February 19, 2026

P C M

Incidence or a Coincidence?

घटना, संयोग, प्रारब्ध या नियति?

बचपन से मुझे जानने और पता लगाने में कुछ अधिक ही रुचि थी। और ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि लगभग हर प्राणी में यह जन्मजात रूप से होती ही है। हर शिशु में, चाहे वह मनुष्य का या पशु का हो, पक्षी या जलचर का है। यह मूल और अबोध प्रवृत्ति आगे चलकर अपने और अपने आसपास के संसार को जानने समझने और उसमें अपने संसार में होने, उससे संबद्ध और फिर उससे फिर भी कुछ भिन्न और स्वतंत्र उसकी एक इकाई होने की मान्यता का रूप ले लेती है। यह या तो केवल अपने लिए सुरक्षित बने रहने और संसार में निरंतर अपने लिए आवश्यक उन वस्तुओं को प्राप्त करते रहने की प्रवृत्ति में बदल जाती है जो हमें निरंतर सुरक्षित और सुखी बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रतीत होती हैं। इन वस्तुओं में हमारा परिवार, लोग और उनसे हमारा संबंध भी ऐसी ही एक वस्तु होती है। शारीरिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रहने की इस प्रवृत्ति को survival instinct  कह सकते हैं। स्कूल में आठवीं बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद नौंवीं में विज्ञान या क्या संकाय में से कोई एक चुनना था। मेरी दिलचस्पी विज्ञान में थी, और चूँकि  मुझे डॉक्टर नहीं, वैज्ञानिक या और गणितज्ञ बनना था इसलिए बॉटनी ज़ूलॉजी लेने का सवाल ही नहीं था। अब बचा गणित, तो आगे जाकर इंजीनियरिंग भी लिया जा सकता था।

P -Physics, C - Chemistry  और  M - Mathematics, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र और गणित। यद्यपि तब यह कल्पना तक नहीं उठती थी कि भविष्य में नौकरी या आजीविका के प्रश्न का भी सामना करना होगा। लेकिन इन्हीं विषयों को लेकर ग्रैजुएशन और फिर गणित में पोस्ट ग्रैजुएशन कर लिया, बैंक में सम्मानप्रद नौकरी भी मिल गई और झुकाव शुरु से ही अध्यात्म की ओर था, तो बस सारा प्रयास अध्यात्म का रहस्य खोजने और समझने में लगा दिया। अभी करीब साल पहले इस बारे में सोच रहा था कि शायद बचपन में P C M को चुनने के पीछे अव्यक्त रूप से जो इच्छा मन में थी वह मूलतः अध्यात्म के प्रति  मेरी गहरी रुचि का ही संकेत था। क्योंकि गीता में वर्णित सांख्य और योग की इन दोनों निष्ठाओं से मैं अपनी उस रुचि को संबद्ध कर सकता था, अर्थात्  relate  कर पा रहा था।  Analogy  के रूप में उस दृष्टि से -

भौतिक शास्त्र - कर्म, रसायन शास्त्र - गुण और गणित - सांख्य (बुद्धि) के ही सूचक हैं, - कर्म, गुण और बुद्धि का न्यायोचित समन्वय ही धर्म और दर्शन है।

धर्म सिद्धान्त और आचरण है, दर्शन अध्यात्म है।

धर्म शरीर, मन और संसार से सुसंगति है, जबकि दर्शन आत्मा से सुसंगति  है।

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