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February 14, 2023

बॉउंड्री वॉल!

विकास की क़ीमत!

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पिछले तीन वर्षों से भी पहले से इस स्थान पर रहने लगा हूँ।प्रकृति के सान्निध्य में। हाइवे से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव में।

हाइवे से गाँव तक जाने के दो रास्ते हैं। गाँव को बॉउंड्री वॉल से घेर कर वाल के किनारे से होकर दोनों रास्ते जाते हैं। जब तक आप गाँव में नहीं पहुँचते, आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि इस वॉल से बाहर कोई गाँव बसा होगा। वैसे गाँव स्वच्छ, और साफ-सुथरा है और आदर्श ग्राम की श्रेणी में शामिल है, पर जो दोनों रास्ते गाँव तक जाते हैं उनके बीच की विस्तृत भूमि पर दो तीन बड़े बड़े होटलों के बीच बिल्डर्स ने एक बड़े क्षेत्र पर अपना दफ्तर खोल रखा है, जिसके पास सुन्दर शिव मन्दिर है। मन्दिर तो छोटा ही है, किन्तु उसके आसपास की जगह काफी फैली हुई है, जिस पर सुरुचिपूर्ण तरीके से पेड़-पौधै लगाकर गॉर्डन या पार्क जैसा कुछ विकसित किया गया है। पार्क और बाउंड्री वॉल के बीच से होकर गाँव तक जानेवाले रास्ते पर एक बड़ी कॉलोनी निर्मित की गई है। बड़े बड़े प्लॉट्स पर उतने ही काफी बड़े आवास भी बने हैं, जिनके आसपास भी बगीचे बनाने के लिए काफी जगह है। ऐसी ही एक कॉटेज के पास स्विमिंग पूल भी है। 

किन्तु इन तीन वर्षों में कोरोना के आने से पूरा क्षेत्र उजाड़ और वीरान हो चुका है। अनेक जर्जर हो रहे भवनों की कम्पाउन्ड-वॉल पर लगे लोहे के गेट भी देखरेख के अभाव में या तो टूट चुके हैं, या फिर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के द्वारा उखाड़ और तोड़ कर चोरी कर लिए गए हैं।

ऐसी ही एक कम्पाउन्ड-वॉल के भीतर एक सुन्दर सा ऊँचा वृक्ष है और बाहर भी ठीक उसके सामने ही एक और ऐसा ही वृक्ष सड़क किनारे पर है। बाहर का वृक्ष भी यद्यपि सुन्दर था, किन्तु रास्ते पर होने से उसे काट दिया गया। अब वह वृक्ष एक ठूँठ ही बनकर रह गया है, जिस पर एक खोखला सा प्रवेश-द्वार दिखाई देता है!

कोरोना-काल की समाप्ति पर अब उस क्षेत्र में फिर से धीरे धीरे सब कुछ व्यवस्थित किया जाने लगा है।

जो उजड़े जो उखड़े,

सो उखड़े, सो उजड़े! 

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March 20, 2022

सब कुछ विचार है!

कविता / 20-03-2022

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हाँ, सब कुछ यूँ तो विचार ही है, 

किन्तु विचार सब कुछ तो नहीं है!

विचार आता है, चला भी जाता है,

विचार जिसमें आता-जाता है,

क्या वो भी आता-जाता है?

अगर वो भी आता-जाता हो तो,

फिर जिसे पता है, -वह क्या है?

ये पता होना, और इसका भी पता नहीं होना,

और इस पता न होने, का भी पता नहीं होना, 

इस पता होने, और पता न होने, के बीच,

उठता और उभरता है कोई विचार,

जो कभी पुराना या नया नहीं होता,

जो एक या अनेक भी नहीं होता है,

फिर भी हर टुकड़ा एक होता है!

और छा जाता है, -अन्धेरे की तरह,

उमड़ता-घुमड़ता रहता है, -अपने ही में,

और बरसता है बरसात के बादल की तरह। 

खुद ही से उपजता है, खुद ही उपजाता है,

खुद से खुद उसका, क्या अजीब नाता है! 

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November 16, 2014

आज की कविता / संध्या के क्षण

आज की कविता / संध्या के क्षण
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गूँजती हैं घन्टियाँ
मन के कानोँ से सुनूँ,
बज रही हो कहीं जैसे
कृष्ण की व्रजवेणु ।
स्वप्न जैसा मधुर कोई
खुले नयनों से देखूँ,
राधा के चरण छूती
कालिन्दी रजरेणु ।
संध्या की इस वेला में
दिन प्रतिदिन यही लगता,
लौटते जब गौधूलि में
गोपाल गोविन्द धेनु ।।
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September 20, 2014

~~ कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 27 ~~

~~ कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 27 ~~
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1977 में विक्रम विश्वविद्यालय से गणित में M. Sc. करने के बाद रिसर्च करने की तीव्र अभिलाषा थी। किन्तु नौकरी करना अधिक जरूरी था। बहरहाल गणित में दिलचस्पी बनी रही।  संस्कृत और गणित दोनों अस्तित्व की अपनी भाषा है।  गीता पढ़ते हुए अध्याय 8 के प्रथम श्लोक पर आधुनिक गणित की धारा में कुछ कौंधा और प्रभु की कृपा से उसे व्यक्त भी कर पाया।  सोचा उसे इस ब्लॉग के पढ़नेवालों को भी अर्पित कर दूँ !

 

February 14, 2013

तब्दीली (पैंटिंग/कविता)

~~~~ तब्दीली ~~~~~
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हालाँकि यह रचना ख़ास तो नहीं है, लेकिन मित्रों के अनुरोध पर प्रस्तुत कर रहा हूँ .  
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