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February 17, 2022

चारा, मछली, मछुआरा!

कविता / 15-02-2022

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वह चारा, वह मछली, और वह मछुआरा, 

युग-युग से नाटक, चला आ रहा सारा!

हर बार उसे लगता है, वह चारा खाएगी,

हर बार ही होता है, निराश वह बेचारा!

होता है सागर, कितना अति-विस्तीर्ण!

होता है तालाब मगर, अति ही संकीर्ण!

तालाब में हैं कितनी और भी मछलियाँ,

रोज पकड़ता है मछुआरा, उनमें से कुछ, 

लेकिन वह अब तक हाथ नहीं है आई,

जिसके लिए कर रहा कोशिश मछुआरा!

कभी कभी लगता है सचमुच, क्या वह है भी! 

कभी कभी लगता है सचमुच, हाँ वह है ही!

लगता है, क्या यूँ ही, बीतेगा जीवन सारा,

मेहनत करता फिर, बेचारा थका-हारा!

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कस्तूरी तन में बसे, मृग ढूँढे बन माँहि,

प्रीतम तो हिय में बसे, सब ढूँढें जग माँहि!!

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May 16, 2021

मछलियाँ और मछुआरे!

कविता 15-05-2021

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मज़हब तो चारा है,

सियासत है बंसी,

जनता तो मछली है, 

तिजारत है काँटा!

ताजि़रात तो तरीका है,

मार्शीयत है मशीन, 

मरकरी से मार्स तक,

मार्केट से मार्शल तक,

आदमी दर आदमी, 

मारने का औजा़र!

किन्तु अब बदल गए,

शिकार के तरीके, 

अब बिछाते हैं जाल,

एक हिस्से को घेरकर, 

घेरते हैं बाक़ी हिस्से, 

और घिर जाती हैं,

जब मछलियाँ,

समेटते हैं जाल,

हर तरफ से!

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शब्द-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, युद्ध-शास्त्र, ज्योतिष-शास्त्र,

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