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July 28, 2018

चार कविताएँ, फ़ुरसत में ...

चार कविताएँ, फ़ुरसत में ...
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कुछ गरज़ते हैं, पर बरसते नहीं,
कुछ बरसते हैं, पर गरज़ते नहीं,
कुछ गरज़ते हैं, बरस भी पड़ते हैं,
बारिशें झेलती रहती हैं सब-कुछ !
बारिशों से बादलों का साथ,
जैसे थामे हों हाथ में हाथ,
कभी तो छूट जाता है,
कभी छोड़ भी जाता है ।
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कुछ भी ...
जब हम बिज़ी होंगे,
कैसे इज़ी होंगे?
अच्छा है लेज़ी होना,
अच्छा है क्रेज़ी होना !
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सवाल !?
दुआएँ किसको दूँ मैं,
दुआएँ किससे लूँ मैं,
दुआएँ किससे माँगूँ,
किसके लिए मैं ?
जो माँगने पर भी न दे उससे?
जो बिन माँगे देता रहा है, उससे?
उसे मालूम है किसे क्या चाहिए,
क्यों परेशां करूँ खामखाँ उसको?
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 कुप्पा ...
अपनी तारीफ़ सुन मैं हुआ फूलकर कुप्पा,
डर है फूलकर फूट ही न जाऊँ कभी,
हे प्रभो अगले जनम न बनाना इन्सां,
इन्सां के बदले बना देना भले ही कपि...
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