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July 09, 2021

शब्द-शक्ति

अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना 

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समीक्षा : "दर्द लेकर दर-ब-दर" कविता की। 

वैसे अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना और शब्द-शक्ति के बारे में मैं अधिकारपूर्वक कुछ नहीं कह सकता, किन्तु उपरोक्त शीर्षक से लिखी कविता की समीक्षा के बहाने मैं उनका उपयोग कर रहा हूँ। इस दृष्टि से देखें तो यह कविता लिखते हुए मुझे पुनः गीता के अध्याय ४ के श्लोक का स्मरण हुआ :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।। ५

जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण (या गीता के रचयिता) द्वारा किए गए 'अहं' शब्द के प्रयोग में श्लेष अलंकार दृष्टव्य है।

यदि क्रियापद 'वेद' पर ध्यान दें तो इसमें भी इसी प्रकार श्लेष अलंकार की सुसंगति दो प्रकार से दिखाई देती है।

संस्कृत भाषा की अदादिगण की धातु √विद् का प्रयोग 'जानने' के अर्थ में किया जाता है।

'वेद' शब्द का प्रयोग पुनः लिट् लकार (अनद्यतन भूत काल) में अन्य पुरुष एकवचन तथा उत्तम पुरुष एकवचन में समान अर्थ में किया जाता है, अर्थात् 'उसने जाना' और 'मैंने जाना' के अर्थ में। 

'अहं' पद, संज्ञा के रूप में 'आत्मा' के अर्थ में, तथा सर्वनाम के रूप में 'मैं' के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

भगवान् श्रीकृष्ण (या गीता के रचनाकार) ने जिस भी दृष्टि से ऐसा प्रयोग किया हो, उसकी दोनों ही अर्थों से सुसंगति है।

इसी दृष्टि से सन्दर्भित मेरी रचना में 'मैं' शब्द का प्रयोग दो अर्थों को दर्शाता है। एक है वास्तविक 'आत्मा' और दूसरा है मेरी वह लौकिक पहचान जो आभासी, व्यावहारिक प्रतीति और ज़रूरत है किन्तु वह मिथ्या है न कि मेरा यथार्थ ।

इसी सन्दर्भ में, 'अभिज्ञा' शब्द का प्रयोग 'भक्ति' के अर्थ में महर्षि शाण्डिल्य विरचित 'भक्तिदर्शनम्' में भी दृष्टव्य है। 

भक्ति को भी महर्षि ने दो प्रकार से वर्णित और वर्गीकृत भी किया है। एक है मुख्या और दूसरी है इतरा या गौणी। 

विशेष यह कि दोनों ही प्रकारों की भक्ति में भक्त को आत्मा का विस्मरण नहीं होता।

इसी 'अभिज्ञा' की प्रतिध्वनि "प्रत्यभिज्ञानात्" सूत्र में, तथा और शैवदर्शन के एक ग्रन्थ, 

आचार्य क्षेमराज-विरचित : "प्रत्यभिज्ञाहृदयम्"

में भी सुनाई देती है। 

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दर्द लेकर दर-ब-दर

अहं, अहंकार, अभिज्ञा, अभिमान, 

अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना,

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कविता : 09-07-2021

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क्या मेरी अपनी कोई पहचान होना चाहिए!

क्या नहीं पहचानता (हूँ) असलियत भी मैं खुद की?

यूँ तो ये लगता है, सब पहचानते ही हैं खुद को ,

ये भी लेकिन सच नहीं, क्या जानते हैं वे खुद को!

मुमकिन है क्या, अनजान कभी, कोई होता हो खुद से?

हाँ जरूर हो सकता है, गा़फ़िल हो जाता हो खुद से!

अपने वजूद से क्या कभी इंकार कोई करता है?

फिर कभी होगा कोई, नावाकि़फ़ कैसे खुद से?

यही तो ग़फ़लत है अपनी, जान और पहचान में,

हकी़क़त में, जानने-पहचानने के, दरमियान में!

खुद को कोई जिस तरह से भी जाना करता है,

और अपने-आपको, जैसे कि पहचाना करता है,

'जान' पर 'पहचान' कोई, जब अपनी लाद लेता है,

अपने वजूद को भुलाकर ओढ़ लेता है जब ग़फ़लत,

खुद को, उसी तो भूल में, खुद ही तो बाँध लेता है!

लेकिन मगर उस भूल को जब वह जान लेता है,

खुद को, खुदी को भी तभी पहचान लेता है!

खुद से खुद की ही, जान-पहचान तक का सफ़र,

है बहुत दिलचस्प भी, इतना बहुत ही पुर-असर!

कोई मुसाफ़िर जब तलक करता नहीं है यह सफ़र,

तब तक भटकता रहता है, दर्द लेकर दर-ब-दर!

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