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September 05, 2024

Distressed and Depressed.

The Crises and The Challenges of Our Times.

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भारत के संकट और चुनौतियाँ 

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर,

हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेक़रार!!

'70 के दशक में स्व. दुष्यन्त कुमार को पढ़ा था।

कैसे एक ही शे'र या साहित्यिक रचना के अर्थ समय, संदर्भ और उसे पढ़नेवाले की मनःस्थिति के अनुसार बदल जाते हैं इसकी कल्पना तक शायद ही न तो उस साहित्यकार या शायर को होती होगी और न उस रचना को पढ़नेवाले उसके किसी पाठक को, यह इसका एक बहुत ज्वलन्त उदाहरण हो सकता है!

जरा कल्पना कीजिए किसी उस लड़की की स्थिति की, जो स्वयं बांग्लादेश की एक ग़ैर मुस्लिम दलित वर्ग की बेटी है, जिसके घर के कमज़ोर किवाड़ों पर गहरी अँधेरी रात में किन्हीं गुंडों या बदमाशों की खटखटाहट हो रही हो, या उस जैसी किसी दूसरी लड़की की स्थिति, जो कि स्वयं इस डर से घर से घबराकर भागकर पड़ोसी के घर जाकर आतुर प्रतीक्षा करते हुए उसके किवाड़ों को जोर जोर से खटखटा रही हो!

उसी दौर में साहित्य से मेरा मोहभंग हो चुका था। चाहे वह मुंशी प्रेमचन्द हों, कृशन चन्दर हों, क़ैफी आजमी हों या नामी गिरामी कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, हरिवंशराय बच्चन जैसे लोग ही क्यों न हों! उनकी तुलना में स्थापित साहित्यकार जैसे फणीश्वरनाथ रेणु, मुक्तिबोध उन सबसे कुछ अलग जान पड़ते थे। ऐसे ही पृथ्वी राजकपूर और उनका पूरा परिवार जो आज भी सफलता, समृद्धि और ऐश्वर्य की बुलन्दियाँ छू रहा है, समय के उस दौर में बहुत क्रान्तिकारी जान पड़ता था। एक बहुत लम्बी सूची है इन सब कलाकारों और साहित्यकारोंं की, जिन्हें हवा के रुख को और नदी के बहाव की दिशा पहचानने और उसके अनुसार अवसर भुनाने में महारत हासिल थी, फिर भले ही उससे देश और देश की जनता का भविष्य चौपट ही क्यों न हो रहा है। उस समय का, विशेष रूप से 1900 से बाद के अंग्रेजी और उससे पहले के मुग़लों का शासन भी अपनी पूरी ताकत से भारत और भारत की जनता, संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने पर आमादा था। और मैं यह भी मानता हूँ कि हममें से अधिकांश यद्यपि विदेशी शासन के इस निरन्तर दमन और अत्याचारों से अत्यन्त पीड़ित और त्रस्त थे, किन्तु हममें ही कुछ इने-गिने ऐसे भी थे जिन्होंने अपने भारत राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करते हुए हँसते हँसते हुए अपने प्राणों का बलिदान तक कर दिया। और फिर कुछ ऐसे तथाकथित राष्ट्रवादी थे जिन्हें कांग्रेस में नरम दल में जाना जाता था, जिन्हें भारत को आजाद कराने का श्रेय भी दिया गया। उसी कॉंग्रेस ने जिन्ना और माउन्टबैटन से साँठ-गाँठ कर भारत का विभाजन कराया था। जब तक इस पूरे इतिहास पर हम ध्यान नहीं देंगे, तब तक हमारे संकटों और विपत्तियों का अन्त नहीं हो सकेगा। फिल्में, साहित्य, कला, संगीत, टी वी, इन्टरनेट और इससे जुड़े विभिन्न नेटवर्क आज भी हमें बुरी तरह भ्रमित कर रहे हैं और इस दौर में भी अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए बहुत से लोग ढिठाई और दुष्टतापूर्वक जनता के दरवाजों पर बेकरारी से दस्तक दे रहे हैं। और हम आज भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कौन सी दस्तक किसकी है! बंगाल जल रहा है, आसाम, उड़ीसा, और तो और, उन्हें दिल्ली तक अब दूर नहीं दिखाई दे रहा है।

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July 28, 2024

हिन्दुत्व एक षड्यंत्र

क्या हिन्दुत्व एक षड्यंत्र है?

यह पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ कि इसके माध्यम से स्वर्गीय श्री बलराज मधोक के 

भारतीयता के विचार 

को पुनः एक बार स्मरण कर लिया जाए।

यह तो स्पष्ट है कि जिस समय श्री बलराज मधोक ने उक्त विचार / दर्शन की स्थापना और प्रतिपादन किया था, उस समय तत्कालीन जनसंघ  के कट्टर हिन्दूवादी नेता यह समझने में पूरी तरह और नितान्त विफल रहे कि

आर. एस. एस. की स्थापना करनेवाले इस विषय में कितने दिग्भ्रमित थे। 

सबसे बड़ी बात यह कि "हिन्दू" धर्म नहीं, संस्कृति या सभ्यता है जिसका प्राण है सनातन, अर्थात् धर्म, जो कि सनातन है। सनातन धर्म कहना पुनरुक्ति मात्र है। जैसे कोई कहे  - "मीठी शक्कर"। शक्कर का अर्थ है मीठा और मीठा का अर्थ है शक्कर। इसी प्रकार सनातन का अर्थ है अजर अमर धर्म और धर्म का अर्थ है अजर अमर अविनाशी अर्थात् सनातन और शाश्वत। आर. एस. एस. की स्थापना ही भारत और भारतीयता को,  भारतीय जाति, सभ्यता और संस्कृति को "हिन्दू" नाम दिए जाने से हुई।

इस प्रकार हिन्दू-विरोधी सभी समुदाय संगठित हो गए और इस प्रकार से 

India That Is Bharat

अर्थात् भारत और भारतीयता के विचार को गौण बनाकर अप्रासंगिक और उपेक्षित दिया गया।

दुर्भाग्य से या इरादतन श्री बलराज मधोक को पार्टी के महत्वपूर्ण स्थान से धीरे धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया और मार्जिनलाइज़ कर अप्रासंगिक बना दिया गया। आज भी भारत विश्व की दो महाशक्तियों अर्थात् भारत (और भारतीयतावादी) तथा भारत के विरोधियों के बीच का रणक्षेत्र बना हुआ है। जनसंघ, आर. एस. एस. और अन्य सभी हिन्दूवादी संगठन आज तक इस अन्तर्द्वन्द्व / दुविधा से उबर नहीं पाए हैं। और कभी उबर ही सकेंगे ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं है।

भारत को "हिन्दू राष्ट्र" घोषित न कर पाने में मूलतः यही असमंजस मूल कारण है।

हो सकता है कि हिन्दूवादी विचारधारा के प्रबल और कट्टर समर्थक भविष्य में संविधान संशोधन लाकर ऐसा कर पाने में सफल भी हो जाएँ, लेकिन इसकी कौन सी और कितनी बड़ी कीमत "भारतीयों" और सनातन (या धर्म) को माननेवालों की चुकानी होगी इसकी कल्पना करना तक अत्यन्त भयावह है।

धर्म तो सनातन ही है, और सनातन ही धर्म है।

हिन्दू (वैदिक), जैन, बौद्ध, सिख सभी सनातन के ही विभिन्न रूप हैं यहाँ तक कि पारसी भी। केवल मुस्लिम, ईसाई और यहूदी परंपराएँ ही "सनातन" अर्थात् "वैदिक धर्म" से प्रतिकूल विचारधारा पर आधारित हैं और उनके माननेवालों का ही सनातन अर्थात् वैदिक धर्म से मौलिक मतभेद है। भारतीय और गैर-भारतीय का विभाजन इस दृष्टि से स्पष्ट ही है, और इसलिए भारत राष्ट्र को "हिन्दू राष्ट्र" बनाने का विचार ही मूलतः विध्वंसकारी और अत्यन्त विनाशकारी भी है।

उक्त पोस्ट लिखने का एकमात्र कारण यही है कि इस माध्यम से प्रबुद्धों और राष्ट्रप्रेमी नागरिकों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाए।

कृपया "लेबल" में 'बलराज मधोक' पर क्लिक कर पहले लिखे मेरे पोस्ट्स का अवलोकन करें।

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