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June 10, 2024

76 ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद

Question / प्रश्न 76

ईश्वर क्या है?

 Answer / उत्तर 

आध्यात्मिक साधनाओं की विविध परम्पराओं का इस आधार पर भी वर्गीकरण किया जा सकता है कि कुछ तो संसार की सृष्टि करने, संरक्षण और परिपालन तथा पुनः उसका संहार करने के लिए किसी महान ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करती हैं, और इससे विपरीत और भिन्न दृष्टि का आग्रह करनेवाली ऐसी किसी सत्ता का प्रमाण दिए जाने का आग्रह करती हैं। इनमें भी पुनः अनेक मतभेद देखे जाते हैं जैसे कि वह सत्ता एकमात्र और अद्वितीय है और उससे भिन्न किसी और दूसरी ऐसी सत्ता का अस्तित्व ही नहीं है। फिर उस एकमात्र ईश्वरीय सत्ता को माननेवालों की बीच भी इस पर मतभेद होते हैं कि उसका स्वरूप और नाम किस प्रकार का है। उसके साक्षात्कार का मार्ग या उपाय क्या हो सकता है इस पर भी उनके बीच विवाद होता रहता है। फिर इस बारे में भी इन सभी के बीच एक और मतभेद इस प्रकार का होता है कि क्या उस ईश्वरीय सत्ता का संसार में अवतरण होता है या कि वह किसी विशिष्ट मनुष्य को संसार में भेजता है जिसके माध्यम से उसके स्वरूप और कार्य के बारे में संसार को संदेश दिया है। पूर्व की सनातन धर्म की भिन्न भिन्न परम्पराओं में यद्यपि उसे एकमेव और अद्वितीय भी कहा जाता है और उसे ही आत्मा या परमात्मा, ब्रह्म या परब्रह्म भी कहा जाता है - जैसे कि आस्तिक परम्पराओं में, जबकि इनसे भिन्न और भी परम्पराएं हैं, जिनमें ऐसी किसी ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व पर संशय किया जाता है, यहाँ तक कि उसके अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया जाता है। जैसे कि नास्तिक, चार्वाक परम्पराएँ। इनसे भी भिन्न बौद्ध और जैन परम्पराएँ भी हैं जिनमें इस प्रकार का ईश्वर विचार का विषय ही नहीं होता और आत्मा को ही जानने पर बल दिया जाता है क्योंकि यद्यपि आत्मा या स्वयं से प्रत्येक मनुष्य अनायास परिचित ही होता है, आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए बहुत ही श्रम और प्रयास करना भी आवश्यक होता है। इन भिन्न भिन्न मतों या सिद्धान्तों को माननेवालों की तरह किन्तु उनसे कुछ भिन्न यह मत वेदान्तवादियों का होता है कि आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म, सत्य, और उन्हें जाननेवाला एक ही और इन सबसे अनन्य है।

एक दृष्टान्त / उदाहरण दिया जाता है कि यदि वाहन या गाड़ी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाना है तो उसे खींचकर ले जाया जाता है या धकेलकर ले जाया जाता है इसका विशेष महत्व नहीं है।

इसी प्रकार अनेक सिद्धान्त ईश्वर और आत्मा के बारे में हैं और यदि ईश्वर का या आत्मा का साक्षात्कार करते हुए उसे जानना है, या उसे जानकर उसका साक्षात्कार करना है, तो इसका विशेष महत्व नहीं रह जाता कि इस उद्देश्य की प्राप्ति किस तरह से की जाती है।

यहाँ पर सबसे बड़ी बाधा है व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और स्वामित्व के रूप में व्यक्तिगत अहंकार। अहंकार किसी भी यत्न से स्वयं का निषेध, निरसन या निराकरण नहीं कर सकता। इसलिए अहंकार को मिटा सकना लगभग असंभव है। इसके लिए कोई तरीका नहीं हो सकता। किन्तु इस समस्या का एक संभावित हल यह हो सकता है कि सब कुछ ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया जाए। किन्तु समर्पण भी तब तक किया नहीं जा सकता जब तक मनुष्य में कामना का लेशमात्र भी शेष है। और क्या किसी "ईश्वर" की स्वीकृति भी कामना का ही एक प्रकार नहीं होती! इसलिए ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, यह प्रश्न गौण है, प्रमुख प्रश्न यह है अहंकार का विलय (dissolution) कैसे हो सकता है? किसी के लिए यह संभव है कि वह निश्चयपूर्वक यह अभ्यास करता रहे कि उस अज्ञात ईश्वरीय सत्ता को यथासंभव सतत स्मरण रखे और अपने समस्त संकल्प, इच्छा आदि को भी उसका ही समझे और अपने सारे यत्नों को भी ।इसी के साथ जो भी कुछ घटित होता है उस सबको भी उसकी ही इच्छा समझे अर्थात् ईश्वरीय सत्ता से वह कोई प्रतिरोध न करे। अपने आपकी सुरक्षा तक उसे सौंप दे। किन्तु यह भी बहुत कठिन प्रतीत होता है। क्या फिर ऐसा नहीं किया जा सकता कि ईश्वर का विचार तक न किया जाए और केवल आत्म-चिन्तन ही किया जाए। यहाँ  इस पर भी ध्यान देना होगा कि तब संसार के समस्त विषयों को मन से बहिष्कृत कर देना होगा। मन इस प्रकार से क्या विषयों से नितान्त रिक्त हो सकता है? संभवतः पतञ्जलि के योगसूत्र से इसका संकेत ले सकते हैं जिसमें योग को चित्त की वृत्तियों का निरोध (करना) कहा गया है। शायद एक और अन्य सांख्यनिष्ठा के आधुनिक युग के द्रष्टा :

Emptying of the mind of all its content / contents.

कहते हैं।

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June 02, 2024

वह कौन?

Question / प्रश्न 76.

वह कौन?

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वैसे तो वह कोई सजीव सत्ता है जैसे कोई वृक्ष, जैसे कोई पशु, जैसे कोई पक्षी, जैसे कोई मनुष्य - बच्चा, कोई युवा, वृद्ध, जैसे कोई पुरुष या स्त्री, या जैसा कोई आदि-मानव। 

जब उसे भूख लगती है तो वह खाने के लिए भोजन की तलाश करता है, जब भोजन मिल जाता है तो जब तक भूख मिट नहीं जाती तब तक भोजन करता रहता है, या कहें तो खाने का कार्य करता है। फिर वह निरर्थक, यूँ ही यहाँ वहाँ घूमता भटकता रहता है।

प्यास लगने पर पानी पीता है। वह समाज या परिवार में रहता हुआ समय समय पर पैदा होनेवाली अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को पूर्ण करने की स्थायी व्यवस्था करना सीख जाता है ताकि बार बार उसे भोजन और पानी की तलाश में यहाँ वहाँ भटकते न रहना पड़े। क्रमशः अपनी और अपने परिवार की, "समाज" की, "सभ्यता" की एक विशिष्ट एक शैली वह विकसित कर लेता है। जैसे पशु / पक्षी आदि अपना समाज निर्मित कर लेते हैं, उस तरह से वह भी अपना समाज निर्मित कर लेता है। अभी तक तो उसने "भाषा" का आविष्कार भी नहीं किया है, और वह भी दूसरे प्राणियों की ही तरह चित्त में समय समय पर और क्षण क्षण पर प्रकट और विलीन होती रहनेवाली विभिन्न भावनाओं के साथ साथ बहता हुआ, उनके अनुभवों को अपनी स्मृति में संजोता है। यह सारा  कार्य उसके किसी भी सचेतन, और स्वैच्छिक निश्चय से नहीं होता, बल्कि अनायास और अपने आप होनेवाला प्राकृतिक कार्य हुआ करता है। और यद्यपि अभी तक उसमें विभिन्न घटनाओं को समझने की बुद्धि उत्पन्न हो चुकी होती है और वह उनके स्वाभाविक पूर्व-पश्चात के क्रम में आधारभूत तथ्य के रूप में "समय" की पहचान भी कर चुका होता है, और उस पहचान से "समय" के विस्तार के छोटे और बड़े होने की तुलना भी कर सकता है, फिर भी अभी वह भाषा और शब्दों से अनभिज्ञ होता है। फिर किसी समय वह विभिन्न वस्तुओं, घटनाओं और ध्वनियों के बीच तारतम्य स्थापित करना भी सीख लेता है जो पुनः स्मृति में किसी प्रारूप में संजो ली जाती हैं।

और फिर किसी समय इसी प्रकार से चित्त में अनायास क्षण क्षण उठती और विलीन होती हुई भावनाओं और उनकी प्रतिक्रियाओं की एक विशिष्ट पहचान बना लेता है। इच्छा, भय, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, रोष, आकर्षण और विकर्षण, शत्रु, मित्र, सापेक्ष और निरपेक्ष वस्तुओं और  आवश्यकताओं आदि की भी पहचान इस तरह उसे हो जाती है।

जीवन जीने के लिए इतना ही पर्याप्त होता है।

किन्तु वस्तुओं, घटनाओं, भावनाओं और अनुभवों आदि से ध्वनियों को संबंधित करने के क्रम में अनैच्छिक रूप से ही सही, "भाषा" का निर्माण वह कर लिया करता है। परिवार, समाज आदि में भी उन ध्वनियों को शाब्दिक रूप में सीख और स्वीकार कर लिया जाता है।

और तब उसके पास वैचारिक मन नामक एक यंत्र आ जाता है जिसकी सहायता, प्रभाव और परिणाम से जब वह अकेला भी होता है तब भी कल्पना के अन्तर्गत वह स्मृति को पुनर्जीवित करने लगता है। तब वह "स्वयं" से "उस भाषा" में स्वप्न जैसी अवस्था में जागते हुए या सोते हुए बातें करने लगता है।

वह कौन?

वही, जो कि अभी तक शाब्दिक भाषा से अनभिज्ञ था।

अब से पहले भी उसका जीवन दो अवस्थाओं में बीतता रहता था - जब वह संसार में जागृत हुआ भूख प्यास को अनुभव करता हुआ उन्हें मिटाने की चेष्टा में संलग्न रहा करता था, और (शरीर के) थक जाने पर विश्राम करता या सो जाता था ।

जागने और सोने की इन दोनों गतिविधियों में शरीर तो यंत्रचालित ढंग से सतत ही अपना कार्य करता रहता था और सोने की स्थिति में 'मन' संभवतः स्वप्न जैसी किसी अवस्था में, -जागने के समय के अनुभवों का स्मरण या विस्मरण किया करता होगा।

इन विभिन्न अनुभवों में "स्वयं" की पहचान तो बहुत बाद में बनती होगी, जिसे और भी बाद में अपनी एक अमूर्त (abstract) पहचान बनाकर स्मृति में केन्द्रीय मौलिक  की तरह अंकित और टंकित कर लिया जाता होगा।

शरीर के सोने या जागने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि उसकी गतिविधियाँ दोनों ही समय स्वाभाविक रूप से कम या अधिक तीव्रता के साथ चलती रहती हैं।  यह तो "मन" ही होता है जिसमें "स्वयं" की वह अमूर्त कल्पना "मैं" की स्मृति बनकर अपना कृत्रिम अस्तित्व निर्मित कर लेती है।

जब "मैं" जागता हूँ उस समय तो किसी न किसी कार्य में व्यस्त होकर अपने आप को उसका "कर्ता" होने की धारणा से बद्ध कर लिया करता हूँ, किन्तु जब करने के लिए इस "मैं" के पास कोई कार्य नहीं होता, तो "वह"  व्याकुल हो उठता है, या तो वह निद्रा की शरण लेता है, या किसी काल्पनिक व्यस्ततता की । अपने लिए "वह" स्वयं ही असंख्य ध्येय कल्पित और  सृजित कर लेता है, उन्हें प्राप्त करने के यत्न में जी-जान से जुट जाता है।

"वह" अपने आपको समस्त सुख-दुःख का, चिन्ताओं, आशाओं, आशंकाओं, महत्वाकांक्षाओं के "भोक्ता" के रूप में भी कल्पित कर लेता है, उपलब्धियों का स्वामी और इस समस्त ज्ञान के संग्रह के "ज्ञाता" की तरह भी।

"वह" यह कभी नहीं देख पाता कि सो जाने पर इन सब असंख्य ध्येयों आदि का क्या होता है! वह अपने आपको सुधारना, निरन्तर और से और भी अधिक परिष्कृत और समृद्ध करते रहने की चेष्टा करता रहता है।

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