June 29, 2019

धर्म, राष्ट्र और मानसिकता

ज़रूरत !
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धर्म एक घर है !
राष्ट्र एक मानसिकता है ।
या तो हम अपना धर्म इस प्रकार बदल लें कि सबका राष्ट्र एक हो,
या, हम अपनी राष्ट्रीयता इस प्रकार बदल लें कि सबका धर्म एक हो ।
किन्तु और बड़ी कठिनाई यह है कि हममें से कुछ न तो राष्ट्रीयता बदलने के लिए राज़ी हैं, न धर्म बदलने के लिए ।
और बाक़ी लोग राष्ट्रीयता और धर्म में से केवल एक को ही बदलना चाहते हैं ।
और विडम्बना यह कि राष्ट्रीयता को माननवालों में से कुछ 'कुल दो राष्ट्रों' को मानते हैं जिसके लिए उनके अनुसार उनका धर्म ही उन्हें प्रेरित करता है ! 
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श्री राजीव दीक्षित, समस्या, समाधान, निराकरण,  दो राष्ट्रों का आग्रह   

June 27, 2019

उत्तम खेती ..

कृषि प्रधान देश भारतवर्ष
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हिंदुत्व के स्वाभिमान के प्रति जागृत होना अपनी जगह ज़रूर एक मुद्दा है तो भारत की सांस्कृतिक धरोहर और विरासत के प्रति जागृत होना भी उतना ही, बल्कि उससे भी कई गुना अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसकी उपेक्षा कर हिंदुत्व पर अड़े रहना नासमझी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी आँखें 'प्रगति' की  चकाचौंध से लुब्ध और प्रभावित हुए बिना रह सकती हैं?
निश्चित ही भारत-विभाजन के बाद देश में सहिष्णुता के चलते ही जहाँ मुसलमानों की जनसंख्या बेरोकटोक बढ़ती चली गयी वहीं पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता के चलते हिन्दुओं, सिखों यहाँ तक कि  ईसाईयों, पारसियों आदि की भी जनसंख्या घटती चली गयी।
जब प्रश्न कृषि के तरीकों को विकासशील बनाने का उठता है, तो हम कृषि के यंत्रीकरण की बात करते हैं, सिंचाई के लिए बड़े बांधों की वकालत करते हैं जिसका (तात्कालिक लाभ जो अंततः सबके लिए बहुत हानिकारक ही सिद्ध होना है), कृत्रिम खाद, कीटनाशक, खर-पतवारनाशक दवाओं के इस्तेमाल को ही कृषि-उत्पादन बढ़ाने का जरिया मान बैठते हैं। इनसे हमारी ज़मीन लगातार खराब होती जा रही है। हमारी उपज की गुणवत्ता गिरती जा रही है और हमारी सब्ज़ियों, फलों और अन्न में तमाम विषकारक पदार्थ भर गए हैं जिनसे हर कोई अनेक बीमारियों की चपेट में आ रहा है।  क्या वह भी एक बड़ी राष्ट्रीय हानि नहीं है? हमारे चिकित्सा-व्यय अनाप-शनाप बढ़ाते जा रहे हैं, और बड़े बड़े अस्पताल खुलने को हमने प्रगति का पैमाना समझ लिया है। लेकिन हम यह बिलकुल भूल बैठे हैं कि गोवंश पर आधारित कृषि से बिना उपरोक्त साधनों के ही हम कृषि से बहुत अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। देशी तरीकों से और चिकित्सा-विधियों से हम वैसे भी अधिक स्वस्थ रह सकते हैं और बहुत सी बीमारियों का इलाज़ काम खर्च में और सरलता से कर सकते हैं।  इस 'प्रगति' ने वास्तव में हमारे लिए विनाश का ही द्वार खोल रखा है।   
आज हमारी गायें सड़कों पर प्लास्टिक और अखाद्य वस्तुएँ कचरा इत्यादि खाती हैं, जबकि श्री राजीव दीक्षित जी ने परिश्रम और तर्क से यह सिद्ध और स्पष्ट कर दिया है कि केवल परंपरागत कृषि ही भारत (और पूरी धरती) की अर्थ-व्यवस्था की ताकतवर बुनियाद हो सकती है।
"उत्तम खेती माध्यम वान (वाण),
अधम चाकरी कुकुर निदान ...  "
को हमने आपने सुना होगा।
गायों के साथ बैल भी बेकार हो गए और इससे भी देश में गोहत्या को अपरोक्षतः बढ़ावा मिला यह भी हमें समझ में नहीं आता और इसलिए जब हमारे महात्मा या हिंदूवादी संगठन गोवध पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करते हैं तो हमारी बुद्धि यह कुंठित हो जाती है और हम नहीं समझ पाते कि बेकार गायों का क्या करें! लेकिन यदि हम गोवंश पर आधारित कृषि अपनाएँ तो एक और जहाँ पूरा गोवंश हमारे लिए आय का बहुत बड़ा साधन हो सकता है, वहीं कृषि उपकरणों के न्यूनतम इस्तेमाल से बहुत से हाथों को रोज़गार भी मिल सकता है।
गोहत्या के प्रश्न पर धार्मिक आधार पर सोचा जाना तो अवश्य ही विचारणीय है किन्तु इसके साथ इसे राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे की तरह देखा जाना और भी अधिक ज़रूरी और हमारे लिए हितकर है।
जनसंख्या का मुद्दा भी ऐसा ही है जिसे धर्म से अलग कर राष्ट्रहित में क्या है इस आधार पर देखा जाना चाहिए।संलग्न विडिओ में मौलाना मुफ्ती साहब तर्क कर रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के बजाय विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ज़ाहिर है वे मुस्लिम समाज को जनसंख्या-नियंत्रण करने के लिए राज़ी नहीं कर सकते।  बल्कि उनका छिपा एजेंडा तो यही है कि मुसलमान अपनी आबादी बढ़ाते रहें। और वे कह रहे हैं कि प्रगति (development) होने पर ही लोग जनसंख्या पर नियंत्रण करने लगेंगे। यह तर्क कितना हास्यास्पद है ! दूसरी तरफ यद्यपि गरीबी का अर्थशास्त्र भी एक हद तक इसे सही मानता है क्योंकि समृद्ध (और प्रगतिशील) होने पर मनुष्य 'मनोंरंजन' के दूसरे तरीकों को अपनाने लगता है, क्योंकि गरीब के पास तो 'मनोंरंजन' का यही एक साधन होता है।
इसलिए मुसलमान गरीब हो या अमीर, चार शादियाँ कर सकता है, दर्ज़न भर बच्चे पैदा कर सकता है और हिन्दू एक से अधिक शादी करने पर जेल जाता है । 
इस प्रकार भारत में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है जिसका कारण है क़ानून अन्यायपूर्ण होना ।
जब भारत-विभाजन हुआ था, क्या उसी समय क़ानून द्वारा इस विसंगति और भेदभाव को दूर कर दिया जाना ज़रूरी नहीं था ? अब समस्या बहुत ही विकराल हो चुकी है जिसका प्रमुख कारण स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद से जारी 'तुष्टिकरण' और वोट-बैंक की राजनीति है।
 राष्ट्र के हित में क्या यही उचित न होगा कि अब भी हम राजनीति की इस कुटिलता को समझ सकें?
अवश्य ही कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि किसी भी नागरिक के लिए उसके होनेवाले बच्चों की अधिकतम संख्या तय कर दी जाए और जिसे सभी धर्मों के लोगों पर कड़ाई से लगाया जाए ?        
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June 20, 2019

Walk, Walk, walk ...& Talk, Talk, Talk

चरैवेति-चरैवेति 
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श्री राजीव दीक्षित जी का विडिओ।
अभी लीची को जिसका संभावित कारण बतलाया जा रहा है,
बिहार में फैले उस
चमकी बुख़ार (acute encephalitis syndrome) 
के इलाज़ के लिए शायद यह काम आ सके।
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तुलसी, Ocimum-Basilicum (?),
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तरीका:
श्याम तुलसी का काढ़ा बनाएँ।
उसमें थोड़ी नीम-चढ़ी गिलोय डाल दें।
थोड़ी सोंठ भी मिला दें।
और थोड़ी छोटी पीपर / पिप्पल भी।
यह काढ़ा बहुत कडुआ होता है, इसलिए इसमें थोड़ा सा गुड़ भी मिला दीजिए।
एलोपैथिक इलाज़ के जो खतरे हैं, उनका वर्णन श्री राजीव भाई ने विस्तार से किया ही है।
यह पोस्ट सिर्फ जानकारी के लिए है, प्रचार या विज्ञापन के लिए नहीं।
कोई भी प्रयोग करने से पहले पूरी सावधानी से अपनी जिम्मेदारी पर ही करें।
विडिओ में कहा गया है कि उपरोक्त ओषधि किसी भी प्रकार के ज्वर के उपचार के लिए लाभप्रद है।
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होम्योपैथी में Ocimum x 200 भी यही कार्य कर सकता है किन्तु उसमें सिर्फ तुलसी होती है।   
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'वर्णसाम्य' तथा 'अर्थसाम्य'

गंगा-जमनी तहज़ीब 
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हिज़्ब अरबी भाषा का शब्द है या नहीं मैं नहीं जानता, लेकिन ऑक्सफ़ोर्ड हिंदी-इंग्लिश-डिक्शनरी के अनुसार तहज़ीब शब्द फ़ारसी से हिंदी में आया है। महफ़िल अरबी भाषा का शब्द है। महफूज़, महज़ भी अरबी भाषा से हिंदी में आए हैं। अरबी से हफ़ीज़, हाफ़िज़, मुहाफ़िज़, महफूज़, हिफ़ाज़त कैसे बने हैं इसका अनुमान लगाया जा सकता है।  मुझे अरबी लिपि का ज्ञान नहीं है, उर्दू (लिपि) से भी मैं लगभग अनभिज्ञ हूँ। लेकिन अरबी भाषा का हिजरत (exodus) शब्द है, जो मूलतः अलगाव या पलायन के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है।  'हिजरी' सम्वत् का प्रारंभ इसी 'हिजरत' से हुआ था। इसी हिजरत से निष्पन्न 'मुहाजिर' उसके लिए प्रयुक्त होता है जो बाहर से आया है। हिंदी में प्रवासी का अर्थ है, जो कुछ तय समय के लिए कहीं आता-जाता रहता है। आप्रवासी का अर्थ है जो प्रवास करने के बाद बाहर कहीं स्थायी रूप से बस गया है।
संस्कृत में 'उर्द्' धातु (भ्वादिगण,  माने -- मानं परिणामं च एवं क्रीड़ायां) अर्थात् तुलना और संकेत करने,  तथा
खेलने / व्यवहार के अर्थ में प्रयुक्त होती है। 'उर्दू' के उद्भव के जो ऐतिहासिक कारण बतलाए जाते हैं वे केवल इस सरल से तथ्य पर पर्दा डालने के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं। यह स्पष्ट है कि बाहर से आए अरबी, तुर्क, फ़ारसी, मंगोल, उज़बेक आक्रमणकारी अतिथियों से संपर्क-भाषा के रूप में जो भाषा अस्तित्व में आई उसे ही 'उर्दू' का नाम मिला।     
'मह' और 'पीलु' दोनों संस्कृत के शब्द हैं जिनसे अंग्रेज़ी और दूसरी यूरोपीय भाषाओं के अनेक शब्द बने हैं 'वर्णसाम्य' तथा 'अर्थसाम्य' के द्वारा जिनके संस्कृत से उद्भव की पुष्टि की जा सकती है। संस्कृत में मेघ, मघवा, मघवन् आदि इंद्र के लिए प्रयुक्त शब्द हैं। Mega, Metric, Meta, तथा Max इसी के सज्ञात / सज्ञाति cognate हैं, यह स्वीकार करना मुश्किल नहीं है। महफ़िल भी इसी प्रकार से बना शब्द है।  
'पीलु' से पीलुस्थान (वर्तमान फ़लस्तीन) और ग्रीक भाषा के शब्द 'phil' की उत्पत्ति हुई जो उपसर्ग (suffix) की तरह फिलोसॉफी / फ़लसफ़ा  और अनेक यूरोपीय भाषाओं में भी पाए जाते हैं।  Philosophy, Philology, Philanthropy, Philharmonic, Philanderer, King Philip, सभी से इस तथ्य की पुष्टि होती है।
हिजाब और मजहब दोनों शब्दों का अर्थ होता है आचरण करने का तरीका (विधि / विधान) जिसे पर्यायतः किन्तु सीमित अर्थ में शायद 'धर्म' कहा जा सकता है, किन्तु 'धर्म' के व्यापक वैदिक, सनातन-धर्म के अर्थ में यह उससे बहुत भिन्न हो सकता है।
तमाम मजहबों (religions) में टकराहट और परस्पर वैमनस्य इसीलिए हैं क्योंकि न तो मजहब और न religion धर्म के उपयुक्त पर्याय हो सकते हैं। धर्म-निरपेक्षता / Secularism इसीलिए एक भ्रामक शब्द है जिसे हर कोई अपने ढंग से परिभाषित करता है।
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गंगा को भगीरथ स्वर्ग से धरती पर लाये तो वह भगवान शंकर की जटाओं में रास्ता भूल गयी।
गंगा वास्तव में सतोगुणी देवता-तत्व है, जबकि यमुना सूर्यपुत्री है जिसका जन्म सूर्यपत्नी 'संज्ञा' से हुआ।
भगवान सूर्य से ही मृत्यु (के देवता यमराज) का जन्म हुआ।  तात्पर्य यह कि गंगा का आधिदैविक स्वरूप पुण्यप्रद है जबकि आधिभौतिक स्वरूप जल-तत्व है और उस रूप में वह यमुना जैसी ही एक नदी है, जिसका उद्गम हिमालय से होता है।
चूँकि यमराज तमोगुण-प्रधान हैं और यमुना रजोगुण-प्रधान, ये दोनों भाई-बहन क्रमशः तमोगुण तथा रजोगुण से प्रवृत्त हैं और इसी प्रकार इनके प्रभाव से दोनों ही धरती पर प्रजा को नियम से परिचालित करते हैं।
गंगा-जमनी तहज़ीब में इसलिए अनेक विरोधाभास और विडंबनाएँ होना आश्चर्य नहीं है।
'उर्दू' उसी तहज़ीब का असर है और यदि हम इसे देवनागरी में लिखने लगें तो इसकी शक्ति अनेक गुना बढ़ जाएगी और जैसे सभी नदियाँ बहते बहते स्वयं ही स्वयं को शुद्ध और स्वच्छ करती रहती हैं, भाषाएँ भी इस प्रकार अधिक समृद्ध और सामर्थ्यवान हो सकती हैं।
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June 16, 2019

अजनबी हर दिल अज़ीज़

आज की कविता 
दौरे-मोबाइल
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हर मरीज़ अब चाराग़र हो गया है,
लगाकर 'आला' सुनता है कानों से,
दिल की धड़कनें, दूसरे मरीज़ों की,
हर हकीम अब मरीज़ हो गया है !
जाँचता है सपने, बाँटता है तसव्वुर,
ख़याल, तस्वीरें, ग़म, मुस्कुराहटें, 
देखता है पर्दे पे चेहरे, मरीज़ों के,
सुना करता है शिकवे, शिकायतें, ग़िला,
अजनबी हर दिल अज़ीज़ अब हो गया है !
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देवास, 16 / 06 / 2019  

ईश्वर और ईशिता

पितृ-सत्ता / Male-Chauvinism 
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आज का गूगल-डूडल Father's Day को समर्पित है।
बुद्धिजीवी इस पर अथक बहस कर सकते हैं और उसे मनचाही दिशा में मोड़ सकते हैं कि भारत में कैसे पितृ-सत्तात्मक समाज में स्त्री को संपत्ति / गुलाम समझा जाता था :
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्रमर्हति।।
(मनुस्मृति 9 :3)
इस बारे में यूरोप (और आज का अमेरिका) के, - चाहे वे पूँजीवादी / साम्यवादी / नास्तिक या ईसाई मत के विभिन्न सम्प्रदाय हों, प्रगतिशील होने की दुन्दुभी बजाते नहीं थकते।
लेकिन Father's Day के दिन का इतिहास उतना ही पुराना है जिस दिन 'ईश्वर' / God को महान और संसार का सर्वशक्तिमान परम पिता कहकर उसके 'एक' होने को परम सत्य स्वीकार किया गया।
इस प्रकार सांख्य-सिद्धान्त में जिसका उल्लेख तक करने से कपिल-मुनि बचते रहे, बेचारा वही 'पुरुष' 'एक' और 'पिता' होने तक सीमित होकर रह गया।
वेदों में उस परमेश्वर को 'ईशिता' अर्थात् स्वामित्व का अधिकार कहा गया है, जो ईश्वर का 'गुण' और उपाधि है।ऋग्वेद में उसे इसलिए उसके कार्य के अनुसार, 'एक' भी, अनेक भी, शून्य भी, अशून्य भी, व्यक्ति भी, स्त्री भी, पुरुष भी, यहाँ तक कि नपुंसक (लिङ्ग) भी, आनन्द एवं अनानन्द भी, विज्ञान तथा अविज्ञान दोनों, ब्रह्म व अब्रह्म, या ब्रह्मा तथा ब्रह्माणी (सरस्वती, सृष्टिकर्ता की वह विद्या जिसके माध्यम से वह सृष्टि करता है) भी, तथा समष्टि (ब्रह्म) भी कहा गया है। उससे ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत है।
[By the way here we can see a brief reference to Abraham / इब्राहीम, the core-elements of Western Religions]
जिस प्रकार शक्कर से मिठास को अलग नहीं किया जा सकता अर्थात् यदि मिठास है तो शक्कर भी होगी ही, तथा इसी प्रकार यदि शक्कर है तो मिठास भी होगी ही, वैसे ही 'ईश्वर' नामक उस परम सत्ता को 'ईशिता' से पृथक नहीं किया जा सकता। 
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ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति।।१।।  
साब्रवीत -- अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृति-पुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च।।२।। 
अहमानन्दानानन्दौ। अहं विज्ञानाविज्ञाने। अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये। अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि।  अहमखिलं जगत्।।३।।
वेदोऽहमवेदोऽहं।  विद्याह्मविद्याहम्।  अजाहमनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम्।।४।।
(ऋग्वेद १०/०८/१२५)
अहं रुद्रेभिभिर्वसुभिश्चरामि। अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि । अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ।।५।।          
(देव्यथर्वशीर्षम्) 
क्या हमें Father's Day, Mother's Day, Women's Day जैसे दिन अलग से भी मनाना चाहिए?
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June 10, 2019

किताबे-हक़ीक़त

डॉ. आरिफ़ मोहम्मद खान
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क़िश्ती भी नहीं बदली, दरिया भी नहीं बदला,
हम डूबनेवालों का जज़्बा भी नहीं बदला !
है शौक़े-सफ़र ऐसा, इक उम्र हुई हमने,
मंज़िल भी नहीं पाई, रस्ता भी नहीं बदला,
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सूर्य-सिद्धान्त, काफ़िराना-उलूम , कौटिल्य-बुक्स  

June 09, 2019

वज़ीर / फ़क़ीर

छोटी लकीर : बड़ी लकीर
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छोटी लकीरों के फ़क़ीर,
हमेशा ही, चलते रहते हैं
लकीर के इस सिरे से,
दूसरे सिरे तक ।
पेन्डुलम जैसे,
जैसे हुआ करती है,
मुल्ला की दौड़ मस्ज़िद तक,
बड़ी नज़ीरों के वज़ीर,
चलते हैं बिसात पर,
कभी छोटी या लम्बी,
सीधी या टेढ़ी चालें ।
कभी छोटी लकीरें,
बनकर के दायरा छोटा,
सिमटकर खो भी जाती हैं,
कभी मिल जाती हैं,
अपने से बड़े दायरे में,
जैसे कि कोई बड़ी मछली,
लील जाती है,
छोटी मछलियों को,
और कभी अकेली ही,
कर दिया करती हैं,
पूरा ही तालाब गन्दा ।
राजनीति, कभी तो राज-पाट है,
कभी घात-प्रतिघात है,
सृजन का उल्लास है,
या ध्वंस का उन्माद है ।
एक छिछला तालाब है,
या शतरंज की बिसात है ।
वज़ीर भी फ़क़ीर हुआ करते हैं,
फ़क़ीर भी वज़ीर हुआ करते हैं,
सवाल है सिर्फ़ उन लकीरों का,
जो दायरे या मिसाल हुआ करते हैं ।
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कविता आज की,
('आज तक' / 'भारत तक' पर श्वेता सिंह से श्री रविशंकर प्रसाद की बातचीत देखते-सुनते हुए .....)   

June 08, 2019

हसरतों का हश्र

आठ पंक्तियाँ 
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हसरतों का हश्र ये होगा नहीं मालूम था,
क़सरतों की क़सर कहाँ कम पड़ गयी,
आरज़ूओं की देते रहे हम अर्ज़ियाँ,
ख़्वाहिशें सब ख़्वाब बनकर रह गईं।
मर्ज़ की इस तर्ज़ की तरज़ीह थी,
हर्ज़ का हर्ज़ाना भी हम देते रहे,
देना न देना था मगर मर्ज़ी उसकी,
रेत पर कुछ नाव यूँ खेते रहे।
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June 05, 2019

दुःख : जो नहीं था / है / नहीं है

उस शहर में 
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वह शहर मैंने 19 मार्च 2016 को छोड़ा था।
18 मार्च को एकाएक तय किया / हुआ।
19 मार्च की शाम को वहाँ से चला और उसी रात साढ़े नौ बजे केवटग्राम पहुँचा। 
5 अगस्त 2016 की सुबह 10:30 पर केवटग्राम छोड़ा और दोपहर 1:00 बजे यहाँ (देवास) आ गया।
उस शहर में मेरे निवास-स्थल (महाशक्तिनगर) के पीछे स्थित एक कॉलोनी में वे रहते हैं।
किसी सरकारी विभाग में कार्यरत थे और किन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी।
मैंने कभी उनसे पूछा नहीं।  पूछना ठीक नहीं लगा।
बहरहाल वे मधुबन कॉलोनी के उस मकान में रहते हैं जहाँ उन्होंने पिछले बीस वर्षों में खून-पसीने से सींचकर दुर्लभ आयर्वेदिक वनस्पतियों का एक उपवन निर्मित किया। स्वाभाविक है कि वह उन्हें प्राणों से भी ज़्यादा प्रिय था। लेकिन दुष्टों की नज़र उस भूमि पर पड़ गयी और अनेक षड्यंत्र रचे जाने के बाद कुछ माह पहले उन लोगों की जीत हुई।  वन-विभाग, पर्यावरण-विभाग, दूसरे सरकारी विभागों में की गयी उनकी प्रार्थनाओं का कोई असर नहीं पड़ा। जे.सी.बी. मशीन लाकर उनके उस उपवन को जमींदोज़ कर दिया गया तो वहाँ सौ-पचास कारें पार्क करने की जगह निकल आई। और वह भी शहर के बीच के उस महँगे location पर।
चार दिन पहले एकाएक उनका फ़ोन आया तो भूल से मैंने उनके उपवन के बारे में पूछ लिया।
उनकी आवाज़ बदल गयी।  आवाज़ में उनका दर्द छलक आया। संक्षेप में पूरी कहानी सुनाई।
बहुत पहले मेरा उनसे परिचय तब हुआ था जब वे मेरी किताब (अहं ब्रह्मास्मि) लेने के लिए मेरे पास आए थे। चूँकि वे मुझे बहुत मानते हैं इसलिए कभी-कभी उनसे आध्यात्मिक महत्त्व की बातें करने का साहस मैं कर बैठता हूँ ।  मैंने उनकी पूरी कहानी शांतिपूर्वक सुनने के बाद पूछा :
"चतुर्वेदी जी ! आप इतने दुःखी क्यों हैं?"
"अब वह उपवन नहीं रहा, इसलिए।"
उन्होंनें लगभग रोते-रोते  कहा।
लगभग दस सेकंड हम दोनों ही मौन रहे।
"बुरा न समझें तो एक बात पूछ सकता हूँ?"
मैंने उनसे कहा।
"जी पूछिए !"
"क्या बीस साल पहले वह उपवन था?"
"नहीं जी, तब तो वहाँ खाली जमीन पड़ी थी, जो इस कॉलोनी के बनते समय से ही वैसी ही पडी थी, इसीलिए मेरे मन में वहाँ उपवन लगाने का विचार आया था, क्योंकि बचपन से ही मुझे पेड़-पौधों से बहुत लगाव था।"
"तो तब वहाँ उपवन भी नहीं रहा होगा।"
"ज़ाहिर है कि तब वहाँ उपवन कहाँ था ?"
"क्या तब उपवन के न होने का दुःख था?"
वे रोते-रोते अचानक हँसने भी लगे।
"फिर जब आज वह नहीं है तो उसके न होने का दुःख क्यों?"
"यह सही है, लेकिन मन जुड़ जाता है न !"
"हाँ, मुझे भी अफ़सोस है, लेकिन जीवन ऐसा ही है। क्या आपको मेरी बात बुरी लगी?"
वे जानते थे कि मैं उपदेश देने से क़तराता हूँ, और बावजूद तमाम संकोच के बस उनका दुःख बाँटना भर चाहता था।
"नहीं, आप ठीक कहते हैं, इसीलिए तो मैंने फोन किया था कि मेरा दुःख हल्का हो जाए। आपने तो मेरे सभी दुःख दूर कर दिए ! धन्यवाद !"
मैं नहीं सोचता कि उन्होंने व्यंग्य या कटुता से ऐसा कहा होगा।
"सॉरी ! मैंने आपको ठेस पहुँचाई !"
"नो सर ! आपने तो मेरी इतनी बड़ी सहायता की है, जिसकी मुझे कल्पना तक न थी।"
जब वे बहुत आत्मीयता से बातें करते, तो मुझे सर कहने लगते थे। 
उनकी आवाज़ में एक चमक थी। शायद यही चमक उनके आँसुओं में, और उनके चेहरे पर भी उस समय रही होगी। उनकी आवाज़ में एक महक थी जो शायद उन फूलों की थी, जो कभी उनके उपवन में खिले होंगे, और उपवन के रहने पर आगे भी खिल सकते थे।
- या ऐसा मुझे लगा।
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शिक्षा का कृषि-मॉडल

शिक्षा और कृषि के तत्व 
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शिक्षा और कृषि दो ऐसे उपक्रम हैं जो मनुष्य के सांस्कृतिक अस्तित्व की पहचान तय करते हैं।
जैसे कृषि के लिए हमें भूमि, जलवायु, परिस्थितियों और उपज की जानकारी होना ज़रूरी और उपयोगी है उसी प्रकार शिक्षा के लिए समाज, समाज के वातावरण, सामाजिक / राजनैतिक परिस्थितियों, और शिक्षा से हमें किस (हितग्राही) के लिए क्या उपलब्ध करना है, -अर्थात् शिक्षा का लक्ष्य और प्रयोजन जानना ज़रूरी है।
जैसे कृषि-कार्य में सबसे पहले भूमि को उपज / फसल की आवश्यकतानुसार तैयार किया जाना होता है, वैसे ही शिक्षा की बुनियाद जिन तत्वों पर सुनियोजित रीति से आधारित होना चाहिए उन विभिन्न तत्वों पर ध्यान देना ज़रूरी है। अभी तो स्थिति यह है कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था केवल रोज़गार उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। बढ़ती जनसंख्या में जिस प्रकार की शिक्षा से हर व्यक्ति को रोज़गार मिले यही चिंता हमारी शिक्षा-व्यवस्था की मूल प्रेरणा है और उसे हम सर्वाधिक महत्त्व देते हैं।
स्पष्ट है कि प्रकृति से सामंजस्य के साथ रहने के लिए बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है, जिसका सामना हमें पूरे मनुष्य-समाज को ध्यान में रखते हुए करना होगा, और यही हमारे राजनैतिक नेतृत्व की परीक्षा भी है जिससे लगभग हर राष्ट्र के राजनेता शायद अनभिज्ञ हैं, या जिसकी ओर से लापरवाह हैं। यही राजनीति का चरित्र है जिसके मूल में सभी के अपने-अपने निजी स्वार्थ और भय भी हैं।
राजनैतिक अस्थिरता, चाहे वह आन्तरिक राजनीतिक स्थितियों से पैदा होती हो, या दुनिया के तमाम देशों के बीच की टकराहट का परिणाम हो, हमें इस मूल प्रश्न की ओर ध्यान ही नहीं देने देती। मनुष्यों की सतत बढ़ती हुई जनसंख्या और संसाधनों की निरंतर घटती उपलब्धता, संसाधनों के बेतहाशा अपव्यय, अपक्षय, और विनाश (degeneration and destruction) पर हमारा ध्यान ही कहाँ है?
यह भी महत्वपूर्ण है कि जैसे कृषि के लिए भूमि को तैयार करने में पहले हानिकारक खर-पतवार और अवांछित घातक कारकों को दूर करना आवश्यक रूप से ज़रूरी होता है, वैसे ही शिक्षा के संस्थानों को भी उन सभी क्षति-प्रद  कारकों और तत्वों से मुक्त किया जाना ज़रूरी है, जो शिक्षा से प्राप्त किए जानेवाले हमारे अपेक्षित लक्ष्य में बाधक हैं, या  जिनसे हमारी शिक्षा की गतिविधि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
यह एक आश्चर्यजनक संयोग मात्र नहीं है कि पूरे संसार में शिक्षा का जितना संबंध तथाकथित 'धर्म' से रहा है, उतना ही राजनीति से भी रहा है। मूलतः संस्कृत भाषा में जिसे 'धर्म' कहा जाता है उसके लिए किसी दूसरी भाषा में ऐसा कोई समानार्थी शब्द शायद है ही नहीं, जो इसके वैदिक तात्पर्य को ठीक-ठीक व्यक्त कर सके।
अंग्रेज़ी भाषा में प्रचलित शब्द  'religion' संस्कृत की 'लग्' धातु से बने अनेक शब्दों में से ही एक है। 'लग्' धातु (stem) इतनी सार्वत्रिक (ubiquitous) है कि इससे leg, legal, lug, log, logistic, log-in, ligature, legitimate / legitimacy, illegal, delegate, relegate, religion जैसे शब्द बने जिनमें से relegate (-to) का प्रयोग किसी तत्व, वस्तु, विधि या सिद्धांत का उसके मूल स्वरूप से विरूपण करने, बिगाड़ने, उसके गुण-क्षरण (dilution) के अर्थ में किया जाता है।  इस प्रकार religion; - वास्तव में 'धर्म' से बहुत भिन्न और कभी-कभी बिलकुल विपरीत स्थापित और प्रचलित हुई उन परंपराओं, रूढ़ियों और मतों, धारणाओं, विश्वासों को दिया गया नाम है जिन्हें  समाज के विभिन्न समुदायों ने अपनी अस्मिता की पहचान बना लिया। इसलिए यह अनुमान अवश्य किया जा सकता है कि उन तमाम परंपराओं, रूढ़ियों और मतों, धारणाओं, विश्वासों में 'धर्म' का कुछ अंश तो अवश्य हो सकता है, किन्तु इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनमें से कुछ वास्तविक 'धर्म' की न सिर्फ विरोधी ही, बल्कि अधर्म या विधर्म पर ही आधारित हैं। यद्यपि उनमें से प्रत्येक परंपरा, रूढ़ि, और मत, धारणा और विशवास / आस्था की संभवतः कोई आध्यात्म-परक व्याख्या भी की जा सकती है, इसलिए यह लगता है कि 'सब धर्म एक ही सत्य के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं,' लेकिन व्यावहारिक रूप में इस व्याख्या से उनके बीच विद्यमान वैमनस्य और विद्वेष, विरोध और पारस्परिक असहिष्णुता तथा अविश्वास दूर नहीं होता।
यह है धर्म का वह 'राजनीतिक' पक्ष जो लोभ-भय से प्रेरित होकर शिक्षा को भी अपने लाभ के लिए औज़ार के रूप में प्रयुक्त करता है। और यही हालत पूरे विश्व में है।
इसलिए रोज़गार-परक शिक्षा देना शिक्षा के प्रश्न का एक प्रमुख पहलू तो हो सकता है लेकिन वह इस चुनौती का सक्षम ज़वाब नहीं है कि सबको रोज़गार मिल जाना ही दूसरी अनेक समस्याओं का निदान और हल / समाधान है।
उन दूसरी अनेक समस्याओं में विभिन्न देशों की भौगौलिक-राजनीतिक और पारस्परिक मैत्री, शत्रुता, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों की स्थितियाँ भी हैं, जिन पर हमारा ध्यान किसी वजह से निष्पक्ष, न्यायपूर्ण नहीं होता।
विकास के नाम पर भौतिक-उन्नति के आग्रह में हम उन तमाम स्थितियों को निरंतर पैदा कर रहे हैं जो अंततः मनुष्य-जाति का और पृथ्वी से 'जीवन' का ही विनाश करने जा रही हैं । शायद आज की स्थिति में वे हमें एकमात्र 'हल' या आवश्यकता भी दिखाई देतीं हों, किन्तु दीर्घ-काल में तो उनका यही परिणाम होना है।
विज्ञान, तकनीक और मुद्रा (अर्थशास्त्र) अपने-आपमें हमें किसी हद तक 'सुखी' बना सकते हैं किन्तु 'सुख' तथा 'दुःख' भी मानसिक प्रकार की वस्तुएँ हैं न कि विशुद्धतः 'भौतिक' वस्तुएँ। और जब तक मनुष्य का मन भय और लोभ से ग्रस्त रहता है ऐसा 'सुख' न तो स्थायी और न ही 'प्राप्य' भी है। विज्ञान, तकनीक और मुद्रा का परस्पर विनिमय (exchange) किया जा सकता है लेकिन  'सुख' तथा 'दुःख', लोभ तथा भय का ऐसा विनिमय संभव नहीं है। शिक्षा भी एक प्रकार का विनिमय है; - तकनीक, विचार, भावना, बुद्धि या विवेक (intelligence) का।    
यदि और जब तक, शिक्षा हमारे सामूहिक-मन से भय और लोभ का उन्मूलन नहीं करती तब तक किसी भी प्रकार की तथाकथित 'धार्मिक'-शिक्षा हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रखती। न तो वैयक्तिक और न सामूहिक सुख अथवा दुःख कहीं होते हैं।  वे बस अमूर्त और अस्थिर धारणाएँ / मान्यताएँ (abstract notions) भर होते हैं, जो व्यक्ति-मन और समूह-मन के स्तर पर मनुष्य-मात्र की चिंता अर्थात् चुनौती हैं।  और यह चुनौती आज की ही नहीं, हमेशा ही रहनेवाली चुनौती भी है।
एक अत्यंत रोचक तथ्य और विडम्बना यह भी है कि युद्ध की शिक्षा ही नहीं बल्कि उसका प्रशिक्षण भी हमारी शिक्षा-नीति और हमारे सामूहिक अस्तित्व का एक प्रबल पक्ष है। यह समझना कठिन है कि इस पर रोया या हँसा जाए !
जब तक हमारी मानसिकता इतनी विकसित और परिपक्व न हो जाए, कि इस चुनौती को ठीक से समझकर इसका सम्यक् प्रत्युत्तर दे सके, तब तक किसी प्रकार की दूसरी शिक्षा तात्कालिक उपयोग की दृष्टि से ज़रूरी भले ही हो, इस चुनौती से पलायन का ही केवल एक और प्रकार-मात्र  है।
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शिक्षा एक चुनौती, शिक्षा-प्रसंग 
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June 04, 2019

शिक्षा की व्यवस्था और राजभाषा का प्रश्न

भाषा-शिक्षा और शिक्षा-भाषा
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आज ही सुबह भाषा की राजनीति से संबंधित एक पोस्ट इसी ब्लॉग में लिखा था।
अभी पाँच मिनट पहले,  श्री अय्यर जी द्वारा प्रस्तुत विचार सुने  , जिसे उन्होंने कुछ घंटों पहले व्यक्त किया था, तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका दृष्टिकोण मेरे दृष्टिकोण से कितना अधिक समान है।
मैंने अपने पोस्ट में यही कहा था कि परस्पर विचार-विनिमय तथा शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा, - सब्ज़ी या दाल के समान है, जबकि विचार की विषय-वस्तु (matter / subject) मुख्य भोजन, - जैसे कि रोटी या चाँवल जैसा है।  इसलिए जब कोई भी व्यक्ति जितनी अधिक भाषाएँ सीखता और उनका इस्तेमाल करता है तो उसके मस्तिष्क का उतना ही अधिक बहु-आयामी विकास हो सकता है। इसलिए शिक्षा की भाषा एक या एकाधिक हों तो इसमें सभी का लाभ है।  और इसलिए भाषा की शिक्षा मुख्यतः ऐच्छिक विषय के रूप में दी जानी / ली जानी चाहिए।
मुझे खुशी हुई कि मेरी बात कहनेवाले और भी हैं, और इस तरीके से सोचने से हमें अनेक समस्याओं को बिलकुल नए सिरे से देखना संभव हो रहा है।
श्रेय भले ही किसी को भी मिले ऐसे विचारों से समाज और व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाया जा सकता है।
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प्रमुख बिंदु :
शिक्षा की व्यवस्था और राजभाषा का प्रश्न,
राष्ट्रभाषा,
अनेक भाषाएँ सीखने से रोज़गार की संभावनाएँ बढ़ती हैं। यह बेरोज़गारी कम करने के लिए भी सहायक है।
यह परस्पर सौहार्द्र और समरसता को भी बढ़ाता है।
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राजनीति और सवाल राजभाषा / राष्ट्रभाषा का

राजभाषा का राज़ 
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मेरे इस ब्लॉग के पाठकों ने अनुभव किया होगा कि हिन्दी से मुझे प्यार है।  सच्चाई तो यह है कि ब्लॉग पर लिखने की शुरुआत मैंने इसी ब्लॉग से की थी और इसका शीर्षक भी यही दर्शाता है। मैं नहीं कह सकता कि विभिन्न भाषाओं का मेरा ज्ञान कितना है लेकिन यह ज़रूर अनुभव करता हूँ कि केवल हिन्दी ही वह भाषा है जिसे मैं ओढ़ता-बिछाता हूँ और जिसमें प्रायः सोचता भी हूँ। हाँ कभी-कभी मराठी भाषा में इसी तरह सोचता हूँ क्योंकि 'सोचना' तो नितांत व्यक्तिगत मामला है।  वैसे मराठी मेरी मातृभाषा भी है। मेरी स्कूल की शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई लेकिन कॉलेज में प्रवेश लेते समय मैंने अंग्रेज़ी का महत्व महसूस किया इसलिए विज्ञान और गणित विषयों में ग्रेजुएशन तथा पोस्ट-ग्रेजुएशन किया।
यदि विज्ञान और गणित में मेरी अभिरुचि (aptitude) न होती तो आजीविका की दृष्टि से शायद मैं कॉमर्स विषयों में स्कूल की शिक्षा लेता लेकिन कला-संकाय में इसलिए नहीं जाता कि मैं कला-क्षेत्र की विद्याओं को स्कूल और कॉलेज से बाहर भी सीख सकता था।
साथ ही, केवल कला-क्षेत्र के ज्ञान से संतोषजनक आजीविका (नौकरी) मिल पाना भी संदिग्ध या मुश्किल प्रतीत होता था। दूसरी ओर, मैं विज्ञान, गणित और अंग्रेज़ी को छोड़ना भी नहीं चाहता था।
जैसा कि प्यार (infatuation) में होता है, बुद्धि के मोहित हो जाने पर मनुष्य यह भी भूल जाता है कि किस बात (कारण / वज़ह) से वह इतना मोहित हुआ, वैसे ही मैं संस्कृत और लगभग किसी भी भाषा से प्यार करने लगा।
1969-1970 के मेरे स्कूल के दिनों में आकाशवाणी से विभिन्न भाषाएँ सिखाने के कार्यक्रम प्रसारित हुआ करते थे। मेरे छोटे भाई ने तमिल, मैंने मलयालम और मेरी एक बहन ने तेलुगु सीखना तय किया, क्योंकि सीखने के लिए हमें ये ही भाषाएँ उपलब्ध थीं। इन्हीं दिनों मेरी माताजी का किन्हीं मलयालम-भाषी नर्सेज़ से परिचय हुआ तो मलयालम में मेरी उत्सुकता के कारण मैं उनके पास यह भाषा सीखने के लिए जाने लगा। एक कारण यह भी था की मैं रेडियो से मलयालम की लिपि नहीं सीख सकता था। मुझे यह नहीं पता था कि उनमें से केवल दो ही मलयाली थीं, जबकि तीसरी बांग्लाभाषी थी। तीनों उम्र में मुझसे बड़ी थीं, शायद इसलिए भी मुझे उनसे झिझक या शर्म नहीं थी। मैंने उनसे कुछ सरल बोल-चाल में प्रयुक्त होनेवाले वाक्य और शब्द सीखे।
कुछ समय बाद कादम्बिनी पत्रिका में 'तमिल' सीखने के लेख मिले तो तमिल सीखने का प्रयास किया लेकिन फिर वह अधूरा ही रह गया।
मराठी में मेरे लिए सीखने जैसा कुछ नहीं था और मुझे हमेशा लगा कि मराठी लिखने (के अभ्यास) से मेरा हिन्दी भाषा का ज्ञान तथा प्रयोग गड़बड़ाता है, इसलिए भी मैं मराठी लिखने से बचता रहा क्योंकि मैं अपनी  हिन्दी को बिगाड़ना नहीं चाहता था।
यद्यपि मैंने दासबोध का अध्ययन किया किन्तु उसे केवल उसकी शिक्षा के लिए किया, न कि उसके मराठी होने के कारण।  वैसे ही जैसे मैंने अंग्रेज़ी माध्यम से विज्ञान और गणित का तथा संस्कृत माध्यम से वेदांत या अध्यात्म का अध्ययन किया।
इस प्रकार विभिन्न भाषाएँ मेरे लिए वह शाक-भाजी थीं जिन्हें मुख्य भोजन के लिए सहायक साधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मुख्य भोजन (रोटी या चांवल) तो ज्ञान था।
शायद इसीलिए जैसे दाल या शाक-भाजी के बदलने से मुख्य भोजन नहीं बदलता और फिर भी आपको भिन्न-भिन्न शाक-भाजी या दाल पसंद होते हैं, वैसे ही विभिन्न भाषाओं से मुझे लगाव हुआ। मुझे यही समझ में आया कि सभी भाषाएँ इस दृष्टि से समान हैं कि उनका उपयोग है। किसी दूसरी दृष्टि से उन्हें इस प्रकार से देखना कि उनका धर्म या जाति या वर्ग-विशेष से संबंध है वास्तव में एक संकुचित दृष्टिकोण है। सच्चाई तो यह है कि  सभी भाषाएँ  एक-दूसरे को समृद्ध ही करती हैं, और कोई भी मनुष्य जितनी अधिक भाषाएँ जानता है, वह उतना ही अधिक सहिष्णु और उदार होगा। अगर आपको धरती और मनुष्यों से प्यार है तो आपका किसी भी भाषा से सामंजस्य बैठने लगेगा।
भारत की भाषाओं, समुदायों / सम्प्रदायों, संस्कृतियों आदि के आधार पर भारतीयों में वैर पैदा करना अंग्रेज़ी शासन की सोची-समझी रणनीति थी और इसके पीछे लक्ष्य था भारत को ईसाई बनाना। वह इसी प्रकार से और तभी संभव था जब यहाँ के विभिन्न भाषाओं, समुदायों / सम्प्रदायों, संस्कृतियों, परंपराओं की घोर निंदा की जाए और पूरा भारतीय समाज अपने-अपने जीवन-दर्शन को त्याग दे, हीनता-ग्रंथि से ग्रस्त हो जाए।
वास्तव में विरोध तो अंग्रेज़ी का होना चाहिए जिसने हमारी समृद्धि और विरासत को न सिर्फ लूटा और विखंडित किया, बल्कि बुरी तरह से नष्ट भी कर दिया।
किन्तु चूँकि अंग्रेज़ी भी व्यवहार का माध्यम है, एक भाषा के रूप में उसका भी यथोचित सम्मान अवश्य किया जा सकता है। अंग्रेज़ी फिर भी हमारी अपनी माता का स्थान तो नहीं ले सकती।
जैसे आज अंग्रेज़ी एक तरह से पूरे विश्व में इस्तेमाल की जाती है उसी तरह आनेवाले कुछ वर्षों में हिन्दी भी की जाने लगेगी, यह उम्मीद ज़रूर की जानी चाहिए।
संक्षेप में स्कूली शिक्षा में केवल दो ही भाषाएँ अनिवार्य होनी चाहिए :
एक मातृभाषा, दूसरी बच्चे की जिसमें रुचि हो वह दूसरी भाषा।
तीसरी, चौथी भाषा के रूप में किसी भाषा को ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ा / पढ़ाया जा सकता है।
इन ऐच्छिक भाषाओं में प्राप्त अंकों / श्रेणी आदि को शिक्षा के मूल-प्रमाण-पत्रों से अलग रखा जा सकता है।
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