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January 26, 2025

On The Other Side Of The Hill.

पर्वत के उस पार

जब वह पहली पर्वत के उस पार से इस पार आया था तो उसने उसे देखा था। दूर पर स्थित वह स्त्री आकृति, जो पहाड़ी पर किसी समतल भूमि पर बैठी हुई थी और जो किसी कार्य में इतनी अधिक निमग्न थी कि उसे उसके आने का आभास तक नहीं हो पाया था,  इसलिए थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद वह वहाँ से लौट पड़ा था। जब वह उससे काफी दूर जा चुका था तब उस स्त्री का ध्यान उस पर गया था और वह कौतूहल, उत्सुकता, भय और रोमांच से व्याकुलतापूर्वक उसकी दिशा में खिंचती चली आ रही थी। शायद उसने उसे पुकारा भी होगा ऐसा उसे प्रतीत हुआ। फिर बहुत दिनों तक उसे पर्वत के इस पार, इतनी दूर तक आने का साहस नहीं हुआ। प्रतिदिन वह इस तरफ आने के बारे में स्मरण तो करता रहता, किन्तु कुछ सोच पाने में अक्षम था। क्योंकि कुछ सोच सकने के लिए कोई भाषा और सार्थक शब्दों का आधार होना आवश्यक होता है। उसके समूह में ऐसे कोई शब्द और कोई भाषा अभी अस्तित्व में आए ही कहाँ थे! वे लोग केवल आँखों और मुखमुद्राओं से अपनी भावनाओं को व्यक्त और ग्रहण करते थे। उन्हें अग्नि का ज्ञान था और धनुष बाण तथा गदा इत्यादि चलाने में भी वे निपुण थे। उनकी संस्कृति में यद्यपि विवाह नामक संस्था की कोई कल्पना या अवधारणा तो नहीं थी, किन्तु पुरुष-स्त्री के परस्पर संबंधों में बारे में वे सभी संकोचशील, लज्जालु, निश्छल और निष्कपट थे। प्रेम की पवित्रता उनकी दृष्टि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी और यौन संबंध अपेक्षाकृत गौण वस्तु थी। इसलिए स्त्रियाँ हों या पुरुष सभी प्रायः परस्पर समर्पित भावना से युक्त होते थे। हंस उनके लिए ऐसे आदर्श थे जिन्हें वे आध्यात्मिक समर्पणयुक्त प्रेम का के सर्वोच्च उदाहरण की तरह देखते थे और इस प्रकार का प्रेम उनके स्वभाव में उसी प्रकार अन्तर्निहित ही था जैसा उन्हें हंस-युगलों में भी दिखलाई देता था। इसलिए स्त्री-पुरुष के यौन संबंधों में छल कपट या दुराचार आदि उनमें ग्लानि और क्षोभ उत्पन्न कर देता था, और हंसों की ही तरह वे भी एकनिष्ठा के व्रती थे। यह उनका धर्म ही था, न कि सामाजिक नैतिकता के मूल्यों या बाध्यताओं आदि से परिभाषित भय और लोभ, अधिकार,  प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा पर आधारित कृत्रिम चरित्र। संभवतः कुछ लोग, कुछ स्त्रियाँ और कुछ पुरुष भी, अपवाद भी  होते होंगे और ऐसा करने के लिए यद्यपि स्वतंत्र भी, होते होंगे, चूँकि इससे उनके मन में स्वयं के प्रति ग्लानि और क्षोभ भी उत्पन्न होता होगा, न तो कोई किसी की निन्दा करता था, न किसी को हेय दृष्टि से देखता होगा। समय के साथ हर कोई स्वयं ही परिपक्व हो जाता होगा। न तो समाज उसे कोई दंड देता था न उसका उपहास, निन्दा या भर्त्सना करता था। शायद यही कारण रहा होगा कि उस "आदिम" समाज में हर स्त्री को पूर्ण सम्मान और  आदर प्राप्त था, जहाँ हर मनुष्य ही उन सारे मनोरोगों, यौन कुंठाओं तथा ग्रन्थियों से मुक्त रहता होगा जो आज के हमारे तथाकथित सभ्य, उन्नत और प्रगतिशील समाज में सर्वत्र विद्यमान हैं। तब स्त्री पुरुष एक दूसरे के भोग की विषय नहीं प्रेम, स्नेह और मैत्री का आधार थे। और दाम्पत्य इसी प्रेम की नींव पर निर्मित भवन या मन्दिर भी था।

तब उसका समाज गौवंश और कृषि कार्य पर आधारित समाज था जिसमें ज्ञान के सभी क्षेत्रों का समावेश होना अपरिहार्यतः आवश्यक था। ज्ञान ही सदैव उनके इस सतत परिवर्तनशील दृश्य-विश्व का अदृश्य और अमूर्त अधिष्ठान था और कृषि उसका व्यक्त प्रकट रूप। कृषि कर्म था और ज्ञान ही शक्ति था। और कर्म और ज्ञान, उन दोनों की प्रेरणा थी चेतनता अर्थात् जीवन और जीवन का उत्स जो जिसकी पराकाष्ठा था एकमात्र उत्सव। इस उत्सव की अभिव्यक्ति असंख्य रूपों में हुआ करती थी। यह था सनातन उत्सव जो उनका धर्म ही था। यह समाज की परंपरा भी था। धर्म और परंपरा अनन्य और अभिन्न तथा परस्पर आश्रित वास्तविकता और अनन्य निष्ठा थे। वे जीवन में सतत अनुसन्धान करते हुए उसके सौन्दर्य में अनायास ही सदा अभिवृद्धि किया करते थे इसलिए उस समाज में आक्रोश के लिए कहीं स्थान ही न था। न तो असंतोष, न आक्रोश, न कुंठा, न प्रतियोगिता, और न ही प्रतिशोध। इस एकनिष्ठा का दर्शन ही एकमात्र प्रेरणास्रोत था और इसलिए दाम्पत्य भी इतना ही पवित्र और आदर्श धर्म और चरित्र भी था। जो अनायास ही उनके हृदय से उमंग की तरह उमड़ता रहता था। यह द्वैत में अद्वैत तथा अद्वैत में द्वैत का प्रत्यक्ष प्रमाण और उदाहरण भी था। यही उनकी वह' अलिखित जीवन चर्या / unwritten code of conduct  था जिसे वे सहज ही व्यवहार में लाते थे और इसलिए उन्हें आचरण में नैतिकता क्या है और अनैतिकता क्या है, सभ्यता, शिष्टता, आत्मीयता, आदर क्या है यह समझने के लिए बौद्धिकता पर निर्भर होने की आवश्यकता ही नहीं होती थी।   

वह भी इसी प्रकार की रुचि रखनेवाला एक मनुष्य था, जिसे वे "ब्राह्मण" कहा करते थे। एकनिष्ठता के व्रत पर आधारित वंश-परंपरा की शुद्धता के कारण उस समाज में शेष लोग भी व्यवसाय, आजीविका और उससे जुड़े विभिन्न कार्यों की प्रकृति के अनुसार चार मुख्य वर्णों से अपनी पहचान स्थापित करते थे, और यद्यपि एक ही वंश में उत्पन्न कोई भी मनुष्य किसी दूसरे वर्ण का कार्य अपनी रुचि के अनुसार आजीविका और व्यवसाय के लिए कर सकता था, किन्तु इससे किसी को किसी और से अधिक या कम श्रेष्ठ नहीं समझा जाता था। यह एक अलिखित आचरण-पद्धति (unwritten code of behavior and conduct) था, और प्रत्येक और सभी इसे स्वीकार करते थे।

वह अभी युवा ही था कि संयोगवश पर्वत के उस पार से इस पार चला आया था जहाँ उसने इस युवती को देखा था और दोनों के बीच प्रेम का पदार्पण हुआ।

वह भी उसकी ही तरह रोमांचित और विस्मित था। "ब्राह्मण" होने पर भी उसने इस स्त्री के वंश और माता पिता के बारे में कोई प्रश्न नहीं उठाया और वस्तुतः तो उसे इस सबकी कल्पना तक नहीं थी। क्योंकि तब वहाँ 'विवाह' की कोई औपचारिकता या बाध्यता का भी प्रश्न नहीं था।

जब उससे पहली बार उसकी भेंट हुई थी, तो अवश्य ही अपरिचय के कारण संकोच और भय, विस्मय आदि थे, किन्तु एक बार एक दूसरे से परिचय होने के बाद दोनों ही एक दूसरे के आत्मीय हो गए थे।

तब वे केवल भाव-भंगिमाओं और नेत्रों से ही संवाद करते थे जिसका प्रभाव तुरन्त ही होता था! जैसे वह उसकी अनुगामिनी थी, वह भी वैसे ही उसका अनुगामी था और दोनों ही बिना शाब्दिक संवाद के वैसे ही एक दूसरे के मनोभावों को समझ लेते थे जैसे वह अब तक पशु पक्षियों और यहाँ तक कि वृक्षों तक की भावनाएँ समझती रही थी। बहुत बाद में इसी आधार पर तंत्र विकसित हुआ और फिर यंत्रों तथा मंत्रों से इस विद्या का शास्त्रीय तकनीकी स्वरूप सामने आया। इस बारे हम अगले पोस्ट में विस्तार से विचार करेंगे। 

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November 05, 2021

उत्सव धर्म

नित नूतन, चिर सनातन 

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भारतीय, वैदिक परंपरा में (मनुष्य के) जीवन के चार पुरुषार्थों को सबसे अधिक महत्व दिया गया है :

धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष ।

पुरुषार्थ का तात्पर्य है  : Endeavor, Enterprise.

ये दोनों शब्द भी पुनः उत्साह (enthusiasm) और उत्सव (festival) के समानार्थी हैं। 

इन चार पुरुषार्थों में से धर्म को वरीयता दी गई है क्योंकि शेष तीनों उसकी ही लीक पर चलते हैं।

क्या धर्म को परिभाषित किया जा सकता है! 

सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टि से कोई परिभाषा की जा सकती है, किन्तु परिभाषा भी पुनः धर्म की हमारी दृष्टि से ही पैदा होगी। परंपरा भी एक दृष्टि से धर्म ही है, किन्तु वह धर्म के वास्तविक,मूल स्वरूप, उद्देश्य और कारण को इंगित करे, यह आवश्यक नहीं।

पुनः, धर्म के एक सरल तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए किसी ऐसे आधार / मापदंड / criteria को तय करना होगा और चिर सनातन काल से इस आधार / मापदंड / criteria को श्रेय (common good) के आधार / मापदंड / criteria के अनुसार तय किया जाता रहा है। इस प्रकार धर्म केवल अपने और अपने समस्त परिवार ही नहीं, बल्कि मनुष्यमात्र, समाज, तथा संपूर्ण चर-अचर जीवन की विविध अभिव्यक्तियों के लिए जो कुछ भी आवश्यक, हितप्रद और श्रेयस्कर है उसे जानने, खोजने और उस पर आचरण करने का साधन है।

इस दृष्टि से धर्म जीवन के प्रति हमारी भावना की ही परिचायक गतिविधि है । समस्त अस्तित्व के और सबके लिए जो सदा शुभ है, वैसी भावना ही धर्म का मूलतः वास्तविक तत्व spirit और प्रेरणा है । क्या सभी के हृदय में मूलतः यही भावना अनायास ही विद्यमान नहीं होती? व्यक्ति, परिवार, समाज या मनुष्यता को उसकी समग्रता में देखा जाए, तो भावना ही व्यापक और  उदात्त अर्थ में धर्म का प्राण है।

भावना के जागृत होने के बाद ही बुद्धि और अपने अस्तित्व पर ध्यान जाता है, बुद्धि के अनुसार भावना ही भाव अथवा प्रवृत्ति का रूप लेकर संपूर्ण और समस्त जीवन को निर्देशित करती है। बुद्धि अपने-पराये का कृत्रिम, बहु-आयामी और बहुस्तरीय भेद / विभाजन करती है । अतएव भावना मूलतः और व्यावहारिक रूप से भी, संपूर्ण अस्तित्व का संचालन करनेवाली वह शक्ति है, जिसे बुद्धि की सहायता से यद्यपि समझा और जाना तो जा सकता है, किन्तु भावना के मूल तत्व और चरित्र का आकलन नहीं किया जा सकता, क्योंकि आकलन करना भी बुद्धि का ही विषय / कार्य है।

अब, यदि बुद्धि के स्वरूप और चरित्र को ही समझ पाना मनुष्य के लिए बहुत दुष्कर और कठिन है, तो भावना का स्वरूप और चरित्र क्या और कैसा है, इसका ठीक ठीक अनुमान लगाना तो इससे भी एक अधिक दुरूह कार्य है।

फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता, कि भावना जिसे कि अंग्रेजी में sentiment / spirit कह सकते हैं, अस्तित्व की मूल संचालनकर्त्री शक्ति है। 

इसे ही 'ईशिता' (governance) कहा जाता है, जो संपूर्ण जड-चेतन, चराचर भूत-प्राणियों को किसी न किसी कार्य में प्रेरित, संलग्न तथा प्रवृत्त करती है। 

'ईशिता', 'ईश्वर' की भाववाचक संज्ञा (abstract noun) है, और इस तरह से देखें तो 'ईश्वर' कोई व्यक्ति विशेष हो या न भी हो, तो भी 'ईशिता' अस्तित्व का शासन करनेवाली प्रत्यक्ष शक्ति है।

'ईशिता' के रूप में 'ईश्वर तत्व' का वर्णन ईशावास्योपनिषद् की भूमिका में इस प्रकार से किया गया है :

ईशिता सर्वभूतानां सर्वभूतमयश्च यः ।

ईशावास्येन संबोध्यमीश्वरं तं नमाम्यहम् ।।

वही सर्वत्र (omnipresent), सर्वज्ञ (omniscient) और सर्वशक्तिशाली (omnipotent) और प्रत्यक्ष वास्तविकता (Reality) भी है।

उसे एक अथवा अनेक की तरह सीमित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार जब भावना (spirit) की एकता (uniqueness), व्यापकता, असीम सामर्थ्य और विविधता पर ध्यान जाता है, तो हमें अनायास ही उसकी उस महिमा का भान होता है, जिसका हम यद्यपि वर्णन तो नहीं कर सकते, किन्तु उससे प्रभावित व अभिभूत (overwhelmed)  हुए बिना भी नहीं रह सकते। 

किन्तु परंपरा और समुदाय (religion and tradition) उसे यत्किञ्चित जानकर ही किसी न किसी प्रकार से अनुमान की प्रणाली में संकुचित तथा संकीर्ण कर देते हैं और उनके बीच की एक दूसरे के प्रति नासमझी से अनावश्यक संघर्ष और वैर उत्पन्न हो जाता है। 

दीपावलि की यह  ज्योति मनुष्यमात्र के हृदय में उस उत्सव धर्म की भावना का उन्मेष, संचार और विस्तार करे, इस कामना के साथ दीपावलि पर्व की असंख्य हार्दिक शुभकामनाएँ!

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