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May 01, 2025

GUIDE!

आज की बात!

गाईड, रहीम और ग़ालिब 

भोपाल के किसी मित्र ने व्हॉट्स ऐप पर हिन्दी फिल्म "गाईड" के -

"वहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ ..."

इस गीत का वीडियो शेयर किया  -

और जैसा अकसर होता है, जब उसने 

"कहते हैं ज्ञानी,

दुनिया है फ़ानी,

पानी पे लिक्खी है,

कुछ तेरा न मेरा,"

इस टुकड़े में "फ़ानी" को "पानी" समझ लिया, तो 

मुझसे रहा नहीं गया, और मैंने उसका ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि "फ़ानी" का मतलब होता है "फ़ना" होनेवाला अर्थात् नश्वर या नाशवान - perishable.

Consumer goods are perishable items that can't be kept pure for much long, and are useful for a short time only.

फिर ग़ालिब के कुछ शे'र प्रमाण के लिए प्रस्तुत किए -

इशरते-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

बस कि मुश्किल है हर काम का आसां होना, 

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।

की मेरे क़त्ल के बाद जफ़ा से तौबा। 

हाय उस ज़ूद पशेमाँ का पशेमाँ होना! 

इशरत  मतलब मुक्ति,

क़तरा मतलब टुकड़ा / बून्द,

दरिया मतलब समुद्र,

फ़ना मतलब विलीन,

आसां मतलब आसान, 

इंसा  मतलब इंसान,

आदमी मतलब मनुष्य, 

मयस्सर मतलब उपलब्ध,

जफ़ा मतलब क्रुद्ध या क्रोध, 

ज़ूद का मतलब - ज्यादा - extreme,

पशेमाँ का मतलब लज्जित, शर्मिन्दा होना, 

फिर उसने पाकिस्तान के वर्तमान हालात के बारे में एक मीम / शॉर्ट वीडियो पेश किया जिसमें यू एस के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प "water, water" कहते हुए पानी की बॉटल उठाकर पानी पी रहे होते हैं और खाली बॉटल को उछाल कर दूर फेंक देते हैं।

फिर मुझे रहीम का यह दोहा याद आया :

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। 

पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून।।

यहाँ पर पानी का मतलब आँखों की शर्म, शर्मो-हया, लज्जा, मोती की चमक, और पान के साथ खाया जाने वाला चूना हो सकता है, जिसमें पानी सूख जाने पर वह किसी काम का नहीं रह जाता। 

उसने कहा :

क्या 'चून' शब्द का एक अर्थ "आटा" नहीं होता?

मैंने कहा -

'चून' शब्द संस्कृत के 'चूर्ण' शब्द का अपभ्रंश है, और पर्याय से,  imperatively  आटा या चूना दोनों अर्थों में प्रयुक्त होने लगा। फिर यह संस्कृत के ही 'च्यवन' शब्द का भी अपभ्रंश हो सकता है। जैसे बरसात में छत से पानी टपकना या चूना।

फिर मैंने कहा -

अजीब बात है कि आप भोपाल के हो और मैं भोपाल से बाहर का, फिर भी आपको उर्दू पढ़ा रहा हूँ!

वे बोले -

भई, पाकिस्तान की आँखों का पानी तो उसी दिन मर चुका था जिस दिन कुछ मुसलमानों ने मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग क़ौम घोषित कर कह दिया था कि ये दोनों क़ौमें साथ साथ नहीं रह सकती हैं, और इसलिए इस आधार पर अपने लिए भारत को विभाजित करने की और अपने लिए अलग मुल्क की माँग कर दी थी।

अब भारत ने पाकिस्तान का पानी क्या रोक दिया तो उपद्रव कर रहा है। एक दिन अवश्य ही पाकिस्तान के टुकड़े टुकड़े होंगे और सब टुकड़ों की मुक्ति / इशरत हिन्दुस्तान रूपी दरिया में फ़ना होने से ही होगी।

अखंड भारत हिन्दू राष्ट्र ही इस समस्या का एकमात्र और स्वाभाविक विकल्प है।

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February 05, 2023

कालधर्म / समय की गति

नियति, धर्म और कर्म

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यह पोस्ट कल लिखे पोस्ट के क्रम में प्रासंगिक है। 

भारतवर्ष में विदेशी आक्रान्ताओं का आगमन होने के बाद जो परिस्थितियाँ बनीं उनसे उर्दू भाषा अस्तित्व में आई। उर्दू लिपि का आविष्कार भी मूलतः फ़ारसी और अरबी भाषाओं की लिपि का ही, समय की आवश्यकता के अनुसार इरादतन किया गया तात्कालिक रूपान्तरण ही था, जिसे कि भारत की प्रजा पर उन विदेशी आक्रान्ताओं, शासकों द्वारा इसलिए थोपा गया था ताकि उन्हें भारत में अपना साम्राज्य, शासन और सत्ता स्थापित करने में, चलाने में और उसका विस्तार करने में सहायता मिल सके।

यही भारतवर्ष का भयंकर दुर्भाग्य और हमारा अपनी राष्ट्रीयता के प्रति सामूहिक प्रमाद भी था, जिसका दंश हमें अभी भी सता रहा है। इस्लाम-परस्त उस विदेशी शासन की सत्ता की समाप्ति होते होते भारत पर अंग्रेजों की सत्ता स्थापित हो गई, जो हमारी सांस्कृतिक अस्मिता पर और भी अधिक प्रबल कुठाराघात था। इस प्रकार की परिस्थितियों को समय की गति कहा जा सकता है, जिस पर हमारा अधिक वश नहीं था। इस संक्षिप्त इतिहास पर ध्यान देने से यही प्रतीत होता है, कि वैश्विक आधार पर भी काल (रूपी-देवता) का अपना अस्तित्व और धर्म है और मनुष्य उसकी शक्ति के सामने असहाय और दुर्बल है। इसीलिए आज हमें ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, जो हमारे लिए कठिन चुनौतियाँ बन चुकी हैं। तमाम भाषाई प्रश्न भी इसी स्थिति का परिणाम हैं, जिन्हें केवल और केवल सूझ-बूझ से ही सुलझाया जा सकता है, राजनीति या राजनीतिक इच्छा-शक्ति के प्रयोग से नहीं।

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February 04, 2023

अनुवाद और लिप्यन्तरण

एक सामयिक और ज्वलन्त प्रश्न

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पिछले 30 वर्षों से अपने अनुवाद-कार्य में मैंने अनुभव किया है कि विभिन्न भाषाएँ और उनकी लिपियाँ जिस भाषा-चेतना से प्रेरित और घनिष्ठतः संबद्ध होती हैं, उस भाषा-चेतना को हृदय से अनुभव कर लिए जाने पर भी एक भाषा से दूसरी भाषा में किया जानेवाला अनुवाद उतना सरस और स्वाभाविक नहीं हो सकता, जितना कि मूल भाषा में लिखी गई सामग्री हो सकती है। भारतीय भाषाओं की एक विशेषता यह है कि सभी भाषाएँ परस्पर अत्यन्त घनिष्ठता से जुड़ी होने से किसी भी एक भाषा से किसी भी दूसरी भाषा में किया जानेवाला अनुवाद लिपियों की भिन्नता / समानता / असमानता के बावजूद भी बहुत हद तक मूल भाषा में लिखी गई सामग्री का बहुत श्रेष्ठ भावानुवाद  भी हो सकता है। इसलिए हम देखते हैं कि गुजराती, असमिया, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, ओड़िया और हिन्दी, सभी भाषाओं में लिखे गए साहित्य के विभिन्न अनुवाद इन सभी भाषाओं के पाठकों को समान रूप से प्रिय होते हैं और प्रभावित भी करते हैं। वे उस औसत भारतीय के जीवन को बहुत सुन्दर ढंग से प्रदर्शित करते हैं जिसकी मातृभाषा इनमें से कोई भी क्यों न हो। उत्तर भारत के संबंध में यह विशेष रूप से सत्य है। क्योंकि मूलतः सभी उस भारतीय संस्कृति के ही विभिन्न रूप हैं जो स्थान स्थान पर भिन्न भिन्न होते हुए भी एक ही दृढ अन्तर्सूत्र में पिरोई हुई मोतियों, या फूलों की माला की तरह है।

दक्षिण भारत का रुख करें तो हम देख सकते हैं कि मलयालम, तेलुगु और कन्नड भाषाएँ लिपि की दृष्टि से और रचना की दृष्टि से भी मराठी से बहुत समान हैं, जबकि तमिऴ ही एकमात्र ऐसी भाषा जान पड़ती है, जो इन सबसे हटकर कुछ अलग रंग रूप की प्रतीत होती है। मैं मानता हूँ कि अच्छी और शास्त्रीय तमिऴ सीखने के लिए वैसा ही धैर्य रखना होता है, जैसा कि शास्त्रीय संगीत या (वैदिक) संस्कृत सीखने के लिए आवश्यक हो सकता है। संगीत फिर चाहे उत्तर भारत का हो, या फिर दक्षिण भारत का हो। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारणों से तमिऴ भाषा, जिसे सर्वाधिक प्राचीन भाषा माना जाता है, दक्षिण भारत की भाषाओं और उत्तर भारतीय भाषाओं के बीच सेतु की भूमिका की तरह भी कार्य कर सकती है। तमिऴ और संस्कृत भाषाओं के पारस्परिक और ऐतिहासिक संबंधों के बारे में विस्तार से मैंने अपने पुराने पोस्ट्स में लिखा है, उसकी पुनरावृत्ति करना यहाँ अनावश्यक जान पड़ता है। मंतव्य यह है कि समस्त भारतीय भाषाओं और उनकी लिपियों के बीच एक गहरा, स्वाभाविक सामन्जस्य है और वही सामञ्जस्य हिन्दी भाषा को उन विभिन्न भाषाओं से जोड़ता भी है ही। सांस्कृतिक दृष्टि से इसलिए एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करना सरल और रोचक भी हो सकता है, चाहे लिप्यन्तरण के माध्यम से किया जाए, या बिना लिप्यन्तरण किए ही किया जाए। प्रचलित बोली और लिखी जानेवाली तमिऴ के साथ एक कठिनाई यह है कि तमिऴ लिपि में लिखे गए किसी एक ही व्यञ्जन का उच्चारण किसी दूसरे ध्वनिसाम्य वर्ण की तरह भी किया जा सकता है जैसे :

க का प्रयोग क, ख, ग और घ के लिए, 

ச का प्रयोग च, छ, ज और झ के लिए, 

த का प्रयोग त, थ, द तथा ध के लिए, और 

ப का प्रयोग प, फ, ब तथा भ के लिए किया जाता है, इसलिए इस भाषा को पढ़कर सीखना तब तक असंभव ही है जब तक कि इन ध्वनिसाम्य वर्णों का उच्चारण सुनकर नहीं सीखा जाता। यही तमिऴ भाषा की शक्ति भी है, और कठिनाई भी।

किसी हद तक यही समस्या फारसी लिपि में लिखी गई सिन्धी,  उर्दू, और कश्मीरी भाषाओं के संबंध में भी है। तमिऴ भाषा के बारे में इस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है कि इसकी लिपि का देवनागरी से लिपिसाम्य वैसा ही स्पष्ट है जैसा कि भारत की अन्य भाषाओं का लिपिसाम्य देवनागरी लिपि से है। दूसरी ओर, उर्दू, काश्मीरी और सिन्धी आदि भाषाओं को फ़ारसी में लिखे जाने के कारण उनकी लिपि की देवनागरी लिपि से दूर दूर तक कोई समानता नहीं है। इसलिए उर्दू, काश्मीरी, सिन्धी भाषाओं और हिन्दी को भी फ़ारसी लिपि में लिखा जाना भयंकर दुर्भाग्य ही है / था, जिसके कारण ये भाषाएँ समय के साथ इस प्रकार से बदलती चली गईं कि अब विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच बहुत दूरी पैदा हो गई है।

जब मैंने इस बारे में पढ़ा कि किसी के द्वारा रामचरितमानस का  उर्दू में अनुवाद किया जा रहा है, तो मुझे इस पोस्ट को लिखने की जरूरत महसूस हुई। इस प्रकार का अनुवाद करने के पीछे कोई प्रबल प्रेरणा भी अवश्य ही होगी यह भी सच हो सकता है, किन्तु यह कार्य कितना कठिन और कितना श्रमसाध्य है इसे तो इस कार्य को करनेवाला ही अधिक अच्छी तरह जान सकता है। दूसरी ओर, यह भी मानना होगा कि न तो संस्कृत पर हिन्दुओं का एकाधिकार है, और न ही उर्दू, अरबी, या फ़ारसी आदि पर  मुसलमानों या इस्लाम के मतावलंबियों का ही कोई एकाधिकार हो सकता है। और यह भी गले न उतरनेवाला ही एक कटु सत्य है कि रामचरितमानस या ऐसे किसी अन्य धार्मिक ग्रन्थ का उर्दू में अनुवाद किए जाने पर समाज के एक बड़े वर्ग को आपत्ति होगी। और यह आपत्ति उठानेवालों में हिन्दुओं और मुसलमान मतावलंबियों दोनों ही वर्गों के लोग होंगे। 

संभवतः इसका एक बेहतर तरीका यह भी हो सकता है कि इस प्रकार के धर्म-विशेष के ग्रन्थों को अरबी, फ़ारसी या नस्तालीक लिपि में यथावत् लिखा जाए। हालाँकि मुझे नहीं लगता, कि यह कार्य भी सरल होगा।

विभिन्न मतावलंबियों की धार्मिक मान्यताओं के बीच पारस्परिक मतभेद भी ऐसे कार्य में एक बड़ा अवरोध हो सकता है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

यह एक प्रासंगिक, महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है, किन्तु कुछ भी कह पाने के लिए मैं स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहा हूँ !

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September 14, 2019

14 सितम्बर 2019 / हिन्दी-दिवस

आज का दिन 
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हिन्दी-दिवस 14, सितम्बर 2019 की शुभकामनाएँ।
पिछले किसी पोस्ट में ग्रन्थ-लिपि के बारे में लिखा था।
यह उल्लेख किया था कि किस प्रकार मराठी और संस्कृत भाषाएँ जिस लिपि में लिखी जाती हैं उसी  देवनागरी लिपि में हिन्दी भी लिखी जाती है। और इससे तीनों ही भाषाएँ अधिक समृद्ध और प्रचलित हुई हैं।
इसी प्रकार अगर हिंदी-प्रेमी दूसरी सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी-लिपि में लिखने लगें तो उनके पाठक-वर्ग की वृद्धि ही होगी और वे भाषाएँ भी और अधिक बोली और समझी जाने लगेंगी।
अंग्रेज़ी के साम्राज्य को इसी तरह समाप्त किया जा सकता है।
यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अंग्रेज़ी सभी भारतीय भाषाओं के प्रचलन के धीरे-धीरे कम होने की दिशा में अग्रसर है। इसके साथ यह भी संभव है कि केवल देवनागरी लिपि में ही अंग्रेज़ी को लिखे जाने का प्रयास किया जाए।
संक्षेप में : 
इस प्रकार अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने-बोलनेवाले अनायास इस लिपि के अभ्यस्त होने लगेंगे। यही बात उर्दू के लिए भी सत्य है। उर्दू का प्रचार-प्रसार भी इसे देवनागरी लिपि में लिखे जाने पर अधिक होगा।
किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार मुख्यतः तो उनके प्रयोग की आवश्यकता के ही कारण होता है, और किसी भी भाषा को समाज पर थोपा नहीं जा सकता। कोई भी मनुष्य जितनी अधिक भाषाएँ सीखने और इस्तेमाल करने लगता है, उसका मस्तिष्क उतना ही प्रखर और मेधावी होने लगता है।
भारतीय लोगों के पूरे विश्व में सर्वाधिक सफल होने का यही कारण है कि वे अंग्रेज़ी और किसी एक भारतीय भाषा के साथ साथ अनेक भाषाएँ जानते हैं। दूसरी ओर तमाम विदेशी जैसे रूसी, चीनी, जापानी आदि भी भारतीयों के मुकाबले इसीलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि अपनी भाषा के आग्रह के कारण वे अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाएँ सीखने में कम रूचि लेते हैं।  भारतीय भले ही बाध्यतावश अंग्रेज़ी सीखते हैं किन्तु अंग्रेज़ी के शब्द मूलतः संस्कृत से उसी प्रकार व्युत्पन्न किए जा सकते हैं जैसे कि तमाम भारतीय भाषाओं के शब्द किए जा सकते हैं। 
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August 31, 2019

इज्यते

अरबी, उर्दू, फ़ारसी, हिब्रू, संस्कृत
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'गीता-सन्दर्भ' मेरा एक और ब्लॉग है जिसे आप मेरी profile पर देख सकते हैं।
अपने भाषा-अध्ययन के अनुभव से मैंने पाया कि जहाँ तक हो सके, किसी भी भाषा का अध्ययन किसी दूसरी भाषा के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए। हर भाषा का अपना एक विधान होता है जिसे तब अनायास ग्रहण कर लिया जाता है, जब हम उस भाषा को सुनकर और व्यवहार में उसके प्रयोग को देखकर धीरे-धीरे उसकी सूक्ष्मताओं पर ध्यान देने लगते हैं।
इसलिए किसी भी भाषा को बिलकुल नए सिरे से सीखना सबसे बेहतर है।  वास्तव में तो भाषा का व्याकरण सीखने की ओर बहुत बाद में, तब ध्यान देना ठीक है, जब प्रयोग में लाकर, हम भाषा को किसी हद तक सीख चुके होते हैं।
व्याकरण का इतना ही उपयोग है कि भाषा की शुद्धता की परीक्षा की जा सके।
मैंने इसी प्रकार से संस्कृत का अध्ययन किया।  मेरा दावा नहीं कि मेरा संस्कृत भाषा का ज्ञान व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध है।
संस्कृत व्याकरण के नियमों और विशेषताओं को समझने से पहले मैंने संस्कृत के ग्रंथों को उनके मौलिक रूप में पढ़ना प्रारम्भ किया। मुझे भाषा से प्रेम था, और उसका अर्थ का मेरे लिए गौण महत्त्व का था।
इसलिए संस्कृत की समझ मुझमें वैसे ही आई, जैसे अपनी मातृभाषा को सीखते समय हम उसके अर्थ पर अधिक ध्यान दिए बिना ही उसे समझने लगते हैं। यह मातृभाषा कोई भी हो, बहुत बाद में जाकर अर्थ की गूढ़ताओं पर हमारा ध्यान जाता है।
संस्कृत का यथेच्छ और पर्याप्त, संतोषप्रद ज्ञान होने के बाद ही मैंने उसकी सूक्ष्मताओं पर ध्यान दिया। यहाँ तक कि व्याकरण और छंद-शास्त्र का अध्ययन तक न करते हुए मैं श्लोकों को लिखने / रचने लगा, -और तब जाकर मुझे व्याकरण और छंद-शास्त्र को समझने की आवश्यकता अनुभव हुई।
इसी प्रकार मैंने अंग्रेज़ी का अध्ययन किया।
शायद मैं उर्दू, फ़ारसी, अरबी, हिब्रू आदि का भी अध्ययन ऐसे ही कर सकता था, किन्तु उस विषय में मेरी एक समस्या थी। मुझे बार बार अनुभव होता था कि भाषा हमारी चेतना (मानसिकता, मनोविन्यास) को प्रभावित करती है, और चेतना भी भाषा को उसी तरह प्रभावित करती है। इसमें कुछ संशय मेरे मन में इसलिए भी था कि जिन भाषाओं से मेरा थोड़ा-बहुत परिचय था, वे सभी बाईं से दाईं और लिखी जाती हैं - जैसे कि अंग्रेज़ी, हिन्दी, मराठी, बाँग्ला, यहाँ तक कि  तमिळ, मलयालम, कन्नड, तेलुगु आदि भी। रशियन, फ्रेंच, जर्मन, यहाँ तक कि ग्रीक भी।
चूँकि मानव-मस्तिष्क में तंत्रिकाएँ (nerves) क्रमशः बाएँ और दाएँ हिस्सों (lobes) से निकलकर हमारे शरीर के क्रमशः दाएँ तथा बाएँ अंगों में फैलती हैं इसलिए यह अनुमान लगाया जाना विसंगतिपूर्ण नहीं है कि बाईं से दाईं ओर लिखी जानेवाली भाषाओं को प्रयोग करनेवाले तथा दाईं से बाईं ओर लिखी जानेवाली भाषाओं को प्रयोग करनेवाले लोगों की चेतना और मानसिकता में अवश्य ही कोई विशेष फ़र्क होता होगा।
(इसे और अच्छे तरह समझने के लिए श्री V.S.Ramachadran के कार्य के बारे में जानना सहायक हो सकता है। )
सभी भाषाएँ स्वतंत्र रूप से, बिना किसी अन्य भाषा के माध्यम से सीखने के अपने अनुभव में मैंने पाया कि किसी भी भाषा की रचना (structure) को अधिक अच्छी तरह से जानने के लिए यह ज़रूरी है कि उसे सीधे ही प्रयोग में लाने का अभ्यास किया जाना अधिक उपयोगी है।
बहुत बाद में हम अवश्य ही अनुवाद के माध्यम से अपने भाषा-ज्ञान को समृद्ध और शुद्ध कर सकते हैं।
ऊपर गीता का सन्दर्भ इसी परिप्रेक्ष्य में है।
गीता पढ़ते हुए मेरा उन अनेक संस्कृत शब्दों से परिचय हुआ जिनमें सीधे ही किसी दूसरी भाषा के विभिन्न  शब्दों के स्वरूप और उसी अर्थ की झलक भी देखी जा सकती है, जो उन भाषाओं में उनका अर्थ है।
उदाहरण के लिए अस्मि, अस्मद्, युष्मत्, आदि से I am, you, आदि तथा वयं से we त्वं से Thou, du (जर्मन) उल्लेखनीय हैं। तत् से the और that, तत्र से there, ...  
इस प्रकार का विधान जर्मन और किसी हद तक फ़्रेंच में भी पाया जाता है, जहाँ मूल प्रातिपदिक पद से उसका विभक्ति रूप बनाया जाता है।
ऐसा ही अनुभव आज तब हुआ, जब मैं 'इज्यते' शब्द के बारे में अपने गीता-सन्दर्भ ब्लॉग के नए पोस्ट में लिख रहा था।  मुझे याद आया कि अरबी भाषा के इज़्ज़त और इजाज़त शब्दों का इस्तेमाल अरबी भाषा में उसी अर्थ में होता है, जैसा कि इसे संस्कृत में किया जाता है।
भाषाशास्त्र के विद्वान् कुछ भी कहें, मुझे लगता है कि एक भाषा का मूल किसी दूसरी भाषा में खोजना और सभी भाषाओं का स्रोत किसी एक प्राचीन भाषा में खोजना मूलतः भ्रामक है। भाषाओं में परस्पर कोई गहरा संबंध है, इसमें शक नहीं किन्तु ऐसी कोई भाषा खोजना जो सब भाषाओं का मूल हो, व्यर्थ का हठवाद ही अधिक है।
मेरी अपनी मातृभाषा मराठी से मुझे यह लाभ हुआ कि मैं यह समझ सका कि किसी भाषा को एक से अधिक लिपियों में लिखने पर भाषा समृद्ध ही होती है। स्पष्ट है कि देवनागरी को अपनाए जाने से मराठी का कोई नुक्सान कदापि नहीं हुआ। इसी प्रकार उर्दू को हिंदी में लिखे जाने से उर्दू अधिक समृद्ध होकर और भी पहली-फूली। उर्दू के लिए अरबी लिपि का आग्रह ऐतिहासिक दृष्टि से ठीक हो सकता है, किन्तु इससे उर्दू की लोकप्रियता में कमी भी आती है। वास्तव में तमिल की भी यही स्थिति है।  जिन्हें तमिल आती है उन्हें तमिल के लिखित रूप और उच्चारण के बारे में कोई कठिनाई नहीं आती होगी, किन्तु यदि तमिल को उसकी ग्रन्थ-लिपि में भी लिखा जाए तो तमिल और भी समृद्ध ही होगी। इस प्रकार यह तमिल के लिए लाभ का ही सौदा होगा।  हाँ जिन्हें तमिल के प्रचलित रूप से संतोष है, वे इसका इस्तेमाल भी यथावत् करते रहें तो इससे धीरे-धीरे दूसरे भी ग्रन्थ-लिपि में रुचि लेकर उस ओर आकर्षित हो सकते हैं। 
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