Showing posts with label मौन. Show all posts
Showing posts with label मौन. Show all posts

July 28, 2022

वह, जो बाहर है!

कविता : 27-07-2022

--------------©---------------

वह जो यहाँ है, वही वहाँ है, 

यहाँ और वहाँ के बीच का फ़ासला, 

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो भीतर है, वही बाहर है,

वह जो बाहर है, वही भीतर है।

भीतर और बाहर के बीच का फ़ासला,

चाहे जितना भी कम या ज़्यादा हो!

वह जो बाहर है, वही भीतर है,

वह जो भीतर है, वही बाहर है।

कोई किसी को बदल नहीं सकता!

बाहर बिम्ब है, भीतर प्रतिबिम्ब है,

बाहर प्रतिबिम्ब है, भीतर बिम्ब है।

भीतर बिम्ब है, बाहर प्रतिबिम्ब है, 

भीतर प्रतिबिम्ब है, बाहर बिम्ब है।

बाहर, जो भीतर प्रतिबिम्बित है, 

भीतर, जो बाहर प्रतिबिम्बित है।

एक चुम्बित है, एक प्रति-चुम्बित है!

एक स्तंभित है, एक प्रति-स्तंभित है! 

एक अवलंबन है, एक अवलंबित है!

कौन क्या है!, क्या कौन है!

क्या कौन है?, कौन क्या है?

शब्द मौन है,  मौन शब्द है,

स्तब्ध निःस्तब्ध है, निःस्तब्ध स्तब्ध है!!

***

 




May 17, 2022

संगीत की दुनिया

कविता / 17-05-2022

---------------©-------------

इतना सन्नाटा क्यों है? 

मौन गाता क्यों है? 

शब्द नीरव हैं क्यों?

स्वर सजाता क्यों है? 

कभी उदासी, कभी खुशी,

कभी रोना, कभी हँसी, 

कभी उल्लास या आक्रोश,

भाव ऐसे, जगाता क्यों है?

कभी हँसता, या कचोटता, 

कभी चुभता, या सहलाता,

कभी बहकाता, भरमाता,

उभरकर, खो जाता क्यों है?

मौन खिलखिलाता क्यों है? 

इतना सन्नाटा क्यों है?

***



March 09, 2021

हाय रे! सोच के दायरे!

आज की कविता 

--

"सोचता है कौन?" - यूँ भी क्या सोचा कभी! 

"सोचता है मौन, क्या?" -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

'सोच' खुद ही सोचता है,  जाल बुनता और बनता है,

कारागार खुद ही खुद के लिए अपना खुद का बनता है।

अपने बनाए कारागृह में  खुद ही रहता है, 

नित ही धरकर नए रूप, ढलता बदलता है। 

कौन उसको समझाए,  -यूँ भी क्या सोचा कभी!

"सोचता है मौन, क्या?" -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

"सोचता हूँ", -सोचना यह, नहीं है क्या कोरा वहम? 

'सोच' है, पर क्या हैं कोई, 'सोचनेवाले' 'मैं' या हम? 

यह वहम, बुनियाद भी तो नींव बिलकुल खोखली, 

'सोच' में ढल, 'सोच' सी बन, 'ठोस' लगती है भली!

है 'किसे' पर यह वहम,  -यूँ भी क्या सोचा कभी!

सोचता है मौन 'क्या',  -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

दीए तले, नीचे अन्धेरा, थरथराना लौ के साथ,

ढूँढता है चैन, व्याकुल, पर न आए, उसके हाथ!

देखता है रौशनी, हर तरफ बिखरी हुई, 

पर न पाए देख लौ जो, जल रही निखरी हुई!

देख भी पाएगा, लेकिन, -यूँ भी क्या सोचा कभी!

दीप है क्या सोचता, -यूँ भी क्या सोचा कभी! 

'सोच' की अपनी रिहाई, कैसे खुद की कैद से! 

उसके बनाए, जिसमें कैदी, उसके ही संसार से!

उम्र-कैद ऐसी कि जिससे, मरने से ही होगी रिहाई,

मृत्यु क्या वह मुक्ति है, किसने कब ऐसी मुक्ति पाई!

मुक्त है क्या, सोचता, -यूँ भी क्या सोचा कभी!

सोचती है, मुक्ति क्या,  -यूँ भी क्या सोचा कभी? 

--