February 26, 2022

धूलि-वन्दन

होली-उत्सव

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कविता 

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धूल-धूसरित चरण तुम्हारे,

मेरे मन को भाते हैं,

चरण-धूलि सिर पर रखकर,

भक्त-हृदय हरषाते हैं

चरण-धूलि का अंगराग,

पृथ्वी भी धारण करती है, 

जीवों, वृक्षों का स्नेह-सहित,

पालन-पोषण करती है!

गोधूलि वेला हो संध्या को, 

सूर्योदय में भी प्रतिदिन ही,

वायु में बिखरी स्वर्ण-कणों,

रत्नों जैसी जगमगाती है?

मन खोया-खोया रहता है, 

हृदय भी पुलकित विस्मित सा,

कण-कण में प्रभु कृपा तेरी, 

हर मन को हरषाती है।

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February 24, 2022

एक कविता-चित्र

फ़ोटोकॉन / photocon 

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उल्लास-उत्सव से भरे! 



जब दर्द बयाँ होता है!

कविता : 24-02-2022

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हर बार ही नया होता है, 

जब भी दर्द बयाँ होता है,

लेकिन यह मालूम नहीं, 

दर्द किसे, कहाँ होता है!

भीतर होता है, या बाहर,

यहाँ-वहाँ या कहीं नहीं,

दर्द होता है, अहसास क्या, 

अहसास, क्या दर्द होता है!

किसी व्यतीत की पीड़ा, 

किसी भविष्य की आशंका, 

या कि, वर्तमान का ही दंश,

दर्द यूँ, ऐसा भी, होता है!

धुन्ध जैसा बिखरता है,

रौशनी जैसा निखरता है, 

अँधेरे जैसा फैलता हुआ,

कौंध के जैसी प्रखरता है!

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अयमात्मा ब्रह्म...

सूक्ति :

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।

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यह मेरा है या यह पराया है, इस प्रकार का आकलन संकीर्ण बुद्धि से युक्त मनुष्य ही करते हैं। उदार-हृदय से प्रेरित आचरण करनेवाले मनुष्यों के लिए तो पूरी पृथ्वी मानों एक ही परिवार होता है।

महावाक्य :

अयमात्मा ब्रह्म।।

'अयं' (पद) सर्वनाम अर्थात् 'यह' शब्द सूक्त में किसी सांसारिक या भौतिक वस्तु के लिए प्रयुक्त है, और महावाक्य में आत्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। सूक्त में जिसे परिवार कहा गया है, उसे ही महावाक्य में निज आत्मा कहा गया है। 

जब तक अयं का विचार है तब तक इदं (यह) भी होगा ही, और जब तक इदं (यह) है, तब तक अहंकार (मैं) भी होगा ही।

इस प्रकार जिस 'मैं' का निर्देश सूक्त में 'निज' (मेरा) के सन्दर्भ में किया गया है, वह उस 'मैं' से भिन्न है जिसका महावाक्य में निर्देश है। जिस 'मैं' का निर्देश महावाक्य में ब्रह्म कहकर किया गया है, उसका ही निर्देश पुनः 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में ब्रह्म के अर्थ में है।

परो या परः के भी दो तात्पर्य हो सकते हैं :

अन्य अर्थात् दूसरा, 

परम अर्थात् आत्यन्तिक, पूर्ण, अंतिम,

परः पुनः ब्रह्म, आत्मा या परमात्मा के अर्थ में भी ग्रहण किया जा सकता है। 

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February 22, 2022

क्षितिज और परिधि

समय क्या है?

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बया का घोंसला

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महर्षि वेदव्यास सूर्य को अर्घ्य देकर शान्त और प्रसन्न मुद्रा में अपने आश्रम में आसन पर विराजमान थे। उनका पुत्र क्षितिज, और पुत्री परिधि उस कुल्या, कूलिनी के तट के समीप अवस्थित उनकी उस पर्णकुटी के आसपास खेल रहे थे, जहाँ पर उनका आश्रम था।

उस क्षीणधारा पयस्विनी के इस तट पर तथा दूसरे तट पर भी बबूल (acacia) के अनेक वृक्ष थे, जिन पर बया के अनेक नये पुराने घोंसले हवा में झूल रहे थे।

वे पक्षी ऋतु आने पर हर बार उन वृक्षों पर नये घोंसले बनाया करते थे। बबूल के वृक्ष पर काँटे उनकी रक्षा करते थे, तो नीचे नदी के बहते जल के कारण कोई शिकारी पशु भी उन घोंसलों तक पहुँच नहीं पाता था।

एक बया उस समय पास के ही एक वृक्ष पर तिनकों से ऐसा ही एक घोंसला बनाने में संलग्न थी, जिसे देखकर दोनों भाई-बहन को अपने पिता के मुख का आभास होता था। भगवान् वेदव्यास जी की मुखमुद्रा और इस घोंसले की रचना में अवश्य ही, कोई समानता तो थी ही!

भैया! इस चिड़िया को क्या समय का भान ही नहीं होता कि वह धीरे धीरे, तिनकों से बुनकर इतने अधिक श्रम और धैर्य के साथ अपना नीड़ निर्मित करती है?

क्षितिज ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह कौतूहल और विस्मय से उस पक्षी को तिनके लाते हुए और उसके साथ के दूसरे पक्षी को तिनकों को बुनकर घोंसला बनाते हुए देखता रहा। 

तब परिधि दौड़कर पिता के पास पहुँची, और उनके समक्ष पुनः अपनी वही जिज्ञासा रख दी, जिसे उसने क्षितिज से पूछा था।

"तुम्हें क्या लगता है? क्या समय के होने से वह चिड़िया अपना घोंसला बुनती है, या उसके घोंसला बुनने के कारण ही समय का, या समय के अस्तित्व का प्रारम्भ होता है?"

यह उत्तर सुनकर परिधि चकित रह गई। 

"फिर समय क्या है?"

उसने पिता से पूछा। 

"अक्षरात्संजायते कालो कालाद् व्यापकः उच्यते... "

पिता ने पुत्री की जिज्ञासा शान्त करते हुए कहा।

"पिताजी! 'व्यापक' शब्द का क्या तात्पर्य हुआ?"

"परधि! 'व्यापक' शब्द के दो आशय हैं : एक है काल, -जिसके आदि या अन्त को कोई भी नहीं जानता, दूसरा आशय है स्थान या आकाश, जिसका विस्तार कहाँ से कहाँ तक है, इसे भी कोई भी नहीं जानता।"

"किन्तु पिताजी! अभी-अभी तो आपने यह कहा कि काल का उद्भव अक्षर से होता है!"

"हाँ, उस अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-नायक परमेश्वर, चैतन्यघन अक्षर परमात्मा से ही, जिसमें कि सतत असंख्य काल और आकाश, अनवरत वैसे ही उठते और विलीन होते रहते हैं, जैसे कि समुद्र में सदैव असंख्य बुलबुले उठते ओर विलीन होते रहते हैं।"

(कल्पित)

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February 21, 2022

जैसे

 कविता / 21-02-2022

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नींद आती है, ख्वाब आते हैं, 

चिट्ठियों के जवाब आते हैं!

किसी मुफलिस की झोंपड़ी में,

जैसे कोई नवाब आते हैं!

हिफाज़त, देखरेख, कीजिए, 

काँटों के पीछे गुलाब आते हैं!

हाँ निगाहें तो हैं क़ातिल उनकी, 

मगर अंदाजो-आदाब आते हैं!

बेख़याली में भी खयाल होता है, 

रंजो-ग़म के हिसाब आते हैं!

बैठे-बैठे भी ऐसे ही अकसर, 

खयाल उसको, नायाब आते हैं!

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सोचो, साथ क्या जाएगा!

कविता / 21-02-2022

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तुम कौन!

सोचने दो संसार को,

संसार के बारे में!

सोचने दो मन को,

मन के बारे में!

सोचने दो साँस को,

साँस के बारे में,

बुद्धि को बुद्धि के बारे में,

स्मृति को स्मृति के बारे में!

शरीर को खुद उसके बारे में! 

तुम क्या सोच सकते हो! 

क्या तुम सोच सकते हो!

क्या तुम सोच भी सकते हो! 

फिर सोचता कौन है! 

तय है, कोई कहीं नहीं!

तुम्हें डर लगता है! 

पर क्या डर तुम्हें लगता है!

तुम्हें भूख लगती है, 

पर क्या भूख तुम्हें लगती है! 

तुम्हें नींद आती है,

पर क्या नींद तुम्हें आती है!

तुम जाग जाते हो, 

पर क्या तुम सोये भी थे! 

तुम्हें स्वप्न आते हैं, 

पर क्या स्वप्न तुम्हें आते हैं!

भूख और प्यास,

थकान और नींद,

स्वप्न और जागना, 

तुम्हें पूछे बिना ही आते हैं,

पता नहीं कौन है वह, 

जो करता है इंतजाम सारा, 

शायद उसे ही भगवान कहते हैं!

या उसको ही संसार कहते हैं, 

भगवान को भगवान के बारे में,

संसार को संसार के बारे में,

भगवान को संसार के बारे में,

संसार को संसार के बारे में,

मन को मन के बारे में,

तन को तन के बारे में,

बुद्धि को सोचने दो,

बुद्धि के बारे में,

और स्मृति को सोचने दो, 

स्मृति के बारे में!

तुम्हें पता ही है, 

कि तुम बस, हो भर! 

पता न भी हो,

तो भी तुम हो ही! 

पता होना भी है ही!

बस तुम्हें इतना ही पता है, 

इतना होना पता भी काफी है, 

तुम्हारा होना भर ही काफी है!

अपना होना पता भी काफी है!

पता होने का होना काफी है!

सोचना निहायत गैर-जरूरी है, 

और फिर, यूँ भी नामुमकिन है! 

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February 20, 2022

चींटियाँ और चिन्ता

कविता / 20-02-2022
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चिन्ता,
चिमटा या चिमटी नहीं,
चिन्तित हुई कोई, 
चींटी ही तो होती है, 
जो अकेली नहीं, 
अकसर सदल बल,
समूह होती है!
चली आती हैं, 
बेहिचक, बेखटके,
चुपके-चुपके, बेधड़क!
कर देती है, -आक्रमण,
अपने शिकार पर, 
और उनमें से जब,
कोई या कुछ,
पैरों-तले कुचल जाती हैं,
तो तुरंत ही उसे,
लादकर ले जाती है,
दूसरी कोई चींटी!

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February 19, 2022

निष्ठा और श्रद्धा,

विश्वास और मत

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यद्यपि यह एवं इससे पहले का अंतिम पोस्ट मेरे स्वाध्याय ब्लॉग में लिखा जाना उचित होता किन्तु इसे यहाँ लिखने का प्रयोजन यह है कि पाठक मेरे उस ब्लॉग का भी अवलोकन करें। या उस ब्लॉग के पाठक इस ब्लॉग का भी अवलोकन करें। 

ब्लॉग लिखना मेरे लिए एक स्वाभाविक कार्य है, इसका न तो कोई विशेष उद्देश्य है, न इसके माध्यम से मुझे किसी प्रकार का आर्थिक लाभ लेना होता है। व्यक्तिगत रूप से मुझे न तो किसी धर्म, सिद्धान्त, व्यक्ति, मत आदि का खण्डन-मण्डन करना है, न अपने आपको किसी उपदेशक की तरह स्थापित करना है। न ही मेरा यह दावा है कि मैं किसी का गुरु इत्यादि हूँ। हाँ, यहाँ मैं अपने विचार अवश्य व्यक्त करता हूँ, जिसे पढ़ना चाहे वह पढ़े, इससे पाठक सहमत या असहमत हो तो यह अवश्य ही उसकी अपनी स्वतंत्रता है, जिसका भी मैं पूरा सम्मान करता हूँ।

निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास, आस्था और मत आदि यद्यपि एक ही व समान अर्थ के द्योतक प्रतीत होते हैं, किन्तु यह आंशिक सत्य ही है, न कि पूर्ण सत्य । 

निष्ठा वह प्रतीति है, जो हमारे मन से स्वाभाविक रूप से उभर आती है, और जिसकी सत्यता पर प्रश्न या संदेह तक नहीं किया जा सकता । जैसे अपने आपके अस्तित्व का भान हर जीवित प्राणी में अनायास ही होता है। मैं यह शरीर हूँ, ऐसी प्रतीति भी अनायास ही हर किसी को होती है। इसके ही बाद यह शरीर मेरा है, इसकी प्रतीति होती है जो स्वाभाविक और अंतःस्फूर्त निष्ठा ही है। यह निष्ठा अतः अचल-अटल, और अपरिवर्तनशील होती है, जो बाहर से नहीं पाई जाती है। 

इसी प्रकार से यह निष्ठा या ज्ञान, कि मुझसे अर्थात् मेरे शरीर से अलग एक वह संसार भी है जिसे हर कोई यद्यपि जानता तो है, किन्तु कभी उसे अपना, तो कभी अपने से भिन्न भी मानता है।

यह ज्ञान अवश्य ही एक सतत परिवर्तित होते रहनेवाला विचार ही होता है, किन्तु फिर भी इस संसार को भी अपने आपकी ही  तरह हमेशा रहनेवाली एक वस्तु की तरह अनायास स्वीकार कर लिया जाता है। परंतु फिर भी अभी भी यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि मैं और (मेरा) संसार परस्पर भिन्न और स्वतंत्र दो अलग अलग चीजें हैं या कि एक ही वस्तु है।

जैसे संसार के अस्तित्व की प्रतीति और उसके बारे में होनेवाला ज्ञान हमें अपने बाहर से प्राप्त होता है, वैसे ही इस संसार के ही एक अंश की तरह से अपने शरीर का ज्ञान भी हमें बाहर से ही प्राप्त होता है। अपने शरीर का ज्ञान तो बाहर से पाई जानेवाली जानकारी मात्र होता है, जबकि अपने आपका भान ऐसी किसी प्रकार की जानकारी न होकर नित्य विद्यमान अनुभव / प्रतीति होता है। अपने अस्तित्व का भान भी है, और इस भान का भी अस्तित्व तो है ही। अस्तित्व और भान एक दूसरे से अविभाज्य सत्य  हैं। 

किन्तु शरीर के चेतन होने से ही अस्तित्व का भान मैं के रूप में अभिव्यक्त होता है और तत्क्षण ही इस शरीर को ही मैं की तरह सत्य भी मान लिया जाता है। 

शरीर के रूप में अपने आपको स्वीकार कर लेने के बाद भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं जा पाता है कि जिन मूल तत्वों से यह शरीर बना है, संसार भी तो उन्हीं मूल तत्वों से बना हुआ है।

इस प्रकार मैं और मेरा संसार एक ही साथ एक दूसरे से भिन्न / अभिन्न भी प्रतीत होने लगते हैं। बाद में यहीं से संशय, दुविधा और तथाकथित अज्ञान प्रारम्भ होता है।

इस अज्ञान से ही फिर विभिन्न विचार, मत, आस्था, विश्वास भी  पैदा होते हैं, जो सामाजिक मान्यताओं का रूप ले लेते हैं, जिसे समाज के प्रभावशाली वर्ग के लोग दूसरों को शिक्षा के माध्यम से प्रदान करते हैं। शिक्षा के अंतर्गत इसलिए निष्ठा के स्वरूप के बारे में नहीं, बल्कि वैचारिक सिद्धान्तों के बारे में अध्ययन किया जाता है । इस प्रकार की शिक्षा पुनः या तो सामाजिक विखंडन का कारण बनती है, या तथाकथित समन्वयात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास करती है और कुछ लोग उसके कायल हो जाते हैं। यह दृष्टिकोण साम्यवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, भाषा या धर्म (रिलीजन) आदि के रूप में राजनीतिक दर्शन हो जाता है। यह अहिंसावादी हो सकता है या हिंसा को उचित ठहराने पर बल देने के आग्रह के रूप में अतिवाद का रूप भी ले सकता है। यही फिर वर्ग-संघर्ष को अपरिहार्यतः आवश्यक भी घोषित कर, उसका औचित्य भी सिद्ध कर सकता है।

किन्तु यदि मत, विश्वास, विचार आदि के स्थान पर -निष्ठा क्या है, इसे जानने का प्रयास किया जाए तो पता चलता है कि यह हमारे भीतर विद्यमान सत्य का सहज स्वाभाविक साक्षात्कार ही है। और यह सत्य अलग अलग लोगों का अलग अलग अनुभव न होकर सभी की एकमेव वास्तविक अनुभूति ही है।

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संकल्प, निश्चय, और द्वंद्व

अनिश्चय और अन्तर्द्वन्द्व

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संकल्प किया जाता है, जिसे करनेवाला संकल्पों से भिन्न और स्वतंत्र, संकल्प का स्वामी, कोई संकल्पकर्ता भी अवश्य होता है, या ऐसा मान लिया जाता है।

निश्चय किया नहीं जाता, बस होता भर है। वह, जिसे निश्चय का स्वामी या निश्चय करनेवाला कहा जा सके ऐसा कोई निश्चयकर्ता न तो कल्पना में और न ही वस्तुतः भी कहीं होता है। 

संकल्प करनेवाले जिस तथाकथित संकल्प-कर्ता की स्वीकृति, संकल्प से भिन्न और स्वतंत्र एक अस्तित्वमान सत्ता और समस्त संकल्पों के स्वामी की तरह से होती है, और प्रमादवश ही जिसे तत्क्षण ही अपने-आपकी तरह स्वीकार कर लिया जाता है, वह भी वस्तुतः और यद्यपि अनुमान से ही उत्पन्न हुआ, वैसा ही एक विचार होता है, जैसा कि संकल्प भी एक विचार ही होता है।

इस प्रकार संकल्प से भिन्न और स्वतंत्र प्रतीत होनेवाला कोई आभासी संकल्पकर्ता अस्तित्व में आता है, जिसका अस्तित्व एक तात्कालिक और क्षणिक घटना होता है ।

तात्पर्य यह, कि संकल्प और संकल्पकर्ता दोनों, विचार की ही गतिविधि होते हैं, किन्तु संकल्पकर्ता को अपने होने के विचार के रूप में सातत्य प्राप्त हो जाता है, जबकि संकल्प को सतत बदलते रहनेवाली वस्तु मानकर अस्थायी और तात्कालिक वस्तु समझ लिया जाता है। 

इस प्रकार से उत्पन्न मान्यताएँ विचार-मात्र हैं।

निश्चय स्वयं विचार न होकर, दृष्टि या दृष्टिकोण ही होता है, जो पुनः त्रुटिहीन या त्रुटियुक्त भी हो सकता है। 

फिर भी संकल्प करनेवाला कोई संकल्पकर्ता भी केवल विचार और उस विचार से सीमित होता है, और स्मृति तथा विस्मृति के सहारे कार्य करता है, निश्चय का कार्य उससे नितान्त भिन्न रीति से होता है। 

इसलिए संकल्प और संकल्पकर्ता, -- द्वन्द्व तथा संशय, आशा और निराशा, अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना को जन्म देते हैं, जबकि निश्चय से सदैव एक नई दृष्टि प्राप्त की जा सकती है ।

संकल्प सदैव द्वन्द्व और संशय, अनिश्चय और दुविधा, आशा एवं निराशा को जन्म देता है । संकल्प सदा ही लोभ और भय का कारण होता है, जबकि निश्चय उचित कर्तव्य क्या है इस बारे में दृष्टि देता है। 

संकल्प करनेवाला कल्पित संकल्पकर्ता अपने आपको सदैव ही कर्ता, भोक्ता, स्वामी, ज्ञाता इन चार रूपों में सीमित कर लेता है, जबकि निश्चय केवल दृष्टि मात्र होने से त्रुटिपूर्ण या त्रुटिरहित भर होता है और इसलिए चिन्ता, लोभ, भय, द्वन्द्व, संशय, दुविधा और अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त होता है।

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Terminology :

संकल्प - choice, 

निश्चय - vision, 

संकल्पकर्ता - the assumption : 'I'm the authority,

कर्ता - the assumption / thought : 'I do',

भोक्ता - the thought / assumption :

'I experience, enjoy, suffer',

स्वामी - the thought / assumption :

'I' possess, I have control over things. 

ज्ञाता - the idea :

I have the knowledge, information, or the memory.

ज्ञान - knowledge, information, memory,

दुविधा - conflict,

संशय - suspicion / doubt, 

द्वन्द्व - confusion, अन्तर्द्वन्द्व - indecision.

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February 18, 2022

अनलिखा

कविता / 18-02-2022

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मुमकिन / संभावना

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कुछ कहा अनकहा हो जाएगा, 

अनकहा कुछ कहा हो जाएगा! 

कुछ पढ़ा अनपढ़ा हो जाएगा,

अनपढा़ कुछ पढ़ा हो जाएगा!

कुछ सुना अनसुना हो जाएगा, 

अनसुना कुछ सुना हो जाएगा, 

कुछ लिखा अनलिखा हो जाएगा,

अनलिखा कुछ लिखा हो जाएगा,

ऐसा भी क्या कभी हो जाएगा,

कहीं यहीं अभी ही हो जाएगा!

कुछ किया अनदेखा हो जाएगा,

अनकिया कुछ किया हो जाएगा!

कुछ हुआ अनहुआ हो जाएगा, 

अनहुआ कुछ हुआ हो जाएगा! 

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February 17, 2022

चारा, मछली, मछुआरा!

कविता / 15-02-2022

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वह चारा, वह मछली, और वह मछुआरा, 

युग-युग से नाटक, चला आ रहा सारा!

हर बार उसे लगता है, वह चारा खाएगी,

हर बार ही होता है, निराश वह बेचारा!

होता है सागर, कितना अति-विस्तीर्ण!

होता है तालाब मगर, अति ही संकीर्ण!

तालाब में हैं कितनी और भी मछलियाँ,

रोज पकड़ता है मछुआरा, उनमें से कुछ, 

लेकिन वह अब तक हाथ नहीं है आई,

जिसके लिए कर रहा कोशिश मछुआरा!

कभी कभी लगता है सचमुच, क्या वह है भी! 

कभी कभी लगता है सचमुच, हाँ वह है ही!

लगता है, क्या यूँ ही, बीतेगा जीवन सारा,

मेहनत करता फिर, बेचारा थका-हारा!

***

कस्तूरी तन में बसे, मृग ढूँढे बन माँहि,

प्रीतम तो हिय में बसे, सब ढूँढें जग माँहि!!

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February 15, 2022

वर्तमान

कविता / 15-02-2022

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अङ्गद के पाँव की तरह,

अडिग, अटल, वर्तमान, 

किसी की भी शक्ति से, 

लेशमात्र भी हिलता नहीं, 

शायद इसीलिए समय, 

यद्यपि चलता रहता है,

सतत और लगातार,

वर्तमान, फिर भी, कभी,

जरा भी बदलता नहीं!

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नई जगह!

कविता / 14-02-2022

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विस्मय और रहस्य 

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किसी अपरिचित नई जगह पर जाना हो,

जहाँ न कोई अपना जाना पहचाना हो, 

लेकिन जो है जानेवाला, उसको खुद को, 

कैसे याद रखेंगे उसको, जिसको "मैं" माना हो, 

कितना मुश्किल है यह, कितना आसान है यह, 

मैं स्वयं अपरिचित "मैं" से, अनजान भी तो है, 

क्या यह कभी किसी जगह जा भी सकता है!

कितना व्याकुल, बेचैन और परेशान है यह,

क्या इससे बाहर कोई कभी, जा भी सकता है!

लेकिन यही तो यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ जाता है, 

फिर भी सर्वत्र सदा स्वयं को ही पाता है! 

जब सबको अपने में, अपने को सबमें पाता है,

तब यह उपरत, शान्त, समाहित हो जाता है!

इस स्थिति तक आने में समय लगा करता है, 

किन्तु समय भी यह, विलीन इसमें हो जाता है।

वह सर्वत्र, जहाँ विलीन, समय भी हो जाता है,

यहाँ-वहाँ भी वह जिसमें कि समय नहीं होता,

जहाँ स्थान-समय की सीमा भी मिट जाती है, 

अपने स्वरूप पर विस्मय तब, किसे नहीं होता!

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February 12, 2022

वह जो है!

कविता / 12022022

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अकसर मुझसे कहता है, 

वह जो मुझमें रहता है,

तुम हो कौन मेरे, बोलो!

तुममें मैं कौन, जो रहता है!

एक खयाल उठता है,

एक सवाल पूछता है,

एक खयाल बूझता है,

कोई जवाब ढूँढता है!

यह सवाल, वह जवाब,

उस रौशनी में चमकते हैं,

रौशनी, खामोश है जो!

खयाल जोश, पर बेहोश,

रौशनी, मगर, होश है जो!

रौशनी कुछ नहीं कहती

करती है लेकिन लाजवाब

जोश या बेहोशी ही तो, 

करते हैं, सवाल-जवाब!

तो कौन है जो कि देखता है, 

ख़यालों, जवाबों, रौशनी को,

या, रौशनी देखती है, खुद को?

ये सवाल, सवाल ही तो है!

खयाल का कमाल ही तो है!

*** 








February 08, 2022

और शरद जोशी

आषाढ़ का एक दिन,

और नावक के तीर,

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कभी इन दो पुस्तकों (!) के बारे में पढ़ा-सुना था। 

अगर मेरी याददाश्त ठीक है, तो इनमें से प्रथम हिन्दी का नाटक है, जिसकी पृष्ठभूमि में संस्कृत की, संभवतः महाकवि कालिदास की रचना "मेघदूतम्" है।

सोचता हूँ कि एक बार पाठ कर लूँ। संस्कृत की पुस्तकों के बारे में अकसर अनुभव होता है, कि अगर उन्हें किसी आध्यात्मिक या धार्मिक संस्था द्वारा प्रकाशित किया गया हो तो प्रायः उनकी छपाई कलात्मक और सुंदर होती है, किन्तु किसी व्यावसायिक प्रकाशन द्वारा किया गया उनका प्रकाशन वास्तव में पाठक के धैर्य की परीक्षा ही करता है।

"आजकल किताबें कौन पढ़ता है!"

जब मैंने 1990 में नौकरी छोड़ दी थी और अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक की एक अंग्रेजी / मराठी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने में उत्साह से संलग्न था तब मेरे एक मित्र और कॉलेज के  सहपाठी तथा बैंक के मुझसे जूनियर सहकर्मी ने मेरे इस वक्तव्य पर उपरोक्त टिप्पणी की थी।

यद्यपि मुझे उसकी इस टिप्पणी पर न तो आश्चर्य और न ही दुःख हुआ, क्योंकि उससे मुझे ऐसी कोई आशा थी, कि वह मेरी बात को महत्व देगा।

वह बात वहीं ख़त्म हो गई। 

किन्तु जिन पुस्तकों का अनुवाद मैंने किया, उनके प्रकाशकों ने जिस कुशलता और दक्षता से मेरे कार्य का मुद्रण और प्रकाशन किया वह अवश्य ही प्रशंसनीय था। 

यद्यपि उस मित्र की यह बात भी अपनी जगह शायद सही ही थी कि आजकल किताबें कौन पढ़ता है।

सचमुच बहुत से प्रकाशक संस्कृत के ग्रन्थों का न तो प्रूफरीडिंग ठीक से करते हैं, न सौ पचास साल पहले मुद्रण करना इतना आसान था, जैसा कि आजकल कंप्यूटर से डेस्कटॉप-एडिटिंग होता है। बीच में कुछ समय इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटरों के आने से यह कार्य अवश्य ही बेहतर ढंग से होने लगा था, किन्तु जैसे मोबाइल के आगमन के बाद पेजर कालातीत (redundant, obsolete, out-dated) हो गए वैसे ही डेस्कटॉप एडिटिंग के आने से पुराने लिथो-प्रिन्टर्स भी कहीं ओझल हो गए। 

किन्तु अब बहुत सा साहित्य (विशेषतः संस्कृत भाषा का) on -line भी पाया जा सकता है पर वहाँ इन्हीं प्रोफेशनल्स कारणों से संस्कृत ग्रन्थों की दुर्दशा भी होती है।

'नावक के तीर' का अनुवाद क्या होगा?

मुझे लगता है यह किसी पत्रिका या अन्यत्र लिखा जाने वाला उनका कोई स्तंभ (column) रहा होगा। 

निश्चित ही 'नावक' शब्द से श्री शरद जोशी का तात्पर्य 'नाविक' अर्थात् नाव-वाला ही रहा होगा और 'तीर' शब्द से 'बाण' नहीं, -'तट' ही रहा होगा।

नौ, नाव, नावक, नाविक और अंग्रेजी के navigation, naval, navy, एक ही अर्थ को इंगित करते हैं।

गीता का यह श्लोक दृष्टव्य है :

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।।

(गीता 2/67)

शायद यह समय ही है जो वायु की तरह नेट-सर्फिंग करनेवाले नेवीगेटर को कहीं से कहीं ले जाता है! 

***


बात

कविता / 07-02-2022

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बात करने के लिए, कुछ भी न हो अगर, 

तो भी शुरू करने से बात शुरू होती है! 

मिलने की कोई वजह न भी हो अगर, 

तो भी मिलने से, मुलाका़त नई होती है! 

हाँ अगर अजनबी लग रहा हो हर कोई,

और अगर दिल में नहीं हो जज्बा कोई,

तो किसी बात का मतलब ही क्या है, 

तो बात करने का मक़सद ही क्या है! 

तो बात करने की ज़रूरत ही क्या है!

मुलाकात करने की ज़रूरत ही क्या है?

दोस्ती-दुश्मनी की कोई वजह क्या है! 

ज़िन्दगी की फ़ितरत-ओ-सूरत क्या है!! 

***

सन्दर्भ  : Russia Ukraine conflict.

February 05, 2022

भक्ति का भेद

वसंत का आगमन

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बृजभूमि पर वसंत का आगमन हो चुका था। संध्या में गौएँ वन में चरकर गाँव की ओर लौट रही थीं। चन्द्रमा अभी उदित नहीं हुआ था। अभी दो घड़ी की देर थी।

दो तीन घड़ी के बाद चन्द्रमा जब उदित हुआ तब तक ग्वाल- बाल घर से शाम का भोजन कर रास नृत्य के लिए एकत्र हुए।

उन ग्वाल-बालों के बीच एक ऐसा भी बालक था जो नृत्य तो कम, उछल-कूद ही अधिक करता था। और दूसरे ग्वाल-बालों को उसकी उछल-कूद पर कोई आपत्ति भी नहीं होती थी। 

एक दिन उसके एक साथी ने उससे पूछा :

"तुम नृत्य कम और उछल-कूद अधिक क्यों करते हो?"

उसने कहा : 

"मैं हनुमान का भक्त हूँ, इसलिए नृत्य तो अधिक नहीं, उछल-कूद ही अधिक जानता हूँ।"

"तो तुम रासबिहारी कृष्ण की रासमंडली में सम्मिलित ही क्यों होते हो?"

"अरे! तुम्हें नहीं पता कि भगवान् श्रीराम ही तो इस द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं, और हनुमानजी तो भगवान् श्रीराम के ही परम भक्त हैं।"

"तो"

"यही कि जहाँ श्रीराम होते हैं, वहाँ हनुमानजी भी होते ही हैं। इसीलिए मुझे नृत्य नहीं आता तो भी मैं अपने आपको रास-नृत्य में सम्मिलित होने से नहीं रोक पाता!"

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जब सब कुछ है!

कविता 05-01-2022

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जब सब कुछ होगा, 

तो सुख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो दुःख भी तो होगा ही! 

जब सब कुछ होगा, 

तो सुख-दुःख भी होगा ही! 

जब सुख-दुःख होगा,

तो बेचैनी भी होगी ही!

फिर क्यों यह मन कहता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

फिर क्यों यह मन सोचता है, 

यह बेचैनी क्यों होती है! 

यह सुख किसको होता है?

यह दुःख किसको होता है?

यह सुख-दुःख किसको होता है? 

यह सुख-दुःख जिसको होता है, 

जब तक वह है तब तक तो,

सुख-दुःख, बेचैनी, होगी ही!

जब तक ऐसा, कोई जो भी है,

उसको बेचैनी होगी ही! 

फिर वह कोई भी, जो भी है, 

कैसे बेचैनी दूर करे? 

क्या वह खुद ही फिर मिट जाए, 

क्या तब ही उसको चैन मिले! 

लेकिन यदि वह ही मिट जाए,

तो फिर कैसे 'वह' रह पाये!

कैसे 'वह' तब फिर यह जाने,

बेचैनी फिर कैसे जाये!

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तो सवाल यह है :

जो मन सुखी-दुःखी होता है,

जो "मैं" सुखी-दुःखी होता है, 

जो मन "मैं" कहता है,

जो "मैं" मन को जानता है,

क्या "मैं" ही, 'वह' मन है? 

क्या मन ही, 'वह' मैं है? 

फिर किसको कौन मिटाता है,

कौन बचा रह जाता है?

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February 03, 2022

एक पुरा कथा

बलि-पशु और पशु-बलि

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तब समय नहीं था। 

मतलब यह कि वह समय नहीं था, जो कि बीतता या व्यतीत होता है। धरती पर जीवन था किन्तु तब धरती सूरज के इर्द-गिर्द नहीं घूमती थी, बल्कि आकाश में, या अन्तरिक्ष में किसी अज्ञात दिशा की ओर गतिमान थी। यह भी पता नहीं, कि वह तब किसी सरल रेखा में गतिशील थी, या कि उसका मार्ग वृत्तीय, अंडाकार, वक्र, परवलयाकार या अतिपरवलयाकार था।

जो भी हो किन्तु यह भी सच है कि तब सूरज ही धरती के इर्द-गिर्द घूमा करता था - और शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है ही! बहरहाल, तब सूरज और चन्द्रमा दोनों ही धरती की परिक्रमा करते रहे होंगे, और आकाश के तमाम तारे, नक्षत्र आदि भी। 

इसलिए भी तब धरती पर सुबह और शाम तो होती थी, रात्रि में चन्द्रमा और तारे, नक्षत्र आदि भी दिखाई देते रहे होंगे, -क्योंकि  इसका उल्लेख भी शास्त्रों में है ही!

तब भी धरती पर मनुष्य था, और सभी मनुष्यों का जीवन अलग अलग कबीलों के अपने अपने रीति रिवाजों से संचालित होता था। कुछ कबीले नितान्त शाकाहारी, कुछ मांसाहारी, तो कुछ सामिष-निरामिष दोनों ही प्रकार का आहार करने के अभ्यस्त थे। कुछ थोड़े से ऐसे नरभक्षी (cannibal) भी थे, जो कि अपने कबीले के मनुष्यों के अलावा अन्य किसी भी कबीले के मनुष्यों को अपना आहार बना लेते थे। ऐसे ही नरभक्षियों को राक्षस, असुर, दानव, और दैत्य भी कहा जाता था।

तब समय नहीं था ।

मतलब वह समय नहीं था जो कि बीतता या व्यतीत होता है।... 

तब देवता भी नहीं थे, या थे भी तो वे अपने अपने लोक में रहते हुए अपना कार्य करते रहते थे। 

कुछ देवता कभी कभी मनुष्यों से उनके प्रेम के कारण अवश्य ही उनके समक्ष प्रकट होने लगे थे, और उन मनुष्यों से धीरे धीरे उनके संबंध प्रगाढ होने लगे थे। फिर भी देवता ही यह तय करते थे कि उन्हें किसी के समक्ष प्रकट होना है या नहीं। 

बहुत समय तक ऐसी परंपरा चलते रहने से मनुष्यों को यह स्पष्ट हुआ कि किस देवता या देवी का संबंध रात्रि से है, और किसका संबंध दिन से है। इतना ही नहीं, किसका संबंध अंधेरे से है, और किसका संबंध प्रकाश से है। किसका संबंध बादलों से है, और किसका संबंध वायु से है, किसका संबंध अग्नि से है, किसका धूप से, किसका वर्षा से, किसका शीत या ऊष्णता से है। किसका संबंध रोग से है, किसका स्वास्थ्य, नीरोगता, या आरोग्य से, किसका जन्म या मृत्यु आदि से है। किसका काम-भावना से है, किसका लोभ या भय से है।  संबंधों के और प्रगाढ होते-होते धीरे धीरे मनुष्य देवताओं की भाषाओं को भी समझने लगे। तब तक मनुष्यों को यह नहीं पता था कि क्या सभी देवता एक ही या अलग अलग भाषाएँ बोलते हैं ? 

फिर जब मनुष्यों को यह पता चला कि देवता अलग अलग और अनेक भाषाएँ बोलते हैं, तो उन देवताओं की भिन्नता के आधार पर ही उन्हें यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग आदि नाम प्रदान किए गए। देवताओं के पास यह शक्ति थी कि वे अपनी इच्छा के अनुसार किसी के सामने प्रकट या अप्रकट हो सकें, किन्तु जब मनुष्यों ने धीरे धीरे उनकी भाषा सीख ली, तब मनुष्यों को यह विद्या आ गई कि वे आवश्यकता होने पर वाणी का प्रयोग करते हुए उन देवताओं का आवाहन या आह्वान कर सकें। इसी क्रम में मनुष्यों को यह भी अनुभव हुआ कि जैसे मधुमक्खियाँ, भ्रमर और तितलियाँ अलग अलग सुगन्धों से आकर्षित होते हैं, उसी तरह अलग अलग देवताओं को अलग अलग प्रकार की सुगन्ध के प्रयोग के द्वारा आकर्षित किया जा सकता है। आकर्षित ही नहीं, बल्कि प्रसन्न भी किया जा सकता है। 

यही मनुष्य ऋषि कहलाए। 

उन्हीं ऋषियों ने तब सभी देवताओं का आवाहन करने, उनसे संपर्क करने, तथा उन्हें प्रसन्न करने के विज्ञान का, अर्थात् यज्ञ का आविष्कार किया और इसकी पूरी प्रक्रिया लिपिबद्ध की। 

कुछ देवता यद्यपि सात्विक प्रवृत्ति के थे, और प्रायः केवल घृत की आहुति से ही अत्यंत प्रसन्न हो जाते थे, किन्तु राजसी और तामसिक प्रवृत्ति रखनेवाले कुछ अन्य देवता मांसभोजी थे, और इसलिए यज्ञों के अनुष्ठान में पशु-बलि का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।

इन सभी देवताओं के साथ इन देवताओं के कुछ ऐसे अनुचर या दास भी यज्ञ की आहुतियाँ प्राप्त करने लगे और चूँकि ये अनुचर भिन्न भिन्न प्रकार के उच्छिष्ट आहार को ग्रहण करने के अभ्यस्त थे, इसलिए यज्ञ के स्वरूप में क्रमशः विकार आने लगा । इसके बाद कुछ मनुष्यों ने ही उन अनुचरों को प्रसन्न करने का विज्ञान भी खोज लिया।

इन अनुचरों में बहुत से ऐसे थे, जो कि देवताओं की ही तरह पहले तो मनुष्य ही थे, किन्तु मनुष्य के रूप में उनकी मृत्यु हो जाने के बाद केवल वायुरूप के होकर रह गए और देवताओं के अनुचर हो गए, ताकि उस जीवन को आनन्दपूर्वक जीते हुए उस स्तर के भोग प्राप्त कर सकें।

धरती पर यज्ञ का धर्म धीरे धीरे जब विकार को प्राप्त होते होते अंततः पूरी तरह से लुप्त हो गया, तो इन दासों / अनुचरों ने मनुष्यों को प्रेत-कुल (ghost-cults) की ओर आकर्षित कर लिया।

चूँकि इस समय तक यज्ञ के विज्ञान का अंत हो चुका था, अतः प्रेत-कुल की परंपरा के अनुयायियों ने पुस्तकों और ग्रन्थों आदि के माध्यम से अपनी अपनी परंपराओं की स्थापना की।

चूँकि हर ग्रन्थ का अपना एक देवता होता है, इसलिए अनेक ग्रन्थों के भिन्न भिन्न देवता ही एकमेव परमेश्वर बन बैठे और तब  पशु-बलि की पूर्व-परंपरा के समाप्त हो जाने के बाद परस्पर युद्ध करने लगे। और इन विभिन्न परंपराओं के अनुयायी, जो कि पहले अपने अपने देवता के वाहन थे, धीरे धीरे अन्य देवताओं के लिए बलि-पशु के रूप में प्रयुक्त किए जाने लगे।

इसके बाद जब से सूरज और ग्रह-नक्षत्रों ने धरती की परिक्रमा करना छोड़ दिया और, जब धरती ही सूरज की परिक्रमा करने लगी, तब तक विभिन्न मतों, देवताओं के अनुयायी दूसरे मतों के मतावलंबियों को बलि-पशु की तरह प्रयुक्त करने लगे। 

यह परंपरा आज तक वैसी ही सतत, निरंतर जारी है।

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क्रिप्टोकरेंसी

Non Fungible Tokens

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दिनांक 02 दिसंबर 2021 को क्रिप्टोकरेंसी के बारे में मैंने :

"The Wolf of the Wall Street"

शीर्षक से एक पोस्ट इस ब्लॉग में लिखा था। 

कल परसों देश के बजट में बिटकॉइन, ईथीरियम एवं ऐसी दूसरी आभासी प्रतिभूतियों (non fungible tokens) पर सरकार के दृष्टिकोण से मेरे इस विचार की पुष्टि हुई कि जनता के हितों की सुरक्षा के लिए सरकार के द्वारा लिए गए निर्णय विवेकपूर्ण हैं, और पर्याप्त सावधानी से लिए गए हैं ।

सबसे बड़ी और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले दो तीन वर्षों में तथाकथित "माइनिंग" की अवधारणा को लॉन्च, सपोर्ट या एन्डोर्स करते हुए यह भ्रम फैलाया गया कि क्रिप्टो-करेंसी के माध्यम से किया जानेवाला लेन-देन सुरक्षित है, तथा क्रिप्टोकरेंसी में किया जानेवाला निवेश कम से कम समय में अधिक से अधिक रिटर्न दे सकता है।

निश्चित ही सरकार फूँक फूँक कर कदम रख रही है, किन्तु यह भी सरकार का दायित्व है कि इस बारे में क्रिप्टोकरेंसी की वैधता के बारे में स्पष्टता से अपना दृष्टिकोण सामने रखे। वैसे इसे नॉन फंजिबल टोकन्स (Non Fungible Tokens) की श्रेणी में रखे जाने से यह तो स्पष्ट ही है कि इसमें निवेश करने में कितना जोखिम है, इस पर ध्यान देकर ही अपने लिए कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। यदि आपके पास अनाप शनाप और बेहिसाब इतना पैसा है और आप इसमें निवेश की रिस्क ले सकते हैं, तो भी आपसे प्रेरणा लेकर दूसरे वे लोग जिनके पास केवल मेहनत की गाढी़ कमाई है, कहीं अपने  लालच और नासमझी की वजह से इसे गवाँ न बैठे!

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