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November 20, 2025

SIX DIMENSIONS

त्वं स्कन्दः!

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ॐ गं गणपतये नमः।।

एकदा नैमिष्यारण्ये ...

2 x 2 x 2 x 10 x 10 x 10 x 10 = 88000 

ऋषयः ... 

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं रुद्रो त्वं स्कन्दस्त्वं यमस्त्वं वरुणः!

सपने, स्मृति, संसार, समय, संबंध और जन्म-मृत्यु 

निमिषमात्र में घटित और अघटित होते हैं।

यही हैं षडानन भगवान् स्कन्द के छः मुख, और

स्कन्दावतार !

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April 14, 2025

The System-Analyst.

The Anatomy, The Physiology and The Metabolism of an Organism / Organic System.

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यह पोस्ट इस ब्लॉग में लिखने का एक उद्देश्य यह भी है कि इसके पेज-व्यूज़ 199000 प्लस हो चुके हैं। जल्दी ही 200000 हो सकें।

अंग्रेजी या हिन्दी में ब्लॉगपोस्ट लिखने के अपने अपने फायदे और खामियाँ भी होती हैं, इसलिए दोनों का एक साथ प्रयोग करने से  optimization  का लाभ भी हो सकता है।

कोई व्यवस्था नॉमिनल, पर्सनल या मैटीरियल इन तीनों में से किसी एक प्रकार की हो सकती है। जैसे बही खाते लिखने के लिए खाते / account को इन तीनों में बाँट देने से मुद्रा / पैसे के एक से दूसरे में होनेवाले प्रवाह को सुनियोजित किया जा सकता है, वैसे ही व्यक्तिगत और सामूहिक संपत्ति (मुद्रा) के हस्तान्तरण को भी इस प्रकार से सुनियोजित किया जा सकता है।

किसी भी शुद्धतः भौतिक या यांत्रिक प्रणाली / व्यवस्था / System को संचालित करनेवाला उससे भिन्न ही कोई और ही होता है। दूसरी ओर, किसी जैव-प्रणाली / जैव- इकाई / organism के भीतर निहित सीमित जीवन ही उस जैव-इकाई को स्वयं ही किसी हद तक स्वतंत्र रूप से संचालित करता है, ऐसा प्रतीत होता है। जैसे अनेक छोटे-बड़े यंत्रों को सुनियोजित रीति से परस्पर संबद्ध कर एक यांत्रिक प्रणाली बनाई जाती है जिसे बनानेवाला उस प्रणाली से अलग होते हुए भी उसका संचालन करता है। किसी भी जैव-प्रणाली में उसको नियंत्रित और संचालित करनेवाला नियामक वस्तुतः उसके भीतर या बाहर होता है  कौन और कहाँ होता है इस बारे में शायद विज्ञान भी अभी ठीक ठीक कुछ नहीं कह सकता। और अगर कहें कि विज्ञान के नियम ही यह कार्य करते हैं तो यह भी तय है कि वैज्ञानिक प्रकृति के कार्यों का अवलोकन करने के  माध्यम से उन नियमों के बीच कोई सुसंगति खोजता है और उसे शाब्दिक रूप प्रदान करता है उसे 'नियम' कहा जाता है। ये नियम सार्वत्रिक और वैश्विक / universal and ubiquitous होते हैं, न कि किसी जैव-प्रणाली के अन्तर्गत सीमित, नियंत्रित और संचालित होते हैं।

इस प्रकार, ये नियम ही जैव-प्रणाली की दृष्टि से उसमें निहित और व्याप्त चेतना / consciousness होते हैं, जबकि ऐसी सभी जैव-प्रणालियों को उनमें स्थित भिन्न भिन्न प्रवृत्तियों के माध्यम से प्रेरित करनेवाला भी कोई नियम अवश्य और अपरिहार्यतः है जो उन सबमें भीतर और बाहर भी अस्तित्व में है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि

समष्टि और वैश्विक चेतना अर्थात्- Universal and collective consciousness.

ही वह एकमात्र नियम है जो चेतन / conscious  भी है, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि उसकी चेतनता / चेतना / consciousness  किसी एक जैव-प्रणाली या कुछ जैव-प्रणालियों तक ही सीमित है। वह चेतनता / चेतना अबाध और सर्वत्र व्याप्त है। चूँकि किसी एक या कुछ जैव-प्रणालियों के बनने और मिटने से उस चेतनता / चेतना की स्थिति और कार्य-क्षमता प्रभावित नहीं होती इसलिए उसे ईश्वर-चेतना या ईश्वरीय चेतना कहना गलत नहीं होगा। इस प्रकार हम ऐसे "ईश्वर" के अस्तित्व की कल्पना और अनुमान कर सकते हैं जो संपूर्ण अस्तित्व का संचालन तथा नियंत्रण भी करता है जो विभिन्न जड चेतन वस्तुओं को निर्वैयक्तिक या वैयक्तिक स्वरूप देता है और उसके ही द्वारा तय किए गए मानदण्डों के आधार पर किसी तय समय तक के लिए जीवन भी देता है। वह समय बीत जाने पर बाद में उसमें स्थित प्राण और चेतना विलीन हो जाते हैं, यद्यपि वे द्रव्य, जिनसे भौतिक शरीर और भौतिक संसार बनता है केवल रूपान्तरित भर होते हैं, नष्ट तो वे भी नहीं होते हैं। ऐसी ही किसी दूसरी, और  अन्य जैव-प्रणाली के बनने पर पुनः उसमें भी प्राण और चेतना का आविर्भाव होता है, लेकिन यह नहीं पता है कि क्या यह किसी जैव-प्रणाली के पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं।

ऐसी ही असंख्य जैव-प्रणालियों के सामूहिक जीवन पर, और उनके बीच की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया पर ध्यान दें तो यह संपूर्ण संसार भी इसी तरह से, अपने-आपमें एक विराट और अत्यन्त जटिल किन्तु सुगठित / compact, connected, synchronized इकाई प्रतीत होगा, जिसका नियन्ता / ईश्वर भी सर्वत्र व्याप्त नियामक और एकमात्र समष्टिगत, सामूहिक और वैयक्तिक नियम भी स्वयं वही होगा।

श्री रमण महर्षि कृत 

உள்ளது நாற்பது  ग्रन्थ के रचयिता वासिष्ठ गणपति ने इसके संस्कृत काव्यानुवाद 

सद्दर्शनम् 

में इसी सत्य को इस प्रकार से श्लोकबद्ध किया है --

सर्वैर्निदानं जगतोऽहमश्च

वाच्यः प्रभुः कश्चिदपारशक्तिः।

चित्रेऽत्र लोक्यं च विलोकिता च

पटः प्रकाशोऽभवत्स एकः।। 

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July 30, 2023

The Mediocrity

आम आदमी

आम आदमी के बारे में वह भी सोचता था और इसलिए भी उसका अध्यात्म और धर्म के उस प्रकार पर भरोसा नहीं जो कि आम आदमी की मानसिकता के सन्दर्भ में सामाजिक स्तर पर दिखाई देता है। उसके इस चिन्तन में उसे किसी ईश्वर की मान्यता भी अनावश्यक प्रतीत होती थी। 'नोट्स' में उसने आगे लिखा था :

सांख्य-दर्शन की दृष्टि से भी किसी ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं हो सकता है। इसी तरह चूँकि ईश्वर के 'न होने' को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता, इसलिए और जैसा कि योग-दर्शन समाधिपाद में औपचारिक रूप से 'ईश्वर' को परिभाषित करते हुए कहा गया है :

ईश्वरप्रणिधानाद्वा।।२३।।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।। 

-- ।।२४।।

उसका संशय निराधार है, यह भी नहीं कह सकते।

उसने आगे लिखा था, फिर :

ईश्वर-अंश जीव अविनाशी।।

इस उद्धरण के अर्थ की व्याख्या भी भिन्न भिन्न प्रकार से की जा सकती है और किसी पुरुष-विशेष के 'ईश्वर' होने के मत को अकाट्य सत्य की तरह कैसे स्वीकार किया जा सकता है? और 

"जीव ईश्वर का ही अंश है, क्या यह भी वैसे ही सत्य नहीं है, जैसे कि :

"ईश्वर जीव का ही अंश है?" 

याद आया महर्षि रमण कृत 'उपदेश-सारः' :

ईशजीवयोर्वेषधीभिदा।।

सत्सवरूपतः वस्तुकेवलम्।।

इसका तात्पर्य यह कि मनुष्यों की अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार ईश्वर और जीव के बीच भेद या अभेद होने की, जैसी भी कल्पना हो, दोनों ही मूलतः एकमेव सत् के ही दो रूप हैं। इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता है कि वैसे उसका झुकाव 'सांख्यनिष्ठा' की ही ओर अधिक था, किन्तु जब तक वह न पूछता, इस बारे में मैं उससे कैसे कुछ कह सकता था? ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि जिसे ईश्वर कहा जा सकता है वह एक मान्यता है या अनुभव, भावना है या अनुभूति, इन्द्रियगम्य-मनोगम्य, या बुद्धिगम्य कोई विषय है, अपने से भिन्न या अभिन्न दूसरी कोई सत्ता। ईश्वर के विषय में स्वयं मुझे भी यह दुविधा है क्योंकि वह जीव की ही तरह "प्रभु" और "विभु" दोनों ही है, जैसा कि गीता में अध्याय 5 के निम्नलिखित श्लोकों में वर्णन किया गया है :

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।

अर्थात् अपने हृदय में उत्पन्न इस अज्ञान को जिसने ज्ञान से नष्ट कर दिया है, उसके लिए वह परम-तत्व परमात्मा या परमेश्वर, आदित्य अर्थात् सूर्य जैसा प्रत्यक्ष हो जाता है।

"इसलिए भी ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं इसे मान्यता या तर्क-वितर्क से नहीं जाना जा सकता है।"

यह उसका निष्कर्ष था। 

उसके 'नोट्स'  में यह सब पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।

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July 16, 2023

आशीर्वाद

सफलता का मद

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'नोट्स' -- 2

अपनी बुद्धि और "सफलता" के मद में डूबा हुआ मैं यह नहीं देख पाया कि सफलता भी सामर्थ्य, साधनों, समय और श्रम का परिणाम होती है। इच्छा तो बस एक प्रेरक तत्व है। और इन सबका सम्मिलित रूप है अनुशासन :

यो शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।।

याद आया। 

मैं कुछ इसी तरह इच्छा और संकल्प के बीच झूल रहा था। तब जीवन में पहली बार अपनी क्षमता, सामर्थ्य, साधनों की अपर्याप्तता और समय की सुनिश्चितता पर  संशय उठा। ईश्वर के बारे में तो मुझे यही लगता था कि वह अपनी सुविधा के लिए तय की गई एक मान्यता भर है, जो उसके अस्तित्व को मानते हैं उनके लिए भी, और जो उसके अस्तित्व को नहीं मानते, उनके लिए भी, और मजे की बात है कि जिन्हें इस बारे में दुविधा है, और तय नहीं कर पाते कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करें या नहीं, उनके लिए भी। 

मैं अपने आपको इसी तीसरी कोटि में रखता था। फिर किसी दिन मन में यह प्रश्न कौंधा कि ईश्वर है या नहीं, या मैं इस बारे में संशयग्रस्त हूँ, ऐसे विचारों में उलझे रहने से क्या मैं किसी ठोस नतीजे पर पहुँच सकूँगा! तात्पर्य यह, कि ये तीनों ही विकल्प मूलतः इस प्रश्न से मेरे ध्यान को पूरी तरह से हटा देते हैं कि "ईश्वर" शब्द किस वस्तु का या उसके अर्थ का द्योतक है? ईश्वर शब्द "समय" जैसा ही एक शब्द है और जैसे हम "समय" शब्द का अर्थ या तात्पर्य न जानते हुए भी इस शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं, क्या उसी तरह से हम "ईश्वर" का अर्थ, तात्पर्य और यह शब्द किस वस्तु का सूचक है, इसे भी न जानते हुए ही प्रयोग नहीं किया करते हैं! शायद मैं अज्ञेयवाद की दिशा में आगे बढ़ रहा था। फिर मुझे लगा, क्या "मैं नहीं जानता" यह कल्पना भी एक विचार या अवधारणा / मान्यता ही नहीं है! एक नया शब्द सीख लेने से मैं मान लेता हूँ कि ईश्वर "अज्ञेय" है और मैं "अज्ञेयवादी" हो जाता हूँ!

इसलिए पहले यह तय करना होगा कि "ईश्वर" शब्द का मेरे लिए क्या अभिप्राय हो सकता है?

जैसा मैंने पहले कहा, "समय" भी तो ऐसा ही एक शब्द है! क्या कभी कोई, समय का अस्तित्व है या नहीं है, इसे जानता या इस बारे में प्रश्न उठाता है?

श्रीमद्भगवद्गीता खोलता हूँ तो एक संकेत मिलता है :

कालो कलयतामहम्।।

तात्पर्य यह कि काल का अस्तित्व आकलन करनेवालों के लिए है। या काल अनुमानजनित एक निष्कर्ष भर है।

फिर लौट कर :

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।

और, 

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

पर आ जाता हूँ।

इसलिए काल "विकल्प" नामक वृत्ति हुआ।

काल के स्वरूप / चरित्र को दर्शानेवाला एक अन्य सूत्र :

वर्तते इति वर्तमानम्।।

भी है। 

अंततः यही लगता है कि ईश्वर भी काल की ही तरह से अव्याख्येय, अनिर्वचनीय वास्तविकता है। और इस पर एक या अनेक का विशेषण लागू नहीं हो सकता। जैसे कोई भाववाचक संज्ञा होती है, ईश्वर, काल और "मैं" भी abstract noun  ह8ं।

यह सब तो ठीक, किन्तु प्रश्न उठता है कि काल, ईश्वर और "मैं" क्या तीन पृथक् पृथक् वास्तविकताएँ हैं? यदि ऐसा है तो इन तीनों के बीच क्या संबंध है, या हो सकता है?

यहाँ मेरी बुद्धि स्तब्ध हो जाती है और शायद उस दशा का भागी हो जाता हूँ और जिसका श्रीमद्भगवद्गीता में : 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।

इस प्रकार से वर्णन किया गया है, ऐसा मुझे लगता है।

जैसे ही मुझे इस सत्य / स्थिति का साक्षात्कार होता है, यह भी स्पष्ट हो जाता है कि "काल", "मैं" या "ईश्वर" यद्यपि उसी दशा के पर्यायवाची हैं, फिर भी उन्हें मैं स्व या पर में विभाजित नहीं कर सकता। स्व / पर अर्थात् subjective or objective.

मेरे द्वारा दिए गए जानेवाले ऐसे ही वक्तव्यों के आधार पर लोग मुझे संत, ज्ञानी, महात्मा या गुरूजी आदि जैसे शब्दों से संबोधित करने लगते हैं। किन्तु जब इन विषयों पर बातचीत होती है कि किसी "निष्कर्ष" पर पहुँचने की उम्मीद करते हैं। क्या यह मुमकिन है? 

इस पर भी ऐतराज नहीं है, लेकिन जब लोग इस बहाने से मुझसे "आशीर्वाद" माँगने लगते हैं तो मैं समझ नहीं पाता कि "आशीर्वाद" का क्या मतलब है! जिन्हें यह सब अच्छा लगता है, वे आशीर्वाद का आदान करने के लिए स्वतंत्र हैं और उनसे मेरा कोई विरोध भी नहीं है, किन्तु मेरे लिए यह संभव ही नहीं कि मैं किसी को "आशीर्वाद" कह भी सकूँ! देना तो बहुत दूर है! औपचारिकतावश भी ऐसा करना मुझे अच्छा नहीं लगता। क्योंकि तब यह भी भावनात्मक शोषण का ही रूप हुआ। और अधिकांश लोग मुझसे सहमत नहीं हो पाते। क्योंकि वे "सफलता" के अभिलाषी होते हैं। पर पता नहीं कि क्या "सफलता" का "आशीर्वाद" से कोई संबंध है भी या नहीं! और फिर इस सिलसिले का अंत कहाँ है! 

इस पोस्ट में तो यहीं तक! 

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November 05, 2021

उत्सव धर्म

नित नूतन, चिर सनातन 

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भारतीय, वैदिक परंपरा में (मनुष्य के) जीवन के चार पुरुषार्थों को सबसे अधिक महत्व दिया गया है :

धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष ।

पुरुषार्थ का तात्पर्य है  : Endeavor, Enterprise.

ये दोनों शब्द भी पुनः उत्साह (enthusiasm) और उत्सव (festival) के समानार्थी हैं। 

इन चार पुरुषार्थों में से धर्म को वरीयता दी गई है क्योंकि शेष तीनों उसकी ही लीक पर चलते हैं।

क्या धर्म को परिभाषित किया जा सकता है! 

सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टि से कोई परिभाषा की जा सकती है, किन्तु परिभाषा भी पुनः धर्म की हमारी दृष्टि से ही पैदा होगी। परंपरा भी एक दृष्टि से धर्म ही है, किन्तु वह धर्म के वास्तविक,मूल स्वरूप, उद्देश्य और कारण को इंगित करे, यह आवश्यक नहीं।

पुनः, धर्म के एक सरल तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए किसी ऐसे आधार / मापदंड / criteria को तय करना होगा और चिर सनातन काल से इस आधार / मापदंड / criteria को श्रेय (common good) के आधार / मापदंड / criteria के अनुसार तय किया जाता रहा है। इस प्रकार धर्म केवल अपने और अपने समस्त परिवार ही नहीं, बल्कि मनुष्यमात्र, समाज, तथा संपूर्ण चर-अचर जीवन की विविध अभिव्यक्तियों के लिए जो कुछ भी आवश्यक, हितप्रद और श्रेयस्कर है उसे जानने, खोजने और उस पर आचरण करने का साधन है।

इस दृष्टि से धर्म जीवन के प्रति हमारी भावना की ही परिचायक गतिविधि है । समस्त अस्तित्व के और सबके लिए जो सदा शुभ है, वैसी भावना ही धर्म का मूलतः वास्तविक तत्व spirit और प्रेरणा है । क्या सभी के हृदय में मूलतः यही भावना अनायास ही विद्यमान नहीं होती? व्यक्ति, परिवार, समाज या मनुष्यता को उसकी समग्रता में देखा जाए, तो भावना ही व्यापक और  उदात्त अर्थ में धर्म का प्राण है।

भावना के जागृत होने के बाद ही बुद्धि और अपने अस्तित्व पर ध्यान जाता है, बुद्धि के अनुसार भावना ही भाव अथवा प्रवृत्ति का रूप लेकर संपूर्ण और समस्त जीवन को निर्देशित करती है। बुद्धि अपने-पराये का कृत्रिम, बहु-आयामी और बहुस्तरीय भेद / विभाजन करती है । अतएव भावना मूलतः और व्यावहारिक रूप से भी, संपूर्ण अस्तित्व का संचालन करनेवाली वह शक्ति है, जिसे बुद्धि की सहायता से यद्यपि समझा और जाना तो जा सकता है, किन्तु भावना के मूल तत्व और चरित्र का आकलन नहीं किया जा सकता, क्योंकि आकलन करना भी बुद्धि का ही विषय / कार्य है।

अब, यदि बुद्धि के स्वरूप और चरित्र को ही समझ पाना मनुष्य के लिए बहुत दुष्कर और कठिन है, तो भावना का स्वरूप और चरित्र क्या और कैसा है, इसका ठीक ठीक अनुमान लगाना तो इससे भी एक अधिक दुरूह कार्य है।

फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता, कि भावना जिसे कि अंग्रेजी में sentiment / spirit कह सकते हैं, अस्तित्व की मूल संचालनकर्त्री शक्ति है। 

इसे ही 'ईशिता' (governance) कहा जाता है, जो संपूर्ण जड-चेतन, चराचर भूत-प्राणियों को किसी न किसी कार्य में प्रेरित, संलग्न तथा प्रवृत्त करती है। 

'ईशिता', 'ईश्वर' की भाववाचक संज्ञा (abstract noun) है, और इस तरह से देखें तो 'ईश्वर' कोई व्यक्ति विशेष हो या न भी हो, तो भी 'ईशिता' अस्तित्व का शासन करनेवाली प्रत्यक्ष शक्ति है।

'ईशिता' के रूप में 'ईश्वर तत्व' का वर्णन ईशावास्योपनिषद् की भूमिका में इस प्रकार से किया गया है :

ईशिता सर्वभूतानां सर्वभूतमयश्च यः ।

ईशावास्येन संबोध्यमीश्वरं तं नमाम्यहम् ।।

वही सर्वत्र (omnipresent), सर्वज्ञ (omniscient) और सर्वशक्तिशाली (omnipotent) और प्रत्यक्ष वास्तविकता (Reality) भी है।

उसे एक अथवा अनेक की तरह सीमित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार जब भावना (spirit) की एकता (uniqueness), व्यापकता, असीम सामर्थ्य और विविधता पर ध्यान जाता है, तो हमें अनायास ही उसकी उस महिमा का भान होता है, जिसका हम यद्यपि वर्णन तो नहीं कर सकते, किन्तु उससे प्रभावित व अभिभूत (overwhelmed)  हुए बिना भी नहीं रह सकते। 

किन्तु परंपरा और समुदाय (religion and tradition) उसे यत्किञ्चित जानकर ही किसी न किसी प्रकार से अनुमान की प्रणाली में संकुचित तथा संकीर्ण कर देते हैं और उनके बीच की एक दूसरे के प्रति नासमझी से अनावश्यक संघर्ष और वैर उत्पन्न हो जाता है। 

दीपावलि की यह  ज्योति मनुष्यमात्र के हृदय में उस उत्सव धर्म की भावना का उन्मेष, संचार और विस्तार करे, इस कामना के साथ दीपावलि पर्व की असंख्य हार्दिक शुभकामनाएँ!

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July 16, 2021

शरीर, मन और आत्मा

अहं, त्वं, तत्, इदम्

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तव तत्त्वं न जानामि, कीदृशोऽसि महेश्वर।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

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अस्मद्, युष्मद्, और तत् तीन ही सर्वनाम एकमेव 'अहं' सर्वनाम के विस्तार हैं।  इसी का एक पर्याय है 'इदम्' ।

इन्हें 'प्रत्यय' भी कहा जाता है। 

जो प्रतीत होता है, जिसे प्रतीति की तरह ग्रहण कर लिया जाता है और व्यवहार में जिसे प्रयोग में लाया जाता है उसे प्रत्यय कहा जाता है।

'अस्मद्' अर्थात् 'मैं' या 'हम' प्रत्यय ऐसा ही सर्वनाम है, जिसे 'अपने लिए' के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

अपना अस्तित्व और अपने अस्तित्व का भान, परस्पर अभिन्न, अनन्य, और अविभाज्य (त्रि)कालरहित सत्य हैं ।

इसके बाद ही किसी अन्य तत्व के विषय में कुछ भी कहा जा सकता है। यहाँ तक कि 'काल' को यद्यपि अनादि समझा जाता है, किन्तु उस काल की अवधारणा का जन्म या सत्यता की प्रतीति भी अपने अस्तित्व और उस अपने अस्तित्व के भान के बाद ही हो सकती है।  इसलिए 'काल' प्रतीति और प्रत्यय मात्र है। 

अपने को (अर्थात् आत्मा को)  शरीर मात्र समझना उपयोगी है, किन्तु वह एक व्यक्त विचार की तरह ही सत्य है, अपनी निजता या वास्तविकता नहीं है। इसी प्रकार काल और स्थान (Time & Space) प्रत्यय या विचार मात्र हैं, न कि अस्तित्व की तरह विद्यमान सत्यता। 

जबकि 'निजता' काल-स्थान से स्वतन्त्र अपनी वास्तविकता है, न कि कोई विचार या अवधारणा । 'निजता' को शब्द न दिया जाए, तो भी वह अस्तित्व और उस अस्तित्व का भान है, उसे 'अपना' का विशेषण दिए बिना भी, वह नित्य, चिरंतन, स्वतः-सिद्ध वास्तविकता (reality) और सत्य है। 

यह भान ही चेतना है, जो अपने-पराये के भेद से रहित स्थिति है। इसी भान के अन्तर्गत 'अस्मद्', विचार की तरह प्रकट और अप्रकट होता रहता है, और एक आभासी (छद्म) प्रतीति का उद्भव होता है। व्यवहार में इसे ही 'व्यक्ति' की तरह, दूसरों से अलग, अपना स्वतंत्र अस्तित्व मान लिया जाता है, जो काल-स्थान-सापेक्ष होने से अवास्तविक (unreal) है। 

इस प्रकार 'अहं' से 'अहंकार' रूपी कृत्रिम सत्ता का उद्भव होने के बाद ही, 'त्वं' के रूप में अपने जैसे किसी दूसरे चेतन को 'तुम' कहकर संबोधित किया जा सकता है। 

अपनी सीमित क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति को अनुभव करते हुए अपनी अपेक्षा अधिक क्षमता, सामर्थ्य और शक्ति से युक्त किसी चेतन 'दूसरे' अस्तित्व (ईश्वर या महेश्वर) की कल्पना की जाती है और उसे ही, संसार की समस्त गतिविधियों का एकमात्र नियन्ता तथा संचालनकर्ता मान लिया जाता है। 

तब उसे 'त्वं' पद से संबोधित कर उसकी प्रार्थना की जाती है। 

उस 'त्वं' से कहा जाता है :

तव तत्त्वं न जानाति कीदृशोऽसि महेश्वर ।

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

अस्तित्व और अस्तित्व के भान में अपने और उसके अस्तित्व की परस्पर अभिन्नता और अनन्यता तो असंदिग्ध ही है।

इसी प्रकार 'तत्' अर्थात् 'वह' पद से इंगित और 'अहं' तथा 'त्वं' से भिन्न, तीसरा सर्वनाम 'सः', 'सा' 'तत्' प्रत्यय किसी तीसरे जड या चेतन अस्तित्व के द्योतक के अर्थ में  क्रमशः प्रयुक्त होता है। 

'तत्' की ही तरह 'इदम्' 'इयम्' और 'एतत्' पदों (शब्दों) को 'यह' के अर्थ में क्रमशः पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग रूपों में प्रयोग किया जाता है।

उस महेश्वर को शिव, शक्ति या परब्रह्म की तरह व्यक्त करने के लिए इस प्रकार अपनी भावना के अनुसार ज्ञेय या अज्ञेय मान लिया जाता है। 

***

संसार की दृष्टि से, शरीर, मन और आत्मा (स्व / स्वयं) यही तीन मौलिक तत्त्व हैं, और इनका पारस्परिक संबंध ही जीवन अर्थात् 'चेतनता' है।  ये चारों अन्योन्याश्रित एकमेव, अभिन्न, अविभाज्य वास्तविकता हैं ।

इस प्रकार 'चेतनता', जीवन या 'भान' निर्वैयक्तिक तत्व है, किन्तु उसे शरीर-विशेष व्यक्ति से संबद्ध मानकर अपना एक आभासी और स्वतंत्र अस्तित्व, बुद्धि में वास्तविक के स्थान पर स्थापित हो जाता है। बुद्धि वैयक्तिक होती है, जबकि जिस 'चेतनता' में व्यक्त और अव्यक्त होती है, वह 'चेतना' अर्थात् 'जीवन' नितान्त निर्वैयक्तिक है।

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June 06, 2015

प्रार्थना !

प्रार्थना !
--
शिव तुम कितने भक्तपरायण,
उमा को तुमने हृदय लगाया,
गंगा और शशि को भी तुमने
हँसकर अपने शीश बिठाया,
सुर-असुरों मनुजों राक्षस पर
रहती सदा तुम्हारी करुणा,
कालकूट विष को भी तुमने,
इसी तरह से गले लगाया!
मुझ पर भी तुम कृपा करो ना,
प्रियतम करो न मेरी वञ्चना
मुझको नहीं लगाते पर क्यों,
हे शिव अपने पावन चरणा?
--

January 02, 2015

आज की कविता : 'सर्व'






















आज की कविता :
--

'सर्व' है अप्रत्याशित,
'सर्व' था अप्रत्याशित,
'सर्व' होगा अप्रत्याशित,
'सर्वथा' अप्रत्याशित !
'सर्व' तो समग्र है,
जिसमें समाहित है,
'विपरीत' भी,
फिर भी निर्द्वंद्व है,
सर्वतः, सर्वदा, सदा,
अनपेक्षित, अनुपेक्षित,
सर्वथा !

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© विनय वैद्य, उज्जैन,

September 20, 2014

~~ कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 27 ~~

~~ कल का सपना : ध्वंस का उल्लास / 27 ~~
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1977 में विक्रम विश्वविद्यालय से गणित में M. Sc. करने के बाद रिसर्च करने की तीव्र अभिलाषा थी। किन्तु नौकरी करना अधिक जरूरी था। बहरहाल गणित में दिलचस्पी बनी रही।  संस्कृत और गणित दोनों अस्तित्व की अपनी भाषा है।  गीता पढ़ते हुए अध्याय 8 के प्रथम श्लोक पर आधुनिक गणित की धारा में कुछ कौंधा और प्रभु की कृपा से उसे व्यक्त भी कर पाया।  सोचा उसे इस ब्लॉग के पढ़नेवालों को भी अर्पित कर दूँ !

 

September 17, 2014

आज की कविता / 17/09/2014.

आज की कविता / 17/09/2014.
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© विनय वैद्य, उज्जैन,
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मन्दिर नहीं जानते 
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मन्दिर नहीं जानते,
प्रशंसा,
वे सिर्फ़ खड़े रहते हैं,
आशीर्वाद देने को,
चाहें आप उनमें विराजित प्रतिमा की पूजा करें,
या उसे तोड़ दें,
चाहे आप उसे किसी दर्शन, धर्म या सिद्धान्त का नाम देकर,
तलवार बना लें,
काट दें उन सब को,
जिनके हाथों में हैं,
ऐसी ही दूसरी तलवारें,
चाहें आप उस मन्दिर को ही तोड़कर,
नाम दे दें अपने धर्मस्थल का, 
और घोषित कर दें,
कि आपका धर्म ही एकमात्र ईश्वरीय धर्म है,
बाँट दें पूरे विश्व को,
सिर्फ़ दो मज़हबों में,
और जो आपके मज़हब को नहीं मानता,
उसे मिटा देना आपका परम धार्मिक कर्तव्य है,
हाँ एक तीसरा मज़हब भी इसमें आपका मददग़ार होता है,
जो या तो बुद्धिजीवी होता है,
प्रतिष्ठित,
या बस अवसरवादी,
जिसके कोई सिद्धान्त नहीं होते,
वह मन्दिर की सत्ता का भी मज़ाक उड़ाता है,
किन्तु आपके धर्म, और आपके ईश्वर पर उँगली नहीं उठाता,
क्योंकि उसे मन्दिर के होने न होने से कोई मतलब नहीं,
वह मन्दिर से तो नहीं, लेकिन आपकी तलवार से जरूर डरता है,
और वक़्त आने पर खुद ही रख देता है शीश,
आपके चरणों में, 
और जिसे मतलब है,
वह किसी मज़हब तक बँधा नहीं होता,
वह सिर्फ़ अपने मज़हब का पाबन्द होता है,
कि मज़हब मुक्ति है,
मज़हब स्वतन्त्रता है,
और यह तभी होती है,
जब आप दूसरों की मुक्ति का सम्मान करते हैं,
और इसे न तो आप किसी को दे सकते हैं,
न कोई और आपको दे सकता है,
लेकिन कोई इसे आपसे छीन भी नहीं सकता,
मुक्ति,
जो वह आपके आदर्शों और विश्वासों से विपरीत ही क्यों न हो ।
और तब आप निर्भय होते हैं,
आप मिटने से नहीं डरते,
क्योंकि मिटना तो जीवन की रीत है,
पर फ़िर भी, तब आप मिटाने से ज़रूर डरते हैं,
क्योंकि आप अस्तित्व का सम्मान करते हैं,
अपने, और सम्पूर्ण, -अथाह जीवन का,
जिसमें आपके होने-न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता,
क्योंकि आप उससे पृथक् नहीं हैं, 
क्योंकि यह अपने आपको ही मिटाने का सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण तरीका है,
और तब आप समझ पाते हैं,
कि मन्दिर मिट क्यों जाते हैं, मिटाते क्यों नहीं?
मन्दिर जानते हैं अमर होना,
और देते हैं यही आशीर्वाद,
बिना कहे ।
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September 03, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -23,

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -23,
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कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ...!

अध्याय 4 श्लोक 18,

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
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(कर्मणि अकर्म यः पश्येत् अकर्मणि च कर्म यः ।
सः बुद्धिमान् मनुष्येषु सः युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥)
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भावार्थ :
जो कर्म में अकर्म को तथा इसी प्रकार अकर्म में कर्म को देखता है, केवल वही मनुष्यों में अन्यों की तुलना में बुद्धिमान मनुष्य है, वही योग से युक्त और कृतकृत्य है ।
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श्रीमद्भग्वद्गीता को बचपन से पढ़ता रहा हूँ ।  नए पुराने कुछ आचार्यों विद्वानों की व्याख्याएँ भी पढ़ीं । किन्तु मुझे हमेशा से लगता रहा कि किसी ग्रन्थ को उसकी मूल भाषा में पढ़ने से जो (तात्पर्य) समझ में आता है, वह उसके अनुवाद या व्याख्याओं के अध्ययन से शायद ही समझा जा सकता हो । और संस्कृत के ग्रन्थों के पढ़ने का सबसे अच्छा एक तरीका यही है कि उनका उनके मूल-स्वरूप में ’पाठ’ किया जाए । शायद शुरु में यह ’रटना’ जान पड़े, लेकिन ’रटने’ का मतलब है आप बाध्यतावश यह कार्य कर रहे हैं । लेकिन यदि आप खेल-खेल में इसे करते रहें, तो जल्दी ही इससे जुड़ाव होने लगता है । और इस जुड़ाव को पैदा होने, पनपने में एक दो नहीं, बीस पच्चीस वर्ष या और अधिक समय भी लग सकता है । और फिर अचानक लगने लगता है कि इसे पढ़ना न सिर्फ़ अपना, बल्कि संसार के भी कल्याण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण एक कार्य है । क्योंकि तब आप और संसार दो पृथक् सत्ताएँ नहीं होते । शायद इसे ही आत्म-ज्ञान भी कह सकते हैं ।
--
एक दृष्टि से यह अध्ययन एक ’कर्म’ है, वहीं यह ’अकर्म’ भी है । जैसे रोज सवेरा होता है, शाम होती है, या कहें सुबह और शाम के होने से हम ’रोज’ नामक वस्तु / समय को परिभाषित कर लेते हैं । ’समय’ जो इस रूप में दृश्य भी है और अदृश्य भी ! और सुबह और शाम का होना सूरज के उगने और डूबने से ही तो होता है ! हम सूरज पर उगने और डूबने का इल्ज़ाम कितने जल्दी लगा देते हैं ! फिर हम कह सकते हैं कि ठीक है, धरती के सूरज के चारों ओर चक्कर काटने से सूरज उगता या डूबता दिखलाई देता है ।
लेकिन क्या धरती इरादतन सूरज का चक्कर काटती होगी ? अभी तो हमें यह भी पक्का नहीं कि क्या धरती का कोई ऐसा दिल-दिमाग होता है या नहीं, जो इरादा कर सके । फिर हम कहते हैं कि यह तो प्रकृति (और विज्ञान) के नियमों से संचालित होता है । इसमें दो बातें स्पष्ट हैं । ’प्रकृति’ इस शब्द को कहने से हमें धरती, आकाश, सूरज या ऐसी किसी वस्तु का प्रमाण तो नहीं मिल जाता जिसे हम ’प्रकृति’ कह रहे हैं । दूसरी बात विज्ञान के नियमों के बारे में ! क्या विज्ञान के नियम उस ’समय’ (और ’स्थान’) की परिभाषा के आधार पर ही नहीं तय किए जाते जिसकी अपनी ही विश्वसनीयता अभी प्रमाणित नहीं हो सकी है?
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फिर भी समय और स्थान,”प्रकृति’ का दृश्य रूप है, ऐसा अनुमान लगाना शायद गलत न होगा । और इस ’प्रकृति’ को ’जाननेवाला’ भी एक तत्व इस ’प्रकृति’ के अस्तित्व को स्वीकार या अस्वीकार करने से पहले भी स्वतः प्रमाणित है ही । जैसे यदि हम कर्म / कार्य को स्थान और समय के आधार पर बाँटकर न देखें तो इसे परिभाषित तक नहीं कर सकते, वैसे ही यदि हम इस कर्म / प्रकृति को ’जाननेवाले’ तत्व को भी समय और स्थान के आधार पर न बाँटें, तो क्या इस तत्व को परिभाषित किया जा सकता है ? किन्तु क्या इससे यह सिद्ध हो जाता है कि उनका अस्तित्व नहीं है? इन सबका समष्टि अस्तित्व तो स्वप्रमाणित तथ्य / सत्य है । क्या इस समष्टि अस्तित्व को हम ’कर्म’ / ’प्रकृति’ / ’चेतना’ या ईश्वर कह सकते हैं ? क्या इनके अतिरिक्त इनसे भिन्न इस आयोजन का कोई ’कर्ता’ उनसे अलग है?  क्या वही इस सारे आयोजन का / की सूत्रधार नहीं है? क्या वह कुछ करता है? क्या कभी कुछ होता है? यदि कभी कुछ होता या किया नहीं जाता तो कर्म का क्या प्रमाण? तो क्या कर्म और अकर्म एक ही सत्ता के दो पक्ष नहीं हुए?
कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ...!
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August 27, 2014

May 28, 2013

उन दिनों -७६.

उन दिनों -७६.
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_( © Vinay Vaidya, vinayvaidya111@gmail.com)_____________________________________
’फ़ेसबुक’ पर मेरी एक मित्र है ’श्रुति शर्मा’ । हर हफ़्ते एक बार ’चैट’ करती हैं । हर बुधवार या गुरुवार को, जब भी मैं मिल जाऊँ ! और अगर न मिल पाऊँ तो गुरुवार की रात्रि में उनका ’प्रणाम और शुभ रात्रि’ का एक ’एस.एम.एस.’ आ जाता है । उस हफ़्ते न तो मैं बुधवार को उससे मिल पाया, न गुरुवार को । गुरुवार की रात्रि में उसका ’एस.एम.एस.’ भी नहीं आया । ’फ़ेसबुक’ जब भी खोली, उसे ’ऑफ़लाइन’ पाया । उसका मेरा कोई ’कॉमन-फ़्रैन्ड’ भी नहीं है । वह कभी मेरी किसी पोस्ट पर न तो ’लाइक’ की प्रतिक्रिया देती है, न कोई ’कमेंट’ ।
पूरा हफ़्ता उसकी फ़िक्र में बीत गया था । नहीं, उसने अकॉउन्ट ’डि-एक्टिवेट’ भी नहीं किया था । उसका मोबाइल भी ’स्विच्ड-ऑफ़’ था । वह शायद नर्मदा के तट पर स्थित किसी जगह रहती है, ऐसा उसने कभी बताया था । जब उसका ’प्रोफ़ाइल’ चेक किया तो पाया कि वे हुबली (कर्नाटक) में रहती हैं, उनका जन्म नेमावर ( निमाड़, मालवा, मध्यप्रदेश) में हुआ, शिक्षा जबलपुर / होशंगाबाद में हुई, और इसलिये  उसे नर्मदा से लगाव तो विरासत में ही मिला था । उसके नाना हरदा-हंडिया में खेती करते थे । यह सब अतिरिक्त जानकारी उससे मुझे ’चैट’ से ही मिली थी ।
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कल उसने सूचना दी कि उसकी माताजी नहीं रहीं । किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थीं और दो तीन साल पहले ही रिटायर हुईं थीं । अर्थात् मैं उनसे लगभग तीन चार वर्ष छोटा हूँ । श्रुति भी शायद किसी इन्स्टीट्यूट में असिस्टेन्ट प्रोफ़ेसर है । ७ और ११ वर्ष की आयु के दो बच्चों की माँ । उसके पति किसी कम्पनी में कार्य करते हैं । उच्च-मध्यवर्गीय एक परिवार । इस बीच हम फोन पर बातें करते रहे । बीच बीच में उसके पति और बच्चों की आवाज़ें, टीवी और दूसरे मोबाइल्स तथा ऐसे अन्य उपकरणों की ध्वनियों का हस्तक्षेप ज़ारी था । दस बारह मिनट तक हम बस एक दूसरे की साँसों की आवाज़ें सुनकर समझ रहे थे कि अभी फोन लाइन पर है । फ़िर उसने फ़ोन रख दिया । मैं नहीं समझ सका कि वह मुझे लेकर इतनी भावुक क्यों थी ।
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’बहुत बातें करते हो कौस्तुभ  संवेदनशीलता की’
मेरे भीतर से किसी ने कहा ।
ज़ाहिर है वह मैं ही था । एक संभ्रमित मैं । मेरा ही प्रतिरूप, ऑल्टर-ईगो!
अक्सर मुझे दोनों ही आरोपों का सामना करना पड़ता है । मेरी परिचित या रिश्ते में कुछ लगनेवाली महिलाएँ प्रायः मुझ पर दोनों ही क़िस्म के आरोप लगाती रही हैं । कभी यह कि मैं तो निष्ठुर हूँ, भावना और संवेदना से शून्य । अच्छा हुआ मैंने शादी नहीं की नहीं तो उस औरत का जीवन बहुत दूभर हो जाता! कभी वे ही मेरी प्रशंसा करती; नहीं कौस्तुभ  सचमुच बहुत महान् है, अपने ऊपर संयम रख लेता है । कभी वे मुझे संदेह की नज़रों से भी देखती रही हैं । 'implications are many, ...' - की दृष्टि से । जिसे कहें, अनेक निहितार्थ हो सकते हैं जिसके । वे यह तो महसूस करती हैं कि मैं किसी व्यसन से ग्रस्त नहीं हूँ, मैं शायद बीमार हूँ, लेकिन वे इस बारे में ठीक ठीक कुछ नहीं जानतीं । और इसलिए रहस्य का एक सुरक्षा कवच मेरे इर्द-गिर्द आवरण की तरह मुझे छिपाए रखता है । एक अविवाहित पचपन पार आयु का ’मैं’
लोगों में ’अनफ़िट’ हूँ, ऐसा सिर्फ़ मैं ही नहीं, लोग भी महसूस करते हैं । इस स्थिति में श्रुति जैसे कुछ लोगों का मुझसे सम्पर्क बनाए रखना जहाँ एक भावनात्मक तसल्ली देता है, वहीं एक डर भी मन में बनाए रखता है कि तसल्ली का यह चीनी मिट्टी का ख़ूबसूरत फ़ूलदान किसी धक्के से कहीं दरक न जाए!
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’हैलो !’
’हैलो!’
’प्रणाम !’
’कैसी हो बेटे!’
’ठीक हूँ, ...आप?’
’मैं भी ठीक हूँ ।’
’ममा को गए अभी दो हफ़्ते हुए हैं, लेकिन अभी भी लोगों का आना-जाना, मिलना जारी है ।’
वह कुछ शिकायत भरे स्वरों में बोली । उसकी शिकायत मुझसे तो शायद ही रही हो, मुझे लगा उन मित्रों परिचितों और रिश्तेदारों से रही होगी, जो कर्त्तव्य या औपचारिकतावश उसके घर मिलने आते-जाते रहे होंगे ।
’यू नो..., ममा आख़िरी वक्त में मेरे ही पास थीं । मामा बरसों पहले गुज़र चुके थे, मामी और उनका बेटा ज़रूर आये थे, लेकिन कल चले भी गए ।’
’हाँ...,’
’आख़री दिन से दो दिन पहले भी आपको याद किया था ममा ने ।’
वह मुझे क्यों याद करने लगीं? एक कौतूहल उठा मन में, जो कुछ ही पलों में उत्कण्ठा बन गया ।
’वो आपके ब्लॉग पढ़ती थीं, और उनके अनुरोध पर ही मैंने आपसे ’दोस्ती’ की थी ।’
यह मेरे लिए नई जानकारी थी । मुझसे तीन चार वर्ष बड़ी एक महिला मेरी प्रशंसक थी, लेकिन उन्होंने कभी मुझसे बात तक नहीं की ! न किसी और माध्यम से कभी सम्पर्क ही किया था ।
’मुझे बहुत दुःख है श्रुति, लेकिन तुमने मुझे पहले कभी इस बारे में नहीं बतलाया !’
’आपके बारे में उन्हें कुछ अन्य लोगों से भी मालूम था । आपके रिश्तेदारों, परिचितों के माध्यम से, और आपका एक ’एन्लार्ज़्ड’ फ़ोटोग्राफ आज भी उनके पूजाघर में तथा ड्रॉइंग-रूम में लगा हुआ है । हाँ वे कभी उसकी पूजा करती हों, ऐसा ख़याल नही ।’
’अरे मैं उनसे वैसे भी छोटा हूँ, उनके आशीर्वाद ही काफी हैं मेरे लिए!’
’यही तो, ... यही शब्द आपके लिए उनके मुँह से निकलते हुए सुने थे मैंने एक-दो बार!’
याददाश्त को टटोलता हूँ तो कुछ याद नहीं आता ।
’आपके एक परिचित थे गर्गजी, ...’
अचानक उसके मुँह से गर्गजी का नाम सुनकर मैं स्तब्ध रह गया ।
’मतलब?’
’वही, आपने जिनके बारे में अपने ब्लॉग्स में बहुत-कुछ लिखा है !’
’अरे! तुम जानती हो उन्हें?’
’नहीं, मैं तो नहीं, ममा ज़रूर उन्हें जानती थीं, और उनके साथ आपके घर भी आ चुकी थीं ।’
’कहाँ हैं आजकल वो?’
’आपको नहीं मालूम? उन्हें तो गुज़रे हुए पाँच-छः साल हो गए !’
’...’
’हैलो!’
’बाद में बात करेंगे, अभी बहुत मुश्किल है, ... ’
मैंने जैसे-तैसे अपने को सँभालते हुए कहा ।
--
वह अवश्य जानती होगी कि मेरे लिए यह समाचार कितना कठोर सदमा हो सकता था, लेकिन फ़िर भी उसने मुझे इतनी सहजता से गर्गजी के चले जाने के बारे में बतलाया । वह वैसे तो अत्यन्त आदरपूर्वक मुझसे बातें करती थी, लेकिन फ़िर भी उसकी वाणी में हमेशा एक ऐसी निस्पृहता भी झलकती थी कि मैं नहीं समझ सका कि वह मुझे लेकर अचानक इतनी भावुक क्यों हो उठी थी । शायद मैंने ही उसे गलत समझा हो!
--
दो-तीन दिनों बाद फ़िर उसका फ़ोन आया तो मैं बस बैठा हुआ था । हफ़्ते में दो तीन फ़ोन आते हैं, उनमें से भी अक्सर उसी के । इसलिए ख़याल था कि उसने ही किया होगा । लेकिन यह तो कोई दूसरा ही नंबर था ।
--
’हैलो!’
"कौस्तुभ बोल रहे हैं?’
’जी!’
’मैं विजयवर्गीय बोल रहा हूँ ।’
’जी कहिए!’
’बस एक सूचना देना थी, आपको हम हर माह कुछ पैसे भेजते थे!’
’जी!’
’लेकिन अब इस माह से यह संभव न हो सकेगा!’
’जी!’
’आपको तो पता ही होगा कि जयश्री शर्मा नहीं रहीं!’
’कौन जयश्री शर्मा?’
’वही महिला, जो आपके लिए पैसे भिजवाया करती थीं ।’
’जी, अच्छा !’
उधर से फ़ोन ऑफ़ हो गया । मुझे कोई पिछले तीन चार साल से इस संस्था से क़रीब पच्चीस सौ रुपये प्रतिमाह प्राप्त होते थे । वर्ना तो पिछले कुछ वर्षों से मित्र और शुभचिन्तकों के ही सहारे जैसे-तैसे गुज़ारा हो रहा था । यह सच है कि मैंने उनका कुछ अनुवाद कार्य किया था, जिसके लिए उन्होंने मुझे पहले ही से पर्याप्त पारिश्रमिक दे दिया था । फ़िर मैं अभी तक इस भ्रम में था कि संस्था ही मुझे हर माह ये पैसे सहायता के रूप में भेज रही थी । लेकिन ये महिला जयश्री कब से और क्यों मुझे पैसे भिजवाने लगी? वह भी बिना मुझे बतलाए! वैसे मैं अकेला हूँ इसलिए आर्थिक कठिनाई से बहुत चिन्तित नहीं होता । फ़िर अभी ऐसी कोई तात्कालिक समस्या थी भी नहीं कि चिन्ता की जाए । सोच ही रहा था कि श्रुति का कॉल आ गया ।
--
’हैलो!’
’हैलो अंकल, मैं श्रुति बोल रही हूँ, कैसे हैं आप?’
’ठीक हूँ ।’
’आपको पता ही होगा कि ममा आपको कुछ पैसे भिजवाती रही हैं, पिछले कुछ सालों से!’
अचानक ध्यान आया, विजयवर्गीय ने इन्हीं का जिक्र किया था शायद ।
’हाँ, लेकिन बस अभी दो मिनट पहले ही मुझे इस बात का पता चला।’
’अरे!’
’हाँ, मैं एक संस्था के लिए अनुवाद का काम करता था । उनसे मेरे कोई व्यावसायिक संबंध नहीं थे, फ़िर भी वे मुझे सम्मानजनक पारिश्रमिक दिया करते थे । हालाँकि पिछले तीन-चार साल से मैंने उनका कोई कार्य भी नहीं किया, लेकिन फ़िर भी वे मुझे लगभग दो हज़ार रुपये हर माह भेजते रहे हैं । फ़िर पच्चीस सौ भेजने लगे । चूँकि मुझे ज़रूरत थी इसलिए मैं लेने से मना नहीं कर पाया ।’
’हाँ, ममा को आपकी आर्थिक स्थिति का पता था, और अभी भी उन्होंने आपके लिए एक ड्रॉफ़्ट बना रखा है आपके नाम से । मैं चाहती हूँ कि आपको भिजवा दूँ ।’
’क्यों?’
’उन्हें जब पता चला कि अब वे कुछ दिनों की मेहमान हैं तो मुझे बतलाया था इस बारे में । और, ...’
’और? ...  और क्या?’
’वास्तव में आपको पता है ममा को पेन्शन मिलती थी, पापा तो कुछ छोड़कर गए नहीं थे, ममा को जितनी पेंशन मिलती थी वह भी खर्च नहीं होती थी । इसलिए वे ज़रूरतमन्दों को सहायता कर देती थीं । लेकिन ममा के लिए आप उन ज़रूरतमन्दों से बहुत अलग थे । ममा आपकी पूजा ही नहीं करती थीं, बल्कि शायद ... दिल से आपको बहुत चाहती भी थीं ।’
उसने कुछ हिचकिचाहट के साथ कहा ।
’मतलब?’
’मतलब तो वही जानें, मैं क्या कह सकती हूँ?’
’शायद मुझे छोटा भाई समझती हों ।’
मैंने बात को सम्हालने की क़ोशिश की ।
’अंकल, क्या हर भावनात्मक लगाव को किसी रिश्ते का नाम दिया जाना ज़रूरी है?’
’हाँ, तुम ठीक कहती हो, शायद वो मेरी प्रशंसक थीं, या पिछले जन्म में मेरी कोई रही हों, माँ, बहन, मौसी, या शायद  ...’
’शायद प्रिया ही रही हों!’
’लेकिन इस जन्म में मेरे लिए तो वे एक पूज्य देवी के समान हैं, ...! निर्मल वर्मा ने एक स्थान पर लिखा था, ईश्वर अपनी कृपा में सर्वाधिक अदृश्य होता है । मुझे लगता है कि तुम्हारी ममा मेरे लिए ऐसी ही ईश्वर थीं।’
’हाँ । लेकिन आपको पता है, जब उन्हें मालूम हुआ कि अब उनका वक़्त नज़दीक है, तो एक दिन पूछने लगी; मैं अगर कौस्तुभ से शादी करना चाहूँ तो तुम्हें कैसा लगेगा?’
’अरे!’
’हाँ, आप तो जानते ही हैं कि एक स्त्री दूसरी को जितना अच्छी तरह जान सकती है, पुरुष इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता, और फ़िर वह तो मेरी माँ थीं!’
’मतलब?’
’मतलब यही कि उन्हें आपकी चिन्ता थी, और वे सोचती थीं कि उनकी मृत्यु के बाद पता नहीं हम लोग या कोई और आपकी चिन्ता करेगा या नहीं ।’
’लेकिन, मुझसे शादी करने से इसका क्या संबंध हो सकता था?’
’वे सोचती थीं कि उनकी मृत्यु के बाद आपको हमेशा उनकी पेंशन का अपना हिस्सा मिलता रहेगा । ता-उम्र ।’
’ओफ़् ...!’
’श्रुति,...’
’जी, ...’
’निर्मल वर्मा ने लिखा था, ईश्वर अपनी कृपा में सर्वाधिक अदृश्य होता है, लेकिन मैं सोचता हूँ क्या वह सर्वाधिक कठोर भी हो सकता है?’
’मतलब?’
’मतलब यही कि तुम्हारी ममा ने मुझे जैसा जितना दिव्य अलौकिक स्नेह दिया क्या उसके बाद वे इतनी कठोर हो सकती थीं कि मुझे यह भी नहीं बतलातीं कि उन्हें जल्दी ही जाना था?’
उधर से हिचकी और सिसकी के स्वर सुनाई दिए, और फ़ोन ’कट’ गया ।
अभी दो तीन दिनों से ’सर’ के दुःख का बोझ शायद कम था जो यह एक नया और आ पड़ा ।
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April 25, 2011

~~हरेक सिम्त,...~~


© Vinay Vaidya 
25042011

~~हरेक सिम्त,...~~

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पहले कभी लिखा था, :


"हरेक सिम्त से देखता रहता हूँ तुझे,
ये बात और है कि जानता नहीं मैं  ।"


और आज लिख रहा हूँ, :


"हरेक सिम्त से तू देखता रहता है मुझे,
तेरी नज़रों से छुपकर बता कहाँ जाऊँ ?"


देर आयद, दुरुस्त आयद !!
ज़वाब आया तो सही !! 

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A comment added on 29-04-2011 :
बृजमोहनजी,
दर असल ये पंक्तियाँ ईश्वर को प्रियतम समझकर
लिखी गईं हैं, और यह वाकई दो-तरफ़ा है । पहले 
जब यह महसूस हुआ था कि अस्तित्व की हर वस्तु
एक ही अद्भुत्‌ ’प्रेरणा’ से संचालित है, तो ’उसे’ हर
वस्तु में अनायास ही देखने लगा । यह एक ’दर्शन’
था । बहुत समय बाद फ़िर ऐसा हो गया कि वह
’प्रेरणा’ मानों मेरा ध्यान अपनी ही ओर ले जा रही
हो । मतलब यह, कि ’वह’ भी मुझे देख रहा है, ....
टिप्पणी के लिये सादर धन्यवाद.
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February 11, 2011

~~क्षणिका-1,2.~~

~~~ क्षणिका-1,2.~~ 


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1. हरेक सिम्त से देखता रहता हूँ तुझको 
ये बात और है कि जानता नहीं हूँ मैं !
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2. और हैरत कि जानता नहीं फ़िर भी,
हरेक शक्ल में पहचानता हूँ मैं !!
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August 25, 2010

॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥

~~~~~ ॥ अतिथि तुम कब आओगे ? ॥ ~~~~~
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(Ode to a sparrow,
sitting on the window-sill)
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अतिथि  !!
जब भी खिड़की पर आते-जाते हुए,
-मैं तुम्हें देखता हूँ,
ठिठक जाता हूँ  .
और कभी-कभी तो,
घंटों प्रतीक्षा करता हूँ,
-तुम्हारे आने की .
खिड़की बंद करते हुए,
लगातार यह ख़याल आता रहता है,
कि बस तुम आ ही रहे होगे !
और खिड़की को बंद देखकर,
कहीं लौट न जाओ .
अतिथि, मैं तुम्हारी भाषा तो नहीं समझता,
लेकिन भाव-भंगिमा शायद पढ़ लेता हूँ .
फ़िर कुछ समय के लिए सुनता रहता हूँ,
तुमसे कुछ अबूझ, भेद-भरी बातें .
शायद मेरी बातें भी तुम्हें अबूझ लगती हों !
अतिथि,
तुम फ़िर कब आओगे ? 

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इस कविता को पढ़कर मेरे एक आलोचक मित्र ने इसे 
सुंदर सरल रचना कहा .
इसे पढ़कर मेरे एक सुहृद कवि मित्र ने कहा,
लगता है इसमें अतिथि ईश्वर को कहा गया है .
और मेरी एक परिचता बोली,
प्रेम में पगी एक कविता है यह .
'अतिथि' शब्द उसने शायद प्रेमी / प्रेमिका 
के अर्थ में लिया होगा . 
 
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June 29, 2010

वाह वाह वह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह

~~वाह वाह  वाह वाह वाह वाह वाह ~~
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रोज के अपने नियत भ्रमण के लिए,
शाम को थककर मैं,
निकला घर से .
उमस और गर्मी से बेहाल !
पसीने से तर- बतर,
व्याकुल बाहर-भीतर,
उस मोड़ पर जैसे ही पहुँचा,
जहाँ अचानक सड़क एक खुली जगह में निकलती है, 
और दायें-बाएँ,
बहुत चौड़े रास्तों पर मुड़ जाती है,
वह दौड़ती हुई आकर मुझसे गले लग गयी .
मैंने भी बाँहें फैलाकर,
स्वागत किया उसका,
और एक मृदु आलिंगन में समेट लिया उसे .
उसके दाँए कंधे पर था मेरा बाँया हाथ,
और दाँया,
उसकी पीठ पर से होकर,
उसकी कमर के दाँए,
ज़रा ऊपर .
वह मेरी बेटी, बहन, माँ, 
प्रियतमा, या दोस्त भी हो सकती थी. 
मिनट भर के लिए मेरी आँखें मुंदी की मुंदी रह गयी,
वह सहलाती रही,
-मेरा बदन !
और जब तक साँस में साँस आई,
वह जा चुकी थी, अपना सुखद,
अमृत-स्पर्श देकर !
ले गयी मेरी क्लान्ति, व्याकुलता,
- और स्वेद भी  !
कौन थी वह ?
अरे भाई,
गलत मत समझो,
--वह थी शाम की प्यारी, चंचल ,....
-- 
--हवा !

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!