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May 24, 2022

विकल्प मार्ग

परोक्ष और अपरोक्ष

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अत्यन्त मेधावी के लिए भी आत्म-साक्षात्कार कर पाना कठिन होता है, और साधारण जिज्ञासु के लिए तो और भी दुर्लभ !  और जैसा कि इस उपनिषद् के दूसरे अध्याय की प्रथमा वल्ली में कहा भी गया है :

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभू-

स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-

दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।।

'स्वयंभू' - इस शब्द के अनेक अर्थ ग्रहण किए जा सकते हैं : इसे प्रसंग-विशेष के अनुसार बुद्धि, मन, प्रकृति, पुरुष, महत्, अहम्, काल, चेतना, काल, अहंवृत्ति आदि के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि ये सभी तत्त्व अनादि होने से और इनके उद्गम / स्रोत का अनुमान कर पाना कठिन होने से इन्हें स्वयं-भू कहा जाता है। यहाँ स्वयं-भू का तात्पर्य इनमें से कुछ भी हो सकता है और उस स्वयंभू से ही भूः, भुवः तथा स्वः आदि तीनों लोकों का उद्भव होने से यह कहना उचित होगा, कि जिस किसी भी स्रोत से मनुष्य का उद्भव हुआ हो, भू - पृथ्वी, भुवः - जीवन, और स्वः - अपने होने का सहज भान, होने के बाद ही उस स्वयं-भू सत्ता ने इन्द्रियों को बाह्य जगत् की दिशा में प्रवृत्त कर दिया, और इसी के फल-स्वरूप मनुष्य केवल बाहर के जगत् के ही विषय में जान पाता है। किन्तु किसी किसी जिज्ञासु धीर पुरुष में आत्मा के तत्त्व को जानने की इच्छा जागृत होने पर वह उस प्रत्यगात्मा को जानने की इस प्रबल उत्कंठा से प्रेरित हो जाता है और उसका ध्यान उस पर दृढ हो जाता है।

चूँकि माण्डूक्य उपनिषद् के अनुसार वह गूढ आत्मा --

न अन्तःप्रज्ञ, न बहिष्प्रज्ञ, न उभयतःप्रज्ञ, न प्रज्ञानघन, न प्रज्ञ, न अप्रज्ञ। अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य और अव्यपदेश्य, एक-आत्मप्रत्ययसार और प्रपञ्च का उप-शमन हो जाने पर जिसे जाना जाता है, - जिसे शान्त, शिव, अद्वैत, चतुर्थ माना जाता है, वही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है, 

और उसे ही जान लिया जाना चाहिए।

अव्यपदेश्यम्  ---- That could not be pointed out (as an object).

इसीलिए साधारण जिज्ञासु के लिए यह निर्देश दिया जाता है कि वह उस आत्मा को जानने के लिए प्रारंभ में प्रणव अर्थात् ॐ - इस पद का आलम्बन लेकर अभ्यास करे। 

पातञ्जल योगसूत्र, समाधिपाद के अनुसार :

तस्य वाचकः प्रणवः।।२७।।

तज्जपस्तदर्थभावनम्।।२८।।

इस प्रकार  ॐ पद श्रेष्ठ आलम्बन है, यही परम ब्रह्म है, और इस एक अक्षर को जानकर मनुष्य जो कुछ भी प्राप्त करना चाहता है, वह वही हो जाता है। उसे ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।

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