अदृश्य दीवारें
जानने और पता लगाने की मेरी प्रवृत्ति ने विज्ञान और गणित की ओर मेरा ध्यान खींचा, उसी से प्रेरित होकर मेरा ध्यान धर्म और अध्यात्म की तरफ आकर्षित हुआ। न जाने क्या बात थी कि संस्कृत के ग्रन्थ, स्तोत्र, श्लोक आदि मुझे रोमांचित कर देते थे। वैसे यह मेरा अनुमान है और एक शब्द में कहें तो मेरे "संस्कार" ही संभवतः मुझे उस दिशा में आगे ले जा रहे थे। सब कुछ जैसे पहले से लिखी स्क्रिप्ट के अनुसार घटित हो रहा था और जीवन में अनेक ऐसे अच्छे और बुरे अवसर भी आते जाते रहे जब शायद मेरी मृत्यु भी हो सकती थी। ऐसा शायद हर किसी के साथ होता है। संस्कृत भाषा के प्रति मेरा प्रबल अनुराग और आकर्षण क्यों है, यह मैं कभी नहीं समझ पाया। और मुझे याद है कि बिलकुल बचपन से ही जब मेरा यज्ञोपवीत हुआ था और पिताजी ने कुछ दिनों तक मेरे साथ गायत्री संध्या करते हुए मुझे मंत्रोच्चारण करना सिखाया था। एक मंत्र अब भी स्मृति में है -
महे रणाय चक्षसे...
बहुत बाद में जब 2016 में केवटग्राम में ऋग्वेद का पाठ कर रहा था तब यह मंत्र दृष्टिगोचर हुआ। तब मेंने इसका सरल अर्थ किया - (हे इन्द्र!) तुम महान युद्घक्षेत्र में रण करने के लिए तेजस्वी हो।
जब बचपन में संध्योपासना करता था तब चौथी कक्षा की परीक्षा पास की थी - वर्ष था 1963, तब मेरी आयु साढ़े नौ वर्ष थी। जिस समय मेरी जन्म पत्रिका में चन्द्र की महादशा समाप्त हो रही थी और मंगल की महादशा शुरू होने जा रही थी। अवश्य ही इस महादशा परिवर्तन के साथ मेरे जीवन में बहुत उतार चढ़ाव आने लगे थे। दो साल गाँव के स्कूल में अध्ययन किया, फिर शहर के एक स्कूल में दो साल और फिर एक कस्बे के स्कूल में तीन साल। सभी सरकारी स्कूल थे। तब तक मेरी स्कूल की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और फिर शहर के एक सरकारी कॉलेज में तीन साल तक ग्रैजुएशन की शिक्षा, जिसमें पहला साल रिपीट किया। फिर दूसरे और भी बड़े शहर में ग्रैजुएशन का तीसरा साल। फिर एक साल तक पढ़ने लिखने की छुट्टी। फिर दो साल पोस्ट ग्रैजुएशन। इसके बाद फिर बारह साल जॉब करने के बाद घर के कर्तव्यों से मुक्त होकर बारह साल अंग्रेजी
"I AM THAT"
पुस्तक का अध्ययन और हिन्दी में उसके अनुवाद का कार्य करने में बीत गए। वर्ष 2001 में उक्त पुस्तक
"अहं ब्रह्मास्मि"
शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद 2001-2002 में श्री जे.कृष्णमूर्ति के मूलतः अंग्रेजी में दिए गए -
J.Krishnamurti :Talks With Students
का मेरे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद :
छात्रों से वार्तालाप - वाराणसी 1954
राजपाल ऐंड सन्स से प्रकाशित हुआ।
उपरोक्त पुस्तक का अनुवाद करते समय इस ओर ध्यान गया कि इसमें भी श्रीमदभगवद्गीता की तरह 18 अध्याय हैं, जिनमें से प्रथम तीन प्रधान विषय से संबंधित हैं और अंतिम तीन उपसंहार की तरह!
श्रीमद्भगवद्गीता में भी अंतिम तीन अध्यायों को ग्रन्थ के उपसंहार की तरह देखना जा सकता है।
बचपन के वैदिक गायत्री संध्या से लेकर वर्ष 2016 के ऋग्वेद के पाठ और भिन्न भिन्न समय पर संस्कृत के मूल ग्रन्थों का पाठ करते हुए मैंने कभी किसी दूसरी भाषा में उनके अनुवाद और अर्थ जानने का प्रयास नहीं किया, यहाँ तक कि वाल्मीकि रामायण और स्कन्द पुराण का पाठ / अध्ययन भी मैंने इसी तरह से किया।
वाल्मीकि रामायण और स्कन्द पुराण का पाठ / अध्ययन करते समय संस्कृत व्याकरण और शब्दकोष का उपयोग कभी कभी संशय होने पर करता था।
उपरोक्त जानकारी देने का उद्देश्य यह कि मुझे अनुभव हुआ कि किसी भी ग्रन्थ का केवल मूलपाठ करना ही उसका तात्पर्य ग्रहण करने के लिए पर्याप्त है और किसी दूसरी भाषा में उसके अर्थ को समझने का प्रयास व्यर्थ का एक ऐसा कार्य है जो बुद्धि से बुद्धि में होनेवाली एक अंतहीन यात्रा ही होता है। तात्पर्य यह कि संस्कृत के समस्त शास्त्र ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका ज्ञान अदृश्य दीवारों के पीछे छुपा हुआ दो तालों में बंद है और उस पर विडम्बना यह भी कि ये दोनों ताले भी उन दीवारों की तरह अदृश्य ही हैं। पहला ताला तो संस्कृत भाषा ही है। दूसरा ताला है संस्कृत भाषा में लिखी गई रचना का आभासी अर्थ, जो पुनः और भी अधिक भ्रमित कर सकता है। इसके सबसे अच्छे उदाहरण पर मेरा ध्यान श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ / अध्ययन करते समय गया। इन उदाहरणों पर मैंने अपने पोस्ट्स में लिखा भी है। केवल एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है -
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मादि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।
यहाँ इस उदाहरण में "वेद" क्रिया-पद "अहं" सर्वनाम के सन्दर्भ में उत्तम पुरुष एकवचन / अन्य पुरुष एकवचन के रूप में द्रष्टव्य है। यहाँ "वेद" लट् लकार के साथ लिट् लकार में भी प्रयुक्त है। इसी तरह से "अहं" सर्वनाम भी उत्तम पुरुष एकवचन के साथ अन्य पुरुष एकवचन की तरह प्रयुक्त किया गया है। सामान्य और आभासी अर्थ यह कि भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं के लिए व्यक्ति-विशेष पद "मैं" का प्रयोग कर रहे हैं, जबकि प्रच्छन्न अर्थ यह भी है कि वे इस पद का प्रयोग "आत्मा" के अर्थ में कर रहे हैं। पूरी भगवद्गीता को मैंने जब भगवान् श्री रमण महर्षि की शिक्षाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास किया तब कहीं मेरा ध्यान इस दूसरे अदृश्य ताले पर गया। यहाँ एक बड़ी कठिनाई यह भी है कि गीता में जहाँ जहाँ "अहं" पद का प्रयोग है, वहाँ वहाँ इसका अर्थ "श्रीकृष्ण" या "ईश्वर" के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है, यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि साँख्य दर्शन में "ईश्वर" नितान्त अप्रासंगिक है। योग दर्शन में अवश्य ही समाधिपाद सूत्र २३, २४ में "ईश्वर" पद को औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है -
ईश्वरप्रणिधानाद्वा (समाधिः) ।।
- २३
और,
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।।
- २४
इसलिए संस्कृत और वैदिक, औपनिषदिक, पौराणिक, स्मृति, इतिहास (रामायण और महाभारत) आदि ग्रन्थों में एकेश्वरवाद या अनेकदेववाद आदि का उल्लेख तक नहीं पाया जाता। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि ये ग्रन्थ नास्तिकवादी या अनीश्वरवादी हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपनिषद् जिसका नाम ही ईशावास्योपनिषद् है, ऐसी ही एक दिव्य सत्ता की मान्यता पर आधारित है। संस्कृत के भिन्न भिन्न धार्मिक आध्यात्मिक ग्रन्थ साँख्य दर्शन और योग दर्शन पर आधारित हैं और सभी विभिन्न मनुष्यों की पात्रता के अनुसार उन सभी की अपनी भिन्न भिन्न प्रतीत होनेवाली साधना-प्रणालियाँ हैं। इसलिए उसमें परस्पर विरोध या विरोधाभास तक नहीं है। वे "क्या ईश्वर है या नहीं है?" जैसे भ्रामक प्रश्नों के अनौचित्य को समझते हैं और वह एक है या अन्य, साकार है या निराकार, जैसे सतही बौद्धिक विचारों की निरर्थकता भी समझते हैं। वे इन सतही प्रश्नों के उत्तर खोजने से पहले -
"ईश्वर क्या है?"
इसे जानना और समझना चाहते हैं और वे उसके लिए ही प्रयास भी करते हैं।
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