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August 08, 2021

सुविधाजनक

दर्शन, धर्म, सिद्धान्त, मत (वाद), और सिद्धान्तवाद 

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उस व्यक्ति का अनुभव यह था कि जीवन का एकमात्र सदैव सर्वाधिक आवश्यक प्रश्न है : 

"मैं कौन? / Who I am? "

यह उसका अपना अनुभव था जिससे उत्पन्न हुई उसकी दृष्टि से उसका पूरा जीवन प्रेरित था। कभी कोई जिज्ञासु उससे चर्चा करता तो वह समय और व्यक्ति की पात्रता और संवाद के संभव होने की स्थिति में उसकी योग्यता के अनुसार अपनी सम्मति भी प्रदान करता था किन्तु यह भी कहता था कि सभी व्यवस्थाओं की मर्यादा होती है और जीवन में सदैव सब कुछ अनुकूल होता रहे यह न तो संभव है न आवश्यक। आवश्यक यदि कुछ है तो वह है :

"अपने आपको जान लेना।"

यह उसका विचार, मत, सिद्धान्त, या सिद्धान्तवाद भी नहीं था,  और किसी के प्रति आग्रह या उपदेश भी नहीं था। 

ऐसा ही एक अन्य व्यक्ति था जो जागृति (awareness) तथा चेतना (consciousness) के ही सन्दर्भ में 

"आत्म-ज्ञान (self-knowledge) तथा आत्म-प्रत्यभिज्ञा (knowing the self)"

के भेद को स्पष्ट करते हुए, :

"स्व (self / what is) और सत्य (Reality)"

के बारे में अपना अनुभव उससे मिलने वाले मित्रों से 

"साझा (share)"

करता था। 

वह भी जिन शब्दों का प्रयोग करता था उन शब्दों के अर्थ के प्रति हमारी मान्यता के अनुसार वह 

"क्या / जो / (what)"

कहता था, उसे हम अपनी बुद्धि की सूक्ष्मता और मन की शुद्धता के आधार पर अपने अपने तरीके से ग्रहण कर सकते हैं। इसी प्रकार एक तीसरा व्यक्ति था जो केवल अपने इस अनुभव के विषय में कहता था कि केवल :

"अपना ध्यान स्व (self) पर लगाने से, स्व (self) में गहराई तक निमग्न हो जाने वह स्व (self) अपने उस यथार्थ (जैसा कि उसका वास्तविक अर्थ है) को प्रकट कर देता है जो अभी हमारे मन और मन की विभिन्न वृत्तियों और अपने सच्चे स्वरूप को न जानने रूपी अंधकार में ढँका होने से हमें दिखलाई नहीं देता।"

यह उनका दर्शन था जिसे उनकी सत्य की प्रत्यभिज्ञा कहा जा सकता है। 

इसे हम हमारे समय के तीन विशिष्ट व्यक्तियों से संबद्ध कर उनकी कोई पहचान तय कर सकते हैं किन्तु यह पहचान भी वैसी ही केवल एक वैचारिक गतिविधि होगा, जैसी गतिविधि हमारा मन 

"ज्ञात (known)" 

के अंतर्गत रहते हुए करता रहता है। 

शायद हम 

"मैं कौन? / (Who I am?)",

"ज्ञात से मुक्ति / (Freedom from the known)"

तथा  :

"अहं ब्रह्मास्मि / ( I AM THAT)"

शीर्षकों से उनके व्यक्तित्व और उन शिक्षकों की शिक्षाओं के बारे में कुछ अनुमान लगा सकते हैं, किन्तु वह भी हमारे मन और बुद्धि की ज्ञात की ही सीमा में, उसी के अन्तर्गत होनेवाली एक वैचारिक गतिविधि ही होगा।

इसलिए भी उनके नामों का यहाँ उल्लेख करना अनावश्यक प्रतीत होता है।

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December 07, 2017

बदलाव

एक सरासर गलत ख़याल
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मैं बदलना चाहता हूँ,
लेकिन बदलना नहीं चाहता,
पर बदलना अगर बदा है,
तो बदल ही जाऊँगा!
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रहस्य : अगर आप बदल रहे हैं तो आपको यह कैसे पता चल पाएगा कि आप बदल गए? क्या यह एक विरोधाभास नहीं हुआ? वस्तुतः आप कभी बदल ही नहीं सकते यह अकाट्य सत्य है, अगर कुछ बदलता है तो वह है आपकी खुद के बारे में राय, और यह तो यूँ भी बदलती रहती है इसके बदलने से आप कहाँ प्रभावित हो सकते हैं । क्योंकि प्रभावित होने का मतलब हुआ बदलना ...!
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वास्तव में इस वक्तव्य को कई दृष्टियों से समझा जा सकता है । व्यवहार की भाषा में ’मैं’ शब्द का जो अर्थ ग्रहण किया जाता है उसका अपना प्रयोजन और उपयोग है लेकिन जब अध्यात्म की सर्वोच्च सीढ़ी पर इस शब्द का उपयोग किया जाता है तो इसके लक्ष्यार्थ और वाच्यार्थ के सन्दर्भ में इस अर्थ की विवेचना की जाती है ।
इस एक शब्द ’मैं’ जिसके लिए संस्कृत में अहं तथा अहंकार दोनों रूपों में प्रयोग किया जाता है में से प्रथम अर्थ अधिष्ठान अर्थात् परम सत्य की ओर संकेत के लिए किया जाता है और जो व्यक्ति-विशेष नहीं होता, जबकि दूसरा व्यक्ति-विशेष के अर्थ में किया जाता है । सामान्यतः न तो किसी का ध्यान इस अंतर की ओर जाता है, न किसी की स्वाभाविक उत्सुकता इसे जानने में होती है जब तक कि मनुष्य में विवेक और वैराग्य से इतनी परिपक्वता न आ जाए जब इसे जानना उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न ही न बन जाए । संसार में रहते हुए यह हो पाना कठिन अवश्य है लेकिन असंभव नहीं । और जब कोई प्रश्न जीवन-मरण का हो जाता है तो कठिन है या आसान यह कम महत्व का और उस प्रश्न का समाधान अधिक महत्व का हो जाता है । कोई व्यक्ति कुएँ में गिर जाए तो वहाँ से बाहर निकल पाना कठिन है या सरल है इसका महत्व उतना अधिक नहीं रह जाता जितना इसका कि वह कैसे वहाँ से बाहर आ सके ।
इसलिए यह वक्तव्य एक प्रकार से आत्म-अनुसंधान का प्रवेश-द्वार ही है ।
अधिकांश प्रकरण-ग्रंथों जैसे गीता-उपनिषद आदि में इस प्रश्न का सिद्धान्त भर बतलाया जाता है जबकि विवेक-चूडामणि, पञ्चदशी, अपरोक्षानुभूति आदि में तथा श्री रमण महर्षि, श्री निसर्गदत्त महाराज तथा श्री जे.कृष्णमूर्ति के साहित्य में इसे कैसे हल किया जाता है उसकी विधि विस्तार से स्पष्ट की जाती है । पात्र के लिए वह वहुत उपयोगी सिद्ध होती है जबकि केवल बौद्धिक रीति से उसे पढ़ना उस दिशा में रुचि भले ही पैदा कर दे, प्रायः सतह पर ही रह जाता है ।
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एक सवाल : "स्वेच्छया कोई नहीं बदलता ।
सम्यक् रूप से कोई नहीं बदलता लेकिन क्षणिक प्रलय रोज ही बदल देती है सबको थोड़ा-थोड़ा ..."
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यहाँ बौद्धिक चर्चा न करते हुए ऐसा कह सकते हैं कि बदलाव का अभिप्रेत किसी ’कोई’ के सन्दर्भ में नहीं, अपने स्वयं के ’मैं’ के बदलने के सन्दर्भ में है । जब मुझे लगता है कि मैं बदल गया, बदलना चाहता हूँ, नहीं बदलना चाहता... आदि तो मेरे सन्दर्भ में इसका मतलब यह हुआ कि ’मैं’ ऐसी वस्तु है जो अपने बदलाव होने के तथ्य को जान और प्रमाणित कर सकती है । अनुभव या तर्क से भी यह मतलब मूलतः त्रुटिपूर्ण और असंगत है । ’मैं अपने को नहीं जानता’ या ’मैं अपने को जानता हूँ’ यह विचार भी उतना ही त्रुटिपूर्ण और असंगत है । व्यवहार ’जानना’ शब्द का प्रयोग हमेशा इस धारणा पर आधारित होता है कि ’जाननेवाला’ और ’जिसे जाना जाता है’ वे दो पृथक् वस्तुएँ हैं और ’जानकारी’ / ’ज्ञान’ उन्हें जोड़ता है, उन्हें संबंधित करता है । अपने-आपको जानना या न जानना इस दृष्टि से असंभव है । फिर अपने-आपको बदलना तो नितांत असंभव है । इसलिए जिस ’बदलाव’ की बात यहाँ कही जा रही है वह दुनिया या किसी दूसरे के बदलाव के बारे में नहीं बल्कि अपने-आपके संभावित बदलाव के बारे में है ।
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May 18, 2016

नर्मदे हर !

इस बार 
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संभवतः प्रथम शिप्रा-स्नान मैंने 1956 के सिंहस्थ में किया होगा । क्योंकि तब मेरी आयु 2 या ढाई वर्ष के लगभग थी और आगर से उज्जैन आना छोटी लाइन की रेलगाड़ी से होता था । यह बहुत संभव है कि आगर से माता (माई)-पिता (अण्णा) और भाई बहनों के साथ मेरा उज्जैन आना हुआ हो । पर कुछ याद नहीं आता ।
कभी किसी से पूछा हो, या किसी ने बताया हो, यह भी याद नहीं । 
1980 में दूसरे, 1992 में तीसरे और 2004 में चौथे सिंहस्थ में मैं उज्जैन में था । इस सिंहस्थ में माँ नर्मदा ने मुझसे कहा : "बेटा! इस सिंहस्थ में मैं स्वयं ही उज्जैन जा रही हूँ इसलिए तुम उज्जैन छोड़कर यहाँ मेरे पास ही आ जाओ !" 
और मैं माँ नर्मदा की आज्ञा कैसे टाल सकता था ?
इसलिए मैं यहाँ (नावघाट-खेड़ी ग्राम) आ गया ।
और माई की ऐसी कृपा कि यहाँ आने के बाद कुछ दिनों में ही माई की स्तुति में यह रचना  मुझसे बन पड़ी ! 
एक संकेत देना चाहूँगा :
'अहं-स्फूर्ति' और 'अहं-वृत्ति' का सन्दर्भ श्री रमण महर्षि के उपदेशों के तारतम्य में दृष्टव्य है ।     
माई की महिमा मैं बालक क्या जान सकता हूँ ?
और वर्णन तो बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी भी कहाँ कर पाते हैं ??
नर्मदे हर !
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