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April 22, 2022

स्मृति, पहचान, समय...!

कविता / 22-04-2022.

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एक समय पहचान बनी, 

एक समय पहचान मिटी, 

किन्तु समय की क्या पहचान?

एक समय पर स्मृति बनी,

एक समय पर स्मृति मिटी,

किन्तु समय की क्या पहचान?

पहचान हुई तो स्मृति हुई, 

स्मृति हुई तो हुई पहचान, 

किन्तु समय की स्मृति कहाँ, 

स्मृति नहीं तो क्या पहचान? 

अगर नहीं है स्मृति कोई, 

और नहीं पहचान कोई, 

तो समय का क्या अस्तित्व,

अस्तित्व नहीं, तो क्यों है नाम?

यह जो है समय की स्मृति,

यह जो स्मृति की है पहचान, 

यह पहचान किसे हो याद,

क्या उसकी है कोई पहचान?

फिर भी कुछ है स्मृति से परे,

फिर भी कुछ पहचान से परे,

फिर भी कुछ है समय से परे,

निजता की है वही पहचान। 

***




July 14, 2017

प्रेम और समय -इटैलियन कविता

प्रेम और समय -इटैलियन कविता
लुइगी पिरन्देलो (इटैलियन नाटककार)
हिन्दी रूपान्तर
-
प्रेम ने समय पर एक दृष्टि डाली और हँस पड़ा,
क्योंकि उसे पता था कि उसे उसकी ज़रूरत नहीं ।
प्रेम ने दिन भर के लिए मृत होने का नाटक किया,
और शाम होते-होते पुनः खिल (जी) उठने का ।
(विधाता के) विधान को न मानते हुए। .. ,
अपने हृदय के एक कोने में सोने लगा ।
उस समय तक, जिसका अस्तित्व ही नहीं था ।
और फिर भ्रमित न होते हुए, चल पड़ा ।
कहीं न जाते हुए भी वह लौट आया ।
समय मर चुका था, और वह (प्रेम) अक्षुण्ण रहा ।
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इटैलियन कविता (मूल रूप में)
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E l’amore guardò il tempo e rise,
perchè sapeva di non averne bisogno.
Finse di morire per un giorno,
e di rifiorire alla sera,
senza leggi da rispettare.
Si addormentò in un angolo di cuore
per un tempo che non esisteva.
Fuggì senza allontanarsi,
ritornò senza essere partito,
il tempo moriva e lui restava.
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- L. Pirandello
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