March 31, 2022

तब समय नहीं था,

जब समय अस्तित्व में आया। 

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तब परमात्मा ही था। अब भी वही है।

तब समय नहीं था। अब समय प्रतीत होता है।

वैसे, समय प्रतीत भी कहाँ होता है? 

समय नहीं, समय का विचार ही आता है, न कि समय नामक कोई ऐसी भौतिक वस्तु जो इन्द्रिय, बुद्धि या मनोग्राह्य होती हो। अर्थात्, समय जो नित्य है, जो आता-जाता नहीं। हाँ, समय का विचार ही तो आता-जाता है। शायद, क्या उसके आने-जाने से ही समय का अनुमान नहीं होता! फिर भी भौतिक जगत् / विश्व की प्रतीति तो अकाट्य सत्य है ही न!  इस भौतिक जगत् का आधार सूर्य ही तो है। 

सूर्य के होने की प्रतीति का आधार जीवन ही तो है।

सवाल यह है कि क्या सूर्य के होने से ही जीवन है, और इसके बाद जीवन के होने से सूर्य के होने की प्रतीति? या, इस प्रतीति के बाद ही सूर्य का अस्तित्व प्रतीत होता है? 

तात्पर्य यह कि जीवन, प्रतीति और सूर्य, एक ही युगपत् घटना है, जिसे परोक्षतः 'समय' कहा जाता है। 'समय' न तो बीतता है, न स्थिर है, क्योंकि समय मूलतः एक अवधारणा है न कि कोई भौतिक इन्द्रिय-मन-बुद्धि-ग्राह्य वस्तु। क्वांटम / इलेक्ट्रॉनिक ढंग से कहें तो समय की मात्रा (mass), आवेश (charge) तथा विमाएँ (length, breadth, height, / dimensions) शून्य होते हैं । शून्य का दूसरा अर्थ है - अभाव होना। 

जैसे शून्य का मान न तो धनात्मक होता है, और न ऋणात्मक,  उसी प्रकार से समय का न तो अतीत में, और न ही भविष्य में कोई मान होता है। वर्तमान में भी इसे, क्षण के लगभग शून्य के निकटतम मानकर ही (as small as we please)  अल्प-तम मान दिया जाता है। निपट इस क्षण में समय का कोई मान तय ही नहीं किया जा सकता।

सूर्य, जीवन और प्रतीति (चेतना / consciousness) एक ही वस्तु के भिन्न भिन्न नाम हैं। सूर्य की प्रतीति का आधार जीवन ही तो है, - जीवन है तो प्रतीति है और प्रतीति है तो सूर्य की भी प्रतीति है। किन्तु लगता यह है कि पहले सूर्य अस्तित्व में आया और बाद में जीवन। अत्यन्त मेधावी के लिए भी यह समझना कठिन होता है कि प्रतीति के अभाव में सूर्य का क्या प्रमाण हो सकता है? 

और यह एकमात्र जीवन अविभाज्य अखंड सत्य है। विचार ही समय को अस्तित्व / जन्म प्रदान करता है, और समय, -स्मृति को। ये तीनों भी एकमेव वस्तु की तीन प्रतीतियाँ हैं। 

सूर्य की तीन संतानें हैं - यह एक समय-निरपेक्ष तथ्य है।

यम -अर्थात् समय, यमुना अर्थात् स्मृति, व लोक अर्थात् पृथ्वी के द्वारा सूर्य की कक्षा में परिभ्रमण करने से उत्पन्न होनेवाले दो अश्विनीकुमार । इसे ही अश्विनौ (द्विवचन) भी कहा जाता है। यह संयोग या आश्चर्य नहीं है, कि ग्रीक भाषा के इक्विनॉक्स / equinox  शब्द को दो प्रकार से अश्विनौ से संबद्ध किया जा सकता है। एक है दो अश्वों का युगल, दूसरा है अश्विन्-ऊक्षिन्। ऊक्षिन् अर्थात् अश्व या बैल (ox), पुनः, अश्व से 'horse' की समानता भी दृष्टव्य है।

यह स्थूल इन्द्रिय-मन-बुद्धि-ग्राह्य लोक / जगत् है।

जीवन और प्रतीति, -सूक्ष्म, अर्थात् मनो-जगत है।

विचार से निश्चय अर्थात् बुद्धि का उद्भव हुआ।

बुद्धि का संस्कारित होकर उसके शुद्ध हो जाने पर ज्ञान का।

ज्ञान का अधिष्ठान चेतना / जीवन है।

ज्ञान जब तक निज (स्व) और पर (दूसरा) के सन्दर्भ में होता है, तब तक व्यक्तित्व और व्यक्ति तथा ऐसे असंख्य व्यक्तित्व और व्यक्ति भी सामूहिक और वैयक्तिक रूप से प्रकट और अप्रकट होते रहते हैं। तब स्व / निज और पर का भेद मिट जाता है तो भी 'निजता' अक्षुण्ण रहती है। यह निजता ही परमात्मा है।

यही एकमात्र शाश्वत, सनातन और नित्य वास्तविकता है।

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March 29, 2022

छन्द और छद्म

छायावाद और जनवाद 

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(वैसे इस पोस्ट का शीर्षक "मोहिनी-अट्टम्" भी हो सकता था, किन्तु वह भ्रमोत्पादक होता।)

संयोगवश पुराना अखबार -

(नई दुनिया- इन्दौर, रविवार  दिनांक 02-02-2020, पृष्ठ 2), 

हाथ लगा, तो जहाँ 'किताबघर' में एक जनकवि की किताब के बारे में जानकारी प्राप्त हुई, वहीं उससे ऊपर ही, जनवादी कहे जानेवाले कवि 'अश्वघोष' से स्मिता की बातचीत के अंश पढ़े।

अश्वघोष से याद आया बुद्धचरितं, जिसका अनुवाद हिन्दी भाषा में स्वर्गीय महादेवी वर्मा ने किया था। बुद्धचरितं की जो पुरानी संस्कृत प्रति पाई जाती है, उसे संस्कृत भाषा के किसी विदेशी विद्वान् ने सुधार और संशोधित कर, अनुमान से कुछ (विलुप्त प्रतीत होनेवाले) शब्दों के स्थान पर अन्य, उसे जो उचित प्रतीत हुए,ऐसे शब्दों को रखकर संपादित किया था।

स्वर्गीय महादेवी जी की प्रतिभा और तपस्या को नमन!

इसी पृष्ठ पर जरा ऊपर,

"लेखनकक्ष से"

के अन्तर्गत --

"कविताओं में न हो भाषा का घटाटोप"

शीर्षक से जनवादी कवि अश्वघोष से स्मिता की बातचीत पर आधारित एक आलेख है, जिसका उल्लेख ऊपर मैंने किया।

प्रश्न : पहले और आज की कविताओं में कितना अंतर आ चुका है? 

उत्तर : पहले कविताएँ छायावाद का प्रतिरूप थीं। जिस समय छायावाद खत्म हो रहा था, उस समय कविता वैयक्तिक थी। कविताओं में आदर्श और व्यक्ति ज्यादा थे, इसलिए उनमें प्रेम और देशभक्ति की भावना की बहुलता थी। जैसे ही आजादी मिली, तो रचनाकारों का मोहभंग हो गया। देश की तरह साहित्य में भी क्रान्ति आई और साहित्य में भी धीरे धीरे प्रगति होने लगी। पचास के बाद की कविता में यथार्थ का बाहुल्य आया। वरिष्ठों ने यथार्थ को प्रश्रय दिया। हमारे जमाने में आदर्श नहीं थे। वर्तमान पीढ़ी अति यथार्थवाद पर आधारित है। पहले ज्यादातर कविताएँ प्रकृति पर होती थीं या प्यार पर। वे समाज पर नहीं होती थीं। 

पढ़ते हुए मन में प्रश्न उठा:

क्या छायावाद खत्म हो चुका है?

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इतिहास की प्रामाणिकता / छाया और छायावाद,

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कल्पेऽएकस्मिन् इति बभूव। 

रुद्रो हि एको बहवो बभूव।। 

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि ।

साब्रवीत सर्वेभ्यश्च देवी ।।

ऐसा प्रतीत होता है कि इतिहास शब्द का तात्पर्य इसके मूलतः संस्कृत परिभाषा "इति ह आस" से ग्रहण किया जा सकता है। 

उपरोक्त संस्कृत में स्व-रचित चार पंक्तियों में मैंने जिस देवी को स्मरण किया है, सूर्य की उन्हीं संज्ञा और छाया नामक दो स्त्रियों का उल्लेख स्कंद पुराण में पाया जाता है। 

विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा जिसका विवाह सूर्य से हुआ था, सूर्य के उत्ताप को सकने में असमर्थ हो, एक दिन सूर्य के घर को छोड़ पिता के घर लौट आई। सूर्य की संज्ञा से तीन संतानें यम, यमुना और मनु थीं। सूर्य के घर से जाने से पूर्व संज्ञा ने अपनी, ठीक अपने ही जैसी एक छाया-प्रतिमा रची, और उससे कहा:

"बहन, तुम यहाँ मेरे स्थान पर रहो, सूर्य और मेरे पुत्रों की सेवा और देखभाल करो, किन्तु उन पर यह रहस्य प्रकट न होने देना कि तुम संज्ञा नहीं हो।"

"हाँ, किन्तु तभी तक जब तक मेरे प्राणों पर ही न आ बने!"

"ठीक है।"

संज्ञा ने कहा। 

संज्ञा जब पिता के घर पहुँची, तो पिता ने एकाएक बिना सूर्यदेव के साथ और बिना पूर्वसूचित किए उसके आने का कारण पूछा। तब उसने बताया कि वह सूर्य का ताप सहन न कर पाने से यहाँ आई है। 

पिता ने कहा :

"बेटी! स्त्री का घर तो वही है, जहाँ उसका पति होता है, जिससे उसका विवाह हुआ होता है, तुम सूर्यदेव के पास लौट जाओ।"

तब संज्ञा पिता के पास से तो लौट आई किन्तु सूर्यदेव के पास न जाकर घोर वन में चली गई। घोड़ी का रूप धारण कर वह तप करती हुई, वहाँ चरती रही। 

बहुत समय(!) बाद, जब छाया से सूर्यदेव की तीन और संतानों  शनि, तापी नदी तथा सावर्णि मनु (Emanuel! अव मनु अल्) ने जन्म लिया, सूर्य के संज्ञा से उत्पन्न पुत्र यम ने देखा कि छाया उसकी, यमुना और मनु इन तीनों की तो उपेक्षा करती है, किन्तु शेष तीनों का बहुत लाड-प्यार करती है। तब यमदेवता ने क्रोध में आकर छाया पर अपने पैर से आघात किया। तब छाया ने यम को शाप दे दिया। यम तब पिता के पास पहुँचे, और उनसे बोले :

"लगता है, यह हमारी माता नहीं है, क्योंकि माता कभी अपनी संतान को शाप (curse) नहीं देती।"

तब सूर्यदेव को छाया की वास्तविकता पर सन्देह हुआ, उन्होंने  उससे पूछा :

"सच-सच बता तू कौन है?"

तब छाया ने उनसे सब कुछ सत्य सत्य कह दिया। 

तब सूर्यदेव संज्ञा को खोजते हुए विश्वकर्मा के घर गए और संज्ञा के पिता ने उन्हें बताया कि संज्ञा जब उनसे मिली थी, तब उसे उन्होंने लौटकर सूर्य के पास जाने के लिए कहा था, और वहाँ से उस समय वह चली गई थी।"

तब सूर्यदेव संज्ञा को खोजते हुए उस घोर वन में जा पहुँचे, जहाँ वह अश्विनी (घोड़ी) के रूप में चर रही थी ।

उसे देखकर सूर्य ने अश्व का रूप धारण कर लिया और सूर्य भी उसके साथ घोर वन में चरते, तप करते रहे। 

सूर्य और संज्ञा की यमक संतानों का नाम "अश्विनौ" हुआ, और उल्लेखनीय है कि ग्रीक शब्द equinox का उद्भव और संबंध अश्विनौ से ही हो सकता है। 

यह पूरी कथा आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और भौतिक आयामों को समेटती है। इसलिए मुझे अत्यन्त प्रिय है।

इसकी प्रामाणिकता की परीक्षा इन तीनों कसौटियों पर परखी जा सकती है। 

यह हुआ एक और इतिहास!

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वाद और वादे!

नेता और बुद्धिजीवी

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वाद वाद का भेद है,

वाद वाद  का फेर,

वाद-विवाद में पास है,

वाद-विवाद में फेल!

वाद, मगर हो कोई भी,

साहित्य का या नीति का,

कभी सफल, तो कभी विफल,

संसार में रणनीति का!

बुद्धिजीवी उलझ जाता,

फँस जाया करता है,

नेता वादे करता है,

फिर, भूल जाया करता है!

जनता धोखा खाती है,

नेता धोखा देता है,

नुकसान किसी का होता है,

लाभ किसी को होता है!

वादों की भूलभुलैया में,

विद्वान भटक जाते हैं,

चतुर राजनेता इसमें भी,

राह अपनी खोज लेते हैं!

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March 23, 2022

पर आखिर क्यों?

कविता / 23-03-2022

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क्यों टकराते हो मुझसे, 

क्या मैं तुमसे टकराता हूँ!

तुम क्यों डरते हो मुझसे, 

क्या मैं तुमसे डरता हूँ!

युद्ध तो समाधान नहीं, 

संवाद जरूर विकल्प है, 

युद्ध का यह उन्माद तो, 

विनाश का ही संकल्प है! 

विनाश तो उपचार नहीं,

विनाश, हिंसा-प्रहार है,

जब नहीं है शत्रु कोई,

स्वयं का ही संहार है!

तुम क्यों सबसे डरते हो,

क्या कोई तुमसे डरता है?

तुम क्यों खुद से डरते हो, 

क्या कोई खुद से डरता है?

यह बैसाखी उसूलों की, 

जिसे तुम लाठी कहते हो,

सहारे को तो अच्छी है, 

क्यों बन्दूक समझते हो?

उसूलों की हिफाजत तो,

उसूल ही अपनी कर लेंगे, 

तुम अपनी ही कर लो तो, 

सभी इंसान जी लेंगे।

क्यों अपने उसूलों को,

लोगों के सर मढ़ते हो!

क्यों तलवार लेकर तुम, 

मासूमों पर चढ़ते हो? 

बहादुरी है, कौन सी इसमें,

क्यों खुद को भरमाते हो?

लेकिन छोटे से खतरे से भी,

क्यों बुरी तरह डर जाते हो?

छोड़ो भी यह जिद बचकानी,

अब तो कुछ संजीदा हों,

कुछ ऐसा उसूल अपनाएँ,

जिससे हम ना शर्मिन्दा हों!

या फिर चलने दो दुनिया में,

शक-शुबहा, यह मार-काट,

जब तक खत्म ही ना हो जाए, 

तब तक चलने दो उत्पात!

शायद वह भी समाधान हो,

सबसे उम्दा, सबसे बेहतर,

दुनिया ही जब ना होगी, 

केवल शान्ति रहेगी भू पर!

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March 22, 2022

किसके पास!

कविता / 22-03-2022

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मुझे यही तो भय है,

किसके पास समय है!

कुछ आँखों में सपने हैं,

कुछ आँखों में संशय है!

इनके होठों पर मुस्कान,

लगती मुझको अभिनय है!

अँधेरा बाहर-भीतर है,

हर आशंकित हृदय है!

जीवन में हाँ, है रोमांच,

चलो कुछ तो विस्मय है!

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क्षणिक-दीर्घ

कविता / 23-03-2022

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कितने क्षणिक संबंध हैं, 

पर दीर्घ कितनी है स्मृति!

कितना क्षणिक विचार है, 

पर दीर्घ कितनी है प्रवृत्ति!

कितनी क्षणिक है कल्पना,

पर, दीर्घ कितनी भावना है, 

कितनी क्षणिक है तृप्ति,

पर, दीर्घ कितनी कामना है!

कितना क्षणिक है समय, 

पर दीर्घ कितना काल है, 

कितना क्षणिक, है क्षणभंगुर, 

उपलब्ध, यह संसार है! 

कितना क्षणिक मोह है,

कितना क्षणिक है राग भी,

कितना क्षणिक विराग है, 

पर दीर्घ कितनी है आसक्ति!

कितना सुलभ विचार है, 

पर विवेक कितना है दुर्लभ,

कितना प्रबल संस्कार है, 

वैराग्य कितना है निर्बल!

जड़बुद्धि का है भार नौका,

संसार-सागर क्षुब्ध है, 

क्षितिज पर है इन्द्रधनुष,

देखकर मन मुग्ध है!

उपलब्धि तो कुछ भी नहीं,

आयु घटती जा रही, 

कौन सी आशा है जो,

अब, पूर्ण होने जा रही!

फिर भी यह नाटक नया,

जैसे निरंतर है सतत,

कथा जीवन की अनोखी, 

प्रकट फिर भी है अकथ!

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March 20, 2022

सब कुछ विचार है!

कविता / 20-03-2022

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हाँ, सब कुछ यूँ तो विचार ही है, 

किन्तु विचार सब कुछ तो नहीं है!

विचार आता है, चला भी जाता है,

विचार जिसमें आता-जाता है,

क्या वो भी आता-जाता है?

अगर वो भी आता-जाता हो तो,

फिर जिसे पता है, -वह क्या है?

ये पता होना, और इसका भी पता नहीं होना,

और इस पता न होने, का भी पता नहीं होना, 

इस पता होने, और पता न होने, के बीच,

उठता और उभरता है कोई विचार,

जो कभी पुराना या नया नहीं होता,

जो एक या अनेक भी नहीं होता है,

फिर भी हर टुकड़ा एक होता है!

और छा जाता है, -अन्धेरे की तरह,

उमड़ता-घुमड़ता रहता है, -अपने ही में,

और बरसता है बरसात के बादल की तरह। 

खुद ही से उपजता है, खुद ही उपजाता है,

खुद से खुद उसका, क्या अजीब नाता है! 

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March 19, 2022

कल भी एक दिन है!

कविता / 19-03-2022

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षोडशी

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कल भी तो एक दिन ही था, 

कल भी तो एक दिन ही होगा, 

आज भी एक दिन ही तो है, 

जो न तो था, और न ही होगा!

कल जो बीत गया, कल था, 

कल जो भी होगा, कल होगा,

आज जो है वह न कल था,

आज जो है वह न कल होगा!

वो क्या है, जो है, आज अभी,

न कल था, न कल होगा कभी!

क्या कोई जान पाएगा इसको,

या सवाल ये, न हल होगा कभी!

खयाल जब ये ठिठक जाएगा,

ये मन अगर न भटक पाएगा, 

अचल और स्तब्ध हो जाएगा,

ये राज तब समझ में आएगा! 

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March 18, 2022

मोड़ / Turning Point.

चैत्य / Chateau 

कविता / 18-03-2022

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इस रास्ते पर हर दिन ही 

सुबह-दोपहर शाम-रात,

शीत-ग्रीष्म, पावस-बसंत,

धूप में, छाया में, पतझड़ में,

सतत, निरंतर और लगातार,

घूमता रहा हूँ मैं दो-तीन साल!

पार्क है इस बसाहट के बीच, 

जिसमें हैं दो छोटे-छोटे चैत्य,

उपेक्षित, सुनसान, और वीरान, 

जहाँ कभी बच्चे खेलते हैं, 

कभी गाय-बकरी चरानेवाले,

दोपहर भोजन करते हुए,

अलसाते, ऊँघते, सुस्ताते,

कुछ समय बिताते हैं!

रास्ते के दो सिरों पर, 

दो फाटक हैं किवाड़-रहित,

हद, पार नहीं करता मैं!

बार बार लौट आता हूँ, 

अपनी हद, -मर्यादा में!

एक हद पर है, बुद्धि मेरी, 

तो दूसरी पर है, -'मैं'-बुद्धि!

क्या पता कौन है स्वामी,

क्या पता कौन है सेवक!

द्वन्द्व के दो सिरों के बीच, 

रास्ता मेरा गुजरता है!

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March 14, 2022

नई जीवन-दृष्टि

व्यावहारिक यथार्थ 

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आज अचानक एक नई दृष्टि से देखा / सोचा तो अनुभव किया,  कि किसी से पैसे, धर्म और अध्यात्म के बारे में बातें न करना ही बेहतर है । खेल, कला, फ़िल्मों, राजनीति, तथा साहित्य आदि के बारे में बातें करते हुए समय अच्छा कट जाता है, और व्यर्थ की बातों से बचा भी जा सकता है ।

हाँ, इसमें यह जरूर है कि जो लोग संस्कृति, समाज, देश, धर्म / मजहब / भाषा / रिलीजन या किसी राजनीतिक वाद के कट्टर पक्षधर हैं उन्हें शायद यह बात गवारा न हो!

एक और अच्छा तरीका है, - अपने मोबाइल पर व्यस्त रहना !

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आशा, निराशा और संघर्ष

आशावादी, निराशावादी और संघर्षवादी

(Optimist, Pessimist and the Warrior)

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वैसे तो किसी भी मनुष्य के स्वभाव में ये तीनों प्रवृत्तियाँ भिन्न भिन्न अनुपात में कम या अधिक होती हैं, किन्तु परिस्थितियों, संस्कारों आदि के कारण वह समय समय पर कभी आशावादी, कभी निराशावादी और कभी  संघर्षवादी हो जाता है।

यह दुर्भाग्य ही है कि इस कारण, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और सफल व्यक्ति भी अंततः संसार / जीवन से पराजित हो जाता है। क्योंकि किसी भी व्यक्ति को जीवन के सभी क्षेत्रों में पूरी सफलता कैसे मिल सकती है?

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March 11, 2022

सोचना / न सोचना

कविता / 11-03-2022

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किसी भी बारे में न सोचना, 

किसी के भी बारे में न सोचना, 

कितना मुश्किल लगता है! 

फिर भी, जब सुबह-सुबह, 

आप इस निर्जन वन में, 

इस सर्पिल स्वच्छ सड़क पर, 

भ्रमण के लिए निकलते हैं,

और वृक्षों-लताओं की गंध, 

आपका पीछा करने लगती है, 

तो मुश्किल नहीं रह जाता,

बहुत ही आसान होता है, 

किसी भी बारे में न सोचना,

किसी के भी बारे में न सोचना!

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March 08, 2022

जीवन का यह दृष्टिकोण !

कविता / जीवन-दर्शन

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न आलस्य है, और न उत्साह है, 

ये जो जीवन है, कर्म-प्रवाह है!

जीते जाना है, जब तक है जीवन, 

है करते रहना, कर्म-निर्वाह है!

किसी का किसी से संबंध नहीं,

हरेक की भूमिका, या कोई चाह है!

इसे भाग्य, कर्तव्य, या संघर्ष कहें,

हँसी, सुख की, या कि दुःख की आह है!

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देह इंजन

कविता / 08-03-2022

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देह से बाहर जाने के लिए, 

प्राणों को राह नहीं मिलती,

श्वास-प्रश्वास पुनः पुनः फिर, 

भरती है वायु, -फुफ्फुस में,

करती है प्रज्वलित अग्नि को,

अग्नि जो प्राणाग्नि है, -प्राण,

चक्र चलता है देह में सतत, 

प्राण से चेतना, चेतना से प्राण,

प्राण से मैं, मैं से प्राण पुनः,

चक्र चलता है देह में सतत, 

एक संसार, -वहाँ देह में,

एक देह, यहाँ संसार में, 

होते हैं बिम्बित-प्रतिबिम्बित,

परस्पर एक-दूसरे में!

जीवन-चुम्बित प्राण, 

प्राण-चुम्बित जीवन,

जीवन-चुम्बित चेतना, 

चेतना-चुम्बित जीवन, 

खेलते रहते हैं सभी, 

परस्पर एक-दूसरे से,

परस्पर एक-दूसरे में!

चढ़ते-उतरते रहते हैं,

मन-यात्री असंख्य अनगिनत,

कोई नहीं जानता किसी को! 

***

 



March 07, 2022

बात, वक़्त-वक़्त की!

कविता / 07-03-2022

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जब भी मन हो तो बात कर लेना,

मन न हो अगर, तो कोई बात नहीं!

मिलना, न मिलना, जरूरी तो नहीं,

मिलना न मिलना, मुलाक़ात नहीं!

वक़्त की बात है, कि जरूरी ही हो,

हर घडी़ मुनासिब, ऐसे हालात नहीं!

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March 05, 2022

त्रिवियु - (पुरा कथा)

प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्वयुद्ध,

(प्रवियु, द्विवियु और तृवियु) 

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कालपुरुष के तीन पुत्र थे, जिनका नाम क्रमशः --

प्रवियु, द्विवियु और तृवियु था। तृवियु को ही त्रिवियु भी कहा जाता था।

एक बार तीनों भाइयों में इस पर विवाद होने लगा, कि उनमें से कौन अधिक श्रेष्ठ, पराक्रमी और निर्भय है। 

जब उनमें इस प्रकार से विवाद हो रहा था, तो अंततः विवाद को सुलझाने के लिए वे अपने पिता के पास जा पहुँचे।

"पिताजी! क्या मैं ही मेरे इन दोनों भाइयों से श्रेष्ठ नहीं हूँ!"

-प्रवियु ने प्रश्न किया। 

तब द्विवियु ने हस्तक्षेप करते हुए कहा :

"पिताजी! क्या प्रवियु का अन्त होने के बाद ही मेरा जन्म नहीं हुआ था?"

तब त्रिवियु ने उसे टोकते हुए पिता से कहा :

"पिताजी! क्या प्रवियु की ही तरह, इसी प्रकार से द्विवियु का भी अन्त नहीं होनेवाला है? और तब क्या सर्वत्र मेरा ही वर्चस्व नहीं यह जाएगा?"

तब कालपुरुष ने हँसते हुए कहा :

"तुम तीनों मेरे ही अंश हो। हाँ, प्रवियु का अन्त होने पर उसी ने द्विवियु के रूप में जन्म लिया, और द्विवियु का अन्त हो जाने पर वही त्रिवियु के रूप में जन्म लेगा।"

"तो पिताजी! क्या मैं ही अपने दोनों भाइयों से अधिक पराक्रमी और शक्तिशाली नहीं हूँ?"

-त्रिवियु ने उत्साह और गर्व से कहा।

"नहीं बेटा! तुम्हारे जन्म के बाद इस संसार का अन्त हो जाएगा, और इस संसार के ही साथ तुम्हारा भी। किन्तु मैं तब भी अदृश्य होकर नये नये संसार में पुनः पुनः प्रकट होता रहूँगा। यह संसार मेरा ही विस्तार है।"

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March 04, 2022

वर्तमान का विचार

विचार का वर्तमान

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इस श्रृंखला में दो पोस्ट क्रमशः :

अतीत का विचार और विचार का अतीत, 

एवं,

भविष्य का विचार और विचार का भविष्य

शीर्षक से लिखे जा चुके हैं।

इसी क्रम में यह तीसरा और अंतिम पोस्ट है।

विचार एक अद्भुत् प्रक्रिया तथा वस्तु है जो एक सिरे पर यद्यपि बुद्धिग्राह्य और इसलिए बुद्धिगम्य है, तो दूसरे सिरे पर एक शुद्ध भौतिक इन्द्रियग्राह्य और इसलिए इन्द्रियगम्य है।

केवल बुद्धि और इन्द्रिय ही नहीं, विचार भावग्राह्य, भावगम्य भी है। संक्षेप में कहें तो विचार संवेदनगम्य, अर्थात् संवेदनागम्य है। पुस्तक या कागज पर लिखा विचार जहाँ उस लिपि से अनभिज्ञ व्यक्ति के लिए अर्थरहित चिह्नों का क्रम है, वहीं वाणी से व्यक्त विचार उसी / इसी वर्तमान क्षण में सक्रिय सार्थक तथा प्रयोजन को इंगित करनेवाली अभिव्यक्ति है। 

स्पष्ट है कि इस प्रकार का कोई विचार किसी न किसी भाषा पर आधारित होता है।

विचार की व्युत्पत्ति विच् (विविच्) धातु से है जिसे मुख्य रूप से पूछने, खोज करने, जिज्ञासा करने के अर्थ में प्रयोग किया जाता है, किन्तु पर्याय से (imperatively) या परोक्षतः, शाब्दिक या भाषागत और व्यावहारिक रूप से किसी तात्पर्य-विशेष को इंगित करने के लिए भी किया जाता है । यही 'विचार' का रूढ प्रयोग है। 

जब कोई 'मेरा विचार' कहता है, तो तात्पर्य यह होता है कि इस विचार का उद्भव एक शब्द-समूह की तरह उसके मन / उसकी चेतना में हुआ है जिसे उसने वाणी से प्रकट किया।

जब कोई 'मैं सोचता हूँ' कहता है तो तात्पर्य यह होता है कि यह विचार उसे स्वीकार्य है।

यही विचार अन्य किसी समय पर उसे अस्वीकार्य भी हो सकता है। तात्पर्य यह, कि वह स्वयं को कभी तो विचार से अभिन्न और कभी विचार से भिन्न मानता है।

यही विभाजन विचार और विचारकर्ता / विचारक के बीच पैदा होनेवाला आभासी और कृत्रिम विभाजन है। 

इस प्रकार एक और नया विचार प्रकट होता है, जो कि :

'मैं विचार से पृथक् स्वतंत्र विचारक हूँ'

की निःशब्द अनुभूति / प्रतीति का रूप ले लेता है ।

यही निःशब्द अनुभूति / प्रतीति पुनः शाब्दिक विचार की तरह मन / चेतना पर हावी हो जाती है, जबकि मन / चेतना मूलतः किसी भी विचार से नितान्त अछूता जीवन्त वर्तमान (living presence) है जिसमें 'मैं-विचार' तक के लिए कोई संभावना या स्थान नहीं होता। 

इस 'मैं-विचार' के प्रभाव से ही विचार :

'मेरा विचार', 'मैं सोचता हूँ', 'मैं विचार से पृथक् और स्वतंत्र विचारक / विचारकर्ता हूँ',

इत्यादि अनुमान प्रकट और विलीन होते रहते हैं। 

यही है :

वर्तमान का विचार, और विचार का वर्तमान! 

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March 02, 2022

भविष्य का विचार

विचार का भविष्य

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भविष्य के दो ध्रुव / पक्ष हो सकते हैं :

विषयपरक (objective) और स्वपरक (subjective).

किन्तु ये दोनों ही पक्ष एक ही चेतना की दो प्रतीत होनेवाली अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इसी प्रकार इनकी जो पृष्ठभूमि है उसके भी पुनः दो और पक्ष हैं : काल (Time), और स्थान / आकाश (Space) . यद्यपि चेतना में ही काल और स्थान की कल्पना और कल्पना से उद्भूत विचार सक्रिय होते हैं, और काल और स्थान की एक आधारभूत वैचारिक पृष्ठभूमि के रूप में चेतना ही काल और स्थान के विचार की भूमिका होती है, इसलिए काल और स्थान के वैचारिक स्मृति में परिणत हो जाने के कारण ही उनके किसी वास्तविक (Real) अस्तित्वमान तत्व जैसे होने का अनुमान होता है। यह अनुमान भी आभास और कल्पना ही है, न कि कोई वस्तुनिष्ठ सत्यता (Objective Reality) । इस प्रकार इस आभासी काल के ही अन्तर्गत किसी भविष्य का आभास अतीत के सत्य होने के वैचारिक भ्रम का परिणाम है। अतः वस्तुतः तो भविष्य नामक किसी वस्तु का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। यदि है भी, तो वह केवल उस तथाकथित भविष्य के बारे में उठनेवाले विचार का।

इसे ही विषय-परक सत्यता (Objective Reality) और स्व-परक (Subjective Reality) की दृष्टि से देखें, तो भविष्य (या भविष्य का विचार) भी या तो संसार (mental-world) / जगत् ( material-world) के बारे में होता है, या स्वयं ही के बारे में। संसार / जगत् की सत्यता के बारे में किसी को कोई संशय नहीं होता और उसे प्रत्येक ही मनुष्य एक अकाट्य और अनुभव-गम्य, इन्द्रियगम्य, विचारगम्य, असंदिग्ध तथ्य मानकर चलता है, किन्तु अपने-आपमें ऐसे किसी सर्व-सामान्य, समान (common) संसार का अस्तित्व, जिसे कि भौतिक विज्ञान के द्वारा सत्यापित किया जा सके, या ग्राह्य वस्तु की तरह स्वीकार कर सकें, संदिग्ध ही है।

फिर विचार का भविष्य क्या है? क्या यह भविष्य का एक और विचार भर ही नहीं है?

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March 01, 2022

अतीत का विचार

विचार का अतीत

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अतीत विचार पर आधारित स्मृति है,

स्मृति पहचान है, और पहचान ही स्मृति।

यदि पहचान है तो ही स्मृति है, और यदि पहचान नहीं है, तो स्मृति भी नहीं हो सकती।

विचार पहचान और स्मृति के बीच की काल्पनिक दूरी है। इस दूरी में ही विचार जन्म लेता है, और उस विचार से पुनः कोई दूसरा विचार जन्म लेता है। स्मृति से विचार की पहचान होती है तथा पहचान से स्मृति की निरंतरता। इस प्रकार विचार यद्यपि क्षण क्षण उत्पन्न और विलीन होता रहता है, किन्तु विचारों की निरंतरता ही स्मृति / पहचान के रूप में ऐसी वस्तु की तरह प्रतीत होती है जो सतत परिवर्तित होते हुए भी किसी स्वतंत्र वस्तु की तरह प्रतीत होती है और उसे अपरिवर्तनशील सत्य मान लिया जाता है। उस अपरिवर्तनशील प्रतीत होनेवाली वस्तु की स्मृति-निर्मित धारणाओं (conceptual existence) के आधार पर और अनेक प्रकार की दूसरी भी ऐसी धारणाओं के समूह को सत्य की तरह ग्रहण कर लिए जाने के कारण, मूलतः एक काल्पनिक वस्तु होते हुए भी, स्मृति वास्तविक वस्तु जैसी जान पड़ती है। स्मृति को इसलिए मन का भी समानार्थी समझा जाता है। इस दृष्टि से स्मृति है, तो ही मन होता है और मन है तो अवश्य ही कोई न कोई स्मृति / पहचान विद्यमान होती है।

क्या यह कहना ठीक नहीं होगा कि स्मृति-रूपी मन से भी अन्य चेतना-रूपी कोई आधारभूत मन अवश्य है जो स्मृति से स्वतंत्र और वस्तुतः अपरिवर्तनशील है। यह चेतना-रूपी मन नितान्त शुद्ध, अविकारी है जिसमें यद्यपि विचार उठते और विलीन होते रहते हैं किन्तु यह स्वरूपतः उस मन से अछूता है, जिसमें अन्य सभी विचारों का जन्म, पहचान और स्मृति प्रकट और अप्रकट होते हैं, और एक विशिष्ट विचार अर्थात् अपने निरपेक्ष अस्तित्व के सहज भान के साथ इस अस्तित्व के साथ उसके भान की भी स्मृति, पहचान का विचार के रूप में उद्भव होता है। यह विचार मूलतः एक ओर अन्य विचारों की तरह ही आता-जाता है किन्तु दूसरी ओर अन्य सभी विचारों को एक सूत्र में पिरोता भी है।  अन्य विचार जहाँ सतत उठते और मिटते रहते हैं यह विशिष्ट विचार अपनी स्मृति के रूप में "मैं"- विचार की तरह मन पर आधिपत्य कर अपेक्षतया स्थायी रूप ग्रहण कर लेता है। 

इस सापेक्ष मन से, जिसमें इस सूत्र-रूपी "मैं"- विचार पर अन्य सभी विचार पिरोए होते हैं, एक ऐसा चेतना-रूपी और एक मन भी अवश्य है जिसमें "मैं"-विचार के उठने-मिटने या होने तक के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। अतः इसकी स्मृति या पहचान तक नहीं हो सकती। तर्क, अनुमान, इन्द्रिय-अनुभव, बुद्धिगम्य रूप में भी यद्यपि इसके अस्तित्व, अस्तित्व के भान और भान के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसे प्रत्यक्ष (objective) की तरह जानना असंभव है। 

स्मृति, पहचान, विचार, मस्तिष्क में विचार के रूप में संग्रहित होकर संगठित हो जाते हैं, जिससे संसार की नित्यता अर्थात् ऐसे किसी संसार के काल्पनिक अस्तित्व के अनुमान का जन्म होता है, और चेतना-रूपी मन ही इस कल्पना का अचल-अटल अविनाशी आधारभूत सत्य भी है इसलिए यह मन ही मनुष्य की आत्मा है। 

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गुल

कविता / 01-03-2022

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रौशनी गुल होती है, तो फैलता है अन्धेरा, 

शोर गुल होता है जब, तो टूटता है अमन ।

जब भी दोस्त मिलता है, तो ऐसा लगता है, 

जैसे गुल खिलता है, तो खिलता है चमन।

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