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May 02, 2024

यह कुछ अलग है!

दो ब्लॉग संवाद-मंच 

Two Blog Platforms.

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वर्ष 2009 में किसी दिन "आरम्भ" शीर्षक से पहला पोस्ट इस ब्लॉग मंच / Blog-platform पर लिखा था। अब तक 6000 से अधिक पोस्ट्स प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें से 5000 पोस्ट्स e-blogger  में और 1000 से अधिक वर्डप्रेस  WordPress में हैं। pageviews भी कुल करीब 700000 से अधिक हैं (जैसा इनके द्वारा सूचित किया जाता है।)

अपने अनुभव से यह प्रतीत होता है - वर्डप्रेस पर दूसरी कोई लिंक आसानी से शेयर की जा सकती है, लेकिन वहीं e-blogger पर किसी कारण से ऐसा संभव नहीं हो पाता है। इस तरह यह वन-वे-ट्रैफिक जैसा है!

ट्विटर (जिसे अब X कहा जाता है) पर शायद आसानी से कुछ भी शेयर किया जा सकता है, लेकिन फेसबुक पर ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है। इन तीनों संवाद-मंचों की कम्यूनिटी पॉलिसी गाइडलाइंस क्या हैं यह समझ पाना तो मेरे लिए और भी कठिन है । इसी तरह से कू / Koo  पर भी कुछ समस्याएँ हैं।

टेलिग्राम, सिग्नल आदि का नाम ही सुना है, आवश्यकता कभी नहीं पड़ी।

इनकी तुलना "वॉट्स ऐप" से करें तो 

"बड़े भाई सो बड़े भाई, छोटे भाई तो सुभानल्ला" याद आता है। पता नहीं कितने लोग क्या क्या शेयर करते हैं, जिसकी जरूरत और मतलब तक समझने के लिए सिर खुजलाना पड़ता है! 

इसलिए इंटरनेट का उपयोग न्यूनतम आवश्यकताओं को पूर्ण करने तक ही सीमित हो गया है।

और इसीलिए शीर्षक में ही लिख दिया --

"यह कुछ अलग है!"

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March 28, 2023

पातञ्जल योगसूत्र

मेरा स्वाध्याय ब्लॉग 

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मेरे इस ब्लॉग का अवलोकन अभी तक कुल 108000 बार से अधिक हुआ है, जबकि यह मेरा सर्वप्रथम ब्लॉग था। इसके बाद मेरे स्वाध्याय और दूसरे ब्लॉग जैसे गीता और श्री रमण महर्षि के बारे में,  तथा मेरा  vinaykvaidya  ब्लॉग भी हैं, किन्तु स्वाध्याय ब्लॉग का अवलोकन सर्वाधिक लगभग 338000 बार हुआ है। इसी स्वाध्याय ब्लॉग में कुछ समय पूर्व पातञ्जल योग सूत्र पर अंग्रेजी भाषा में कुछ पोस्ट्स क्रमबद्ध लिखना प्रारंभ किया था, जो कि आज पूर्ण हो गया। जानकारी के लिए यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ। मेरे प्रोफ़ाइल पर मेरे सभी ब्लॉग्स की लिंक देख सकते हैं। 

 @ swaadhyaaya.blogspot.com 

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December 22, 2019

आरंभ / आरम्भ

20 जनवरी 2009 
के दिन यह ब्लॉग आरम्भ किया था।
इसे आरंभ करते समय कल्पना नहीं थी कि दस वर्षों से अधिक तक यह क्रम चलता रहेगा।
आभार गूगल का !
नेट मेरे लिए कोई व्यावसायिक आवश्यकता नहीं है, इसलिए तब थोड़ी कोफ़्त होती है जब पूरे नेट को शुद्धतः व्यवसायपरक होता हुआ देखता हूँ। इस पूरे दशक में फेसबुक और ट्विटर पर भी कुछ वर्षों तक अभिव्यक्ति देता रहा। राजनीति, कला, धर्म, संस्कृति, सभ्यता, साहित्य को इस हद तक व्यवसायपरक और व्यवसाय-केंद्रित बना दिया गया है कि जो व्यक्ति केवल सृजनात्मक स्फूर्ति से प्रेरित होने से कुछ रचता है, अगर वह साधनहीन हो; -जिसकी रुचि पैसे कमाने के लिए ज़रा भी न हो तो इस धन-केन्द्रित सभ्यता, समाज, संस्कृति, व्यवस्था में उसके लिए सूचना के स्रोतों तक पहुँचना भी कठिन हो जाता है।
मुझे कभी कहीं से सहायता मिली तो ऐसे लोगों से जिनके बारे में मुझे कुछ पता तक नहीं था।
इसलिए बिना किसी स्वार्थ के नेट पर कार्य करते रह पाना संभव हो सका।
दूसरी ओर साधन-संपन्न वर्ग के वे लोग हैं चाहे राजनीति, फिल्मोद्योग, साहित्य आदि से जुड़े हों, या किसी सामाजिक सरोकार से, जिनके अनेक महान लक्ष्य, महत्वाकाँक्षाएँ, ध्येय, उद्देश्य होते हैं।
उनसे न तो मेरी स्पर्धा है न उनके बारे में मेरी कोई राय है।
बस इतना ज़रूर लगता है कि लिखता रहूँ, चाहे कोई इसे पढ़े या न पढ़े।
जो इसे पसंद न करेगा, उससे ऐसा आग्रह या अपेक्षा भी नहीं है।
शायद और कुछ समय (जब तक सुविधा है!) ब्लॉग लिखे जा सकते हैं !
मेरे अन्य एक ब्लॉग 'स्वाध्याय' की पाठक-संख्या वैसे तो बढ़ती जा रही है किन्तु मैं नहीं जानता कि वह कब तक रहेगा। क्योंकि लिखने के प्रति उत्साह धीरे धीरे कम होता जा रहा है।   
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November 05, 2018

पूर्वावलोकन / In Retrospect ...

आरंभ से अब तक / इतिहास
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दिनांक २०/०१/२००९ को प्रथम ब्लॉग में पहला पोस्ट 'आरंभ' लिखा था।
लगभग १० वर्ष पूरे हो रहे हैं।
इस बीच नेट पर ट्विटर और फेसबुक पर भी बहुत सक्रिय रहा।
वह भी कुछ मित्रों / परिचितों के आग्रह पर। 
लेकिन अब कुछ समय पूर्व से इन दोनों से विदा ले चुका हूँ।  
ब्लॉग लिखने का एकमात्र ध्येय यह था कि अपनी खुशी के लिए कुछ लिखूँ।
इसका उद्देश्य किसी से जुड़ना या अपने को किसी प्रकार से स्थापित करना तो कदापि नहीं था। 
और बिज़नेस या पैसा / यश कमाना तो कल्पना तक में नहीं था, -न है। 
सिद्धांततः और दूसरे कारणों से भी न तो मेरी आजीविका का कोई स्थिर और सुनिश्चित साधन है, न मैं इस बारे में कभी सोचता हूँ।  इसलिए भी कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि यह ब्लॉग-उपक्रम कैसे अब तक चल सका।
इसके लिए अवश्य ही Google का आभार !
इस बहाने मुझे लिखने, और प्रस्तुत करने के लिए बहुत से विषयों का अध्ययन करने का अवसर मिला।
यहाँ तक तो ठीक है पर इस दौरान लगता रहा यह जो 'है', क्या वस्तुतः है ?
क्या यह हमेशा रहेगा? रह सकता है?
इसलिए यह बोध भी हमेशा बना रहता है कि यह जो 'है' जैसा लगता है, यह वस्तुतः 'है नहीं' , बस लगता भर 'है', कि यह 'है'  .....
इस बीच swaadhyaaya नामक नया ब्लॉग शुरू किया जिसके व्यूअर्स तीन साल में ही इस 'हिंदी-का-ब्लॉग' के ९ वर्षों में कुल हुए व्यूअर्स से दुगुने हो गए !
ख़ास बात यह कि व्यूअर्स कितने हैं इससे मेरा लिखना अप्रभावित रहा।
 रूचि हो तो मेरे अन्य ब्लॉग देखने के लिए मेरी 'प्रोफाइल' देख सकते हैं।  
सादर !
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