February 09, 2026

THE SHADOW OF LIGHT

स्मृति की पहचान : पहचान की स्मृति

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अतीत, पहचान और स्मृति यद्यपि एक ही वस्तु जीवन  के तीन आयाम हैं, और संभवतः तीनों को परिभाषित भी किया जा सकता है, तीनों ही अन्योन्याश्रित सत्य हैं और किसी कल्पित विषय के सन्दर्भ में ही अभिव्यक्त और पुनः अनभिव्यक्त होते रहते हैं। आधारभूत चेतना उन सबमें व्याप्त होते हुए भी उनसे अप्रभावित, अछूती और स्वतंत्र है, जिसमें ये तीनों ही भेद नहीं पाए जाते। जैसे

ब्रह्म - सजातीय, विजातीय और स्वगत

इन तीनों ही भेदों से रहित नित्य विद्यमान अस्तित्व है, और उसे जिस तरह से सर्वनाम के तीनों प्रकारों -

अस्मद्, युष्मद् और तत्

में से किसी एक की तरह व्यक्त या संबोधित नहीं किया जा सकता है, चेतना भी अपना प्रमाण स्वयं ही है और  उसे ही -

सन् धातु के क्त प्रत्यय सहित सत् पद से भी व्यक्त किया जाता है :

श्रीमद्भगवद्गीता -

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। 

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्तयं ह्येतदुत्तमम्।।३।।

अर्जुन उवाच :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

श्रीभगवानुवाच :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठायसंभवाम्यात्ममायया।।६।।

श्री भगवते प्रीयतां च अर्पणमस्तु।।

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