April 30, 2022

आज की रचना

कविता -- सबको पता है!

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छल छुरा, कपट कृपाण,

अपने हृदय में मत रखो, 

रखा है यदि तो शान्ति से,

जीने की आशा मत रखो।

लोभ मोहक, डर भयानक, 

अपने हृदय में मत रखो, 

रखा है यदि तो शान्ति से,

जीने की आशा मत रखो। 

क्रोध उग्र, ईर्ष्या विषैली,

अपने हृदय में मत रखो, 

रखा है यदि तो शान्ति से, 

जीने की आशा मत रखो। 

कामना कुटिल, घृणा कुत्सित, 

अपने हृदय में मत रखो, 

रखा है यदि तो सुख से, 

जीने की आशा मत रखो।

प्रेम निश्छल, शान्ति शुचिता,

अपने हृदय में यदि रखो, 

तो अवश्य ही शान्ति से,

जीने की आशा तुम रखो!

मैत्री, करुणा, मुदिता तथा,

उपेक्षा, सूत्र, -जीवन के चार,

सीख लो व्यवहार में यदि,

जीने की आशा तुम रखो। 

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April 29, 2022

स्मृति, अतीत, विचार और समय

विचार या एक उपद्रव!

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कितनी अद्भुत् बात है!

स्मृति के माध्यम से अतीत को सत्यता प्रदान की जाती है, और अतीत के माध्यम से स्मृति को!

और विचार के माध्यम से ही उन दोनों के काल्पनिक अस्तित्व को!  

यदि विचार का आलंबन न हो तो किसी स्मृति और अतीत का अस्तित्व ही कैसे हो सकता है!

विचार जिस अतीत को महत्व, और जिस स्मृति पर ध्यान देता है, वही अतीत और उससे संबद्ध स्मृति तत्क्षण ही प्रत्यक्ष और सजीव प्रतीत होने लगते हैं। फिर भी यह भी आवश्यक है कि अतीत और स्मृति के बीच का सन्दर्भ एक ही, और समान हो। कोई ऐसा अतीत, जो किसी स्मृति के संबंध में अप्रासंगिक हो, - या कोई ऐसी स्मृति जो किसी अतीत के संबंध में अप्रासंगिक हो, विचार के लिए निरर्थक जैसे होते हैं। किन्तु और भी अधिक रोचक तथ्य यह है कि इस प्रकार अनायास ही समय भी सत्यता ग्रहण कर लेता है। और अतीत कहे जानेवाले इस समय / काल को भी एक यथार्थ भौतिक वस्तु की तरह सत्य मानकर उसके बारे में अनेक काल्पनिक सिद्धान्त निर्मित किए जाते हैं!  विचार एक ऐसी चमत्कारपूर्ण वस्तु अवश्य होता है, जो कि परिस्थिति, स्मृति या वर्तमान में अनुभव किए जानेवाले किसी विषय को सत्यता देता है, किन्तु विचार के बारे में दूसरा आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि विचार स्वयं ही अपने आपको भी सत्यता देता है। या, विचार से अलग क्या कोई और ऐसी अन्य वस्तु होती है, जो विचार के पैदा होने का कारण होती हो? तो यह भी सत्य है कि यदि होती भी हो, तो ऐसे किसी संभावित वस्तु / कारण का अनुमान भी पुनः विचार से ही संभव होता है।

इस पर यदि और अधिक ध्यान दें, तो कहा जा सकता है, कि अतीत की स्मृति, और स्मृति का अतीत, परस्पर अवलंबित होने से विचार पर आधारित एक ही गतिविधि के दो प्रकार होते हैं ।

किन्तु इसी प्रकार से भविष्य का अनुमान, और कोई कल्पित भविष्य भी, क्या ऐसी ही एक गतिविधि नहीं होता? और इस प्रकार जिस भविष्य को सत्य समझा जाता है, 'समय' नामक ऐसी कोई वस्तु (सत्य) हो सकती है?

इस सारी विवेचना में इस सच्चाई पर तो ध्यान जाता ही नहीं, कि यद्यपि होना (अस्तित्व) और होने का यह भान, चेतना या सहज बोध, एक नितान्त स्वाभाविक सत्य है, किन्तु इस सत्य को भी विचार 'अपने होने' और 'अपने होने को जानने' में रूपान्तरित कर देता है और एक आभासी 'मैं' की सृष्टि कर लेता है। इस आभासी 'मैं' को किसी वस्तु पर आरोपित किए जाते ही, विचार में ही अहंकार का उद्भव होता है।

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सार्वभौम महाव्रत

यम -- पाँच सार्वभौम महाव्रत 

(अनुल्लंघनीय कर्तव्य)

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धर्म का आधारभूत तत्व यम है, जो देवता भी है और जगत् की सृष्टि, संचालन और संकोच का अचल अटल नियामक सिद्धान्त भी है।

पातञ्जल योगशास्त्र में योग के बहिरङ्ग साधनों में से यम प्रथम है। यम-नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्यायाहार इन पाँच को बहिरङ्ग साधन कहा जाता है, जबकि शेष तीन, -धारणा, ध्यान और समाधि को अन्तरङ्ग कहा जाता है। योग के इन आठ अङ्गों को सम्मिलित रूप से अष्टाङ्ग योग कहते हैं। 

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।२८।।

(योगाङ्गानुष्ठानात् अशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिः आविवेकख्यातेः।।)

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान-समाधयोऽष्टावङ्गानि।।२९।।

(यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधयः-अष्टौ-अङ्गानि।।)

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमः।।२९।।

(अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः यमः।।) 

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।।३०।।

(जाति-देश-काल-समय-अनवच्छिन्नाः सार्वभौमाः महाव्रतम्।।)

इन्हें यम या सार्वभौम महाव्रत (Universal Austerities) कहा जाता है। इनका पालन करना धर्म के आचरण के व्रत का पालन करनेवाले प्रत्येक ही मनुष्य के लिए आवश्यक कर्तव्य है, जबकि इनमें से किसी का भी उल्लंघन करने को महापातक या पञ्च-महापातकों में से एक कहा जाता है।

ये सार्वभौम इसलिए भी हैं क्योंकि ये प्राकृतिक-न्याय (social-justice) के सिद्धान्त के आधार पर स्थापित हैं, जो सामाजिक आचरण-संहिता (social-moral code of conduct) का आधार भी हैं, तथा संपूर्ण संसार के सभी मनुष्यों के वैयक्तिक व सामूहिक कल्याण / सुख को सुनिश्चित करते हैं।

चूँकि कोई भी परंपरा (traditional) धर्म की इन आधारभूत अवधारणाओं की अवहेलना नहीं कर सकती, इसलिए विभिन्न परंपराएँ धर्म या अधर्म के, या धर्म-अधर्म के मिले-जुले प्रभाव के अनुसार स्थान, समय और सामाजिक परिस्थितियों में अलग अलग और कभी कभी विपरीत रूप तक धारण कर लेती हैं।

इस प्रकार की अनेक और विभिन्न प्रकार की परंपराओं के धर्म के वास्तविक रूप से बहुत भिन्न होने पर भी उन्हें 'समान' कहने को ही विभिन्न परंपराओं (traditions) की समानता के रूप में मान्यता दे दी गई है, और शायद उन्हें रिलीजन भी कहा जा सकता है। किन्तु विभिन्न रिलीजन्स के पारस्परिक मतभेद भी प्रकट और स्पष्ट ही हैं, फिर भी समानता या धर्म-निरपेक्षता के नाम पर उन मूलतः अनेक और विभिन्न प्रकार के मतवादों के शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व को एक ऐसे आदर्श की तरह प्रस्थापित किया जाता है, जो सुनने में तो बहुत अच्छा प्रतीत होता है, पर यथार्थ की भूमि पर दो कदम भी नहीं चल सकता।

इसलिए सबसे पहले तो यही देखना होगा कि रिलीजन (पंथ) / religion और परंपराओं / traditions को धर्म कहना कहाँ तक उचित, न्यायसंगत है। चूँकि उपरोक्त वर्णित पाँच सार्वभौम महाव्रत (Universal austerities) धर्म / अधर्म का वर्णन पर्याप्त स्पष्टता से करते हैं इसलिए किसी भी  रिलीजन (पंथ) / religion, परंपरा / tradition को धर्म या अधर्म में बाँटना उनके बीच के मतभेद को और दृढ करने जैसा सिद्ध होता है।

कोई भी परंपरा केवल धर्म ही हो, या केवल अधर्म ही हो, ऐसा नहीं हो सकता। प्रत्येक परंपरा में धर्म के और अधर्म के भी कुछ तत्व पाए जा सकते हैं। 

इसलिए धर्म-निरपेक्षता (secularism) यद्यपि एक प्रशंसनीय आदर्श तो हो सकता है किन्तु यथार्थ की भूमि पर इसे आचरण में लाया जाना बहुत कठिन सिद्ध होता है।

वैसे भी धर्म-निरपेक्षता आपको ऐसी कोई आचरण-संहिता नहीं प्रदान करती, जिसे सुस्पष्ट और व्यावहारिक स्तर पर भी प्रयोग में लाया जा सके। कदम कदम पर, हर बार इसे पुनर्परिभाषित किया जाना होता है। और लौटकर हमें या तो सामूहिक-विवेक का, या समुदायों के अपने मतवादों पर आधारित विवेचनाओं का सहारा लेना होता है, जिसका हमें कोई सर्वसम्मत समाधान होता हुआ शायद ही दिखाई देता हो।

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April 28, 2022

करना / होना

 कविता 28-04-2022

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अविभूति 

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जब मेरे पास,

करने के लिए,

कुछ नहीं होता,

तब होने के लिए, 

कुछ नहीं करता।

कुछ न करना, 

कुछ न होना,

न महसूस होना, 

न महसूस करना, 

न अहसास होना,

न अहसास करना,

जब नहीं होता, 

तब मैं भी, 

कहाँ होता हूँ! 

तब मैं भी, 

क्या होता हूँ! 

क्या नहीं होता?

तब मैं भी, 

होता हूँ क्या?

इस करने-होने, 

इस पाने-मिलने,

इच्छा-अनिच्छा में,

आशा-निराशा में, 

प्रयास-सायास में,

क्या अनायास ही, 

विलीन नहीं होता! 

इस अहसास में, 

होता हूँ क्या?

इस अहसास में, 

होता है क्या?

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April 27, 2022

लौटनेवाला समय

कविता / 19-04-2022

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वह समय जो कि अतीत हुआ,

स्मृति के परिप्रेक्ष्य में होता है,

हर मनुष्य के लिए अलग, 

कई अतीत अनेक रूपों में!

वह समय जो भविष्य होगा,

कल्पना के परिप्रेक्ष्य में होता है, 

हर मनुष्य के लिए अलग,

कई भविष्य अनेक रूपों में!

यह देख पाना तो है, आसान, 

भविष्य उपजता है, वर्तमान से,

पर यह देखना है बहुत मुश्किल,

उपजता है अतीत भी, वर्तमान से!

और यह जो कि है वर्तमान,

सदा ही बस होता ही भर है! 

न उपजता है, न मिटता है यह,

अतीत-भविष्य की तरह कभी!

हाँ, इसी पल तो होता है खयाल,

अतीत या भविष्य का भी!

ये खयाल जो उपजता-मिटता है!

इसी के जैसा, इसी के साथ,

इसी पल तो होता है मेरा होना,

ये खयाल नहीं है, -है सच्चाई!

जो हमेशा है, ज्यों की त्यों ही!

जैसे यह वर्तमान, जो कि हूँ मैं!

नहीं है, भविष्य या अतीत कभी!

अतीत या भविष्य लौट जाता है,

खोता-मिलता, बनता-बिगड़ता है,

स्मृति या कल्पना के साथ साथ,

मैं हूँ पल, वर्तमान, अचल अटल,

न गुजरता है, न लौटता है कभी!

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।। विद्यया विन्दतेऽमृतम् ।।

केनोपनिषद् : एक दर्शन (vision)

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बीच में चार दिनों तक क्लास नहीं हो सकी। 

इसलिए इस समय में क्लास की तैयारी से पहले, दो तीन बार उपनिषद् का अध्ययन और पुनर्पठन कर लिया।

कल-परसों, दो-तीन दिन इस उपनिषद् का पठन-पाठन होता रहा था। एक खण्ड कल पूरा हुआ।

आज सुबह खाली समय में कुछ लिख रहा था, तो एक कविता 'उसकी बातें' बन पड़ी। अभी ही दस मिनट पहले ही उसे पोस्ट भी किया।  फिर सोचा कि कविता की अंतिम दो पंक्तियों में यह निर्णायक मोड़ कैसे आया!

ध्यान आया, कि केनोपनिषद् के दूसरे खण्ड में वर्णित कथा के सन्दर्भ में इन्द्र, अग्नि और वायु और परमात्मा सबकी अपने ही भीतर विद्यमानता होने के सत्य की गूँज ही इस कविता में उभर आई। इसका सीधा संबंध द्वितीय खण्ड के निम्नलिखित मन्त्र में प्रयुक्त किए गए 'प्रतिबोधविदितं' पद से है :

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्त्वं हि विन्दते।।

आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्।।४।।

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उसकी बातें!

कविता / 27-04-2022

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एक रहस्य! 

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पता नहीं वह क्या करता है, 

दिन भर बैठा रहता है!

बाक़ी के कुछ घंटे लेकिन,

वॉकिंग करता रहता है, 

शायद वह बीमार नहीं,

उसको शायद कुछ काम नहीं,

वैसे तो वह आराम से है,

फिर भी उसको आराम नहीं!

कुछ घंटे वह मोबाइल पर,

हर रोज़ बिताता रहता है!

अगर किसी से मिलता भी है, 

तो चुपचाप ही रहता है, 

पता नहीं, सोचता है क्या,

या बस सुनता रहता है!

उसका मन व्याकुल होता है, 

या प्रसन्न वह रहता है!

उसके साथ रहा हूँ लेकिन, 

अब तक नहीं समझ पाया,

क्या है आखिर उसके दिल में, 

या है वह, कोरा साया!

उसकी बातें वो ही जाने,

मुझको है मालूम यही,

मैं रहता हूँ उसके भीतर, 

वह रहता है मुझमें ही! 

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April 26, 2022

आगे आगे देखिए!

फलित-ज्योतिष्

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पहले मेरा अनुमान था, कालसर्प योग मुसीबतों और मुश्किलों के दौर का द्योतक होता है, लेकिन 26 मार्च से 26 अप्रैल तक घटित घटनाओं के सन्दर्भ में अब लग रहा है, कि कालसर्प योग की समाप्ति ही शायद मुसीबतों और मुश्किलों के दौर के प्रारंभ का द्योतक होता होगा।

एलॅन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया।

इस एक घटना के बाद संसार का दो खेमों में ध्रुवीकरण हो रहा है। जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के समय हमने देखा। चीन और रूस एक तरफ, तो यूरोपीय यूनियन, यू.के. तथा आस्ट्रेलिया दूसरी तरफ। यह तो मोटा विभाजन हुआ। बाकी लगभग सभी दूसरे देश भी असमंजस और घबराहट, अनिश्चय और ऊहापोह के शिकार हैं। केवल भारत ने ही अपना रुख स्पष्टता से सामने रखा है, जिसे इस प्रकार कह सकते हैं : 

"राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है, गुटनिरपेक्ष या बहुध्रुवीय विश्व के सिद्धान्त का महत्व भी उसके बाद ही है।"

पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री शशि थरूर जी इस बात से जरूर खुश हैं कि भारत के विदेश-मंत्री श्री सुब्रमण्यम जयशंकर ने उन्हें बहु-संलग्नता (multi-alignment) जैसा शब्द कॉइन करने का श्रेय (credit) दिया।

इससे क्या? 

"अरे भाई! दिल के बहलाने को गा़लिब ये खयाल अच्छा है।" 

रूस के राष्ट्रपति अपनी बौखलाहट को न तो छिपा पा रहे हैं, न ठीक से जाहिर ही कर पा रहे हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि न्यूक्स के प्रयोग से दुनिया में क्या परिणाम हो सकते हैं। हाँ उन्हें धमकियाँ देने के प्रयोग के परिणामों से कुछ उम्मीद होगी।  चीन और रूस कम्युनिस्ट अधिनायकवाद के प्रकट उदाहरण हैं।

चीन ने पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और कुछ और भी देशों को अपने डेट्-ट्रेप (debt-trap) में फँसाकर आर्थिक बदहाली के मुहाने पर धकेल दिया है।

एलॅन मस्क के द्वारा ट्विटर खरीद लिए जाने से पहले व्यक्तिगत रूप से मुझे ट्विटर पर भरोसा (trust) नहीं था। अब लगता है कि ट्विटर जॉइन किया जा सकता है। फेसबुक इत्यादि दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर शायद ही किसी को भरोसा होता होगा। डिजिटल ट्रान्जेक्शन्स के भुक्तभोगी भी बहुत हैं। जिनके पास अनाप शनाप पैसा है उन्हें पता भी नहीं चलता होगा, और जब पता चलता होगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होती होगी। और यह भी अवश्य सत्य है कि डिजिटल ट्रान्जेक्शन्स बिजली की रफ़्तार (lightening speed) से हुआ करते हैं!

वो कहते हैं न,

इब्तेदा-ए-इश्क है, रोता है क्या,

आगे आगे देखिए होता है क्या!

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आजादी का अमृत-महोत्सव

अजातवाद का सिद्धान्त 

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जैसा प्रतीत होता है, अर्थ की दृष्टि से और व्युत्पत्ति की दृष्टि से भी जन् (जायते) धातु से 'क्त' प्रत्यय के संयोग से बने जन्म तथा जाति शब्द, उत्पत्ति के द्योतक हैं। इस दृष्टि से अजातवाद शब्द का तात्पर्य हुआ -- उत्पत्ति के सिद्धान्त का निषेध। 

इस सिद्धान्त के अनुसार न तो उत्पत्ति है, न विनाश ही है। केवल एक ही तत्त्व का अस्तित्व है, और अस्तित्व ही वह तत्त्व है। प्रश्न उठता है कि यह सतत परिवर्तित होता प्रतीत होता रहने वाला दृश्य-जगत् या संसार मूलतः क्या है?

इसके उत्तर में कहा जाता है :

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।२०।।

(पातञ्जल योगसूत्र साधनपाद)

और वृत्ति ही प्रत्यय है। 

योगसूत्र के प्रारंभ में ही योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है :

अथ योगानुशासनम्।।१।। 

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।२।।

तदा द्रष्टुः स्वरूपे अवस्थानम्।।३।।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र।।४।।

वृत्ति की न तो उत्पत्ति होती है और न ही उसका नाश होता है। वृत्ति नित्य, सनातन, शाश्वत है। वृत्ति का उद्भव, अभिव्यक्ति एवं और लय ही काल का सहवर्ती है। वृत्ति दृश्य है, जबकि काल अदृश्य होते हुए भी वृत्ति के आश्रय से अनुमानगम्य होकर ही अस्तित्वमान प्रतीत होता है। काल और वृत्ति मूलतः एक ही गतिविधि है। वृत्ति के अभाव में काल का भी अस्तित्व नहीं हो सकता। किन्तु वह तत्व जिसे दृष्टा कहा जाता है, इन्द्रियों, बुद्धि आदि के संयोग से मन के रूप में व्यक्त हो जाता है। यह मन ही वृत्ति-स्वरूप है :

मानसं तु किं मार्गण कृते।। 

नैव मानसं मार्ग आर्जवात्।।१७।।

वृत्तयस्त्वहंवृत्तिमाश्रिताः।। 

वृत्तयो मनः विद्ध्यहं मनः।।१८।।

(महर्षि श्री रमण विरचित उपदेश-सार)

इस प्रकार मन और अहं-वृत्ति के मूलतः एक होते हुए भी उनके दो भिन्न रूपों में परस्पर मिले होने की प्रतीति ही मनुष्य में जीव-भाव के रूप में अपने स्वतंत्र अस्तित्व होने की भावना का रूप लेती है। 

यह भावना मूलतः यद्यपि शरीर, मन, बुद्धि और मन / मनुष्य के जाग्रत होने की स्थिति में ही संभव है, जिसे शरीर में स्थित "मैं", और शरीर के बाहर स्थित और प्रतीत होनेवाले संसार के रूप में दृष्टा और दृश्य के बीच के काल्पनिक भेद के रूप में, बुद्धि में ही ग्रहण कर लिया जाता है, फिर भी इस प्रकार बुद्धि के आश्रय से ही यह भावना पुनः वृत्ति ही होती है।

जब चित्तवृत्ति का निरोध हो जाता है, तो मन का भी निरोध हो जाता है अर्थात् अहंवृत्ति का भी निवारण होकर केवल एकमेव चैतन्य आत्मा का ही उसके एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की तरह उसके नित्य, शाश्वत, और सनातन, अमृत-स्वरूप में दर्शन / उद्घाटन (discovery, revelation) हो जाता है।

स्पष्ट है कि वृत्तिमात्र के निरुद्ध होने में काल का अतिक्रमण भी अनायास ही हो जाता है।

उपदेश-सार में इसे ही आत्मा का सहज, स्वाभाविक, नित्य और निज-सुख कहा गया है --

बन्धमुक्त्यतीतं परं सुखम्।।

विन्दतीह जीवस्तु दैविकः।।२९।।

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April 25, 2022

परंपरा जिसने...

अपनी आत्मा खो दी है! 

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श्री जे. कृष्णमूर्ति की अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित और मूलतः अंग्रेजी में लिखित इस छोटी सी पुस्तिका का अंग्रेजी शीर्षक है :

Tradition Which Has Lost its soul.

मेरे पास इसकी जो प्रति है, वह संभवतः 1980 में प्रथम बार प्रकाशित हुई होगी, क्योंकि यह वर्ष 2000 में प्रकाशित इसके प्रथम संस्करण की पाँचवी आवृत्ति है।

इसमें सन्देह नहीं, कि यद्यपि श्री जे. कृष्णमूर्ति ने विश्वगुरु के रूप में स्वयं को स्थापित किए जाने के उद्देश्य से आयोजित किए जाने वाले समारोह में : 

"सत्य एक पथहीन भूमि है, और कोई दूसरा आपको इसे पाने के लिए मार्गदर्शन नहीं दे सकता। आपको अपने लिए स्वयं ही अपना मार्ग प्राप्त करना होगा।... "

"Truth is a pathless land."

का वक्तव्य देकर सबको चकित कर दिया था, और इस एक ही वक्तव्य में विद्यमान विरोधाभास से यह भी स्पष्ट हो गया था कि यद्यपि वे विश्वगुरु के पद को औपचारिक रूप से उस प्रकार से स्वीकार नहीं कर सकते, जैसा कि परंपरा से चलता आ रहा है, फिर भी जीवन के गूढ तात्पर्य को समझने के लिए जो कोई भी इस बारे में गंभीर और उत्सुक हैं, उनसे संवाद करने के लिए वे उपलब्ध हैं।

कुल 6 पृष्ठों की इस छोटी सी पुस्तिका के बैक-कवर पर इसका मूल्य ₹5/- अंकित है। प्रस्तावना पृष्ठ 3-4 पर तथा शेष 5,6,7 तथा 8 पर :

"स्वतन्त्रता के असली शत्रु"

शीर्षक के साथ इसे एक लेख के रूप में, अर्थात् पुस्तिका की तरह प्रस्तुत किया गया है।

श्री जे. कृष्णमूर्ति ने संगठित धर्म (organized religion) को मनुष्य की चेतना की स्वाभाविक उत्स्फूर्ति की राह में बहुत बड़ा रोड़ा कहा है, और इसलिए भी वे तमाम समुदाय जो ऐसे किसी भी धर्म से जुड़े हैं, प्रायः उन पर विश्वास नहीं कर पाते। इसलिए भी शायद ही कोई उनके शब्दों या कार्यों का गंभीरता से आकलन करता होगा। 

जे. कृष्णमूर्ति के संवाद अपने आपमें अवश्य ही बहुत अद्भुत् हैं किन्तु उनसे शायद ही किसी पाठक के मन में कोई रुचि जागृत होती होगी। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि, -- और शायद है भी, कि हमारी सारी शिक्षा-दीक्षा, वातावरण, परिवार और समाज भी हमें पहले ही से इतना असंवेदनशील बना चुके होते हैं कि हम उन्हें भी दूसरे सभी सिद्धान्तों आदि की ही तरह केवल बौद्धिक, वैचारिक निष्कर्षों के रूप में ग्रहण करने लगते हैं।

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ज़रूरी / बेवजह

कविता : 25-04-2022

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यूँ तो कुछ भी ज़रूरी नहीं होता, 

फिर भी कुछ बेवजह नहीं होता!

किन्हीं वजहों का पता होता है,

कुछ का, लेकिन पता नहीं होता।

और जिनका भी अगर होता है,

पता न होना भी, एक होता है!

और हैरत है, कि ज़रूरी है क्या,

यह भी, शायद ही पता होता है!

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"कुछ भी!" 



April 24, 2022

यथातथ्यता / Exactitude.

The Exact and Precise.

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किसी समय जे. कृष्णमूर्ति की पुस्तक :

J. Krishnamurti's Note-book 

का महत्व और भूमिका मेरे लिए vade-mecum जैसी थी।जब मैंने इसे पढ़ना प्रारंभ किया था यद्यपि उस समय मैं केवल इसकी भाषा-शैली से आकर्षित हुआ था, किन्तु धीरे धीरे इसकी भाषा मेरे लिए गौण होती चली गई और उससे जो भाव मैं ग्रहण करने लगा वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने लगा।

वह 1982 का साल था। 

मैंने जे. कृष्णमूर्ति की अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित दूसरी कुछ पुस्तकों जैसे कि जीवन-भाष्य, ज्ञात से मुक्ति, प्रथम और अंतिम मुक्ति, आदि को भी पढ़ा था पर मैंने उसमें व्यक्त उन विचारों का अर्थ समझने तक की चेष्टा तक कभी नहीं की, क्योंकि हमेशा से मुझे यही लगता रहा है कि किसी ग्रन्थ को पढ़ते समय अपनी बुद्धि से उसके तात्पर्य को समझने का प्रयास हमें उसके उस तात्पर्य से अत्यन्त दूर कर देता है जिसे ग्रन्थकर्ता व्यक्त करता, या करना चाहता है। 

मैं बस उन शब्दों को पढ़ता था और बिना कोई व्याख्या किए ही लेखक क्या कहना चाहता है, इसका अनुमान लगाने का प्रयास करता था।

बिलकुल इसी तरीके से मैंने :

श्री रमण महर्षि से बातचीत

को भी पढ़ा था।

बाद में श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषद् आदि को पढ़ते समय भी मैंने इसी तरीके का सहारा लिया।

वर्ष 2002 में मुझे :

J. Krishnamurti's Note-book

का हिन्दी अनुवाद करने की उत्सुकता हुई, और मैं उस कार्य में संलग्न हो गया। मेरे पास इस पुस्तक की जो प्रति थी उसके पृष्ठ 25 पर एक वाक्य मैंने पढ़ा :

"Truth cannot be exact."

(Gstaad, Switzerland, 16th July 1961)

इसे पढ़ते ही जो शब्द मेरे मन में आया वह था :

"यथातथ्यतः"

मुझे पता था कि यह शब्द अवश्य ही मेरी स्मृति से ही आया है, किन्तु मेरी स्मृति में वह कहाँ से आया होगा, मैं इसका अनुमान नहीं कर सका।

अभी कुछ दिनों पहले ईशावास्योपनिषद् की कक्षा में पढ़ाते हुए जब यह शब्द एकाएक मेरे सामने आया, तो मुझे वह प्रसंग याद आया।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-

मस्नाविर्ँ शुद्धमपापविद्धम्।।

कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो-

ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।८।।

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April 23, 2022

चौथी लहर!

अपुनरावर्तनीय समय

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पञ्चाङ्ग फिर देखा। अनुमान है कि जागतिक कालसर्प योग अभी चार पाँच दिनों तक रहेगा। बहुत सी अनपेक्षित घटनाएं घटेंगी।

भारत में सरकार आपात्काल (emergency) लगा सकती है। घोषित या अघोषित रूप से ही, सोशल नेटवर्किंग मीडिया को सेन्सर के दायरे में लाया जा सकता है, क्योंकि वह अपरिहार्य और एहतियातन जरूरी हो सकता है।

कोरोना की लहर से सब कुछ पुनः अस्त-व्यस्त हो सकता है, किन्तु केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के ही इससे प्रभावित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। फिर भी दिनांक 25 अप्रैल 2022 से स्थिति में सुधार होने की आशा है।

उपरोक्त को लिखा तो आज 19-04-2022 के दिन था, किन्तु इसे 25-04-2022 के बाद ही प्रकाशित करने के बारे में सोच रहा था!

अपुनरावर्तनीय समय क्या होता है? 

जो समय लौटता है, उसे पुनरावर्तनीय कहा जा सकता है, और यद्यपि ऐसा कोई समय वस्तुतः न तो है, न हो सकता है, किन्तु कालगणना के भौतिक आकलन और अनुमान से किसी घटना के पुनः होने को परिभाषित करते हुए उस आधार पर वैज्ञानिक और व्यावहारिक उपयोग को सत्य मानकर उस दृष्टि से समय का मूल्यांकन यदि किया जा सकता है, तो ऐसी दो या अधिक घटनाओं के होने के अन्तराल (interval) और उनके बीच जो समय व्यतीत होता है, उस अन्तर के आधार पर ऐसे समय को स्वीकार किया जाता है। किन्तु उसकी सत्यता या असत्यता तो फिर भी संदिग्ध ही है।

पञ्चाङ्ग के आधार पर समय के अपुनरावर्तनीय / पुनरावर्तनीय स्वरूप को अपनी अपनी बुद्धि, विश्वास और निष्ठा आदि से तय किया जा सकता है। 

आज शनिवार 23 अप्रैल 2022 है। अभी सुबह के 5:13 बजे हैं। इस 'अभी', 'सुबह' और 5:13 बजे के समय को यदि एक अर्थ में पुनरावर्तनीय, तो दूसरे अर्थ में अपुनरावर्तनीय भी कह सकते हैं।

इस प्रकार समय का एक प्रकार 'लहर' भी होता है।

चौथी लहर से समय का, या समय से चौथी लहर का अनुमान करना कुछ ऐसा ही कठिन कार्य है।

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April 22, 2022

स्मृति, पहचान, समय...!

कविता / 22-04-2022.

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एक समय पहचान बनी, 

एक समय पहचान मिटी, 

किन्तु समय की क्या पहचान?

एक समय पर स्मृति बनी,

एक समय पर स्मृति मिटी,

किन्तु समय की क्या पहचान?

पहचान हुई तो स्मृति हुई, 

स्मृति हुई तो हुई पहचान, 

किन्तु समय की स्मृति कहाँ, 

स्मृति नहीं तो क्या पहचान? 

अगर नहीं है स्मृति कोई, 

और नहीं पहचान कोई, 

तो समय का क्या अस्तित्व,

अस्तित्व नहीं, तो क्यों है नाम?

यह जो है समय की स्मृति,

यह जो स्मृति की है पहचान, 

यह पहचान किसे हो याद,

क्या उसकी है कोई पहचान?

फिर भी कुछ है स्मृति से परे,

फिर भी कुछ पहचान से परे,

फिर भी कुछ है समय से परे,

निजता की है वही पहचान। 

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April 21, 2022

सिर्फ ठंडा पानी

कविता 21-04-2022

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जब जब प्यास बुलाए, 

तब तब प्यास बुझाए,

जब जब लगती प्यास, 

पीता था कोल्ड्रिंक मैं!

सूख जाता था गला,

जब पीता था कोल्ड्रिंक मैं!

पर आखिर कितना पीता!

तो छूटा कोल्ड्रिंक पीना, 

हर बार ही पानी पीता!

सुराही या मटके का! 

जब जब प्यास बुलाती,

तब तब प्यास बुझाता,

गला भी नहीं सूखता,

ऐसा मटके का पानी!

छाछ पियो या कैरी का, 

पना तो ओर भी अच्छा,

या नींबू पानी भी अच्छा,

या बस मटके का पानी!

देखो कभी आज़माकर,

हाँ पानी हो शुद्ध साफ,

तुम फिर कभी न भूलोगे,

मटके का यह पानी! 

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April 19, 2022

कौन लिखता है!

केनेषितं? 

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केनेषितं पतति प्रेषितं मनः

केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः।। 

केनेषितां वाचमिमां वदन्ति

चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।।१।।

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ईशावास्योपनिषद् की कक्षा पूर्ण हो जाने पर छात्रों से पूछा कि अब आगे किस ग्रन्थ का पठन-पाठन करें?

मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित (#66)

"ईशादि नौ उपनिषद्"

की जो प्रति है, उसका प्रारंभ ईशावास्योपनिषद् से होता है, उस क्रम में अगला उपनिषद् है :

"केनोपनिषद्"

"केन" पद तत्पदवाची "कः" का तृतीया एकवचन रूप है। 

जिसका सरल सा अर्थ है "किसके द्वारा?"

व्याकरण की दृष्टि से तृतीया विभक्ति का प्रयोग "करणं" अर्थात् उपकरण के अर्थ में किया जाता है। 

अंग्रेजी भाषा के व्याकरण में विभक्ति को Case कहा जाता है।

Nominative / कर्त्ता 

Accusative / कर्म

Instrumental / करण

Dative / संप्रदान

Ablative / अपादान

Conjunctive / संबंध

Locative / अधिष्ठान 

 Interjective / विस्मयबोधक

इस प्रकार "केन" यद्यपि करण का द्योतक है, किन्तु भावार्थ के रूप में विस्मय / कौतूहल / जिज्ञासा / प्रश्न भी हो सकता है।

तो प्रश्न यह है कि लिखता कौन है?

स्पष्ट है कि जिन साधनों (उपकरणों) की सहायता से लिखने का कार्य होता है, वे सभी जड (insentient) हैं, जबकि जिससे प्रेरित होकर ये सारे साधन किसी कार्य में संलग्न होकर उसे पूर्ण करते हैं वह तत्व चेतन (sentient) है। 

जड, भौतिक पञ्च महाभूतों से बना हुआ स्थूल इन्द्रियगोचर जगत् है, जिसे 'यह' कहा जाता है।

चेतन, संवेदनशील वह तत्व है जिसे अहंकार, मन, बुद्धि और  चित्त कहा जाता है। और इसे ही अपने-आपकी तरह से जाना भी जाता है। अपने-आप को "मैं" कहा जाता है।

'यह' अर्थात् इस स्थूल जगत् को पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जाना जाता है, किन्तु इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों को भी अहंकार, मन, बुद्धि और चित्त में ही जाना जाता है, -न कि स्वयं उन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा।

अहंकार, मन, बुद्धि तथा चित्त का जो अधिष्ठान है, वह चेतना अर्थात् "जानना" या शुद्ध भान / बोध मात्र है, जिसमें ज्ञाता एवं ज्ञात का विभाजन नहीं होता। 

चूँकि "जानना" ही अहंकार, मन, बुद्धि और चित्त, इन चारों का स्वामी और उन्हें प्रेरित करनेवाली शक्ति है, इसलिए "केन" पद का संकेत "जानने" का ही सूचक है। 

"जानना" ही चेतन (sentience / consciousness) है, जबकि स्थूल या सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियाँ तथा अहंकार, मन, बुद्धि एवं चित्त आदि केवल जड (insentient) हैं।

"जानना" ही "है", और "है / जो है" वह' भी "जानना" ही है।

इसे ही आत्मा के सन्दर्भ में क्रमशः उसके दो पक्षों (aspects) के रूप में व्यक्त किया जाता है।

आत्मा (चेतन) अकर्त्ता है, कुछ भी नहीं करता, जबकि उससे ही प्रेरित होकर समस्त कार्य होता है।

इसलिए अस्तित्व और चेतना ये ही वास्तविकता है। 

कार्य, कर्त्ता इत्यादि अहंकार, मन, बुद्धि और चित्त में आभास / प्रतीति हैं।

यही शिक्षा केनोपनिषद् की विषय-वस्तु है। 

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April 17, 2022

न लौटनेवाला समय

अपुनरावर्तनीय 

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इस अप्रैल माह में शायद शनि ग्रह के अतिरिक्त शेष सभी ग्रह राशि-परिवर्तन कर रहे हैं। कालसर्प योग जो पिछले सप्ताह था, इस सप्ताह भी कल तक रहेगा। यूक्रेन- रूस के बीच के युद्ध के सात सप्ताह बीत चुके हैं। यूक्रेन के लड़कों (लड़ाकों) ने रूस के एक बहुत बडे़ युद्धपोत 'मस्क्वा' को, जो अन्ध-महासागर (या ब्लैक सी) में तैनात था, जीते-जी सागर में इस तरह दफ़ना दिया है कि अब उसकी स्मृति ही शेष रह गई है। 

कल हनुमान-जयन्ती थी, जो आज भी मनाई जा रही है।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमत्ता वरिष्ठं।।  

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

सूर्य से विद्युच्चुम्बकीय तूफ़ान धरती की दिशा में तेजी से चला आ रहा है, जिससे रेडियो और मोबाइल संचार ठप्प या अस्त-व्यस्त होने की संभावना है। 

सूर्य का कोरोना (मंडल) धरती पर  कोरोना रोग की तरह फैल रहा है और उसके नए-नए वैरियंट्स जीव वैज्ञानिकों को हैरान कर रहे हैं। ऋण पर आधारित आर्थिक उन्नति अनेक देशों को दिवालिया और तबाह कर चुकी है, -अभी भी कर रही है, और जिसके शिकार पाकिस्तान और नेपाल से श्रीलंका तक, तथा  अफ्रीका और दुनिया भर तक के भी अनेक देश हो रहे हैं। यदि रूस, यूरोप (नाटो), अमेरिका और चीन, अपने अपने अहंकार के मद में डूबे रहे तो और संसार को इससे और भी बड़ी किसी विपत्ति में धकेल सकते हैं। 

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April 07, 2022

एक पुराना पोस्ट।

एक पुरानी कविता : नागलोक 

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बहुत पहले कभी, एक लम्बी कविता इस ब्लॉग में लिखी थी। जो विचार-रूपी सर्पों के लोक और बुद्धिजीवियों (की तुलना) के बारे में थी। अभी, पिछले कुछ समय से श्री विवेक अग्निहोत्री जी के द्वारा निर्देशित और पल्लवी जोशी -युगल द्वारा निर्मित फ़िल्म "काश्मीर फाइल्स" के बारे में बहुत कुछ लिखा, कहा जा रहा है। 

किसी ने कहा : "यह फ़िल्म नहीं एक आन्दोलन है!"

मुझे लगता है कि यह आन्दोलन भी नहीं, एक तरंग (wave) है, जो भारत और काश्मीर के अतीत की अनुगूँज है। अभी तक जो अन्तिम फ़िल्म कभी किसी टॉकीज़ में देखी थी, उसे शायद 1990 के आस-पास देखा था। वह भी तब, जब मैं बीमार हुआ था और जाँच के लिए पास के बड़े शहर में विशेषज्ञ से मिलने गया था। यद्यपि उस जाँच और चिकित्सा से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा, कि मुझे सलाह देनेवाला चिकित्सक स्वयं भी इस बारे में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका था, और उसकी सलाह और इलाज के बावजूद जब मेरा स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया तो मैंने स्वास्थ्य के बारे में सोचना तक बन्द कर दिया था। बाद में धीरे धीरे मेरी बीमारी अपने ही आप ठीक हो गई। क्यों, कैसे, -इस बारे में भी मैंने बाद में भी कभी कुछ नहीं सोचा। 

यू-ट्यूब पर पल्लवी जोशी द्वारा I AM BUDDHA शीर्षक से अपलोड किए गए कुछ वीडियो मैंने ज़रूर देखे, लेकिन उनके माध्यम से मैं तब इस बारे में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका, कि उस माध्यम से वे कौन सा सन्देश देना चाहती रही होंगी।

"ताशकन्द फाइल्स" के बारे में यू-ट्यूब पर कुछ प्रारंभिक प्रिव्यू देखने से मुझे विवेक अग्निहोत्री के चिन्तन और दर्शन की दिशा का कुछ अनुमान हुआ। मैंने यह अनुभव किया कि न तो विवेक अग्निहोत्री जी और न पल्लवी जोशी ही किसी मिशन को पूर्ण करने के लिए यह सब कार्य कर रहे हैं,  -यह सब तो विधाता की योजना है, जिससे वे इस कार्य में संलग्न हैं। (शायद विधाता की ऐसी ही किसी योजना के अनुसार ही) मुझे भी किसी भी मनुष्य के नाम के बारे में विचार करने और उससे उसके जीवन के ध्येय का अनुमान करने में रुचि होती है।

जैसे जनमेजय ने किसी पूर्वकल्प में नाग-यज्ञ किया था, विवेक अग्निहोत्री जी का कार्य मुझे किसी नाग-यज्ञ के अनुष्ठान जैसा ही प्रतीत होता है। 

विवेक-रूपी अग्नि में विचार-रूपी सर्पों की आहुति देनेवाला यह अग्निहोत्री। शायद इससे मेरी कविता "नाग-लोक" की सुसंगति (analogy) देखी जा सकती है। 

प्रायः हम सभी विचार को ही ज्ञान समझने की भूल कर बैठते हैं। इस प्रकार का समस्त विचार केवल स्मृति की ही उपज और अनुगूँज है, इसे हम नहीं देख पाते। दूसरी ओर, एक वह विचार भी है, जो शाब्दिक रूप ग्रहण करने से पहले हमारे मन में कौंध की तरह प्रकट होता है। इसे प्रत्यभिज्ञा भी कहा जा सकता है।

प्रायः हर मनुष्य या तो भावना से प्रवृत्त होकर कार्य किया करता है, या फिर भावना का उन्मेष होने पर स्मृति का सहारा लेता है, और उसकी स्मृति में संचित किसी विचार के प्रेरित होने पर उस विचार का अनुसरण करता है। इसे ही संस्कार कह सकते हैं।

भावना से उत्स्फूर्त विचार और विचार से उत्स्फूर्त भावना यद्यपि भिन्न भिन्न प्रतीत नहीं होते हैं, फिर भी प्रेरणा और परिणाम की दृष्टि से उनमें बहुत भिन्नता होती है। भय या आकर्षण, ईर्ष्या या लोभ इसी प्रकार की वृत्तियाँ हैं, जिनकी पहचान, -भाव, भावना या विचार के रूप में भी की जा सकती है।

हमारा व्यक्तिगत और सामूहिक मानस भी इन्हीं वृत्तियों के लिए मानों क्रीड़ास्थल है, जिनमें असंख्य वृत्तियाँ उठती और विलीन होती रहती हैं । कोई वृत्ति किसी दूसरी वृत्ति को निगल लेती है, तो कोई किसी और को। यही "नागलोक" कविता की भूमिका थी।

विवेक अग्निहोत्री की कथा यहीं पूर्ण नहीं हो जाती। उन्होंने अब नस्ली नरसंहार (genocide) के लिए एक संग्रहालय निर्मित करने का आह्वान किया है। इसमें सन्देह नहीं कि उनकी दृष्टि किसी वैचारिक दर्शन या मिशन से प्रेरित न होकर भिन्न भिन्न मानवीय तथ्यों के सार्वकालिक मूल्यांकन पर केन्द्रित है। उनका यह स्वप्न (vision) किसी के प्रति घृणा या द्वेष से नहीं, बल्कि इस भावना से प्रेरित है कि इतिहास के यथार्थ की विडम्बनाओं को हम किन्हीं तथाकथित आदर्शों आदि के चश्मे से नहीं, सीधे ही देखें और अपने सामूहिक व्यवहार की परीक्षा उस परिप्रेक्ष्य से करें।

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April 06, 2022

भूल-भुलैया

सत् और असत् (गीता 2/16)

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सन्दर्भ : 

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।१६।।

(गीता, अध्याय २)

ऋण और धन के बारे में सोचते हुए इस तथ्य पर से ध्यान नहीं जाता है, कि 'ऋण' शब्द यद्यपि अभाव का सूचक है, फिर भी वह किसी ऐसी वस्तु जैसा प्रतीत होता है मानों उसे हम अनुभव कर सकें और उसे व्यवहार में उपयोग में ला सकें।

हम कहते हैं : मैंने इतने रुपयों का ऋण लिया / दिया।

जो (ऋण) लिया या दिया जाता है, -वे 'रुपये' भी इस तुलना में कागज के रूप में ही सही, एक अस्तित्वमान ऐसी वस्तु होती है, जिसका मूल्य पुनः इस ऋण शब्द की ही तरह, काल्पनिक और मानसिक विचार मात्र होता है, न कि कोई ऐसी वस्तु, जिसे कि भौतिक रूप से सत्यापित किया जा सके। फिर भी सामूहिक स्वीकार्यता के आधार पर वह हमें ठोस यथार्थ लगने लगता है।

यही है बुद्धि की भूलभुलैया!

इसलिए व्यावहारिक सत्य, मान्यताओं के आधार पर भिन्न भिन्न रूपों में स्वीकार किए जाते हुए भी मूलतः अभावात्मक वस्तु या अभाव मात्र होता है। किन्तु बुद्धि की इस भूल-भुलैया में ही तो (हमारा!?) मन उलझकर रह जाता है, और जिसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसी काल्पनिक वस्तु को सत्य की तरह ग्रहण कर लेता है, तथा इतना ही नहीं, उसके आधार पर उसे व्यवहार में लाने के लिए यत्न करने लगता है। क्या इसका अर्थ यह हुआ कि हम व्यावहारिक सत्य को केवल भ्रम मानकर उसे काम में लाना ही बन्द कर दें? नहीं, वह तो पुनः एक और नई कल्पना का आश्रय लेने के समान होगा।

इसलिए संपूर्ण व्यवहार और व्यवहार करने का वैचारिक आधार मूलतः औपचारिक सत्य है, और स्थान, समय एवं परिस्थिति के साथ सतत बदलता रहता है।

"ऋण" ऐसी ही एक मान्यता है, जिसे अपनाने पर हमारे जीवन में सुविधा और व्यवस्था भी स्थापित हो सकती है, परंतु जिसे न समझ पाने पर हमारे जीवन में समस्याएँ या परेशानियाँ भी पैदा हो सकती हैं।

हमारा समूचा अर्थतन्त्र इसी भूल-भुलैया से ग्रस्त होने के कारण ही व्यक्तिगत और सामूहिक लोभ और भय के प्रभाव से अनेक कठिन समस्याएँ पैदा करता है, और फिर उनमें उलझकर ही रह जाता है।

इससे शायद ही कोई असहमत होगा कि अपनी बुद्धि पर हमारा वैयक्तिक अधिकार होता है और इस बुद्धि को परस्पर साझा भी किया जा सकता है। क्या 'मन' कोई ऐसी वस्तु है, जो वैयक्तिक या सामूहिक के अर्थ में 'मेरा' या 'हमारा' होता हो? 'मन' शब्द से जिसे व्यक्त किया जाता है क्या वह भी बुद्धि की ही तरह की एक अमूर्त अवधारणा (abstract notion) ही नहीं है? फिर भी हम सभी ही शायद इससे सहमत होंगे कि मन ही ऐसी एक वस्तु है, जो कि बुद्धि की भूल-भुलैया में उलझ जाया करता है।

यद्यपि मन और बुद्धि भी, दोनों ही किसी ऐसे जीवित मनुष्य के भीतर ही पाए जाते हैं, जिसमें जीवन नामक एक और यथार्थ तत्व विद्यमान होता है, और 'जीवन' नामक यह तत्व कोई मूर्त अथवा अमूर्त अवधारणा न होकर, प्रकट अनुभूतिगम्य यथार्थ होते हुए भी समस्त और किसी भी अनुभूति का वह आधारभूत सत्य है, जिसमें कि 'मेरा' और 'मुझ से भिन्न' की भावना जन्म लेती है। 'मेरा' और 'मुझ से भिन्न' की यही भावना पुनः 'मैं' तथा 'मुझ से भिन्न' की भावना में रूपान्तरित हो जाती है। मनुष्य के द्वारा तब 'मेरी बुद्धि', 'मेरी भावना' और 'मेरा मन' जैसे निरर्थक  शब्द अपना लिए जाते हैं, जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी भी होते हैं, किन्तु बस वहीं तक उनकी सार्थकता होती है।

बुद्धि, भावना या मन, -इन शब्दों से जिसे इंगित किया जाता है, क्या ऐसी वस्तु को किसी भौतिक वस्तु की तरह अस्तित्वमान कहा जा सकता है, या क्या उस तरह से सत्यापित भी किया जा सकता है? 

किन्तु बुद्धि इसी भ्रम में फँस जाती है, और फँसी ही रहती है।

बुद्धि (intellect) के लिए यह संभव ही नहीं है, कि वह अपने प्रयास से इस उलझाव / भूल-भुलैया से बाहर निकल सके।

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April 05, 2022

दिन गुजरते जा रहे हैं!

कविता : 05-04-2022

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किसलिए? 

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कुछ भी नहीं है, यूँ भी कहने के लिए,

यूँ कि बस, ये दिन गुजरते जा रहे हैं! 

कुछ भी नहीं है करने के लिए मगर, 

हर दिन ही हम, रोज़ मरते जा रहे हैं!

और कुछ दिन आखिरी हैं युद्ध के,

कौन कल होगा यहाँ पर, या न हो,

कुछ हैं घायल मगर कुछ वे और भी,

हर रोज़ जो दम तोड़ते ही जा रहे हैं!

क्या पता वह कौन सी है, हार-जीत, 

जिसकी ख़ातिर यूँ, लड़ते ही जा रहे हैं!

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The Loan Culture.

ऋण या धन?

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फ़ाकामस्ती! 

अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों ने पढ़ा ही होगा कि भारत का किसान ऋणी के रूप में जन्म लेता है, अपना पूरा जीवन भर ऋण के ही बोझ तले दबा रहकर जीता है और अन्ततः मृत्यु हो जाने पर विरासत में ऋण ही छोड़ जाता है। 

मुंशी प्रेमचन्द की रचना (गोदान या रंगभूमि?) में होरी, धनिया और गोबर के जीवन के बारे में भी आपने शायद पढ़ा होगा।

होरी, धनिया और गोबर के जीवन को जिस (अर्थ)व्यवस्था के अजगर ने ऋण की गुँजलक में जकड़ रखा था, उसकी धुरी वैसे तो विदेशी शासन ही था, किन्तु केवल अंग्रेजी ही नहीं, अंग्रेजों ने तो इससे भी पहले से जिस जमींदारी प्रथा का प्रारंभ मुग़लों द्वारा किया गया था, उसी बुनियाद को बस और अधिक मज़बूत बनाते हुए पूरी चतुराई से उस हुक्का-हुक्काम-हाक़िम-तहजीब का भरपूर इस्तेमाल, इस शोषण तंत्र को शक्तिशाली बनाने के लिए किया था। 

अंग्रेजी पुलिस, जमींदार और राय-बहादुर जैसे चाटुकारों के ही जरिए से शोषण की यह व्यवस्था फली और फूली। स्वतन्त्रता की प्राप्ति हो जाने के बाद भी उस व्यवस्था ने देश की राजनीति को भी अपना शिकार बना लिया। 

"ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" पोस्ट लिखते समय मैं यद्यपि श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे राष्ट्रों की स्थिति के बारे पढ़कर उनके बारे में सोच रहा था। एक एक कर कैसे सब चीन के डेट्-ट्रेप में फँसे चले जा रहे हैं, किन्तु फिर मुझे याद आया, कि शास्त्रों में ऋण को पाप (क्यों) कहा गया है!

सामाजिक, राष्ट्रीय संदर्भ में या पूरी मनुष्यता की दृष्टि से यद्यपि यह आर्थिक उन्नति का साधन अवश्य हो सकता है, किन्तु जब गरीब को ऋण देने की बात आती है, तो वहाँ पर भी बिचौलिए अपना हिस्सा बाज़ की तरह झपटने से बाज़ नहीं आते। 

होरी की, या गोबर की कहानी में आपने पढा़ होगा कि साहूकार कैसे उसे एक रुपये का कर्ज़ देकर उसमें से बारह आने पेशगी वसूल कर लेता है।

दूसरी तरफ, मुग़लों, अंग्रेजों के ही समय में भारत में तम्बाकू का आगमन हुआ और इसी तरह शराब का भी । अंग्रेजों ने अफ़ीम, भांग आदि को मादक द्रव्यों की श्रेणी में रखकर देशी-विलायती शराब पीने के चलन को प्रोत्साहित किया । वही गरीब मज़दूर या किसान अब 'देसी' का आदी हो गया और यदि उसे जैसे-तैसे बैंक या सरकार से कर्ज़ मिल भी जाता है तो शराब पीने के लिए खर्च कर देता है।

खेती के लिए कर्ज़ लेकर ट्यूबवैल खोदे जाते हैं, और ट्रैक्टर की सहायता से घंटों का काम मिनटों में निपटाया जाता है। खेती के जिस काम से बीस हाथों को रोज़गार मिला करता था, वे बेकार और बेरोजगार होकर बीड़ी पीते हुए टैम पास करते हैं। बैल भी बेचारे बेकार होकर कसाई के पास पहुँच जाते हैं। 

जमीन के सीने को गहरे से गहरा खोदकर भूजल से सिंचाई कर खेतों की प्यास बुझाई जाती है और बारिश का जल नदियों में न जाकर सीधे बाढ़ का कारण बन जाता है, या समुद्र में बह जाता है। भूजल का स्तर लगातार गिरता जाता है, और मिनरल वाटर तथा आर. ओ. का धंधा उसी तेजी से बढ़ता जाता है। दूषित जल से और गंदगी से होनेवाली बीमारियांँ फैलती चली जाती हैं और पैक्ड फूड खरीदकर बच्चे खुश होते रहते हैं। पॉमोलीन से उनका स्वास्थ्य बरबाद होता रहता है और आँगनबाड़ी में तथा स्कूलों में दोपहर का भोजन उन्हें दिए जाने की व्यवस्था की जाती है। माता-पिता के और भाई बहनों के संबंध से अनजान यह बच्चा और उसका परिवार अपने / सिर्फ अपने ही बारे में सोचना सीख लेता है। 

मशीनों और कल-कारखानों के शोर में घरेलू आटा-चक्की की आवाज़ भी खो गई। जिन स्त्रियों को आटा-चक्की चलाना और अनाज पीसना पिछड़ापन लगता था, अब फर्राटे से कार, स्कूटी और मोबाइल चलाती हैं। फ़िक्र न करें, पेट्रोल-डीजल की चिन्ता भी छोड़ें, अब तो ईवी का जमाना है!

यह सब ऋण का कमाल ही है न!

पैसे और ख्याति की चकाचौंध और क्या होती है?

तो बेहिचक ऋण लें, घी पीना या खाना पुराने पिछड़े जमाने का रिवाज़ लगता हो तो इंग्लिश वाइन का मजा लीजिए!

कर्ज़ की पीते थे मय, और कहते थे, हाँ!

रंग लाएगी, -हमारी फ़ाकामस्ती एक दिन!

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April 04, 2022

मतलब / बेमतलब

 कविता / 03-03-2022

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यह भी एक राज़ / रहस्य है!

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मरने का क्या मतलब है,

जीते-जी किसने जाना!

जीने का क्या मतलब है,

मर-कर भी किसने जाना!

अगर किसी ने जाना भी,  

तो कैसे किससे, कह पाए,

और अगर न कह पाए,

बिन बोले कैसे रह पाए!

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तितीर्षुः

मेरे विज्ञान-शिक्षक -2

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पिछले पोस्ट में मैंने अपने उस अद्भुत् विज्ञान-शिक्षक का वर्णन किया जो विज्ञान के माध्यम से हमें संस्कृत और अध्यात्म पढ़ाने लगे थे।

मेरा एक सहपाठी उनकी परीक्षा लेना चाहता था। 

उसने गंभीरता से उनसे प्रश्न पूछा :

"सर! क्या अनुमापन (titration) शब्द का संबंध भी संस्कृत से हो सकता है?"

"ज़रूर! संस्कृत में 'तृषा' शब्द प्यास के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

इसी प्रकार तृ' > तीर्यते धातु / शब्द तैरने और पार होने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 

तितीर्षा का अर्थ हुआ -- पार जाने की इच्छा।

तितीर्षु का अर्थ हुआ -- पार जाने का इच्छुक। 

तितीर्षणम् ही टाइट्रेशन का निकटतम संस्कृत शब्द हो सकता है। 

हमें कोई सिद्धान्त नहीं प्रतिपादित करना है, बल्कि बस बिखरे सूत्रों को खोजना और उनके बीच संभावित नियमों की सहायता से सामञ्जस्य स्थापित करना है। 

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विज्ञान-शिक्षक

ज्ञानं विज्ञानसहितं

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गीता-सन्दर्भ :

अध्याय ८

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इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१।।

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वैसे तो वे मेरे स्कूल में विज्ञान विषय के व्याख्याता थे, किन्तु वे संस्कृत भाषा के भी प्रखर विद्वान और ज्ञाता थे। उन्होंने संस्कृत भाषा का विशेष  अध्ययन तो नहीं किया था किन्तु वे अवश्य ही इसका प्रमाण थे, कि कैसे किसी किसी मनुष्य को जन्म से ही कोई सिद्धि प्राप्त हुई होती है। 

वे इतनी भाषाओं के बारे में इतना अधिक जानते थे कि मुझे यह आश्चर्यप्रद लगता था। 

रसायन-शास्त्र की प्रयोगशाला में पहले दिन उन्होंने हमें विभिन्न उपकरणों के बारे में इस प्रकार बताया :

पूरयति इति पूरयेत् पिबति इति पिबेत् च।। 

पेयकरं इति पृकरं स्रुषा इति स्रुषिबलम्।। 

(अब मेरा अनुमान है कि उक्त श्लोक नागार्जुन द्वारा रचा गया होगा!)

जिसमें द्रव भरा जाता है उसे पूरयेत् अर्थात् burette कहते हैं।

जो पीने के काम में सहायक है उसे पिबेत् अर्थात्  pippet कहते हैं। 

जिसमें पीने के लिए तय मात्रा में मापकर पेय पदार्थ रखा जाता है, उसे पृकर / पेयकर अर्थात् beaker कहा जाता है।

वैदिक संस्कृत भाषा में स्रुषा शब्द उस चमस् (चम्मच) के लिए प्रयुक्त होता है, जिससे घृत या किसी अन्य द्रव्य को हवन-कुण्ड में उँडेला जाता है।

स्रुषा / स्रुष् धातु से ही बना शब्द है स्रुषाबलं, जिसका रूपांतरण ग्रीक के अपभ्रंश / सज्ञात / सजात /cognate  शब्द क्रुसिबल (crucible) में हुआ।

चूँकि मूल संस्कृत शब्द उन शब्दों के अर्थ के स्पष्टतः द्योतक हैं, इसलिए यह निःसंदिग्ध सत्य है कि संस्कृत भाषा से हम अवश्य ही बहुत कुछ और भी बेहतर तरीके से जान और समझ सकते हैं। 

इन शब्दों से यह अनुमान किया जा सकता है कि ग्रीक भाषा का उद्भव मूलतः संस्कृत भाषा से हुआ होगा।

विज्ञान विषय को भौतिक विज्ञान (साइंस / science) तक ही सीमित न रखकर उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य और तात्पर्य में ग्रहण किया जाए तो हम अधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों सन्दर्भों में अच्छी तरह समझ सकते हैं। तब विज्ञान भाषा-ज्ञान से ऊपर उठकर भाषा-विज्ञान का रूप ले लेता है। 

चलते-चलते :

आपने  bib, imbibe भी सुना होगा। ये शब्द भी 'पिब्' धातु - 'पिबति' के ही सजात / सज्ञात / cognate  हैं।

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April 03, 2022

ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।।

यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ।।

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किसी भी प्रकार का ऋण पाप होता है। ऋण लेना और देना भी दोनों ही पापबुद्धि से प्रेरित होता है, फिर भी ऋण से मुक्त होकर मनुष्य पाप से मुक्त हो सकता है।

ऋण पाँच प्रकार के कहे जाते हैं : मातृ-पितृ ऋण, जिसे लेकर मनुष्य जन्म लेता है। देव-ऋण, जिसे पञ्च महाभूतों से लेकर यह शरीर, मन, बुद्धि आदि पाए जाते हैं ।

ऋषि-ऋण / गुरु-ऋण, जिससे हम अज्ञान-रूपी क्लेशों आदि से मुक्त होते हैं, लोक-ऋण, अर्थात् स्थूल पञ्च-तत्वों, समाज एवं पर्यावरण से प्राप्त वे साधन जिनसे हम स्वस्थ रहकर प्रसन्नता के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। और अंतिम ऋण है - अपने आप के, ईश्वर से भिन्न स्वतंत्र, पृथक् कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता और स्वामी होने का गर्व या अभिमान, अर्थात् अहंकार। 

ऋण इसलिए पाप है क्योंकि इसके द्वारा हम मूल्य चुकाए बिना ही विविध प्रकार के उपभोगों का भोग कर सुख अनुभव करते हैं। 

गीता अध्याय 3 में वर्णित निम्न श्लोकों से भी इसकी पुष्टि होती है :

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।। 

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।८।।

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचार।।९।।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।। 

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।१०।।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।११।।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।१२।।

उपरोक्त अंतिम श्लोक में "स्तेन" शब्द तस्कर का पर्याय है। तस्कर का अर्थ है जिसका हमें अधिकार न हो, और किसी ऐसी वस्तु का उपभोग करना, जिसका मूल्य हमने न चुकाया हो। 

पाँच सार्वभौम महाव्रतों :

अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह में से 'अस्तेय' यही है।

ये पाँच महाव्रत ही पातञ्जल योग में सम्मिलित रूप से "यम" कहे गए हैं। इनका पालन करना धर्म और कर्तव्य, तथा इनका उल्लंघन करना ही अधर्म है।

भौतिक सुखों का उपभोग तब अवश्य ही उचित है जब उनका मूल्य देकर उन्हें प्राप्त किया जाता है। यज्ञ के अर्थात् वेदविहित कर्म के अनुष्ठान (के माध्यम) से भी इन सुखों को अर्जित किया जा सकता है, और बलपूर्वक अनधिकृत रीति से, बिना उनका मूल्य चुकाए भी। इसी आधार पर वे पुण्य अथवा पाप होते हैं।

अल्पबुद्धि, आसुरी बुद्धि से युक्त मनुष्य, तत्काल प्राप्त होनेवाले भौतिक सुखों की प्राप्ति की आशा से मोहित हो जाता है, और उनके विनाशकारी दुष्परिणामों को नहीं देख पाता है।

भौतिक प्रगति की ऐसी ही अन्धी दौड़-धूप में हम सभी, केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि पूरा समाज और मानव-समुदाय इसे ही श्रेय मानकर अपनी सफलता से फूला नहीं समाता है।

किन्तु इसके साथ ही, इस सब उपक्रम से जो तनाव, चिन्ताएँ, आशंकाएँ पैदा होती हैं उनकी उसे कल्पना भी नहीं होती, और जब वे प्रत्यक्षतः सामने आ खड़ी होती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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April 02, 2022

यह नववर्ष !

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, 2022

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हर नये साल (भारतीय नववर्ष) के पहले दिन अवश्य ही उसका फ़ोन आता है। वही शुभकामनाएँ, और प्रणाम। फिर आशीर्वाद पाने की कामना।

मैं बोला :

"आशीर्वाद सदैव है ही!"

वह जिद पर अड़ा रहा। 

इस बार नया तर्क था :

"जैसे न्याय होना ही काफी नहीं होता, न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए, वैसे ही आशीर्वाद होना ही काफी नहीं होता,  -आशीर्वाद है, यह दिखाई भी देना चाहिए!"

मुझे याद आया :

एक बार श्री रमण महर्षि से उनके एक भक्त ने उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करते हुए ऐसा ही प्रश्न पूछा था :

"मुझ पर कृपा करें!"

"कृपा सदैव ही है!"

"तो मुझे प्रतीत क्यों नहीं होती! कृपया मेरे सिर पर हाथ रख दें तो मुझे विश्वास हो जाएगा।"

"अगला निवेदन होगा : कृपया स्टॉम्प-पेपर पर लिखकर दें!  और कृपा प्रतीत न होने पर कोर्ट में दावा दायर किया जाएगा!"

मैंने उसे यह कथा सुनाई, तो वह बोला :

"आशीर्वाद सदैव है, इसका क्या प्रमाण हो सकता है?"

मैंने कहा :

"क्या तुम्हें कभी अपने आप का विस्मरण हो सकता है?"

सुनकर वह बस स्तब्ध रह गया।

"आप ठीक कहते हैं। प्रणाम ब्रह्मन्!"

सुनकर मैं भी बिलकुल ही स्तब्ध रह गया!

(गुडी पाडवा / 02 अप्रैल 2022)

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April 01, 2022

जब मुझे कुछ नहीं करना होता!

कविता : एक अप्रैल 2022

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तब मुझे कुछ नहीं करना होता,

पंछी भोर होते ही, चहचहाते हैं,

और होती है, ताज़गी, ठंडी हवा में,

अभी सूरज भी तो उगा नहीं होता, 

सैर करने के लिए बाहर, रास्ते भी, 

सुनसान, स्तब्ध, और शान्त होते हैं,

मन प्रसन्न, उत्साह से भरा होता है,

और चल सकता हूँ मैं, मीलों तक, 

सतत-लगातार, अथक, -अनथक भी,

किन्तु फिर, लौटना भी तो होता है!

जब तक कि बढ़ जाता है कोलाहल,

सड़क पर भीड़, वाहनों की क़तार,

इससे पहले कि हवा में धूल-धुँआ, 

और शोर-शराबा दबोच लें मुझको,

खींच लेता हूँ कुछ गहरी साँसें भीतर, 

भर लेता हूँ हृदय, सीने में ताज़ा हवा, 

लौट आता हूँ करके सैर, घर वापस,

तब मुझे कुछ नहीं करना होता! 

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