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February 20, 2011

एक क़ोशिश, बस यूँ ही कुछ .....!!

एक क़ोशिश, बस यूँ ही कुछ .....!!
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इश्तेहार हो चले हैं अब रस्मी, रस्में अब होने लगी हैं इश्तेहार,
जब से बाज़ार घुस गया घर में बन गये रिश्ते सारे क़ारोबार ।
जी हाँ एहसास भी मिलेंगे यहाँ, थोक में लेंगे तो क़िफ़ायत होगी,
एक के साथ दो मिलेंगे फ़्री, और पैसों की भी बचत होगी ।
चाहे क़िश्तों में चुकायें या ऑर्डर दें, चाहे क्रेडिट से लें, हर्ज़ नहीं,
कैश दें एकमुश्त तो बेहतर है, कोई बाक़ी रहेगा कर्ज़ नहीं ।
आईये वेल्कम है, स्वागत है, ख़ैर-मक़दम है, आईये हुज़ूर,
आपका घर है, मेरा ये जो ग़रीबख़ाना है, आईये आईये ज़रूर ज़रूर !!

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January 09, 2011

~~ चलो इक बार फ़िर से,.... ~~

~~~~~ चलो इक बार फ़िर से,.... ~~~~~
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कितना आसाँ है कहना,
’अजनबी बन जाएँ हम दोनों’,
कितना मुश्किल है,
सिलसिले खत्म कर देना ,
काश वो शुरु ही न हुए होते,,
वर्ना बनता ही कैसे अफ़साना ?
भुला देने से अफ़साने खत्म नहीं होते,
सिलसिले टूटते नहीं ऐसे,
अजनबी दोस्त तो बन जाते हैं,
दोस्त पर अजनबी बनें कैसे ?
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December 06, 2009

वक्त.

वक्त.
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कभी दोस्त, कभी दुश्मन, कभी दुनिया,
इश्क की राहों में रोड़े भी कई हैं ।

कभी अपने, तो कभी परायों के,
-और कभी किराए के,
सियासत की जंग में घोड़े भी कई हैं ।

कसमें, - कसमें थीं, वादे, -वादे थे,
निभाये हैं कुछ मगर तोड़े भी कई हैं ।

कतरा-कतरा करके ही सही,
दर्द दरिया ने भी जोड़े भी कई हैं ।

वक्त के कितने चेहरे ज़ाहिर हैं,
सच्चे -झूठे हैं, उसने ओढ़े भी कई हैं ।

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