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June 07, 2021

परिचिन्तयन्

माया और चिन्ता :

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दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। १४

(श्रीमदभगवद्गीता अध्याय ७)

किसी संत कवि ने कहा है :

ब्रह्मा के ब्रह्माणी भई, शंकर के भई शिवानी,

विष्णू के लक्ष्मी भई माया, महाठगिनी हम जानी।

ये संत कवि कितने भी महान रहे हों कवि भी तो थे ही।

कवि होने के कारण उनकी बुद्धि शायद मोहित हो गई होगी, या मोहित न भी हुई हो, तो उन्हें पता ही रहा होगा कि कर्म क्या है तथा अकर्म क्या है, क्योंकि इस बारे में प्रायः हर किसी की बुद्धि मोहित हुआ करती है:

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।। १६

(गीता, अध्याय ४)

चिन्ता चिन्मयी माया की एक अभिव्यक्ति है, और चिन्माया ही जगज्जननी है, जगन्माता है। यह माता कभी कभी अपने उन शिशुओं से उस समय छल करती प्रतीत होती है, जब वे उसका केवल अनादर ही नहीं, प्रमाद व अज्ञान से ग्रस्त होने से उपहास और अवमानना भी करने लगते हैंं, उसे उसके गौरव से वंचित कर अपने अधिकार की उपभोग की वस्तु मान लेते हैं ।

और तब इसका दंड उन्हें प्राप्त होता है। फिर भी कभी कभी वे नहीं चेतते और माया पर महाठगिनी होने का दोषारोपण करने लगते हैं।

किन्तु एक अन्य भक्त कवि आदि शंकराचार्य इस विषय में सचेत करते हैं :

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।३

(देव्यापराधक्षमापन-स्तोत्रम्)

यह "छल" क्या है?

यही वह दंड है जो माता के प्रति ऐसी बुद्धि रखनेवालों को प्राप्त होता है। यह है मोहित और भ्रमित, दूषित और कुटिल बुद्धि। 

कल्पना से भी माया का उपहास करना गलतफहमी नहीं है, तो और क्या है? किन्तु ऐसा भी तो हो सकता है कि संत कवि को यह गलतफहमी न हुई हो और उन्होंने कविता की पृष्ठभूमि के रूप में माया को महाठगिनी कहा हो!

तो,  चिन्ता का रोचक पक्ष यह भी है :

अज्ञश्च अश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। 

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। ४०

(गीता अध्याय ४)

इसलिए चिन्ता कभी कभी भूल से, केवल कोरे अज्ञान, भ्रम या गलतफ़हमी से भी पैदा हो जाती है। 

यही मायारूपी गुणमयी माया के तीन तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण हैं, जो क्रमशः शिव, विष्णु तथा ब्रह्मा जैसे बड़े बड़े देवताओं को भी मुग्ध कर देते हैं। 

यह हुआ औपचारिक सत्य ।

जब इन बड़े बड़े देवताओं की चेतना परमात्मा से हटकर अज्ञान और मोह से ग्रस्त हो जाती है, तो वे भी साँसारिक मनुष्यों जैसे ही माया के वश में हो जाते हैं। किन्तु जिस मनुष्य का चित्त या मन परमात्मा के ध्यान में संलग्न और रमा होता है, उसका मन साँसारिक विषयों की तरफ क्यों जाएगा! 

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।। ८

(गीता अध्याय ८) 

अर्जुन ने इसीलिए भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा था :

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।। १७

(गीता, अध्याय १०)

यह हुआ चिन्ता से निवृत्ति होकर चिन्तन, चिन्तन से अनुचिन्तन, तथा अनुचिन्तयन् से परिचिन्तयन् की दिशा में अग्रसर होना।  

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बोलो, माया मैया की! 

--- जय हो!!

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June 06, 2021

... चिन्ता (निरंतर...)

चिन्ताक्रम 

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चिन्ता को मारो गोली, 

या फिर करो ठिठोली, 

या कर लो अनबोली,

पर चिन्ता है अलबेली!

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चल दोस्त दारू पीते हैं! 

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एक तरीका है :

स्वेट मार्डन की किताब :

"चिन्ता छोड़ो,  सुख से जियो!"

पढ़ो! 

नॉर्मन विन्सेन्ट पील की किताब भी सहायक हो सकती है! 

मोटीवेशनल स्पीकर्स की मोटी मोटी किताबें पढ़ने का धैर्य न हो, तो वीडियो ही वॉच कर लें!

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चिन्ता "क्या" है, इस पर अनेक चिन्तकों ने विस्तार से विचार किया है। 

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हम चिन्ता "क्यों" करते हैं, इस पर भी बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने अनुसंधान किया है! 

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हम "किसकी", अर्थात् किस विषय में चिन्ता करते हैं, इस ओर ध्यान देना भी उपयोगी हो सकता है।

प्रश्न यह भी है, कि क्या वाकई हम चिन्ता करते हैं, या चिन्ता हमें अचानक, अनपेक्षित रूप से वैसे ही होने लगती है, जैसे ज़ुकाम या फ्लू हो जाता है!

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है, कि चिन्ता क्या एक स्वैच्छिक गतिविधि होती है, या अनैच्छिक गतिविधि होती है?

क्या हमें एक ही चिन्ता होती है? 

मतलब यह, कि क्या किसी एक ही सुनिश्चित क्षण में हमें एक से अधिक चिन्ताएँ हो सकती हैं?

स्पष्ट है कि किसी भी समय पर एक से अधिक चिन्ताएँ हम पर हावी नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से  हमारा मन ठिठक जाता है, और तब उन दोनों में से जो चिन्ता अधिक महत्वपूर्ण या शक्तिशाली होती है, वही हमें वश में कर लेती है! 

उदाहरण के लिए, जब हमें भूख भी लगी हो, और नींद भी आ रही हो, लेकिन हम बस या ट्रेन में बैठे हुए न तो सो पा रहे हों, न खाने के लिए ही कुछ पास हो, तो यह चिन्ता हमारे लिए अधिक आवश्यक होती है कि पहले सावधानी से यात्रा पूरी हो जाए।

इसलिए चिन्ता दूर तो हो सकती है, लेकिन चिन्ता को किसी प्रयास से ही दूर किया जा सकता है। इसलिए यदि हो सके तो ऐसा कोई प्रयास किया जाना चाहिए न कि चिन्ता! 

यह तो हुआ चिन्ता का व्यावहारिक पक्ष। 

किन्तु चिन्ता का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, क्योंकि चिन्ता मन से जुड़ा तत्व है।

जब जीवन हमारे सामने ऐसी कोई नई चुनौती प्रस्तुत करता है, जिसे न तो हम अपने ज्ञात / ज्ञान के, और न ही अपने पहले के किसी और अनुभव के आधार से समझ पाते हैं, तो हम उस चुनौती का सामना करने के लिए या तो किसी से सहायता लेते हैं, या उसके स्वरूप का आकलन करने के लिए पहले उस चुनौती पर अपना ध्यान एकाग्र करते हैं। हम पूरी स्थिति को ठीक ठीक समझने के लिए अपने इंद्रिय-ज्ञान का सहारा लेते हैं, और इसके बाद बुद्धि और फिर स्मृति का सहारा लेते हैं। 

किन्तु जैसा कि अंतिम पैराग्राफ़ में कहा गया है। जब जीवन हमारे सामने ऐसी कोई सर्वथा नई चुनौती प्रस्तुत करता है, तब आवश्यक नहीं, कि इनमें से किसी भी उपाय से उस चुनौती का समुचित प्रत्युत्तर दिया ही जा सके। 

चिन्ता करने से ही यदि हम किसी चुनौती का सामना सफलता-पूर्वक कर सकते हैं तो चिन्ता की अवश्य ही अपनी उपयोगिता है । किन्तु जब मन (जीवन के संबंध में) सीखने के लिए उत्सुक और उत्कंठित होता है तो चिन्ता की भूमिका उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती। उस समय मन अतीत-रूपी किसी ज्ञात, अथवा ज्ञान रूपी आशा या भय से मुक्त होता है, और तब हम आश्चर्यजनक रूप से अकस्मात् ही जीवन की किसी भी चुनौती का सामना तत्क्षण और उत्साह पूर्वक करते हैं। तब हमें सफल होने या न होने की चिन्ता भी नहीं रहती, और चिन्ता अनायास, अप्रासंगिक और अनावश्यक भी हो जाती है। 

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चिन्ता और चिन्तन

किसी ने कहा है :

माया महाठगिनी!

शायद माया और चिन्ता एक ही वस्तु है।

जैसे माया बड़े-बड़े ज्ञानियों ध्यानियों का पीछा नहीं छोड़ती,  चिन्ता भी इसी तरह सबके साथ लगी रहती है। 

साधु-सन्त हों, तथाकथित वैरागी-संन्यासी, या वैज्ञानिक विद्वान, सभी चिन्ता के वश में होते हैं। चिन्ता भी माया की ही तरह वैसे तो निराकार और अमूर्त होती है, किन्तु अपने प्रभाव की दृष्टि से माया की तुलना में अधिक प्रत्यक्षतः अनुभव होती है।

चिन्ता भी क्या आशा का ही पर्याय नहीं है! 

कालः क्रीडति गच्छति आयुः तदपि न मुञ्चति आशावायुः।। 

उक्त पंक्ति के बारे में किसी पाठक का आग्रह था, कि यहाँ आशा का तात्पर्य hope नहीं, desire (इच्छा) है!

कठोपनिषद् १,१ के अनुसार :

आशाप्रतीक्षे संगत्ँ सूनृतां च

इष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान्। 

एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो

यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे।। ८

के सन्दर्भ में आशा का अर्थ इच्छा से उत्पन्न मनोदशा हो सकता है। इच्छा, आशा, अवश्य ही 'भविष्य' नामक अमूर्त और अग्राह्य काल्पनिक वस्तु की प्राप्ति होने की संभावना से प्रेरित विचार मात्र होता है। इस प्रकार यद्यपि कोई आशा, इच्छा यदि पूर्ण हो भी जाती है, तो भी ऐसी अनेक दूसरी आशाएँ और इच्छाएँ तो निरंतर उत्पन्न होती रहती हैं जिनका पूर्ण होना असंभव होता है, क्योंकि उनमें से बहुत सी परस्पर विरोधाभासी और विसंगत ही होती हैं। 

चिन्ता इस अर्थ में और भी विलक्षण है, कि उसमें आशा के साथ साथ आशंका भी छिपी होती है। आशंका अर्थात् यह डर भी कि कहीं कुछ अनिष्ट न हो जाए।

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क्रमशः --

अगली पोस्ट में भी...