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January 02, 2015

आज की कविता : 'सर्व'






















आज की कविता :
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'सर्व' है अप्रत्याशित,
'सर्व' था अप्रत्याशित,
'सर्व' होगा अप्रत्याशित,
'सर्वथा' अप्रत्याशित !
'सर्व' तो समग्र है,
जिसमें समाहित है,
'विपरीत' भी,
फिर भी निर्द्वंद्व है,
सर्वतः, सर्वदा, सदा,
अनपेक्षित, अनुपेक्षित,
सर्वथा !

--
© विनय वैद्य, उज्जैन,

October 19, 2009

नियति (कविता) .


नियति
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हाँ,
मानता हूँ,
एक अनगढ़ पत्थर ही तो हूँ मैं ,
चाहो तो उछालो मुझको,
और पत्थर ही समझकर देवता की तरह पूजो मुझको,
बहस करो दोस्तों दुश्मनों से,
कि मैं पत्थर हूँ या कि हूँ देवता कोई !
और यदि सोचते हो कि मैं रास्ते की बाधा हूँ,
तो मुझसे बचकर के तुम निकल जाओ ।
मैं तो पत्थर ही हूँ,
एक अनगढ़ सा पत्थर !
सोचता हूँ कभी कोई पानी की लहर आयेगी,
धीरे-धीरे ही सही, गहरे पानी में ले जायेगी,
किसी नदी के आँचल में सरक जाऊंगा,
धीरे-धीरे ही सही, घिस-घिसकर
किसी न किसी दिन मैं,
गोल, चमकदार हो जाऊंगा,
खेलता पड़ा रहूँगा पानी में,
जब तक कि किसी दिन,
कोई आकर मुझे उबार न ले,
और फ़िर मुझको शिव शंकर समझकर,
मेरे बहाने सी वह भी,
ख़ुद ही ख़ुद से भी न उबर जाए,
पर अगर यह नहीं नियति मेरी,
तो शायद तुम ही कभी उठा लोगे मुझे,
प्यार से या कि फ़िर जबरदस्ती,
लेके छैनी-हथौड़ी हाथों में ,
मुझपे तुम ज़ोर आज़माओगे ।
मैं भी डरता हूँ सोचकर कि कहीं,
कि उछलकर उड़ती हुई कोई किरच,
तुम्हें लहू-लुहान ना कर दे,
और तुम्हारे साथ साथ मुझको भी,
कहीं बदनाम नहीं कर दे,
इसलिए बेहतर है -,
छोड़ दो मुझको तुम,
मेरी अपनी ही खुशनसीबी पे,
मेरे अपने ही हाल पर,
जो भी जैसा भी हूँ, -मैं ।

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