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November 02, 2014

आज की कविता /02 /11 /2014 अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः ॥

आज की कविता /02 /11 /2014 
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अद्यरचिता संस्कृता रचना 
अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
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अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
अतिदुर्लभं खलु नरजन्म,
ततो हि विप्रत्वम् द्विजत्वमपि ।
ततो दुःखदर्शनम् जगति
अस्मिनशाश्वति दुःखालये ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

तदपि ईशानुग्रहेण कोऽपि
भवति समर्थोऽस्मिन् ।
विचिन्तयति तत्त्वम् 
स्वरूपमात्मनः जगतश्च ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

केचिदिच्छन्ति रूपम्
केचिदिच्छन्ति शक्तिम् ।
केचिद्धनमपि सुखञ्च
विरलो हि कोऽपि भक्तिम् ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

त्यजति नरो गृहम् 
निजपरिवारम् धनञ्च ।
स्वमित्वमपि जगति 
न  कोऽपि त्यजति व्यक्तिम् ॥ 

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

सत्यम् न त्यज्यमानः 
कुटिलो अहं-सङ्कल्पो ।
न  कोऽपि जानाति कथं वा 
सङ्कल्पमिमम् त्यक्तम्  ॥
अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

परं तु यदा जानाति 
सङ्कल्पदू:ख मूलम् ।
अयि पतत्यहं तूर्तम्
क्षिप्रम् हि भजेदीशम् ॥

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....

अर्पयनात्मनम् स्वाम् 
प्राप्नोति तस्य भक्तिम् ।
विन्दति स्वात्मनिष्ठाम् 
विन्दति श्रीहरिम् सः  

अय्ये अति दुर्लभा भक्तिः, ....
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August 27, 2014

November 27, 2013

ईशावास्योपनिषद् श्लोक 15

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । 
तत्ते पूषनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
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January 24, 2012

जगज्जननी !!

जगज्जननी !!
( स्वरचित मातृ-स्तवन)  
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© Vinay Vaidya,
26012012
  
गावः  श्वेता कपिला श्यामा वा
वात्सल्यं प्रदत्तं शुभ्रम् हि ताभिः  ।
तथैव घोरे सौम्ये शान्ते मुदिते
अम्बे सर्वेरूपे त्वं कृपामयि ॥
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October 31, 2011

वृन्दा / हरिप्रिया / मोक्षदा / तुलसी


कॉपी-राईट : विनय वैद्य, 
३१-१०-२०११.
© Vinay Vaidya 
१.वृन्दा


तुलसी मेरे आँगन की !
अब बढ़ चली है ।
हाँ कभी-कभी जाने-अनजाने,
छीन लेता हूँ मैं,
उसके हिस्से की धूप !
उठ आए हैं,
उन्नत हरितश्रँग,
प्रतीक्षा में हैं,
मञ्जरियाँ,
नयनपट खुलने की,
जब होगा मिलन,
भीतर बाहर के नीलाम्बर का ।
और मैं अकिञ्चन्,
अनायास भागी बनूँगा,
अहैतुक दुर्लभ्य कृपा-प्रसाद का,
जब अर्पित करूँगा,
एक तुलसीपत्र, 
एक मञ्जरि,
श्रीचरणों में ।

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२. हरिप्रिया


हरि-तुल्य सी,
तुलसी अतुल-सी !
जीवन में, मृत्यु में,
पवित्रता में, पावनता में,
पतितपावनी हरि सी ।
जिसके सतीत्व के बल को
श्रीधर भी नहीं हरा सके थे,
मारने हेतु, जालन्धर को,
पहले छल से हरा था,
तुम्हारा सतीत्व,
हरि की माया तो हरि ही जानें,
जालन्धर-वध से,
जालन्धर तो धन्य हुआ ही,
लेकिन हो गए वे भी समर्पित,
तुम्हें ही,
निरन्तर प्रतीक्षा में ठहरे रहते हैं,
शालिग्राम,
शापग्रस्त अहल्या से !
कब कोई भक्त,
तुम्हारी पावन रज उन्हें समर्पित करे,
और वे तर जाएँ !!
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३. वृन्दोपनिषद्


वृन्दा / हरिप्रिया / मोक्षदा / तुलसी 


अगहन शुक्ल एकादशी,
मोक्षदा,
मेरे आँगन की तुलसी,
लद गई है मञ्जरियों से,
मञ्जरियाँ,
कुछ नईँ नन्हीँ नन्हीँ,
कुछ लजाती किशोरियाँ,
कुछ अलसाईँ अँगड़ाई लेतीं, 
नवतरुणियाँ,
और कुछ गतयौवनाएँ,
गरिमामयी प्रौढाएँ,
महिमामयी वृद्धाएँ,
सूखती भूमिसात् होती हुईँ सीताएँ,
देखता हूँ, 
बीज नन्हें,
हर बीज में छिपे असंख्य वृन्दावन,
वृन्दावन में रास खेलते,
अनगिनत बालगोपाल,
राधाकृष्ण से ।
उठाकर कुछ बीज,
रख लेता हूँ हथेली पर,
देखता हूँ असंख्य,
सृष्टियाँ, हर एक में,
जैसी देखी होंगी कभी,
यशोदा ने,
कन्हैया के मुख में,
जब उसे चोरी छिपे,
मिट्टी खाते हुए पकड़ा होगा,
और डपट कर कहा होगा,
"कान्हा ! मुँह खोलो !!"
और उसने मुँह खोलकर दिखाया होगा ।
वह नन्हा सा बीज क्षण भर में,
खींच ले जाता है उन बीते दिनों में,
जब मैं पिता को गीतापाठ करते सुनता था ।
"अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत 
अव्यक्त निधनान्येव, तत्र का परिदेवना ॥"
(२/२८)
हथेली पर रखे बीज वृन्द स्वरों में गाते हैं, :
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥"
मानों कह रहे हों,
वह पूर्ण है, 
जिससे यह तुलसी जन्मी,
यह पूर्ण है, जो प्रारंभ है, 
किसी तुलसीवन का,
पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है,
अव्यक्त से व्यक्त,
पूर्ण से पूर्ण के प्रकट होने के, 
अनन्तर भी,
पूर्ण यथावत् ही रहता है,
अक्षुण्ण,
व्यक्त और अव्यक्त भी ।
फ़िर नई तुलसी,
फ़िर नईं मञ्जरियाँ,
यह है नया उपनिषद्,
जिसे कहते हैं वे सब,
वृन्दोपनिषद् ॥
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