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February 08, 2022

और शरद जोशी

आषाढ़ का एक दिन,

और नावक के तीर,

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कभी इन दो पुस्तकों (!) के बारे में पढ़ा-सुना था। 

अगर मेरी याददाश्त ठीक है, तो इनमें से प्रथम हिन्दी का नाटक है, जिसकी पृष्ठभूमि में संस्कृत की, संभवतः महाकवि कालिदास की रचना "मेघदूतम्" है।

सोचता हूँ कि एक बार पाठ कर लूँ। संस्कृत की पुस्तकों के बारे में अकसर अनुभव होता है, कि अगर उन्हें किसी आध्यात्मिक या धार्मिक संस्था द्वारा प्रकाशित किया गया हो तो प्रायः उनकी छपाई कलात्मक और सुंदर होती है, किन्तु किसी व्यावसायिक प्रकाशन द्वारा किया गया उनका प्रकाशन वास्तव में पाठक के धैर्य की परीक्षा ही करता है।

"आजकल किताबें कौन पढ़ता है!"

जब मैंने 1990 में नौकरी छोड़ दी थी और अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक की एक अंग्रेजी / मराठी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने में उत्साह से संलग्न था तब मेरे एक मित्र और कॉलेज के  सहपाठी तथा बैंक के मुझसे जूनियर सहकर्मी ने मेरे इस वक्तव्य पर उपरोक्त टिप्पणी की थी।

यद्यपि मुझे उसकी इस टिप्पणी पर न तो आश्चर्य और न ही दुःख हुआ, क्योंकि उससे मुझे ऐसी कोई आशा थी, कि वह मेरी बात को महत्व देगा।

वह बात वहीं ख़त्म हो गई। 

किन्तु जिन पुस्तकों का अनुवाद मैंने किया, उनके प्रकाशकों ने जिस कुशलता और दक्षता से मेरे कार्य का मुद्रण और प्रकाशन किया वह अवश्य ही प्रशंसनीय था। 

यद्यपि उस मित्र की यह बात भी अपनी जगह शायद सही ही थी कि आजकल किताबें कौन पढ़ता है।

सचमुच बहुत से प्रकाशक संस्कृत के ग्रन्थों का न तो प्रूफरीडिंग ठीक से करते हैं, न सौ पचास साल पहले मुद्रण करना इतना आसान था, जैसा कि आजकल कंप्यूटर से डेस्कटॉप-एडिटिंग होता है। बीच में कुछ समय इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटरों के आने से यह कार्य अवश्य ही बेहतर ढंग से होने लगा था, किन्तु जैसे मोबाइल के आगमन के बाद पेजर कालातीत (redundant, obsolete, out-dated) हो गए वैसे ही डेस्कटॉप एडिटिंग के आने से पुराने लिथो-प्रिन्टर्स भी कहीं ओझल हो गए। 

किन्तु अब बहुत सा साहित्य (विशेषतः संस्कृत भाषा का) on -line भी पाया जा सकता है पर वहाँ इन्हीं प्रोफेशनल्स कारणों से संस्कृत ग्रन्थों की दुर्दशा भी होती है।

'नावक के तीर' का अनुवाद क्या होगा?

मुझे लगता है यह किसी पत्रिका या अन्यत्र लिखा जाने वाला उनका कोई स्तंभ (column) रहा होगा। 

निश्चित ही 'नावक' शब्द से श्री शरद जोशी का तात्पर्य 'नाविक' अर्थात् नाव-वाला ही रहा होगा और 'तीर' शब्द से 'बाण' नहीं, -'तट' ही रहा होगा।

नौ, नाव, नावक, नाविक और अंग्रेजी के navigation, naval, navy, एक ही अर्थ को इंगित करते हैं।

गीता का यह श्लोक दृष्टव्य है :

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।।

(गीता 2/67)

शायद यह समय ही है जो वायु की तरह नेट-सर्फिंग करनेवाले नेवीगेटर को कहीं से कहीं ले जाता है! 

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July 10, 2021

भीगा धरती का तन-मन!

कविता : 10-07-2021

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तपती जलती सूखी धरती को, 

आकर आतुर मेघों ने सींचा,

कोई बिछा गया धरती पर,

धीरे धीरे हरा गलीचा!

कण कण तृप्त हुआ धरती का, 

सोते निर्झर चंचल होकर, 

दौड़ पड़े हर ओर भूमि पर,

भीगा धरती का तन-मन! 

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July 16, 2015

आज की कविता / 'अच्छे दिन!'

आज की कविता
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'अच्छे दिन!'
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©

वह ढोती,
सिर पर,
घास का गट्ठर,
घर पहुँचकर,
देगी गाय को,
गाय को दुहकर,
बनाएगी चाय,
पति आता होगा,
पिएँगे दोनों,
ए.टी.एम. कार्ड,
उसके पास भी होगा,
शायद मोबाईल भी,
दोनों में शायद बैलेंस भी हो,
शून्य ही सही !
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August 21, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -17

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -17
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राम (रीतेन्द्र शर्मा) से बहुत समय बाद आज संवाद हुआ।  और फिर आज ही एक कविता लिखी,
It is all in the Stars   
उस वक़्त मैं वह मुलाक़ात याद करने की कोशिश कर रहा था जो डॉ. वेदप्रताप वैदिक तथा हाफिज सईद के बीच 2 जुलाई 2014 को हुई थी।
दरअसल मैं 15 अगस्त के लाल किले पर दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण के उस अंश के बारे में सोच रहा था, जिसमें उन्होंने सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच हुए संवाद का जिक्र किया था।
'मारनेवाले से बचानेवाला बड़ा होता है'
सिद्धार्थ या देवदत्त की माँ ने निर्णय दिया था, और हंस सिद्धार्थ को मिल गया जिसने उसके शरीर पर देवदत्त के तीर से लगे घाव का उपचार किया।
प्रधानमंत्री ने इस कथा के पात्रों का सीधा उल्लेख तो नहीं किया, लेकिन मैंने इसे इसी रूप में पढ़ा था।
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हाफिज सईद से मिलने और मिलकर सुरक्षित लौट जाने से यही साबित होता है कि बचानेवाला अवश्य ही मारनेवाले से बड़ा होता है।  खुद डॉ.वेदप्रताप वैदिक को लग रहा था कि उन्हें हाफिज सईद से नहीं मिलना चाहिए था। खैर अंत भला सो सब भला।
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मुझे लगता है कि इस घटना और इसके समय से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं, मैं नहीं कह सकता कि जब श्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के इस प्रसंग का जिक्र किया तो उन्होंने यह डॉ.वेदप्रताप वैदिक और हाफिज सईद की मुलाक़ात के सन्दर्भ में किया था या किसी और वज़ह से किया होगा।
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ध्वंस का उल्लास अभी जारी है।
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June 25, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -7,

 कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -7,
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ध्वंस के उत्सव में पिछला बहुत कुछ भस्म हो चुका है। लेकिन क्षति कोई नहीं हुई।
बल्कि विस्तार, विकास, समृद्धि, उन्नति और उत्कर्ष ही उत्कर्ष होता चला गया है।
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कल सोच रहा था एक ज्वलन्त मुद्दे पर लिखूँ, जिसमें मेरा राष्ट्र पिछले हज़ार वर्षों से जल रहा है।  हाँ डर तो लगता है कि कहीं इसमें उंगलियाँ  न जला बैठूँ !
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वर्ष 2004 में उज्जैन में सिंहस्थ के समय किताबों की जिस दुकान पर काम करता था वहाँ रखने / विक्रय के लिए कुछ पुस्तकें श्री रमणाश्रमम् तिरुवन्नामलाई  मँगवाईं थीं।  चूँकि 'सद्दर्शन' उनके पास उपलब्ध नहीं था (आउट ऑफ़ प्रिंट था) , तो मुझे मौका मिला कि इसी बहाने से इस पुस्तक के हिंदी अनुवाद को 'एडिट' कर प्रेस से नया संस्करण छपवा लिया जाए।
महर्षि की असीम कृपा से श्री रमणाश्रमम् तिरुवन्नामलाई के सर्वाधिकारी महोदय ने इसके लिए मुझे अनुमति प्रदान कर दी। (अभी भी मेरे पास इस संस्करण की दो सौ के क़रीब प्रतियाँ हैं।) चूँकि पुराना संस्करण तीस साल पहले छपा था, इसलिए उसमें वर्तनी की भूलें होना स्वाभाविक ही था। नए संस्करण को मेरे परिचित श्री रामकिशनजी तायल 'फ़ौजी' ने पूरे उत्साह और प्रसन्नता से उनकी प्रेस में कंप्यूटर-सेट और मुद्रित भी करवाया।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण उल्लेखनीय बात यह थी कि यह अनुवाद हिमालय प्रदेश के ज्योतिर्मठ के श्री स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने किया था। पहला संस्करण 1955 में प्रकाशित हुआ था।
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उक्त ग्रन्थ की 'भूमिका' यथावत् यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ :
                                                     
                                               भूमिका
          
  यह ग्रन्थ भगवान् रमण महर्षि ने तमिष्  में लिखा था। इसका श्री वासिष्ठ गणपति मुनि ने संस्कृत में अनुवाद किया।  अनुवाद का यह काम उन्होंने उस समय पूरा किया जब वे सिरसी, उत्तर कर्नाटक में तीव्र तपश्चर्या कर रहे थे।
श्री भारद्वाज कपाली श्री गणपति मुनि के प्रसिद्ध शिष्य थे।  वे काफी समय तक अपने गुरु के साथ रहते थे।  उन्होंने ही उसका संस्कृत भाष्य लिखा और अंग्रेजी अनुवाद भी किया।  उन दोनों पुस्तकों को हमने प्रकाशित किया है।
हिमालय  प्रदेश के ज्योतिर्मठ के श्री स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने श्री कपाली शास्त्री के संस्कृत अनुवाद के आधार पर अपनी गंभीर प्रस्तावना सहित यह हिंदी भाष्य तैयार कर अनुग्रहीत किया है।  हमारा दृढ विश्वास है की इस छोटी सी बहुमूल्य पुस्तक से हिन्दी भाषी साधकों को मार्गदर्शन के साथ साथ प्रेरणा भी प्राप्त होगी।
यथा-क्रम इस पुस्तक के प्रकाशन में श्री भगवान्  व आश्रम के परम भक्त श्री हरिहर शर्मा ने पूरा सहयोग दिया है।
श्री रमणाश्रमम्
1-3-'55                                                                             प्रकाशक
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(क्रमशः ......  कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 8  ) 

June 22, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 6

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 6
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आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष की दसवीं तिथि है ।
आषाढ़ में वर्षा शुरू हो जाती है  ।
आषाढ़ आशा और आढ्यता का संगम है । जब ग्रीष्म अपने चरम पर होता है और काले कजरारे मेघा धरती का सर्वेक्षण करते हैं । मुझे नहीं पता, कि वे जानते हैं या नहीं कि उन्हें किस राह से बचना है और किस छत को भिगोना है!
मेरे  चर्यापथ पर लगे बिल्वमंगल / बनखोर के वृक्ष ध्वंस के उल्लास से गुज़रकर नए फलों से लद रहे हैं। हरे कच्चे फल जिनमें अभी बीज भी नहीं पड़े । वहीँ उनके साथ कुछ पुराने भी अपने दाँत दिखाते हुए पत्तों के बीच नज़र आ जाते हैं ।
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एक वृक्ष और है, मेरे घर के सामने के उपेक्षित से पार्क में । जिसमें शेविंग-ब्रश जैसे फूल आते हैं, गूगल-सर्च किया, लेकिन नहीं मिला उसका नाम । बचपन से उसकी भीनी भीनी महक अच्छी लगती थी । लेकिन अधिक देर तक साथ रहे तो सर दर्द होता है ।
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हम सुख को सहेजने लगते हैं और वह क्लेश हो जाता है ।
आशा और आढ्यता का संगम कभी कभी क्लेश भी बन जाता है ।
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बहरहाल, वर्षा की प्रतीक्षा है !
आओ देवि ! बरसाओ कृपा !
अभी तो सूरज बरसा रहा है,
ताप, उत्ताप, संताप, प्रताप, …
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ध्वंस का उल्लास जारी है, और मैं उल्लसित हूँ ।
जहाँ न सुख है, न दुःख, बस शांति है और उल्लास भी ।
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