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January 14, 2023

उठता-धँसता हिमालय

जोशीमठ

पिछले दो सप्ताह में जोशीमठ 9.4 सेंटीमीटर धँस चुका है और वहाँ स्थित सभी इमारतें धीरे धीरे धरती के भीतर उतर रही हैं। हिमालय की ऊँचाई पिछले कुछ वर्षों में कुछ सेंटीमीटर बढ़ गई है। जैसा कि मैंने अभी हिन्दुस्तान टाइम्स की खबरों में नेट पर पढ़ा। सभी भू-वैज्ञानिक जानते हैं कि हिमालय भूकम्प-सक्रिय क्षेत्र है अर्थात् वहाँ धरती के नीचे स्थित टेक्टोनिक प्लेट्स अभी सुस्थिर नहीं हुई हैं। और इसलिए हिमालय के इस क्षेत्र में विशेष रूप से जहाँ जोशीमठ है, और पूरे हिमालय-क्षेत्र में किसी भी प्रकार का निर्माण-कार्य नहीं किया जाना चाहिए। भारतवर्ष में, सदियों से यात्रा करने की यह परंपरा ही रही है कि वह तीर्थाटन के उद्देश्य से की जाती रही है। अब यात्राएँ टूरिज्म या एड्वेंचर-टूरिज्म के रूप में की जाने लगी हैं। सभी तीर्थस्थलों पर उन्नति और टूरिज्म को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से व्यावसायिक स्तर पर सड़कें और भवन, होटलें और सर्वसुविधाओं से युक्त स्थान निर्मित और विकसित किए जा रहे हैं, अब विभिन्न तीर्थस्थानों की यात्रा करना बहुत आसान हो गया है सुदूर और दुर्गम स्थानों तक सुविधाओं का विस्तार और जाल फैला हुआ है और किसी स्थान की यात्रा अब अधिकतर पर्यटन और मनोरंजन के उद्देश्य से ही की जाती है, न कि धार्मिक या आध्यात्मिक प्रेरणाओं के कारण। इस प्रकार की यात्राओं को करनेवाले लोगों का विश्वास और आस्था भी उन्हीं टेक्टोनिक प्लेट्स की तरह अस्थिर होते हैं जो कि हिमालय की धरती की गहराई में स्थित हैं। बहुत पहले तीर्थयात्राएँ अनेक कष्ट उठाकर की जाती थीं, जिनमें उन कष्टों को सहन करने को तप ही माना जाता था। किन्तु अब तप की यह भावना ही हमारी दृष्टि से ओझल हो चुकी है और हम किसी तीर्थ की यात्रा यदि करते भी हैं तो इसीलिए ताकि उसका प्रचार कर गौरव का अनुभव करें। इससे पुण्य मिलता है या नहीं, यह तो अपनी अपनी मान्यता और विश्वास है, किन्तु हमें यह सन्तोष अवश्य हो जाता है कि हमारा एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा हो गया।किन्तु यह प्रश्न तो फिर भी अनुत्तरित ही रहा कि हम इसके लिए जो मूल्य दे रहे हैं वह कहाँ तक उचित है? प्रकृति की व्यवस्था और कार्य में हस्तक्षेप किया जाना कहाँ तक उचित है। इस प्रश्न की उपेक्षा यदि की जाती है तो इसके परिणामों से बचा भी नहीं जा सकता।

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