Showing posts with label उम्मीद !. Show all posts
Showing posts with label उम्मीद !. Show all posts

November 12, 2021

क्या कभी कुछ,

कविता / 12-11-2021

-------------©-------------

ख़त्म तो क्या कभी कुछ होना है, 

यही तो ज़िन्दगी का रोना है! 

सुबह उठना है, उम्मीदें लेकर, 

रात नाउम्मीद, रोज सोना है!

***



September 12, 2021

किसी की याद

कविता :12-09-2022

------------------©-------------------

किसी की याद कब आती है,

किसी की याद क्यों आती है, 

क्या किसी की याद आती है, 

ये भी तो पूछो, किसे आती है!

जब भूल जाता है कोई खुद को,

क्यों भूल जाता है कोई खुद को, 

कब भूल जाता है कोई खुद को,

ये भी तो पूछो किसे आती है?

कितना बेहूदा सवाल है यह, 

क्या बेमतलब सवाल है यह, 

कैसे भूल सकता है कोई खुद को,

क्या भूल सकता है कोई खुद को? 

यही तो मगर करता है हर कोई, 

भुलाने खुद को ही तो हर कोई,

मगर ऊब जाता है जब दूसरों से,

लौट जाता है, खुद पर ही हर कोई,

कौन लेकिन चाहता है लौट जाना,

अपने उस बेमतलब खालीपन में,

कौन लेकिन चाहता है मन लगाना, 

अपने उस बेवजूद खालीपन में,

इसलिए फिर लौट जाते हैं सभी, 

अजनबी दुनिया के उस नयेपन में, 

जहाँ हर पल कोई उत्तेजना है, 

जहाँ हर पल कोई क़शिश है, 

जहाँ हर पल कोई उम्मीद है,

जहाँ हर पल ही नई क़ोशिश है!

इस तरह से, भागता है हर कोई,

अपने ही खुद से, अपने-आप से, 

अपने उस बेमतलब खालीपन से,

और अपने-आप की ही याद से!

इसलिए शायद भुलाना चाहता है,

कोई नया एहसास पाना चाहता है, 

जो पुराना हो न पाए फिर कभी,

ऐसा कोई अहसास पाना चाहता है!

लेकिन क्या ऐसा भी कभी होता है,

फिर भी है उम्मीद लगी ही रहती,

इसी उम्मीद के ही सहारे तो,

आदमी जिन्दगी भर जीता है!

***

  



March 25, 2021

उम्मीद है!

कविता 

--

हो गई होगी कुछ कम अब तक तुम्हारी बेचैनी,

टल गई होगी होने से पहले ही वह अनहोनी ।

जलजले तो रोज ब रोज ही आया करते हैं,

थम गई होगी जमीं, ठहरने से पहले ज़िन्दगी। 

सिलसिला हर ख़त्म होता है वक्त आने पर,

हुआ था, होता है शुरू जैसे वक्त आने पर !

सोचते हैं हम कि क़ाश, न ख़त्म होता ये कभी, 

पर ये सोचना, ख़त्म हो जाता है वक्त आने पर!

सिलसिला क्या वाक़ई शुरू होता भी है कभी? 

और क्या किसी तरह, ख़त्म भी होता है कभी?

सिलसिला, क्या सिर्फ़ वहम, या ख़याल ही नहीं!

शुरू या ख़त्म होना क्या महज़ इत्तफा़क़ नहीं?

लम्हा भी क्या लमहों का सिलसिला ही नहीं!

देख लो तो फ़िर कोई शिकवा या गिला भी नहीं!

--






June 02, 2016

उम्मीद !

क्षणिका 
उम्मीद !
मुसीबतें ही सही, वक़्त कट तो जाता है,
मुसीबत वक़्त से, बड़ी कोई क्या होगी?
--
मुसीबतें ही सही, वक़्त कट तो जाता है,
वक़्त सा बेरहम और कौन होता है?
--