस्वप्न

आज की कविता : 26 /10/2014
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दुःस्वप्न
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डर,
एक दुःस्वप्न सा,
लौट आता है,
ख़याल तो होता है,
कि वह अचानक,
की-बोर्ड की किसी भी ’की’ को दबाते ही,
’ब्लो-अप’ की तरह,
आक्रमण कर देगा,
पर वह इतना सतर्क और धूर्त होता है,
कि किसी सर्वथा अप्रत्याशित क्षण में ही,
झपटकर दबोच लेता है,
किसी चीते की तरह,
जब किसी क्षण के दसवें हिस्से के लिए,
मैं अनायास अन्यमनस्क हो जाता हूँ ।
लेकिन कोई इलाज नहीं है मेरे पास,
अगर मुझे दुःस्वप्न से बचना है,
तो जागृत रहना होगा,
हर पल,
जागते हुए,
स्वप्न में,
या गहरी से गहरी नींद में भी !
-- ©

October 16, 2014

आज की कविता : यह पथ बन्धु था !

आज की कविता :
यह पथ बन्धु था !
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छः साल पहले,
किसी बाध्यता के चलते,
खरीद लिया था,
इस ’पथ’ को,
यह ’पथ’,
जो कितने अगम्य, दुर्गम्य स्थानों से होकर गुजरता है !
तब लेखनी को विश्राम दिया था,
वर्तनी के पग अविश्रांत चलते रहे ।
इस पथ पर मिले कितने पथिक,
कितने घुमन्तू,
कितने भटकते,
तृष्णातुर,
प्यास से दम तोड़ते,
यायावर मृग,
कितने दोनों हाथों से,
द्रविण उलीचते हुए,
कितने शिकार की तलाश में,
जाल बिछाए !
मैं मुस्कुरा देता था,
जानता था कि इसमें
पथ का कोई दोष नहीं है ।
पंथ का शायद होता हो,
अब जब इस पर काफी चल चुका हूँ,
इससे कुछ परिचित हो चुका हूँ,
तो लौट जाने का मन है,
लौटना जरूरी भी है,
उस नगरी,
जहाँ सरस्वती का वास है,
लेखनी चंचल है,
तूलिका व्यग्र है,
और वीणा तरंगित,
हाँ, विदा पथ !
पर आता रहूँगा कभी-कभी पुनः फिर,
तुमसे मिलने भी !
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August 16, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 14

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -14
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बचपन में कभी कभी जब मैं कहता था, :
'मुझे भूख लगी है, लेकिन कुछ खाने का मन नहीं है,'
या,
'मुझे भूख नहीं लगी है, लेकिन कुछ खाने का मन हो रहा है,'
तो लोग मुझे पागल समझने लगते थे।
अब 55 साल बाद जब मैं कहता हूँ,
'मुझे आत्महत्या करने का मन हो रहा है, लेकिन मैं मरना नहीं चाहता,'
या,
'मैं मरना तो चाहता हूँ लेकिन मेरा आत्महत्या करने  का मन नहीं हो रहा,'
तो भी लोग मुझे पागल समझने लगते हैं,
--
इस छोटी सी समझ ने मुझे समझाया कि मन और शरीर की जरूरतें कभी तो एक जैसी होती हैं और कभी कभी ऐसा नहीं भी होता। और जब ऐसा नहीं होता तो जीवन में द्वंद्व / दुविधा पैदा होती है।
लेकिन क्या मन की और शरीर की जरूरतें अक्सर ही अलग-अलग नहीं होती हैं?
हम मन की जरूरतों को 'इच्छा' कहते हैं, और जब शरीर की जरूरतों को इस इच्छा की तुलना में कम महत्व देते हैं, तब शरीर मन का, और मन भी शरीर का ध्वंस करने लगते हैं।
और इस ध्वंस से उबरने का न तो कोई रास्ता होता है, न रास्ते की जरूरत,  यह तो जीवन की जरूरत है, रीत भी, और उल्लास भी है ।
--
बचपन में ही एक गाना सुना था,
आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है, … '
दोनों बातें एक ही सिक्के के दो पहलू ही तो हैं !
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July 23, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 12.

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 12.
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 सुबह ’गीता-सन्दर्भ’ के लिए लिखे कुछ ब्लॉग्स् पोस्ट किए ।
दोपहर में एक बजे से साढ़े तीन बजे तक सोया । कल रात भर खूब वर्षा हुई । आज सुबह वॉक पर गया तो मानों उस आधे घंटे के लिए वर्षा ने ब्रेक ले लिया था ।
शाम पाँच से छः बजे तक भी मेघों ने खुला आसमान देखने दिया।
घर लौटते-लौटते वे घिर आए हैं  । दोपहर तीन बजे सोकर उठा तो दस मिनट तक ’ब्रह्म-संहिता’ पढता रहा । कुल 62 अध्याय हैं । सुबह जब पढ़ रहा था, तो सोचा इसे ब्लॉग पर प्रस्तुत किया जा सकता है ।
अभी तीन बजे के बाद पढ़ा तो अन्तिम अध्याय के भाष्य (कमेंट्री) पर मेरी घड़ी बन्द मिली । अन्त में जो निष्कर्ष दिया गया उसमें वेद और वेदेतर साङ्ख्य, न्याय, योग आदि को भी त्रुटिपूर्ण आकलन बतलाया गया । किन्तु भाष्यकार स्वयं जिस धोखे का शिकार हो गए, उसकी उन्हें कल्पना भी नहीं हो सकती थी । उन्होंने ’काल’ को एक स्वतन्त्र तत्त्व की तरह स्वसिद्ध सत्ता के रूप में सत्यता दे दी थी । और इससे मुझे  आश्चर्य कदापि नहीं हुआ । जब आज का उन्नत तथाकथित विज्ञान तक ’काल’ के अस्तित्व और प्रकृति के संबंध में भ्रम से नहीं उबर पाया है, तो किसी भाष्यकार का, जो अपने मत को आग्रहपूर्वक प्रतिपादित करना चाहता है इससे उबर पाना कैसे संभव हो सकता है? deceptive logic / logical-deception पर क्या सिर्फ़ वैज्ञानिकों का ही एकाधिकार है?
वैसे मूल ’ब्रह्म-संहिता’ अवश्य ही अनुपम, अद्वितीय है इसमें कोई सन्देह कम से कम मुझे तो नहीं है ।
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कल रात्रि वह पूछ रही थी,
’प्रभु! क्या मैं बादलों से कम्युनिकेशन कर सकती हूँ ?’
’कैसे?’
’अगर मैं उन पर टॉर्च से रौशनी फेंकूँ तो क्या वे रिस्पॉन्ड करेंगे?’
स्पष्ट है कि वह मेरा ब्लॉग 'Love, The Clouds' देखती रहती है । उसे यह भी पता है कि मैंने ’अश्वत्थ’ और ’साइलेन्ट-डॉयलॉग्स’ में मेघों और प्रकृति से, खासकर वट और पीपल से हुए अपने संवादों को विस्तार से लिखा है । वह मुझे ’प्रभु’ या ’भगवान्’ या कभी-कभी ’रुद्र’ का संबोधन भी देती है, लेकिन मुझे इस बारे में कोई वहम नहीं कि यह सब महज़ औपचारिकता का हिस्सा है । और मैं उससे या किसी से ऐसी अपेक्षा भी नहीं कर सकता कि मुझे इस प्रकार से एक विशिष्ट व्यक्ति कहा / माना जाए । ’फ़ेसबुक’ पर उसने मुझसे ’दोस्ती’ की थी । बहरहाल उसे जल्दी ही समझ में आ गया कि उससे मेरी कितनी भी अच्छी ट्य़ूनिंग हो, मेरे और उसकी जीवन-शैली के बीच कोई तालमेल नहीं हो सकता । और न इसकी कोई जरूरत मैंने और शायद उसने भी कभी महसूस की होगी । शुरु में वह उन लड़कों के बारे में मुझसे विचार-विमर्श किया करती थी, जो उसे पसंद करते हैं और उनमें से कुछ उससे शादी करने के इच्छुक भी हैं । दूसरी ओर वह उन लड़कों के बारे में भी बतलाया करती थी जिनसे ’रिश्ते’ के लिए उसके समाज में उसके माता-पिता प्रयासरत हैं । उसके लिए जन्म-पत्रिकाएँ मिलाना मेरा ही दायित्व था । और मेरे ज्योतिष ज्ञान के आधार पर मैं उससे / उनसे स्पष्ट कर चुका हूँ कि उसकी पत्रिका में सुखद वैवाहिक जीवन के योग बहुत प्रबल हैं भी नहीं । उसकी बड़ी बहन के डॉयवर्स हो जाने के बाद से वे शायद इस बारे में ज्यादा परेशान हैं ।
’अगर वे करेंगे भी तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि वे कर रहे हैं?’
’मैं एक्सपेरिमेन्ट तो कर सकती हूँ?’
’जरूर!’
’ओ.के. लेट मी ट्रॉय!’
’वैसे मैं चाहूँगा कि पहले तुम्हें उन्हें एक ’आईडेन्टिटी’ देनी चाहिए ।
’वो क्यों?’
’नहीं तो तुम यह कैसे तय करोगी कि जिस बादल से तुम डॉयलॉग करना चाहती हो वह कौन है? क्या उसके बदलते रंग-रूप से तुम्हें उसे पहचान पाना मुश्किल नहीं होगा?’
’सो हॉऊ कैन डू दैट?’
वह निराश हो गई ।
’यू मस्ट सी दे हैव ऍ कलेक्टिव-आईडेन्टिटी ... .  ’
’...’
’आई मीन, दे हैव ऍ कलेक्टिव-कॉन्शसनेस, ...’
’ओ.के. गॉट इट!’
’कैसे?’
’दे हैव द कलेक्टिव नेम ’इन्द्र’ एन्ड आई कैन एड्रेस द ’देवता’ इन्द्र ’डॉयरेक्टली!’
वह उत्साहित हो उठी ।
’लेकिन यह सब तुम्हारा विशफ़ुल-थिन्किंग भी तो हो सकता है?’
’नोऽऽऽऽ ! हॉऊ डेयर यू से दैट?’
वह थोड़ा निराशा और शिकायत के स्वरों में बोली ।
’ओ.के. लेट मी टेल यू द सिक्रेट’
मैं उसे अपनी तत्काल रची कविता सुनाता हूँ "
जैसे वह मुझे ’सर’, ’प्रभु’ कभी-कभी ’डैड’ या ’अंकल’ कह देती है, वैसे ही मैं उसे ’भवानी’, ’दुर्गा’, ’काली’ या ’देवी’ कह देता हूँ , लेकिन अक्सर मैं उसे उसके नाम से ही एड्रेस करता हूँ और प्रायः वह भी नहीं ।
’सुनो :
क्लॉउड्स आर बट क्लॉद्ज़ ऑफ़ देवी,
...
द क्लॉउड्स विल श्योर रिस्पॉन्ड !’
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’वॉन्डरफुल!’
वह मेरे कॉम्पोज़िशन की तारीफ़ करती है ।
’थैंक्स! बट ईवन इफ़ यू कुड कम्यूनिकेट विद देम / हिम ऐज़ इन्द्र ,यू कॉन्ट गिव ए प्रूफ़ ऑफ़ द सेम, ऑर कन्विन्स पीपुल ! एन्ड, इफ़ यू कुड कन्विन्स, दे विल स्टार्ट वरशिपिंग यू!’
’यस प्रभु, आई अन्डरस्टैण्ड द इन्द्र नॉऊ, एन्ड आई डोन्ट वॉन्ट टु कन्विन्स पीपुल, ...बट डू फील, आई कुड कन्वर्स वेल विद द क्लॉउड्ज़् रुद्र!’
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यह सब बातें कल हुईं थीं । मोबाइल से,एस-एम-एस से ।
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आज शाम के वॉक पर निकला तो सोचा कि उसे सरप्राइज़ दूँ । उसका घर यूँ तो मेरे रोज के वॉक से बहुत दूर विपरीत दिशा में है, लेकिन सड़कों की हालत देखते हुए आज मैंने अपना रूट बदल दिया । और जैसा कि तय किया था, मैंने उसके घर के बन्द दरवाज़े पर केवल एक बार नॉक किया । अन्दर टीवी चल रहा था, दो मिनट बाहर खड़ा रहा, फिर नॉक नहीं किया और लौट आया ।
रास्ते में सब्ज़ी खरीदी, एक ’बेक-समोसा’ और चार पेन्सिल-सेल लिए ट्रांज़िस्टर के लिए, और घर आकर समोसा खाया, चाय बनाकर पी ।
समोसा जिस क़ागज में लिपटा था, उसमें किन्हीं राममूरत राही का लिखा ’पत्र’ छपा था-
’शंकराचार्य ने साँई-भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, उन्हें साँई-भक्तों से माफ़ी मांगनी चाहिए ।’
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बस इतना लिखा ही है कि मेरे उन दूसरे मित्र का एस-एम-एस आता है कि उन्होंने अपनी छुट्टी 30 तक एक्स्टेन्ड कर ली है, मतलब वे अब अगस्त में ही आएँगे मेरे यहाँ !
--

June 08, 2014

~~ कल का सपना - ध्वंस का उल्लास 5 ~~

~~ कल का सपना - ध्वंस का उल्लास 5 ~~
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पाँच वर्ष से अधिक हो गए 'नेट' पर !
इस बीच 'ध्वंस' और 'सृजन', 'सृजन' और 'ध्वंस' तथा 'ध्वंस के उल्लास' का नृत्य अविरल सतत निरंतर चलता  रहा। अनहद नाद सा।
--
भारत राष्ट्र की 'सत्ता' के सूत्रधार बदल गए।  'ध्वंस', और 'सृजन', 'सृजन' और 'ध्वंस' तथा 'ध्वंस के उल्लास' का नृत्य अविरल सतत निरंतर चलता रहा। अनहद नाद सा।
--
एक छोटी सी कविता कुछ दिनों पहले लिखी थी :
अपने लिए,
निराश हूँ,
लेकिन दुःखी नहीं।
तुम्हारे लिए,
दुःखी हूँ,
लेकिन निराश नहीं।
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बहुत-बहुत संतुष्ट हूँ अपने इस संक्षिप्त से, सारगर्भित वक्तव्य से।
वैसे तो यह किसी एक परिचित को लिखी गई 4 (या 6) पंक्तियाँ थीं, लेकिन इसे मैं मेरी सम्पूर्ण आत्मकथा ही समझता हूँ।  जिसे पूरे जगत के प्रति भी समर्पित करना चाहूंगा।
--
सोचता हूँ वक्त कहकर नहीं आता।  ध्वंस और सृजन विपरीत या विरोधी नहीं एक-दूसरे के प्रतिपूरक हैं। दोनों वह बल-युग्म है, जो जीवन  है।  जन्म और मृत्यु भी ऐसा ही एक बल-युग्म है।
--
बचपन से यह बल-युग्म मेरे जीवन के पहिए को संतुलित रखता चला आया है।  हर दिन, हर बार ऐसा लगता है कि अब यह पहिया इधर या उधर गिर जाएगा, लेकिन फिर फिर संतुलित हो  जाता रहा है । अध्यात्म, धर्म, शिक्षा, राजनीति, सामाजिक दबावों और व्यक्तिगत गुण-दोषों  बावज़ूद !
--
हर रोज़, हर घड़ी कुछ न कुछ अनपेक्षित होता है, ख़ुशी या दुःख या बस रोज़मर्रा का रूटीन !
अख़बार पढ़ना मज़बूरी है, आज के अख़बार में ISIS के विरोध में कलकत्ता की मुस्लिम युवतियों के प्रदर्शन के फ़ोटो पर नज़र पड़ती है, दूसरी खबरें भी हैं, रुश्दी को मिला pen -pinter पुरस्कार या केदारनाथ सिंह को मिला ज्ञानपीठ, रेल-भाड़े में वृद्धि जिसे सदानंद गौड़ा पिछली u . p . a . सरकार की सौगात कहते हैं।
वास्तव में मेरा सोचना है कि हमें हर चीज़ की क़ीमत देनी ही होगी। तथाकथित विकास, समृद्धि, प्रगति, उन्नति, आदि की क़ीमत तो चुकानी ही होगी उससे कहीं बहुत अधिक क़ीमत  अपने लोभ, भयों जीवन-मूल्यों आदर्शों, विचारधाराओं, धर्म (?), परंपरा, सामाजिक सरोकारों की भी।
लेकिन शायद ही कोई क़ीमत चुकाने को तैयार है।
'ध्वंस' भी क़ीमत है, और मैं उल्लसित हूँ !

वे चार पंक्तियाँ फिर से उद्धृत कर रहा हूँ  :          

अपने लिए,
निराश हूँ,
लेकिन दुःखी नहीं।
तुम्हारे लिए,
दुःखी हूँ,
लेकिन निराश नहीं।
--
और एक संशोधन  :

तुम्हारे लिए,
या अपने लिए,
भले ही मैं निराश या दुःखी होऊँ,
हैरत नहीं होगी मुझे,
अगर कल के अख़बार में,
तुम्हारे / मेरे / हमारे बारे में छपी,
कोई और डरावनी खबर,
मुझसे 'हॅलो' कहे !
-- 

June 17, 2011

"अस्तित्व-एक नृत्य"


~~~~~ "अस्तित्व-एक नृत्य" ~~~~~
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17062011
© Vinay Vaidya 


शब्द मौन है,
और ’मौन’ शब्द !
व्याप्त दिग्‌-दिगन्त में,
दिग्‌-दिगन्त, जिसमें ।
गति और स्थिरता का,
युगल नृत्य !
अनिर्वचनीय, अवर्णनीय !! 




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March 03, 2011

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन !






~~ कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ! ~~
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© Vinay Vaidya 


क्या सचमुच ?
हाँ, और नहीं भी ! 
जब अभी के इन पलों से उनकी तुलना करता हूँ,
तो वे बहुत अपने लगते हैं ।
लेकिन शायद ऐसा तब भी तो था !
लेकिन सोचता हूँ, तब बेचैनी कहाँ थी ?
कुछ ’छूट जाने’ का एहसास कहाँ था ?
तब बस ’वर्तमान’ हुआ करता था ।
सचमुच तब भविष्य का विचार तक नहीं होता था ।
तब सुख थे, कष्ट भी थे, और प्रश्न भी थे ।
अब सुख बहुत कम हैं, या जो हैं भी, उनका एहसास 
तभी होता है, जब वे छिन जाते हैं,
जैसे अचानक ’नेट’ का कट जाना,
अब यह ’प्रश्न’ नहीं ’चिन्ता’ बन जाता है ।
लेकिन क्या फोन, मोबाइल, टीवी, फ़्रिज,
मोटर-सायकल के बिना भी क्या मैं सुखी नहीं था ?
तब गाँव से छह किलोमीटर चलकर आधे घण्टे के इन्तज़ार के बाद
दूर से आती बस के रुक जाने, उसमें खड़े होने भर की जगह भी 
मिल भर जाने से एक खुशी नहीं होती थी ?
लगता है कि तब बहुत उत्साह था, जो अब चुक गया है ।
अब बस आशाएँ ही बाकी हैं,
’तदपि न मुञ्चति आशावायुः’
किसकी आशा ?
कोई उत्तर नहीं है मेरे पास ।
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January 09, 2011

~~देर आयद, दुरुस्त आयद ~~

~~~~~~देर आयद, दुरुस्त आयद~~~~~
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बहुत दिनों तक मेरे साथ चलते रहने के बाद,
खयाल आया था उसे,
कि वह बस भटकता ही तो रहा है, अब तक !
"कहाँ जाना / पहुँचना चाहते थे / हो तुम ?"
-पूछा मैंने ।
कोई उत्तर नहीं था उसके पास ।
"मुझे लगता है कि मैं चाहता था / हूँ, 
अपनी ’अस्मिता’ की एक पहचान ’स्थापित’ करना ।"
-वह बुद्धिजीवियाया ।
"चलो, ठीक है, मुझे माफ़ करो,
और अपना रास्ता नापो"
-सोचा मैंने ।
लेकिन प्रकटतः यही कहा,
"चलो इक बार फ़िर से,
अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।"
हमने अच्छे दोस्तों की तरह हाथ मिलाये,
-शेकहैन्ड किया,
और अपनी अपनी राह पर चल पड़े ।
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December 17, 2010

यह अन्त था ! माँ !!















~~~~~यह अन्त था !~~~~~
________माँ !!_________
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यह अन्त था !
माँ !!


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अक्सर मैं सोचता था, 
एक तस्वीर बनाऊँ,
पर्वतारोहियों की,
सामने हैं कई शिखर,
जो दुर्गम हैं,
ललचाते हैं,
चुनौती देते हैं,
हर शिखर के लिये,
एक नया अभियान शुरु करना होता है,
फ़िर,
शिखरों के क्रम हैं,
श्रँखलाएँ,
किसी भी शिखर से दूसरे किसी शिखर तक,
एक नया रास्ता
होता है,
या खोजना होता है ।
शुरु करना होता है,
नये सिरे से,
एक नया अभियान,
सामना होता है, 
एक नई चुनौती से !
करना होता है, एक नया संकल्प !
नहीं जानता था,
कहाँ होगा,
इस क्रम का अन्त ।
-जब कोई चोटी अविजित रहकर मुझे जीत लेगी,
और मैं हार जाऊँगा !
पर हाँ,
प्रतीक्षा ज़रूर थी,
ऐसी किसी ऐसी घड़ी की ।
ऐसी किसी चोटी की ।
और फ़िर एक दिन अचानक ही अकल्पित घटा था ।
जब उसके दर्शन हुए थे ।
उसके अद्भुत सौन्दर्य को,
मैं निर्निमेष देखता रह गया था,
अपलक,
ठगा सा !
संमोहित, 
लुब्ध,
मन्त्रमुग्ध सा !
खिंचता चला गया था उसकी ओर,
खिंचता नहीं, बल्कि उड़ता हुआ सा,
क्योंकि मेरे पास पंख नहीं थे ।
और जब उसके चरणों तक पहुँचा,
चरणों को छुआ,
तो मेरा सारा विजय-गर्व धराशायी था,
नतमस्तक,
विगलित,
पिघलकर हो गया था हिमनद्‌ !
भाग रहा था, रसातल की दिशा में ।
हाँ, उसने मुझे अभिभूत कर लिया था,
और मैं रोमाँचित था,
अधीर, विह्वल, पुलकित और गद्‌गद्‌ !!
उसने मुझे उठाकर जड़ दिया था,
मेरे गाल पर एक चुम्बन !
वात्सल्य भरा,
हाँ,
मैं हारकर भी जीत गया था !

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October 13, 2010

प्रीति का उल्लास

~~~~~~प्रीति का उल्लास ~~~~~~
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जानता हूँ,
कि तुम जो बहती हुई निर्झरिणी थी कभी,
जीवन की सख्त शीत में ,
जमकर बर्फ हो गयी हो !
और यह बर्फ हो गयी है सख्त चट्टान .
भूल से इसे ही अपना अस्तित्त्व समझकर,
अस्मिता बना लिया है तुमने !
लोग आते रहे, और इस झूठी अस्मिता को बचाने के लिए,
तुम और भी अधिक कठोर तीक्ष्ण होती चली गयी .
सख्त से सख्त, 
-शीशे सी पैनी,
पर भंगुर भी !!
तुम्हें लगता है कि मैं भी तुम्हें तोड़ने ही आया हूँ,
तुम्हारे समीप ,
कि तुम्हारे एक छोटे से टुकड़े को,
अपने ड्रिंक में डालकर,
अपने नशे का लुत्फ़ बढ़ाऊँ !
नहीं प्रिये !
मैं तो आया हूँ तुम्हारे समीप सिर्फ इसलिए,
कि पिघला सकूँ,
तुम्हें अपनी प्रीति की ऊष्मा से,
कर दूँ तुम्हें  पानी-पानी !
शापमुक्त कर बना दूँ तुम्हें अहिल्या,
ताकि तुम बह सको,
उन्मुक्त स्वच्छंद,
और मैं बह जाऊं,
तुम्हारी प्रीति में,
देवी !

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June 26, 2010

एक प्रश्न

~~~~~~~एक प्रश्न~~~~~~~
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एक प्रश्न : क्या आप वही हैं जो आप दिखने का प्रयास करते हैं..? 
सभी मित्रों से उत्तर अपेक्षित है.. ...जोगी..
उत्तर : आपका सवाल शायद यह है, कि मैं दूसरों की नज़रों में जैसा
दिखलाई देना चाहता हूँ, क्या मैं सचमुच वह हूँ ?
क्या यह एक नामुमकिन सवाल नहीं है ?
क्योंकि अलग-अलग लोगों की नज़रों में मैं हमेशा अलग-अलग
ही रहूँगा
इसलिये असली सवाल यह है कि मैं अपने-आपकी नज़र में क्या हूँ !
दूसरे शब्दों में कहेंतो मेरी अपनी इमेज मेरी दृष्टि में क्या है ?
और थोड़ा धीरज़ से देखेंतो क्या मैं मेरी इमेज हूँ ?
इस बिन्दु पर आते-आते बुद्धि ठिठकने लगती है और धैर्य चुक जाता
है
लेकिन मेरे लिए इस सवाल पर गौर करना जीने की एकमात्र सार्थकता है
सादर

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December 01, 2009

कविता - लौटते हुए !

लौटते हुए
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कितनी बार सोचा है,
कि अब तुम्हारे बारे में नहीं सोचूँगा,
लेकिन हवा का हर झोंका,
पेड़ों की लचकती शाखें,
फूलों के चटखते रंग,
बरबस खींच ले जाते हैं,
-तुम्हारी यादों में !
और मैं न जाने किस पल अचानक पाता हूँ,
कि मैं भटक गया हूँ,
-उन बीहड़ों में,
जो एक अजीब 'सुख' भी देते हैं !
लेकिन अब आदत हो रही है,
अब ख़याल रहता है,
कि कब कोई याद,
मन के किसी कोने में,
अचानक उभर आती है ।
जैसे उस फूल पर वह छोटी सी चंचल चिड़िया,
अचानक आती है,
अपनी लम्बी नुकीली चोंच से रस चूसकर 'फुर्र' हो जाती है,
(और शायद नहीं जानती कि फूल को कहीं कोई चोट तो नहीं पहुँची ।)
मैं भी गुज़र जाने देता हूँ,
-तुम्हारी यादों को,
अब, मैं नहीं जोड़ता, उन्हें किसी ख़याल से,
जैसे ड्राइंग-रूम में रखे,
मनी-प्लांट और केक्टस,
तुम्हारे जाने के बाद से,
धूल और उपेक्षा को झेल रहे हैं,
मकड़ियों के जालों से आच्छन्न हो रहे हैं,
पर सुखी हैं, क्योंकि अब भी शायद किसी कोने में आस लगाए हैं,
कि तुम आओगी किसी दिन ।
मैं जानता हूँ, कि अब तुम सिर्फ़ यादों में ही आओगी ।
लेकिन अब मैं नहीं जोड़ता,
तुम्हारी याद को,
किसी ख़याल से ।
अब नहीं भटकूँगा मैं उन बीहड़ों में,
बार-बार,
-अपने-आपको लहू-लुहान करता हुआ ।
लौट आता हूँ मैं बार-बार,
अपने अनकहे अकेलेपन में,
अपने खा-----ली----पन में ,
-क्योंकि अब रास आ रहा है वह मुझे !
हाँ, अपने-आपसे बदला लेने का 'सुख'
शायद ज़्यादा तल्ख़ है,
तुम्हारी यादों के झूठे 'सुखाभास' से !

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