September 30, 2021

उलझे हुए प्रश्न / संविधान

भारतवर्ष का संविधान :

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"पता नहीं है।" -- इसका भी पता न होना! 

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भारत के संविधान के निर्माताओं का द्वन्द्व (या अन्तर्द्वन्द्व) यह था कि धर्म के प्रश्न का समाधान कैसे करें । भारत का हिन्दू-मुस्लिम आधारित विभाजन स्वीकार करना ही मूलतः वह भयंकर भूल थी, जिसके कारण पाकिस्तान नामक देश उन मुस्लिमों के लिए अस्तित्व में आया, जो भारत से अलग एक स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र के हामी थे। 

उनका ध्येय स्पष्ट था : इस्लाम की बुनियाद पर अपने लिए एक राष्ट्र की स्थापना करना। इस्लाम के मूल सिद्धान्तों में कहीं कोई अनिश्चय और अस्पष्टता नहीं है, इसलिए पाकिस्तान नामक देश बनने के बाद यद्यपि वहाँ अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु विभिन्न गुटों में सत्ता-संघर्ष होता रहा, लेकिन भारत-विरोध के उद्देश्य को लेकर सब सहमत थे।

इन गुटों में इस्लाम के आधार पर भी सिद्धान्ततः यद्यपि सहमति थी, किन्तु उनकी भाषाएँ और सांस्कृतिक प्रेरणाएँ एक दूसरे से बहुत अधिक भिन्न थीं, अतः उनकी आपसी टकराहट के कारण उनके बीच का वैमनस्य, विद्वेष, परस्पर संदेह और अविश्वास भी क्रमशः बढ़ता ही चला गया। इस सबकी अंतिम परिणति के रूप में ही तब का पूर्व पाकिस्तान, पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र होकर बांग्लादेश के रूप में विश्व-पटल पर उभरा।

इस प्रकार मोहम्मद अली जिन्ना का दो राष्ट्रों का सिद्धान्त वैसे तो वास्तविकता की कठोर भूमि पर गिरकर तो असफल सिद्ध होता दिखाई पड़ा, परन्तु इससे इस्लाम के बुनियादी सिद्धान्तों में द्विराष्ट्र की जो अवधारणा है, उस पर कोई आँच तक नहीं आई, और आज भी संसार के सभी मुसलमान उससे प्रेरित होकर उसे ही परम आदर्श की तरह ग्रहण करते हुए अपना सर्वसम्मत लक्ष्य मानते हैं। और चूँकि इसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता इसलिए इसके बारे में सीधे तौर पर, या अप्रत्यक्षतः क्या किया जाना चाहिए ऐसे किसी प्रश्न पर भी किसी का ध्यान भी नहीं जाता। 

भारत में भी इसी तरह, हमारे देश के कर्णधारों तथा संविधान के निर्माताओं को भी उपरोक्त तथ्य का पता होना तो बहुत दूर, इस बारे में कोई कल्पना तक नहीं थी, इसलिए उन्होंने पाकिस्तान में विलय न चाहनेवाली रियासतों को मिलाकर भारत नामक एक देश की कल्पना की, जिसे सभी भारतवासी, भले ही रहन-सहन, जीवन-शैली, 'धर्म', एवं पूजा एवं उपासना की पद्धति, जीवन- शैली एक दूसरे से बहुत ही अलग अलग हो, -इसे अपना देश कहें और समझें ।

इसलिए भारत के संविधान में धर्म के बारे में कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया, और इस विषय में इतना ही मान लिया गया कि किसी भी धर्म और आस्था, विश्वास को माननेवालों के अधिकार समान होंगे। यह मूलतः सनातन भारतीय सर्वसमावेशी उदारता की ही मूल भावना से प्रेरित था, और इसमें किसी के प्रति विद्वेष के लिए कोई स्थान ही नहीं था, जबकि संसार के बहुत से देशों के संविधान में किसी विशेष एक रिलीजन को राज्य का प्रधान रिलीजन घोषित कर दिया गया। हाँ, कम्युनिस्ट देश इसका अपवाद कहे जा सकते हैं, किन्तु उनका रिलीजन अघोषित रूप से नास्तिकता के ही सिद्धान्त से प्रेरित था यह कहना अनुचित नहीं होगा।

भारत के संविधान के निर्माताओं ने इस राष्ट्र को संप्रभु सार्वभौम प्रजातान्त्रिक गणतन्त्र घोषित किया। प्रारम्भ में इस प्रकार इसमें "सामाजिक तथा धर्मनिरपेक्ष" / socialist  and secular, ये दोनों शब्द अनुपस्थित थे। किन्तु वर्ष 1976 में इन दोनों शब्दों को बयालीसवाँ संवैधानिक संशोधन पारित कर संविधान की प्रस्तावना में बढ़ा / मढ़ दिया गया। 

भारत वैसे भी ज्ञात इतिहास में और उससे भी पहले से विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों / समूहों के राजकुलों का संयुक्त गणतंत्र रहा है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भी अनेक राज्य पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर रहे किन्तु ये सभी राजा किसी सार्वभौम सम्राट के ही अधीन होते थे और कोई भी राजा बलपूर्वक किसी अन्य राजा को युद्ध करने की चुनौती दे सकता था किन्तु प्रत्येक राजा का यह भी कर्तव्य होता था कि वह प्रजा का पालन न्यायपूर्वक करे और न्याय का तात्पर्य होता था धर्मशास्त्र के निर्देशों का पालन करते हुए। छल कपट से किसी राजा का राज्य छीन लेना अधर्म ही माना जाता था। न्याय षड्दर्शनों में से ही एक दर्शन है। 

दर्शन का अर्थ है vision / revelation, न कि philisophy.

इसी से प्रेरित होकर ग्रीक चिंतक प्लेटो ने  The Republic ग्रन्थ की रचना की जिसमें 'आदर्श राज्य' की परिकल्पना भी प्रस्तावित की गई थी। इसे ही 'यूटोपिया' कहा गया जो कि बाद में काव्य और कला (poetry and Art) और दर्शनशास्त्र / (philosophy) के सन्दर्भ में क्रमशः साहित्य, नाट्य, मूर्तिकला  तथा राजनीतिशास्त्र (political science) में विकसित हुआ। 

कहना न होगा कि स्वयं Plato ने भी इसे पूर्ववर्ती चिंतकों आदि से प्राप्त किया था। न्याय का भारतीय दर्शन तर्कशास्त्र (logics and reasoning) के माध्यम से वैचारिक आधार पर केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और तात्त्विक प्रश्नों की भी समीक्षा करता है । केवल राज्य और प्रजा के पारम्परिक, पारस्परिक संबंधों और व्यवस्था की ही नहीं। 

गण का अर्थ है, : प्रतिनिधि (representative, delegates). इसलिए जहाँ हमें भगवान शिव के गणों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिनके नायक गणेश हैं, वहीं विष्णु के पार्षदों का भी, और यमराज के दूत तो प्रसिद्ध हैं ही। 

इसी 'गण' शब्द से क्रमशः 'प्रगण' और 'अवगण' शब्दों का उद्भव हुआ, जो बाद में अपभ्रंश होने से क्रमशः पैगन (pagan) और  अफ़गान (Afghan) शब्द बने। इसी प्रकार संस्कृत भाषा का मूल शब्द 'पार्षद', फ़ारसी / पहलवी भाषा में 'फ़रिश्तः' बना। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी भाषा का Angel शब्द,  जो फ़ारसी के 'फ़रिश्तः' का ही पर्याय है, संस्कृत भाषा के शब्द  'अंगिरा' का अपभ्रंश है, और  Anglo-Saxon शब्द भी इसी प्रकार से 'अंगिरा-शैक्षं' का ही अपभ्रंश है। 

संक्षेप में अभिप्राय यह कि 'गणतंत्र' शब्द में वे सारे तत्व पहले से ही विद्यमान हैं जो कि समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष (socialistic-secular) के द्योतक हैं।

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खोज, गुरु की!

कविता : 30-09-2021

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कौन किसी का गुरु होता है, 

क्या तुम गुरु नहीं अपने? 

फिर क्यों खोज रहे हो गुरु को, 

क्यों देख रहे, गुरु के सपने!

जब तक खुद को ना समझोगे,

कैसे समझोगे गुरु है कौन, 

लेकिन जब खुद को समझोगे, 

तब तुम रह जाओगे मौन!

किन्तु तुम्हें तब होगा पता, 

तुम ही गुरु, तुम ही हो शिष्य, 

जब तुम खुद को जानोगे,

तुम वर्तमान, तुम ही भविष्य!

लेकिन तब तक तुम्हें जरूर, 

करना होगा बहुत प्रयास, 

यदि होगी तुममें उत्कण्ठा,

तो मिल जाएगा अनायास! 

तब तुम यह भी जानोगे,

गुरु नहीं होता कोई और,

आत्मा ही है परमात्मा, 

परमात्मा, गुरु का है ठौर!

गुरु न बनाओ कभी किसी को, 

गुरु न बनो तुम कभी किसी के,

खोजो गुरु को बस अपने भीतर,

शिष्य हो रहो, नित्य ही उसी के!

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कहीं भी नहीं!

कविता : 30-09-2021

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कहीं नहीं जाना है तुमको,

भविष्य, अतीत, नहीं होता,

सब कुछ तो बस, यहीं अभी है, 

दूर या पास नहीं होता!

कैसे जाओगे तुम अतीत में,

जो बीत गया, व्यतीत हुआ, 

केवल स्मृति में ही शेष रहा, 

स्मृति से मिटकर अतीत हुआ!

उस स्मृति की ही छाया है, 

जो होती है भविष्य, मन में,

वैसा समय कहाँ होता है,

सब कुछ है केवल इस पल में! 

यह पल जो कि, नहीं बीतता,

यह पल शाश्वत, निश्चल है,

ऐसा फिर कैसे हो सकता है,

कि निश्चल भी, पर चंचल है!

किन्तु कल्पना, है नित चंचल, 

स्मृति भी तो है ऐसी ही,

बुन लेते हैं ताना-बाना, 

जिसे कहें अतीत-भविष्य!

वह निरपेक्ष चेतना लेकिन,

नित्य अपरिवर्तित है निश्चल,

जिसमें ये दोनों बनते-मिटते,

अविकारी, जो सम-अविकल!

जैसे कल्पित भविष्य-अतीत, 

उस प्रकाश में छाया-धूप,

वैसा है मैं, मेरा जग भी, 

वैसा दोनों का रंग-रूप!

यह तन तो है, बस प्रकृति,

जैसा भी है, बस जग है, 

यह मन तो है केवल कर्म,

उन दोनों का यह रहस्य है।

यह तन जैसी भी प्रकृति है,

केवल वैसा भर होता है,

यह मन सतत कार्य करता है, 

यह निष्क्रिय कब होता है? 

विलक्षण किन्तु चेतना इनसे ,

होकर भी इनसे अभिन्न,

जग, तन, मन परस्पर भिन्न, 

चेतना निरन्तर, है अविच्छिन्न! 

तन, मन बनते-मिटते रहते, 

जग भी, आता जाता है, 

किन्तु चेतना, जिसमें ये हैं, 

उसका इनसे क्या नाता है?

क्या उसको जानेगा कोई,

जो न कभी बनता-मिटता,

लेकिन जिसके होने से ही, 

स्मृति से कल्पित समय उगता!

चिन्तन है, तो चिन्ता है, 

चिन्ता है, तो आशा है,

आशा है तो, निराशा भी, 

चिन्तन का यही तमाशा है!

तन की अपनी प्रकृति है,

मन का है अपना स्वभाव,

दोनों का स्वतंत्र जीवन, 

फिर कैसे हो उनमें निभाव!

यह केवल मुश्किल ही नहीं,

यह तो असंभव है नितान्त,

फिर कैसे मिट पाएगी दुविधा, 

कभी हृदय, क्या होगा शान्त! 

स्मृति, कल्पना, और समय की, 

चेतना ही तो है क्रीडा-स्थान,

जिसमें जग है प्रति-पल कल्पित,

तन-मन का आगमन-प्रस्थान!

पुनः पुनः वे जिसमें उठते, 

पुनः पुनः जिसमें खो जाते,

और जगत की, अपनी भी,

बस कोई भूमिका निभाते!

उसकी ही तो क्रीडा है, 

जिसे समझ ना पाने से ही, 

यह जीवन, जग भी पीड़ा है!

स्मृति, विचार या चिन्तन से,

इस पीड़ा को मत उलझाओ,

इस रहस्य पर ध्यान लगाकर, 

इस सवाल को तुम सुलझाओ! 

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टिप्पणी :

क्या सबसे पहले किसी बाह्य, दृश्य संसार पर ही तुम्हारा ध्यान नहीं आकर्षित होता!

फिर इसके बाद तुम्हारे संसार में तुम्हारा ध्यान क्या अपने आप पर भी पुनः पुनः नहीं आता रहता?

क्या तुम्हारा शरीर ही तुम्हारा ध्यान इस ओर आकर्षित नहीं करता कि तुम संसार में हो, न कि संसार तुममें!

क्या इस तरह से तुम अपने आपको संसार में, किन्तु फिर भी संसार से अलग एक व्यक्ति-विशेष नहीं मान लेते? 

क्या तुम्हारी इन्द्रियाँ ही तुम्हें तुम्हारे संसार का, और तुम्हारा ज्ञान नहीं देती हैं?

क्या तुम्हारा मन ही तुम्हें तुम्हारी इन्द्रियों के अस्तित्व का ज्ञान  नहीं देता? 

क्या तुम्हारा मन ही तुम्हें क्रम से जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं में बार बार नहीं ले जाता?

क्या तुम्हारी इन्द्रियों और मन से प्राप्त होनेवाले अनुभव ही तुम्हें सुख-दुःख आदि का ज्ञान नहीं कराते?

क्या तुम्हारी स्मृति ही तुम्हें तुम्हारे (!) मन के अस्तित्व का ज्ञान नहीं देती?

क्या तुम्हें तुम्हारी स्मृति के अस्तित्व का ज्ञान भी तुम्हारी बुद्धि से ही नहीं प्राप्त होता?

और क्या तुम्हारी बुद्धि का भान तुम्हें तुम्हारी चेतना से ही नहीं प्राप्त होता?

और पुनः, बुद्धि से चेतना को जाना जाता है या चेतना में ही बुद्धि को?

क्या यह चेतना ही तुम्हारी नित्य सनातन सत्ता और तुम्हारी  परम वास्तविकता ही नहीं है?

क्या यही चेतना, अनायास ही, भान के रूप में सदैव ही अपने आपकी अभिव्यक्ति और उद्घोष भी नहीं करती?

अपने इस अस्तित्व का यह सहज उद्घोष ही क्या तुम्हारा परम आत्यन्तिक, अन्तर्यामी गुरु नहीं है?

क्या उसे खोज लेना ही सर्वाधिक सरल और आवश्यक नहीं है! 

फिर किसी और गुरु को खोजने का प्रश्न ही कहाँ है?

इस प्रकार संसार, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, स्मृति, बुद्धि, और चेतना, क्या तुममें अवस्थित तुम्हारे गुरु नहीं हैं?

क्या वे तुमसे अर्थात् आत्मा से भिन्न और पृथक हैं? 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णू गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरू साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।। 

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September 28, 2021

संशय, भ्रम और मोह

ग्रीक दर्शन और भारतीय दर्शन

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किसी ग्रीक चिन्तक ने कहा था :

मनुष्य ने विवाह अवश्य करना चाहिए। यदि स्त्री भली मिली तो  मनुष्य का जीवन सुखी हो जाएगा, यदि स्त्री कर्कश मिली तो मनुष्य विचारक हो जाएगा। 

इसलिए ग्रीक दर्शन विचार का अतिक्रमण नहीं कर पाता। 

भारतीय दर्शन विचार का अतिक्रमण कर उस चेतना के बारे में अनुसंधान करता है, जहाँ से विचार का आगमन और पुनः जहाँ विचार का लय हो जाया करता है। 

उपरोक्त ग्रीक विचारक को पुरुषवादी चिंतक कहा जा सकता है। किन्तु भारतीय दर्शन के अनुसार वैसे तो मनुष्यमात्र जन्म से ही सम्मोह से, अर्थात् भ्रम और मोह की बुद्धि से युक्त होता है, किन्तु फिर भी पुरुष की बुद्धि प्रधानतः संशय से युक्त और स्त्री की बुद्धि मोह से युक्त होती है। गीता के अध्याय ७ के अनुसार :

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन भारत ।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ।।२७।।

इसलिए विवाह का सुख-दुःख से कोई निश्चित संबंध है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। विवाह की वैदिक अवधारणा या विधान का प्रयोजन है सृष्टि के कार्य के यंत्र के रूप में प्रजा की सतत वृद्धि को सुनिश्चित करना। एक ओर अपनी जाति और वर्ण की शुद्धता तो दूसरी ओर वर्णाश्रम धर्म के अनुसार जीवन का श्रेय प्राप्त करना। इस प्रकार विवाह कर्तव्य-बुद्धि से किया जानेवाला कार्य है, न कि केवल कामोपभोग के उद्देश्य से किया जानेवाला कोई कार्य।

गीता के इसी अध्याय ७ के एक श्लोक में इसे भी स्पष्ट किया गया है  :

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।११।।

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कहीं दूर ऐसा भी हुआ!

कविता : 28-09-2021

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कहीं एक था जंगल घना,

शेर एक रहता था वहाँ। 

पेड़ों की छाया में दिन,

रात बिताता चाहे जहाँ।

एक गुफा थी लेकिन वहीं, 

बारिश में रहता था वहीं,

भूख लगे या मौसम हो तो,

घूमने लगता बाहर कहीं। 

कभी कभी या अकसर रोज, 

बूढ़ा कोई मृग या खरगोश, 

आकर उसे निवेदन करता,

अब जीवन मेरा है बोझ। 

अगर कृपा हो जाए तेरी, 

यहीं मुक्ति हो जाए मेरी ।

तब वह शेर कृपा कर देता,

अपनी भूख शान्त कर लेता। 

एक आदमी भटक गया,

उस जंगल में पहुँच गया, 

देखा शेर, तो जान बचाकर, 

तेज वहाँ से भागा सरपट,

शेर देखकर हँसने लगा,

घास ने पूछा : हँसते क्यों हो! 

पेड़ों पौधों ने भी यह पूछा,

बोलो दादा! क्यों हँसते हो! 

शेर ने कहा, इस जंगल में, 

कौन किसी से डरता है!

हर कोई हरदम जीता है, 

हर कोई हरदम मरता है, 

घास नहीं डरती बकरी से, 

बकरी मुझसे या भालू से,

सबको ही है मालूम यही,

जीवन सबका इक-दूजे से! 

डरने का क्या काम यहाँ, 

जीना है तो सुख से जियो,

जब मरना होगा, मर जाना,

हँसते-हँसते जिया करो!

मैं हँसना ही भूल गया था, 

उसको देखा तो याद आया, 

फिर मैंने यह भी सोचा,

उसे छोड़कर क्या पाया!

चलो हुआ, अच्छा ही हुआ, 

अब वह यहाँ न आएगा,

जाने कहाँ चला गया है, 

पर मुझको याद आएगा! 

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September 27, 2021

शील-धर्म / Ethics

धर्म और सनातन-धर्म 

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सन्दर्भ : R.S.N.Singh, (पूर्व रॉ अधिकारी) का वक्तव्य

कल यू-ट्यूब पर 'अखंड हिन्द' के वीडियो में उक्त वक्तव्य सुना। संभवतः दो-तीन वर्ष पहले भी इसे सुना था। वे स्वयं तो अपने इस वक्तव्य को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर पाए, किन्तु उनकी इस कठिनाई ने मेरा ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि उन्हें किस बात से कष्ट है। 

संक्षेप में कहें तो यह तो स्पष्ट ही है कि संविधान के अंतर्गत भारत को जिस प्रकार से, 

संप्रभु धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र 

(Sovereign Secular Socialist Republic) 

घोषित किया गया है उसके अनुसार संविधान में, 'भगवान' के बारे में कोई विचार / मत प्रस्तुत नहीं किया गया है । अर्थात् भगवान का अस्तित्व होने, या अस्तित्व न होने तक के बारे में संविधान मौन है। यह तो मानना होगा कि भगवान या उसके समानार्थी शब्दों जैसे गॉड, अल्लाह आदि के तात्पर्य के बारे में संविधान से कोई दिशा-निर्देश नहीं प्राप्त होता। इसलिए जब किसी के द्वारा  संविधान को 'भगवान' कहा जाता है तो इसका ऐसा कोई स्पष्ट और सुनिश्चित सर्वसम्मत अर्थ नहीं प्राप्त होता जिस पर सब सहमत हो सकें। इसलिए केवल बौद्धिक और तर्कसंगत दृष्टि से भी संविधान को 'भगवान' कहना भावनाओं (sentiments) की अभिव्यक्ति का द्योतक तो हो सकता है, किन्तु भावनाएँ तो ऐसा कोई भौतिक तथ्य (physical and material evidence) तो नहीं हो सकतीं, जिन्हें निर्विवादित रूप से प्रमाणित किया जा सके । 

इसलिए संविधान को 'भगवान' कहे जाते ही इसका अभिप्राय भिन्न भिन्न मनुष्यों की दृष्टि में भिन्न भिन्न होता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न उठानेवाले नास्तिकों की दृष्टि में संविधान को 'भगवान' कहे जाने का क्या अभिप्राय हो सकता है? इसी प्रकार अंग्रेजी शब्द 'secular' का शब्दकोष के माध्यम से जो अर्थ प्राप्त होता है वह है : 

mundane, 

लौकिक, व्यवहार्य, सांसारिक, पारंपरिक, भौतिक ।

इसलिए 'secular' के लिए उचित हिन्दी शब्द 'धर्म-निरपेक्ष' नहीं, बल्कि 'पंथ-निरपेक्ष' या 'सम्प्रदाय-निरपेक्ष' होगा, क्योंकि मनुष्य मात्र का कोई न कोई धर्म होता ही है, जैसे पशु या अन्य सभी जीवधारियों का हुआ करता है । धर्म का व्यापक अर्थ तो  स्वभाव या प्रकृति ही है। 

संयोगवश, बचपन में हिन्दी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करते समय :

"General Properties of Matter"

नामक विषय का अध्ययन :

"पदार्थ के गुणधर्म"

के अन्तर्गत किया था।

सनातन-धर्म इसी तथ्य के आधार पर मनुष्य ही नहीं, प्राणिमात्र के लिए जीवन के जिन चार प्रयोजनों का अस्तित्व मान्य करता है, उनमें से 'धर्म' ही सर्वोपरि और सर्वप्रथम है। 

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। 

जीवन अस्तित्व है और अस्तित्व जीवन।

न तो अस्तित्व जीवनरहित हो सकता है, न जीवन अस्तित्वहीन  या अस्तित्व-रहित । क्योंकि जिसके द्वारा अस्तित्वरहित जीवन का उल्लेख किया जा सकता है उसका अस्तित्व और जीवन तो स्वप्रमाणित ही है, और इस पर संदेह किया ही नहीं जा सकता। 

इसलिए 'धर्म-निरपेक्ष' शब्द अपने आपमें न सिर्फ तर्क और अर्थ की दृष्टि से, बल्कि समझने की दृष्टि से भी विसंगतिपूर्ण और विरोधाभासी है। 

किन्तु फिर, स्वतंत्र परिभाषा की दृष्टि से धर्म क्या है, इसे कैसे स्पष्ट किया जाए?

सनातन-धर्म में इसके लिए इसे निर्देश (instruction) के रूप में इस सूत्र में कहा जाता है :

अहिंसा परमो धर्मः।। 

फिर प्रश्न उठता है कि अहिंसा का आचरण कैसे किया जाए? 

क्योंकि उस स्थिति में "जीवो जीवस्य जीवनम्" के सिद्धान्त के अनुसार जिन प्राणियों का जीवन अन्य प्राणियों के आहार पर निर्भर है, उन हिंसक प्राणियों का जीना ही संभव न हो पाएगा! अतः हिंसा-धर्म अधर्म नहीं है, किन्तु परिस्थितिवश वह पशु-धर्म हो सकता है। हिंसा भी अपने स्थान, समय और आवश्यकता के अनुसार ही ग्राह्य और स्वीकार्य हो सकती है, किन्तु ऐसा तब होता है जब अपने प्राणों की रक्षा के लिए ऐसा करना आवश्यक हो जाता है। आत्म-रक्षा की प्रवृत्ति तो प्राणिमात्र का धर्म ही है, चाहकर भी जिसका त्याग कोई नहीं कर सकता। भोजन भी प्राणरक्षक का ही साधन है। 

इसलिए सनातन-धर्म का सूत्र पुनः कहता है :

मा विद्विषावहै।। 

अर्थात् हम किसी से वैर न करें। 

अर्थात् वैर की बुद्धि के कारण जो हिंसा की जाती है, उस हिंसा को करने से हम बचें। 

इसलिए महर्षि पतंजलि के योगशास्त्र में जिन पाँच सार्वभौम महाव्रतों का निर्देश है, उनमें भी अहिंसा ही सर्वप्रथम है :

अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह ।

ये पाँच सार्वभौम महाव्रत 'यम' हैं जिनका उल्लंघन किसी भी स्थिति में नहीं किया जाना चाहिए। 

इसी प्रकार बौद्ध धर्म में 'पञ्चशील' को धर्म का मूल आधार का स्थान दिया जाता है। 

अब हमें यहाँ से 'शील' का अर्थ आचरण और व्यवहार के रूप में प्राप्त होता है जो पुनः आर्य और अनार्य होता है। 

आर्य कोई जाति (race) नहीं, बल्कि श्रेष्ठ, उत्कृष्ट धर्म / शील का आचरण करनेवाले मनुष्य को कहा जाता है।

दुर्भाग्य से जैसे 'धर्म' शब्द का अनुवाद Religion, कर उसके वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया है, वैसे ही 'आर्य' शब्द को जाति / वंश के अर्थवाचक 'Race' के रूप में अनुवादित कर दिए जाने से जान-बूझकर या अनजाने में ही, कितने ही भ्रम पैदा हो गए हैं, या कर दिए गए हैं। 

गीता अध्याय 2 के श्लोक :

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।। २ ।।

में 'अनार्य' शब्द कुल, जाति या वंश (Race) के अर्थ में नहीं, बल्कि निकृष्ट चरित्र का आचरण करनेवाले मनुष्य को इंगित करने के लिए प्रयुक्त किया गया है।

इसी प्रकार अन्यत्र भी 'आर्य' शब्द का प्रयोग 'कुल' या वंश के लिए नहीं बल्कि उत्कृष्टता को दर्शाने के लिए किया गया है।  इसका एक उदाहरण है ईरान के भूतपूर्व दिवंगत राजा के द्वारा अपने नाम में उपाधि के रूप में इसका प्रयोग :

आर्यमिहिर मोहम्मद रजा शाह पहलवी 

'रजा', राजा का अपभ्रंश है, आर्य श्रेष्ठता का द्योतक है, 'पहलवी' (जाति, वंश, कुल, Race) का द्योतक है, जिसकी पुष्टि के लिए वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ५८ में जहाँ विस्तार से इसका वर्णन किया गया है, और 'पह्लव' / पहलवी के साथ-साथ शक, हूण, यवन, म्लेच्छ, काम्बोज, इत्यादि नृवंश का भी वर्णन है, को देखा जा सकता है।

'आर्य' को जाति, कुल, वंश, (Race) कहे / समझ लिए जाने के फलस्वरूप ही जहाँ एक ओर हिटलर के 'नाज़ीवाद' का जन्म हुआ वहीं दूसरी ओर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे एक विद्वान महापुरुष ने यह अनुमान व्यक्त किया कि शायद 'आर्यों' का आगमन उत्तरी ध्रुव से हुआ था! 

श्री R.S.N. SINGH की दुविधा को समझा जाना चाहिए। 

उन्हें इसलिए संकोच अनुभव होता है, क्योंकि संविधान के प्रति उनके मन में पूर्ण सम्मान की भावना होते हुए भी, संविधान के प्रति अपने विचारों की उनकी अभिव्यक्ति के कारण कहीं उन्हें गलत न समझ लिया जाए। संविधान / संवैधानिक परिवर्तनों से यदि किसी व्यक्ति का किसी प्रकार से कोई भिन्न मत हो, तो इसे  संविधान के प्रति असम्मान तो नहीं कहा जा सकता! यदि ऐसा होता तो संविधान में कोई संशोधन किए जाने की संंभावना ही कभी उत्पन्न न होती! इस प्रकार संविधान से सहमत / असहमत होना भी संविधान-प्रदत्त अधिकार ही है। किन्तु साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि मतभेद होने पर अपने सभी मतभेदों का पारस्परिक संवाद के माध्यम से निराकरण कर लिया जाए।

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वो कौन है?

कविता : 25-09-2021

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न अन्धेरा ही दिखाई देता है, 

न रौशनी ही दिखाई देती है!

जब किसी चीज़ पर पड़ती है,

तो चीज़ों में दिखाई देती है! 

और चीजो़ं पे उसके पड़ते ही,

तमाम चीज़ें दिखाई देती हैं!

फिर भी अन्धेरे में चीज़ों को,

और चीज़ों में अन्धेरे को भी,

नहीं देख सकता है कोई भी,

उनपे रौशनी भी डाले अगर!

रौशनी करती तो है रोशन लेकिन, 

अन्धेरे को नहीं कर सकती कभी, 

हाँ मिटा सकती है, उसको शायद,

पर दिखा तो नहीं, सकती है कभी!

रौशनी में मगर जिसे दिखाई देता है,

अन्धेरे में जिसे दिखाई देता नहीं, 

रौशनी में या अन्धेरे में भी कभी, 

क्या वो खुद को देख सकता नहीं!

या फिर ऐसा है क्या, कि वो खुद को,

देखता है कभी, किसी रौशनी में ही, 

किसी चीज़ की तरह, किसी अन्धेरे में, 

या नहीं देखता है, अन्धेरे की तरह! 

तो सवाल है, वो दिखाई देता है किसे? 

तो सवाल है, कि देखता है कौन उसे?

दिखाई देने या, न दिखाई देने से उसके, 

होने या न-होने का, उठता है सवाल?

और यह भी है, कि देखनेवाला वह,

क्या देख सकता है खुद अपने को,

खुद से जुदा, और चीज़ की तरह!

क्या ये होना, मुमकिन भी है कभी!

तो फिर वो देखता है कैसे खुद को,

मगर क्या वही हर चीज़ में होकर,

इसी तरह से देखा करता है खुद को!

तो सवाल ये भी है कि ये तमाम लोग,

जो समझते हैं सबको अलग अलग, 

तो सवाल ये भी है कि ये तमाम लोग,

जो समझते हैं खुद को दूसरों से अलग,

क्या नहीं हैं शिकार, किसी ग़लतफ़हमी का? 

क्या नहीं हैं शिकार अपनी नासमझी का? 

फिर सवाल ये भी है कि आख़िर वो,

जिसे दिखाई देता है, जो देखा करता है, 

क्या ये दोनों हैं वजूद, अलग, अलहदा?

और हैं, क्या दोनों, एक-दूसरे से जुदा!

क्या उसको, फिर कहें, जो सबमें है,

क्या उसको, कह सकते हैं, हम खुदा! 

तो क्या ये सच नहीं है, कि कोई नहीं,

कोई भी नहीं है कभी भी उससे जुदा,

तो क्या ये सच नहीं है, कि कोई भी नहीं,

उसके सिवा, कोई नहीं और, उससे जुदा! 

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आवश्यक सूचना :

यह कविता यहीं पूरी हो जाती है, 

इसे किसी मजहबी चश्मे से न देखा जाए!  :

नज्म का निजाम होना चाहिए,

नग़मे का गुमान होना चाहिए,

दोनों महदूद, महफ़ूज़ रहें, वहीं तक,

अदब में ईमान होना चाहिए !

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September 24, 2021

तुम अतीत हो जाओगे!

कविता : 21-09-2021

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क्या होगा अतीत से जुड़कर,

कैसे अतीत को पाओगे?

और अगर पा भी लोगे तो, 

तुम अतीत हो जाओगे! 

अतीत में सुरक्षा तो है, 

सुख-दुःख हों,  जाने-पहचाने, 

कहाँ मगर रोमाञ्च वहाँ?

बस अतीत को दुहराओगे!

शायद ख़तरा भी ना हो, 

चिन्ताएँ भी ना हों कोई,

वह भी है काफी जीवन में,

सुख-दुःख को भी सह लोगे!

इतना भी हो वर्तमान में, 

यह वर्तमान भी अच्छा है,

जिसमें अतीत का दंश न हो,

ऐसे जीना भी अच्छा है।

क्यों लौटो फिर उस अतीत में,

जो स्मृति, या है बस कल्पना,

वर्तमान से जुड़ जाओ तो,

नित रचो नई, यह अल्पना!

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मन ही मन में

कविता 24-09-2021

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किससे बातें करते हो, 

तुम मन ही मन में!

कौन किया करता है,

तुमसे, मन ही मन में?

बाँट लिया करते हो,

खुद को, मन ही मन में,

बँट जाया करते हो,

खुद ही, मन ही मन में!

तुम मन हो, या मन के,

देखो तुम, मन ही मन में,

एक हो तुम या दो हो, 

देखो खुद, मन ही मन में! 

क्या मन कहता-सुनता है,

खुद, खुद से, मन ही मन में!

या तुम ही कहते-सुनते हो,

खुद ही खुद से, मन ही मन में!

तुम दुनिया हो, या फिर क्या हो,

तुम, दुनिया से दूसरे कोई,

दुनिया तुम हो, या फिर है,

तुमसे अलग, दूसरी कोई! 

तुम, दुनिया, हैं एक या दो,

या हैं तीन, परस्पर कोई!

मन, दुनिया भी, एक या दो हैं, 

या हैं तीन, परस्पर कोई! 

मन दुनिया है, या दुनिया मन!

तुम मन हो, या मन है तुम!

इस सवाल को पहले समझो,

तुम पहले तो मन ही मन में, 

जानो, खुद को, दुनिया को,

समझो बूझो, मन ही मन में!

अपने को जानो-पहचानो, 

अपने दिल में, मन ही मन में! 

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मुग्ध मन, मूढ़ मन।

 कविता : 24-09-2021

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विडम्बना जीवन की! 

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तुच्छ लगता है वह हमें, जो कि उपलब्ध है,

आकर्षित करता वह, मन जिस पर मुग्ध है।

परिधि का केन्द्र से संबंध भी अद्भुत् है,

नित्य सतत स्वयं का स्वयं से ही युद्ध है!

केन्द्र से ही तो परिभाषित, यह परिधि है,

परिधि से ही तो परिभाषित यह केन्द्र है।

एक का विस्तार जब, असीम हो जाता है,

दूसरा अस्तित्व तब, जैसे कि खो जाता है।

फिर भी नहीं संतोष, किसी भी परिसीमा में,

असंतुष्ट ही रहते हैं दोनों संकीर्ण सीमा में। 

टकराते हैं अहं अपने, पृथक् पृथक् दोनों के,

पर नहीं मिलकर हैं घुलते, स्नेह-प्रतिमा में।

स्नेह जो है संधि, जैसे दिवस रात्रि की,

करती पृथक् है दोनों को, धरती प्रतीति की!

बस यही तो हर मनुज के मन का द्वन्द्व है,

जो मिल गया वह तुच्छ, खो गया वह स्वर्ण है!

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September 19, 2021

गणपति बप्पा मोर्या!!

।। श्रीगणेशाय नमः ।।

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भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन भगवान् गणेश का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। 

इसके पहले हरितालिका की तृतीया तिथि के दिन माता पार्वती की प्रिय सखी प्रकृति ने निर्जला व्रत रखकर भगवान् शिव की आराधना की थी। 

प्रकृति के तमोगुण की प्रतिमा ही वह मृदा-मूर्ति थी जिसे माता प्रकृति ने स्वयं के और परमेश्वर शिव के मध्य की यवनिका (पर्दे) के रूप में जब  स्थापित किया था और अकस्मात् भगवान् शिव समाधि से जाग्रत होकर जगत् के दृश्य को देखने के कौतूहल से उस स्थान पर आए जहाँ माता प्रकृति परमेश्वर के दर्शन के लिए स्नान कर स्वच्छ और पवित्र होने का यत्न कर रही थी। वैसे माता प्रकृति पार्वती की ही छाया थी किन्तु उस छाया अस्तित्व को पार्वती ने अपने चिति (भान) का प्रकाश देकर स्वतंत्र और चेतन शक्ति में परिणत कर लिया था और इसलिए उस प्रकृति में मन, बुद्धि, भावना और हृदय का आभासी उन्मेष हो उठा था।इस प्रकार माता पार्वती ने अपने ही जैसी एक स्त्री को अपनी सखी अर्थात् अलि / अलिका के स्वरूप में अव्यक्त से चुराकर (हरित) व्यक्त अस्तित्व में परिणत कर लिया था। 

उसी व्यक्त अस्तित्व के रूप में प्रकृति माता ने भाद्रपद मास की तृतीया अर्थात् हरितालिका तीज को भगवान् शिव को प्रसन्न करने की कामना से निर्जल व्रत का अनुष्ठान किया था । जल से रहित होकर वह शुष्क मिट्टी की अस्पष्ट मूर्ति में ढल गई थी। 

तब माता पार्वती ने उससे कहा :

"मैं समाधि की प्राप्ति के लिए योगाभ्यास कर रही हूँ तुम द्वार पर सावधानी से खड़े रहना ताकि कोई बाह्य विषय मेरी इन्द्रियों को तथा उस माध्यम से मेरे मन को, मन के माध्यम से बुद्धि को, तथा बुद्धि के माध्यम से मेरी आत्मा को न तो छू सके और न ही हर सके।"

"जो आज्ञा!"

कहकर मिट्टी का वह पिण्ड द्वार पर दृढता से खड़ा रहा। 

समाधि से उठकर जब भगवान् शिव ने माता पार्वती को देखना चाहा तो वह पिण्ड पत्थर की दीवार की तरह, माता पार्वती तथा पिता परमेश्वर भगवान् शिव के बीच बाधा बनकर खड़ा हो गया। 

तब भगवान् शिव ने खड्ग से उस पिण्ड पर वार किया जिससे उसका मस्तक धड़ से अलग होकर कटकर गिर गया। तब माता पार्वती के अनुरोध पर उसे जीवित करने हेतु भगवान् शिव ने एक गजशावक का सिर काट लिया जिसकी माता उसकी ओर पीठ किए सो रही थी। 

मिट्टी के पिण्ड के मस्तक के स्थान पर उस सिर को स्थापित किए जाते ही वह पिण्ड प्राण और चेतनायुक्त प्रतिमा की तरह जाग उठा।

इस प्रकार प्रकृति के तमोगुण (मिट्टी) तथा रजोगुण (पशुवृत्ति)  के पश्चात् उस पिण्ड में सतोगुण का आविर्भाव हुआ, जो क्रमशः माता पार्वती की ही तीन शक्तियों, आवरण, विक्षेप, तथा अनुग्रह रूपी शक्तियों की अभिव्यक्ति थे । 

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की तिथि के दिन बुद्धि के स्वामी भगवान् गणेश का आगमन उस रूप में हुआ।

दस दिनों तक उन्होंने भक्तों की पूजा आदर स्वीकार किया और उनके कष्टों तथा अज्ञान, मोह तथा मद, एवं दारिद्र्य और शोक को हर लिया और अनन्त चतुर्दशी की तिथि को भक्तों से विदा लेकर अपने निज धाम लौट गए।

तब से प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि से चतुर्दशी तिथि तक भगवान् श्रीगणेश के गणेशोत्सव का यह पर्व मनाया जाता है।

***

पुढच्या वर्षी लौकर या! 

***

हार्दिक शुभकामनाएँ! 

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September 16, 2021

ख़ता करके!

कविता : 16-09-2021

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क्या करोगे, पता करके,

फर्ज़ अपना, अदा करके !

जब दवा ही नहीं, है कोई,

दर्द अपना, बयाँ करके!

जब सजा ही नहीं, है कोई,

जब मजा भी नहीं, है कोई,

क्या मिलेगा, जुर्म करके,

क्या मिलेगा ख़ता करके!

***

तुम भी बस, ख़याल थे, 

आकर के, जा भी चुके,

मैं भी बस, ख़याल था,

दो पल टिका रहा ज़रूर!

प्यार जब दम तोड़ बैठा,

तुम नहीं थे, कहीं भी,

मौत जब मिलने आई, 

मैं भी नहीं, था कहीं!

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बोलो, कितने मोहन!

कविता : 16-09-2021

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मोहन के दो आगे मोहन,

मोहन के दो पीछे मोहन,

बोलो, कितने मोहन!

एक ने जन्म लिया कारा में, 

देवकी वसुदेव के पुत्र,

माता यशोदा ने पाला उनको,

गोप गोपियों के थे मित्र,

गीता-ज्ञान दिया अर्जुन को, 

राधा और मीरा के इष्ट,

कुन्ती के तो थे परमेश्वर, 

सब अवतारों में हैं विशिष्ट, 

एक ने जन्म पोरबन्दर में, 

लेकर, राष्ट्र को किया स्वतन्त्र,

अंग्रेजों से मुक्त किया, 

मातृभूमि जब थी परतन्त्र! 

नर-नारी के भेद भाव का,

छुआ-छूत का किया विरोध!

ऊँच-नीच का जात-पाँत का, 

तोड़ कुरीति, किया निषेध! 

सत्य का साहस, और आग्रह,

इतना दृढ़, इतना उत्साह,

किए प्रयोग ब्रह्मचर्य के,

नहीं हुआ कोई संकोच!

एक हुए भागवत मोहन, 

नित शाखा में जाते थे / हैं,

'नमस्ते! सदा वत्सले मातृभूमे'! 

सुबह-शाम को गाते हैं! 

संस्कृति और मर्यादा का भी,  

करते हैं आदर-सम्मान !

राष्ट्रधर्म के प्रबल समर्थक,

परंपरा का, कर निर्वाह!

मोहन के ये रूप अनेक,

एक से बढ़कर सारे एक!

परस्पर इनकी क्या तुलना,

आकाश के ये तारे अनेक!

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September 12, 2021

गीता 2/67, 2/68, 9/10, ...

श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।।

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कैलास पर्वत पर अपने धाम में भगवान् त्रिपुरारी जब आत्मस्थ होकर स्वरूप में समाधिस्थ थे तो माता पार्वती जगत् और जीवों के कल्याण की चिन्ता में डूबी हुई थीं ।

इस प्रकार दोनों ही बहुत अधिक आत्मनिमज्जित थे। 

जब भगवान् की समाधि भंग हुई तो उनकी दृष्टि माता पार्वती पर पड़ी। उन्हें अपनी समाधि में ही इसका भान हो चुका था कि माता पार्वती किसी प्रकार की चिन्ता से ग्रस्त हैं, और इसीलिए वे समाधि से उठ गए थे। 

"देवी! तुम्हें किस विषय में चिन्ता हो रही है, मुझसे कहो!"

उन्होंने माता पार्वती को कटाक्ष से देखते हुए प्रश्न किया।

माता पार्वती ने उनके चरण-युगल को स्पर्श किया और तब बोली :

"हे प्रभो! उस दिन आपने गीता के उक्त श्लोक का उल्लेख करते हुए इसका तात्पर्य मुझे समझाया था, किन्तु अब मुझे विस्मृत हो रहा है, इसलिए मेरा निवेदन है कि कृपया पुनः एक बार इसे मुझसे कहें!"

भगवान् शिव ने यद्यपि जान लिया, कि माता पार्वती ने यह प्रश्न केवल इसलिए किया है ताकि इसके बहाने से एक बार फिर यह उपदेश उन असंख्य जीवों को प्राप्त हो सके, जो भवसागर के क्लेशों में डूबे हुए आतुरता से उद्धार किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फिर भी इसे प्रकट न होने देते हुए वे बोले :

"पार्वती! जिस तरह से जल पर स्थित किसी नाव को चंचल वायु बलपूर्वक हर लिया करता है और फिर खींचकर अपनी दिशा में ले जाता है, बिल्कुल उसी तरह से इन्द्रियों के चंचल होने पर मन जब उनके पीछे पीछे भागता है, तो उसकी प्रज्ञा को इन्द्रियाँ भी उसी तरह से हर लिया करती हैं ।"

कुछ क्षणों तक दोनों निःशब्द होकर विस्मयपूर्ण शान्ति में डूबे रहे। फिर पार्वती ने प्रश्न किया :

"प्रभो! किन्तु फिर मन इन्द्रियों के पीछे पीछे न जा सके, इसका क्या उपाय है?"

तब भगवान् शिव ने स्मितपूर्वक कहा :

"तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।६८।।

इसलिए हे महाबाहो! जिसकी इन्द्रियाँ भली प्रकार से निग्रहीत अर्थात् निरुद्ध होती हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर और सुप्रतिष्ठित हो जाती है।"

तब माता पार्वती ने पुनः जिज्ञासा व्यक्त की :

"हाँ, यह तो ठीक है, किन्तु उन्हीं के लिए जिन्होंने अभ्यास द्वारा इन्द्रियों को वश में कर लिया है। परन्तु बहुत से ऐसे भी हैं जो अभ्यास करने में भी समर्थ नहीं हो पाते हैं। उनके लिए कौन सा उपाय है?"

तब भगवान् करुणावतार शिव ने कहा :

"हाँ उपाय है न! 

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ।।१०।।

(अध्याय १२)

यदि कोई अभ्यास करने में भी असमर्थता अनुभव करता है, किन्तु यदि अपने समस्त कर्म केवल मेरे ही लिए करता है, -इस भावना से युक्त होकर उन कर्मों को मुझे ही अर्पित कर देता है तो भी ऐसा कर्म करते हुए वह मुझसे (अनन्यता-रूपी) सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।"

भगवान् शिव ने अपने नेत्र बन्द कर लिए और वे जब पुनः अपने स्वरूप में समाधिस्थ होने जा ही रहे थे तब उन्हें प्रतीत हुआ कि माता पार्वती की जिज्ञासा अभी भी पूर्णतः शान्त नहीं हो सकी, अतः अपने नेत्र खोलकर माता पार्वती पर दृष्टिपात किया। 

फिर स्वयं ही कहने लगे :

हे पार्वति! तुम तो जानती ही हो, समस्त जड-चेतन जगत् और जीव आदि, तुम्हारी ही माया से मोहित होकर अपना सारा कार्य किया करते हैं। इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों को अपना आहार बना लेते हैं, इन्द्रियाँ मन को अपना आहार बना लेती हैं, मन भी बुद्धि को, और इतना ही नहीं, बुद्धि भी आत्मा को अपना आहार बना लिया करती है। पुनः विलोम-क्रम में, आत्मा से बुद्धि का उद्भव होता है, बुद्धि से मन का, मन से इन्द्रियों का, और अंततः इन्द्रियों से विषयों का उद्भव होता है। 

तो अब यह भी सुनो, जैसा कि अध्याय ९ में वर्णित है :

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।।१०।।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।।११।।

हे पार्वति!

मेरी ही प्रेरणा से प्रकृति समस्त चर और अचर भूतों को जन्म देती है और इसीलिए जगत् सतत परिवर्तित होता रहता है। 

मुझ भूतमहेश्वर के परम भाव से अनभिज्ञ होने के कारण मूढ मनुष्य मुझ परमेश्वर को भी मनुष्यदेह में स्थित मानुषी प्रकृति का व्यक्ति-विशेष मान लेते हैं। किन्तु तुम्हारी अनुग्रह शक्ति की कृपा होते ही उनकी बुद्धि के समस्त दोषों का निवारण भी हो जाता है, और उनका उद्धार हो जाता है। क्या तुम्हारी जिज्ञासा शान्त हुई?

(कल्पित)

***




 

किसी की याद

कविता :12-09-2022

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किसी की याद कब आती है,

किसी की याद क्यों आती है, 

क्या किसी की याद आती है, 

ये भी तो पूछो, किसे आती है!

जब भूल जाता है कोई खुद को,

क्यों भूल जाता है कोई खुद को, 

कब भूल जाता है कोई खुद को,

ये भी तो पूछो किसे आती है?

कितना बेहूदा सवाल है यह, 

क्या बेमतलब सवाल है यह, 

कैसे भूल सकता है कोई खुद को,

क्या भूल सकता है कोई खुद को? 

यही तो मगर करता है हर कोई, 

भुलाने खुद को ही तो हर कोई,

मगर ऊब जाता है जब दूसरों से,

लौट जाता है, खुद पर ही हर कोई,

कौन लेकिन चाहता है लौट जाना,

अपने उस बेमतलब खालीपन में,

कौन लेकिन चाहता है मन लगाना, 

अपने उस बेवजूद खालीपन में,

इसलिए फिर लौट जाते हैं सभी, 

अजनबी दुनिया के उस नयेपन में, 

जहाँ हर पल कोई उत्तेजना है, 

जहाँ हर पल कोई क़शिश है, 

जहाँ हर पल कोई उम्मीद है,

जहाँ हर पल ही नई क़ोशिश है!

इस तरह से, भागता है हर कोई,

अपने ही खुद से, अपने-आप से, 

अपने उस बेमतलब खालीपन से,

और अपने-आप की ही याद से!

इसलिए शायद भुलाना चाहता है,

कोई नया एहसास पाना चाहता है, 

जो पुराना हो न पाए फिर कभी,

ऐसा कोई अहसास पाना चाहता है!

लेकिन क्या ऐसा भी कभी होता है,

फिर भी है उम्मीद लगी ही रहती,

इसी उम्मीद के ही सहारे तो,

आदमी जिन्दगी भर जीता है!

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September 11, 2021

प्रतिलिपि / प्रतिच्छाया

निर्णय, भान, विषयी और विषय... 

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कोई विषय हमें आकर्षित करता है । कोई विचार हमें आकर्षित करता है। कोई विषय हमें विकर्षित करता है।  कोई विचार हमें विकर्षित करता है। कोई विषय / विचार हममें कोई भावना जाग्रत करता है। कोई विषय / विचार हमें छूता तक नहीं। कोई विषय / विचार स्मृति से एकाएक ऊपर उभर आता है। 

अच्छे और बुरे की भावना, प्रिय और अप्रिय की भावना, लज्जा या शर्म, संशय, चिन्ता, व्यग्रता, व्याकुलता, सुरक्षा, क्रोध, लोभ, असमंजस, आशा और निराशा, ग्लानि और ऐसी दूसरी भी कई भावनाएँ कभी किसी विषय के सामने आते ही प्रायः जाग्रत हो उठती हैं। इनमें से शायद सर्वाधिक विशिष्ट और इनसे कुछ भिन्न और विलक्षण भावना भी होती है जिसे भविष्य अथवा भूतकाल कहा जाता है। इस पूरी वास्तविकता पर शायद ही कभी हमारा ध्यान जाता हो । पर यही तो जीवन की रीत ही है और अगर कहें कि हर किसी के ही साथ ही ऐसा हुआ करता है, तो यह कहना गलत न होगा। हम इस विषय में सचेत रहें या न रहें, जीवन की यह गतिविधि कभी रुकती नहीं। 

या तो हम जीवन की इस गतिविधि के प्रति सजग और सचेत होते हैं, या बाहरी परिस्थितियों के,  या अपने संस्कारों के दबाव में भावनाओं को किसी हद तक वश में कर लेते हैं। फिर भी, जब इस प्रकार से किन्हीं भावनाओं को, या किसी एक को भी वश में कर लिया जाता है, तो वे मन की गहराई में कुंठित और दबी रहकर कुलबुलाती रहती हैं, और अनुकूल परिस्थिति होते ही अचानक फूट पड़ती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के होने में वैसे तो समय लगता है, किन्तु क्या 'समय' भी एक विचार या भावना (या एक साथ दोनों ही) नहीं होता? समय, जिसे अभी अभी 'प्रक्रिया ' पर आरोपित किया गया है! इस 'समय' नामक वस्तु की क्या कोई भौतिक सत्ता होती है? क्या दूसरी भौतिक राशियों की तरह से इसकी माप-जोख की जा सकती है? क्या इसे मापने या तौलने का विचार या कल्पना निरर्थक और हास्यास्पद नहीं है? किन्तु हम सभी इस बारे में इतने अभ्यस्त होते हैं, और इतने अधिक इतनी पूरी तरह से आश्वस्त, सुनिश्चित होते हैं कि कभी शायद ही इस पर हमारा ध्यान जाता हो, कि 'समय' नामक किसी वस्तु की क्या कोई वास्तविकता है!

भावना एक जीवंत (alive or live) प्राणवान, जीता-जागता तथ्य होता है, कोई जड, या भौतिक इन्द्रियग्राह्य वस्तु नहीं होता, किन्तु इसे नाम या शब्द दिए जाते ही 'विचार' जन्म लेता है, और तब, भावना ही विचार की सहायता से स्मृति में रूपान्तरित हो जाती है। एक ही समय पर अनेक भावनाओं की स्मृति होने पर उनकी परस्पर तुलना की जाने लगती है, जो कि विचार के ही माध्यम से घटित होता है।

भावना को शब्द या नाम दिए जाते ही, 

"मुझे पता है!" या "पता है!"

इस प्रकार का ज्ञान (या ज्ञान का भ्रम) हममें पैदा हो जाता है। 

फिर ऐसी ही किसी भावना से प्रेरित व्यवहार या आचरण को 'कार्य' / 'कर्म' कहा जाता है और पुनः उस कार्य तथा ऐसे ही असंख्य कार्यों को घटना के रूप में 'अपनी' स्मृति में संजो लिया जाता है।

इसी तरह की एक और सर्वाधिक प्रमुख भावना, जो कि निरंतर ही उत्पन्न होती और पुनः पुनः विलीन भी होती रहती है, वह है - 'अपने' होने, या अस्तित्व में होते हुए भी अस्तित्व से कुछ भिन्न, अलग और पृथक् भी होने की भावना। यही भावना, अपनी इस  आभासी निरंतरता से, बुद्धि में अपने कुछ विशेष, और अस्तित्व / संसार से पृथक् कुछ होने के अनुमान, और फिर स्मृति में ढल जाती है, जो क्रमशः दृढ और स्थायी (जैसी) लगने लगती है। 

इसे ही बोलचाल में "मैं" शब्द से व्यक्त किया जाता है, और फिर इस तरह से 'अपने' व्यक्तित्व का जन्म होता है। यद्यपि यह "मैं" सबके लिए (और हरेक के लिए भी) अपने नितान्त निजि प्रयोग की वस्तु होता है, फिर भी बातचीत में सभी इस शब्द का प्रयोग किया करते हैं। किन्तु इस प्रकार से इस शब्द के जिस तात्पर्य का भान और बोध होता है, उससे मनुष्य 'अपने' और अपने संसार के बीच आभासी, कृत्रिम विभाजन की एक काल्पनिक दीवार खड़ी कर लेता है। 

इस प्रकार से असंख्य व्यक्तियों के अपने अपने संसार होते हैं, जो एक दूसरे से यद्यपि अत्यंत भिन्न और पृथक् होते हैं, फिर भी एक सर्वसम्मत भौतिक संसार / विश्व (objective world) सबका भी अवश्य होता ही है, जिसे सभी एक ही मानते हैं और इस बारे में किसी का किसी से कोई मतभेद भी नहीं होता। जिसे हर मनुष्य अपनी जाग्रत अवस्था में अनुभव करता है। मनुष्य-मात्र में अपने स्वयं के, और अपने संसार के बीच का यह कृत्रिम, काल्पनिक, वैचारिक विभाजन "मैं" शब्द के (असावधानी से किए जानेवाले) सतत प्रयोग से निरंतर दृढ होता रहता है। यह भी कहा और पूछा जा सकता है कि (क्या) पशु-पक्षियों आदि तथा अन्य जीवित कहे जानेवाले 'चेतन' / sentient प्राणियों में भी ऐसी भावना, उस भावना की ऐसी निरंतरता, तथा उसकी कोई स्मृति होती होगी, और क्या वह केवल शरीर और शरीर की स्मृति तक ही सीमित होती होगी? उनके पास भी कहने अथवा  सोचने के लिए "मैं" जैसा, या ऐसा कोई और शब्द होता होगा, जिससे वे अपनी स्मृति में स्वयं की एक ऐसी छवि बना सकें, -जैसे कि मनुष्य बना लिया करता है?

इस समूची स्थिति / वास्तविकता का भान / बोध हो जाने पर और इस प्रकार से इसका अवलोकन कर लेने पर, क्या हममें / मन में कोई नई भावना जाग्रत होती है? 

स्पष्ट है कि 'मन' भी ऐसा ही एक शब्द भर है, जो भावना के प्रभाव की तरह, भावना के अर्थ का द्योतक है,  - न कि ऐसी कोई वास्तविकता या सत्य (Reality or truth).

क्या यह मन, मूलतः एक भावना ही नहीं है, जो यद्यपि क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहा होता है, किन्तु उसका अस्तित्व नहीं मिटता। इस विवेचना को विचार की सहायता से किसी शास्त्र से संबद्ध (relate) कर, शास्त्ररूपी वैचारिक क्रम या सिद्धान्त का रूप भी शायद दिया जा सकता हो, और भ्रम को और अधिक दृढता प्रदान की जा सकती हो, लेकिन वह सब केवल वैचारिक भूल भुलैया में अंतहीन भटकाव भी हो सकता है। 

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विषय (object) और (subject) के रूप में जागरूक होना,  सचेत होना, भान होना, -क्या पुनः भावना ही नहीं है? 

कभी हम सचेत होते हैं, जो भान होने से ही संभव होता है। कभी हम अचेत होते हैं, तो उस अवस्था में - "भान नहीं था, और हम चेतनारहित थे",  -ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पुनः सचेत होने पर हमें स्पष्टता से तथा निश्चयपूर्वक पता होता है कि तब भी हम थे ही, और हममें अपने होने का भान भी अवश्य ही था! इसकी तुलना हम अपनी निद्रावस्था से कर इसे और भी बेहतर समझ सकते हैं।

कभी हम जानकारी / विचार का सहारा लेकर सचेत होते हैं, जो शायद यांत्रिक, स्मृति से सीमित और अभ्यासजनित होता है। किन्तु अपने होने का स्वाभाविक भान, अस्तित्व के प्रति सचेत होना, यह सजगता, यह जागृति क्या अभ्यासजनित होती है!

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September 10, 2021

चातुर्वर्ण्यं

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४ में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

तब अर्जुन ने शंका व्यक्त करते हुए पूछा  :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।४।।

अर्जुन की इस शंका का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।५।।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।।६।।

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इसी 30/31 अगस्त 2021 के दिन अपने 'प्रसंगवश' ब्लॉग में एक पोस्ट लिखा था :

विषय, विचार, भावना

(संभवतः अभी तक उस पोस्ट पर किसी पाठक की कृपादृष्टि नहीं पड़ी है। किन्तु मुझे वह पोस्ट महत्वपूर्ण प्रतीत हो रहा है, इसलिए उसे थोड़े से संशोधन सहित अगली पोस्ट में यथावत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ।) 

उपरोक्त श्लोकों के सन्दर्भ में जहाँ 'अहं' का अर्थ आत्मा, जीव और परमात्मा तीनों ही दृष्टियों से ग्रहण किया गया है और तीनों ही अर्थ व्याकरण की दृष्टि से भी ग्राह्य हैं, संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता इसकी परीक्षा अच्छी तरह कर सकते हैं। 

यदि 'अहं' पद को आत्मा (अन्य-पुरुष एक-वचन) या 'मैं' (उत्तम-पुरुष एक-वचन) के अर्थ में ग्रहण किया जाए, तो 'तान्यहं वेद' में प्रयुक्त 'वेद' शब्द को 'विद्' (जानना) धातु के अन्य-पुरुष लट् - लकार, एक वचन, तथा उत्तम-पुरुष एकवचन दोनों ही रूपों में ग्रहण किया जा सकता है ।

बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार आत्मा / परमात्मा का प्रथम नाम 'अहम्' ही हुआ :

'अहं नामाभवत् ...'

वैसे भी संस्कृत भाषा में उत्तम-पुरुष एकवचन सर्वनाम (मैं) को आत्मा शब्द से ही व्यक्त किया जाता है।

इसी प्रकार, 'बहूनि मे व्यतीतानि' का अर्थ भी आत्मा, परमात्मा या व्यक्ति के रूप में स्वयं के अर्थ का द्योतक हो सकता है। 

किन्तु जब भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा इस प्रकार से कहा जाता है, तो स्पष्ट है कि परमात्मा के जन्म का तो प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु किसी विशिष्ट प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए परमात्मा मनुष्य देह में अवतरित होता है, तो यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अनेक अवतार या जन्म परमात्मा के भी हो सकते हैं । किन्तु मनुष्य के लिए यह जान पाना लगभग असंभव ही है कि इस जन्म से पूर्व क्या मेरे और भी जन्म हुए होंगे!

उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लिखित पोस्ट को यहाँ पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। 

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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।१३।।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते ।।१४।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं  पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।।१५।।

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताःक्ष। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१६।।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ।।१७।।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।१८।।

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मनुष्यमात्र में इस 'मैं' सर्वनाम के वास्तविक तात्पर्य के विषय में न केवल अज्ञान और संशय बल्कि अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ भी होती हैं। किन्तु शायद ही कभी किसी का ध्यान इस सच्चाई पर जाता होगा। यहाँ तक कि इस बारे में सोचते ही बुद्धि कुंठित और अवरुद्ध होने लगती है। 

यह भी कहा जाता है कि अहंकार नहीं करना चाहिए। 

या फिर, 'अहंकार को त्याग दो।'

प्रश्न है कि अहंकार को त्यागने, या न त्यागने का कार्य कौन करेगा?

इसे क्या किसी और तरह से नहीं कहा जा सकता?

अहंकार वैसे तो एक विशिष्ट, दूसरी समस्त भावनाओं से भिन्न एक विलक्षण भावना ही है, किन्तु जैसे अन्य सभी भावनाएँ अपने अपने समय पर व्यक्त और विलुप्त होती रहती हैं, यह भावना उन सभी के साथ यद्यपि सदैव संलग्न होती है, किन्तु इसे उन सारी भावनाओं की तरह स्वतंत्र रूप में कभी नहीं पाया जाता। 

अपरोक्षतः इसे कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व इन चार रूपों में अवश्य पहचाना जा सकता है।

कैसे? 

ज्ञातृत्व :

कोई विषय हमें आकर्षित करता है । कोई विचार हमें आकर्षित करता है। कोई विषय हमें विकर्षित करता है। कोई विचार हमें विकर्षित करता है। कोई विषय / विचार हममें कोई भावना जाग्रत करता है। कोई विषय / विचार तो हमें छूता तक नहीं।

इस प्रकार हममें अनायास ही ज्ञातृत्व की, अर्थात् जानने की जो स्वाभाविक क्षमता, या भावना होती है । जानकारी के संग्रह के रूप में जिसे 'ज्ञान' (information) कहा जाता है, उससे बहुत अलग और भिन्न होती है। यह 'ज्ञान' (information) सदैव शाब्दिक या स्मृतिरूप में होता है और वेदान्त की भाषा में उसे 'प्रत्यय' कहा जाता है। इसी प्रकार शब्दरहित विषयग्रहण को ज्ञातृत्व कहा जा सकता है। 

'प्रत्यय' और 'वृत्ति' के भेद का वर्णन पातञ्जल योग-सूत्र में अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है। 

भोक्तृत्व :

अर्थात् अनुभव होना, अच्छा लगना, अच्छा न लगना, सुख-दुःख होना । 

कर्तृत्व :

किसी कार्य को करने / न करने का संकल्प होना, 

और उस कार्य के अच्छे या बुरे फल का भोग करने या न करने का विचार / भावना।

स्वामित्व :

संपत्ति, संबंधों, वस्तुओं, अपने अधिकार के अन्तर्गत आनेवाले लोगों पर अपना स्वामित्व होने की भावना।

ये ही चार वर्ण 'मन' के होते हैं । 

क्या 'मन' इन चारों वर्णों से रहित हो सकता है? 

प्रसंगवश ब्लॉग में 30 / 31 अगस्त 2021 को लिखी पोस्ट :

विषय, विचार, भावना

में इसी बारे में विवेचना की गई है। 

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September 06, 2021

उम्मीदें और क़ोशिशें

कविता : 06-09-2021

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मुश्किलें!

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बस कि मुश्किल है हर काम का आसाँ होना,

आदमी का ज़हीन हो पाना, और न नादाँ होना! 

क्या ये अचरज ही नहीं है कि अकसर कोई,

हर आदमी पैदाइशी नादान हुआ करता है,

शोहरत, दौलत, इज्जत, ताकत, क़िस्मत से,

मिल भी जाया करते हैं कभी कभी लेकिन,

फिर भी सच्चाई से, अनजान रहा करता है!

कोई मक़सद, कोई मजहब, या कोई खुदा,

कोई किताब, कोई तहजीब, या कोई उसूल,

कोई निजाम, कोई तसव्वुर या ख़यालो-ख्वाब,

इसी नादानी में गा़फिल, मान लिया करता है!

किताब, मजहब, या तसव्वुर, कोई भी ख़याल,

हुआ करते हैं पैदा और खड़े जिस बुनियाद पर,

उसी बुनियाद को खुद और खुदी में बाँटकर,

मन को वो खुद ही से जुदा, मान लिया करता है!

है ये हैरत कि कहा करता है मन ही खुद को अपना,

और खुद को ही मन का मालिक भी कहा करता है,

इस गलतफहमी में वो कौन है जो कि है गाफ़िल,

इस तरफ उसका कभी भी ख़याल नहीं जाता है!

मन ही मन को हौसला, तसल्ली भी दिया करता है,

मन ही मन को उकसाया, भरमाया भी करता है,

मन ही खुद से डरता, खुद को डराया भी करता है,

खुद को शर्मिन्दा करता है, शरमाया भी करता है! 

मन ही गुजरता है बहुत आसानो-मुश्किल राहों से,

और खुद ही खुद के लिए राह भी हुआ करता है, 

बस चला करता है इस तरह से जिन्दगी का सफर, 

सच, होके नजरों से ओझल, इसी पर्दे में छुपा रहता है।

ढूँढता रहता है मन, अकसर ही इसी सच को मगर,

और खुद ही चोर और कोतवाल हुआ करता है,

चलता ही रहा करता है ये खेल पूरा जिन्दगी भर,

सच कभी भी न उजागर, जाहिर न हुआ करता है!

बस यही तो है बदनसीबी, बस यही तो है अफ़सोस,

बस यही तो है बुनियाद, वहम और यही तो भरम,

इसको क्या कभी कोई किसी को बता भी सकता है, 

है ये मुमकिन ज़रूर हर कोई इस पे सोच सकता है! 

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ये सच है,...

कविता : 06-09-2021

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एक डमी इंटरव्यू देखते हुए लिखा :

खुजला रहा हूँ, 

सर अपना! 

ये सच है, 

या कि है सपना!

बहला रहा हूँ,

दिल अपना,

ये सच है,

या कि है सपना!

सहला रहा हूँ,

जख्म अपना,

ये सच है,

या कि है सपना!

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तुमसे क्या बात करें!

कविता : 06-09-2021

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तुमसे क्या बात करें! बताओ तुम्हीं कैसे करें! 

तुम तो आजकल हमसे कभी मिलते ही नहीं!

जैसे भी हैं, जो भी हैं, कैसे हैं हम, कैसे कहें!

पर ये हालात हैं, तुम कभी मिलते ही नहीं!

बर्फ़ की मानिन्द ठंडे, सख्त हो गए हैं रिश्ते,

ये वो जज़्बात हैं जो, अब तो पिघलते भी नहीं!

रात-दिन चल रहा है, कुछ सिलसिला मगर ऐसा,

रात दिन रोज होते हैं, लेकिन कभी ढलते ही नहीं!

पहले बेनागा जला करते थे, रोज शाम होते ही,

चिराग़ उम्मीदों के वही, अब तो जलते भी नहीं!

तुमसे क्या बात करें! 

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September 05, 2021

सब थके थके हैं!

कविता : 05-09-2021

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लाचारी

सब थके थके हुए से हैं, लेकिन लड़ाई जारी है!

कुछ मर गए, कुछ घायल, बाक़ी सब की बारी है!

फिर नई कुमुकें आ रहीं हैं, तैयार हो रहे हैं जवान!

फिर खून में आया है उबाल, बारूद में चिनगारी है!

हर कोई लड़ रहा है यहाँ, हर कोई हर किसी के साथ,

हर शख्स यहाँ है सरफरोश, जान दे देने की तैयारी है!

देखनेवाले हैं फिक्रमंद, मगर क्या करें, देखने के सिवा,

करने के लिए कुछ भी तो नहीं, बेवजह ही बेद़ारी है!

आज के वक्त का यह दौर कितना क़ातिल है, बेहूदा भी!

कहाँ जाकर के कब ख़त्म होगा, जीते रहना पर लाचारी है!

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