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February 14, 2023

कुछ ढूँढो तो कुछ मिल जाए!

मनु और शतरूपा

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मनु, श्रद्धा और शतरूपा की कथा याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी और गार्गी की कथा जैसी प्रतीत होती है। अब किसी ने अल्लाह और ओम् को एक कह दिया, जिससे एक और अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो गया। इससे कुछ समय पहले बिहार में किसी ने तुलसीदास और रामचरितमानस की निन्दा की। "अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।" का सन्दर्भ खोजने के उद्देश्य से मैंने रामचरितमानस खोला तो निम्न पंक्तियों पर दृष्टि ठहर गई :

दोहा :

सो मैं तुम्ह संग कहउँ सब सुनु मुनीस मन लाइ।

राम कथा कलि मल हरन मंगल करन सुहाइ।।

चौपाई :

स्वायंभू मनु अरू सतरूपा।

जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।

दंपति धरम आचरन नीका।

अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह के लीका।।

नृप उत्तानपाद सुत तासू।

ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू।।

लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही।

बेद पुरान प्रसंसहिं जाही।।

देवहूति पुनि तासु कुमारी।

जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।।

आदिदेव प्रभु दीनदयाला।

जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।।

सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना।

तत्त्व बिचार निपुन भगवाना।।

तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला।

प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।

सोरठा :

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।

चौपाई :

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा।

नारि समेत गवन वन कीन्हा।।

तीरथ बर नैमिष बिख्याता।

अति पुनीत साधक सिधि दाता।।

बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा

तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।।

पंथ जात सोहहिं मतिधीरा।

ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।।

पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा।

हरषि नहाने निरमल नीरा।।

आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी।

धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।।

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए।

मुनिन्ह सकल सादर करवाए।।

कृस सरीर  मुनिपट परिधाना।

सत समाज नित सुनहिं पुराना।।

दोहा :

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।

बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन  अति लाग।।

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स्वायंभू मनु  : स्वायंभुव मनु,

सतरूपा : शतरूपा,

श्रुति : वेद, उपनिषद् तथा पुराण,

उत्तानपाद और प्रियव्रत दोनों भाई मनु शतरूपा के पुत्र।

ध्रुव : उत्तानपाद और सुनीति का पुत्र,

देवहूति : मनु और शतरूपा की पुत्री, कर्दम ऋषि की पत्नी,

सांख्य दर्शन के प्रणेता भगवान् कपिल की माता (सिद्धानां कपिलो मुनिः -- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १०)

महाराज मनु वृद्ध हो गए, किन्तु विषयों के प्रति उनके मन में विराग नहीं हुआ तो वे दुःखी हुए, और राजपाट पुत्र को सौंपकर रानी शतरूपा के साथ धेनुमती अर्थात् गोमती नदी के तट पर तप और ऋषि मुनियों की संगति करने के लिए जा पहुँचे।

द्वादस अच्छर मंत्र :

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।

का अनुरागपूर्वक जप करने लगे।

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उपरोक्त रामचरितमानस से उद्धृत कुछ पंक्तियों से यह अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए कि यदि इस ग्रन्थ रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने :

ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।

सकल ताड़ना के अधिकारी।।

लिखा है तो "अधिकारी" शब्द का प्रयोग क्यों किया?

इसीलिए क्योंकि ताड़ना पाना उनका स्वाभाविक अधिकार है, और अधिकार हमेशा स्वैच्छिक होता है। वे अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसी का दूसरा उदाहरण है मोक्ष का अधिकार या पात्रता। केवल विवेक और वैराग्य तथा शम दम आदि षट्संपत्तियों से युक्त ही मोक्ष का अधिकारी और पात्र हो सकता है।

नारी प्रकृति है इसलिए वह माता भी है और मनुष्य की प्रकृति में शरीर और मन (अन्तःकरण) दोनों ही प्रकृति एवं पुरुष का ही रूप है, इसलिए इन्द्रियों का दमन किया जाता है जबकि मन का शमन किया जाता है। इन्द्रियों की तुलना रथ में जुते अश्वों से की जाती है और मन की तुलना अन्तःकरण से। आत्मा को रथ पर आरूढ पुरुष और बुद्धि को सारथि कहा जाता है।

इस प्रकार उक्त चौपाई का वाच्यार्थ ग्रहण करने पर यही प्रतीत होगा कि गोस्वामी तुलसीदास ने नारी-विरोधी पुरुषसत्तावादी  दृष्टि से इस चौपाई की रचना की। अल्पबुद्धि और वितण्डावादी यही अर्थ ग्रहण करेंगे, जबकि सूक्ष्म और विवेक की दृष्टि से जो अर्थ होगा, वह इस चौपाई के लक्ष्यार्थ पर ध्यान दिए जाने से ही प्राप्त हो सकता है।

वैसे मनुष्य मात्र का शरीर पुरुष या स्त्री का हो, उसका मन एवं बुद्धि, स्वभाव और प्रवृत्ति में पुरुषोचित या स्त्रियोचित गुण कम या अधिक मात्रा में हो सकते हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ये गुण पुनः सद्गुण या दुर्गुण या दोनों का मिश्रण भी हो सकते हैं। इसे ही श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १६ क्रमशः श्लोक १, २ एवं ३ में दैवी और श्लोक ४ मेंआसुरी संपत्ति कहा गया है।श्लोक ७ से श्लोक २१ तक आसुरी चरित्र का वर्णन किया गया है। निष्कर्ष यही, कि किसी ग्रन्थ का सतही, आधा-अधूरा ज्ञान प्राप्त कर उसकी विवेचना और व्याख्या करना अपने-आप को ही धोखा देना है।

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July 04, 2019

मनु और शतरूपा

सातत्य और सत्य
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संसार का सातत्य, स्मृति से परे होता कहाँ,
कल्पना से परे क्या, होती है स्मृति की सत्यता?
चेतना में ही विषय-विषयी, दो भासमान हो रहे,
चेतना में ही है परस्पर है, दोनों की अखण्डता ।
चेतना वैसे सदा तो, निर्विषयी निर्विषय तथा,
विषय-विषयी के द्वन्द्व में, प्रतीत होती है व्यथा ।
विषय-विषयी से रहित, जब स्वयं को है जानती,
स्वयं को जब नहीं, किसी पहचान से पहचानती,
प्रकृति भी विषय-विषयी-क्रीड़ा का आभास है,
नित सनातन प्रेम पुरुष-प्रकृति का उल्लास है ।
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कविता, चेतना, पुरुष, प्रकृति,