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October 11, 2014

भाषा का यह प्रश्न (1)

भाषा का यह प्रश्न (1)
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बहुत से लोगों को यह लगना स्वाभाविक है कि संस्कृत को उसका उचित स्थान मिलना चाहिए । किन्तु इसके लिए संस्कृत का प्रचार करना और उसे प्रचलन में, व्यवहार की भाषा के रूप में लाया जाना कहाँ तक संभव और जरूरी है? और यदि वह संभव न हो तो जरूरी होने का तो प्रश्न तक नहीं पैदा होता । यदि आपको संस्कृत से प्रेम है, तो इसका यह मतलब तो नहीं कि आप अंग्रेज़ी के या उर्दू के शत्रु हैं । दुर्भाग्य से किसी भी भाषा से प्रेम रखनेवाले अपनी प्रिय भाषा के अतिरिक्त दूसरी सभी भाषाओं के साथ जाने-अनजाने शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं । किन्तु उनका ध्यान इस ओर बिरले ही कभी जाता है कि यह एक नकारात्मक और हानिकारक तरीका है, न सिर्फ़ अपनी भाषा के प्रचलन और उन्नति की दृष्टि से बल्कि पूरे समाज के हर वर्ग के लिए, चाहे वह किसी भी भाषा को अपनी कहता हो ।  सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि कौन सी भाषा सरकारी मान्यता प्राप्त ’राजभाषा’ हो, बल्कि यह भी है, कि उसे ’लादा’ न गया हो । और चूँकि भाषा काफी हद तक भावनात्मक महत्व भी रखती है, व्यावहारिक स्तर पर भी उसकी उतनी ही उपयोगिता
होने के महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता । भाषा शिक्षा का माध्यम होती है और अन्य अनेक विषयों की भाँति शिक्षा के एक विषय के रूप में भी उसका एक महत्वपूर्ण स्थान तो है ही । इसलिए जहाँ एक ओर भाषा की शिक्षा एक ओर उसके ’माध्यम’ होने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए, वहीं दूसरी ओर इसे एक विषय के रूप में भी दिया जा सकता है । इसलिए ’भाषा’ की शिक्षा के दो भिन्न भिन्न किन्तु संयुक्त आयाम हैं ।
संस्कृत या किसी भी भाषा के ’प्रचार’ और उसे प्रचलन में लाने के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों के साथ एक कठिनाई यह है कि जब तक लोग उसे अपने लिए जरूरी नहीं समझते तब तक या तो उसकी उपेक्षा करते हैं, या फ़िर उसका विरोध तक करने लगते हैं । और यह विरोध तब और प्रखर हो जाता है जब उस भाषा की ’अपने’ समुदाय की भाषा से किसी प्रकार से भिन्नता या विरोधी होने का भ्रम हम पर हावी हो जाए । उस ’भिन्न’ भाषा से भय  हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा है, और इससे दूसरे भी अनेक भय मिलकर इसे और भी जटिल बना देते हैं ।  दूसरी ओर किसी भी भाषा के उपयोग की बाध्यता या जरूरत महसूस होने पर हम उसे सीखने, प्रयोग करने के लिए खुशी-खुशी, या मन मारकर राजी हो जाते हैं । अंग्रेज़ी ऐसी ही एक भाषा है । अंग्रेज़ी का उपयोग तो सर्वविदित और सर्वस्वीकृत है ही । तब, जो किन्हीं कारणों से अंग्रेज़ी नहीं सीख पाए, उन्हें अफ़सोस होता है, उनमें हीनता की भावना जन्म लेती है, और वे अंग्रेज़ी को कोसने लगते हैं । और अगर उनके बच्चे फ़र्राटे से (सही या गलत भी) अंग्रेज़ी बोल-लिख सकते हैं, तो वे ही लोग, अपने आपको धन्य समझते हैं, गर्व करते हैं । फिर बहुत संभव है कि बच्चे भी अपनी उपलब्धि पर गर्व करने लगें और माता-पिता को हेय दृष्टि से देखने लगें, उन्हें अनपढ़ या गँवार समझने लगें । भले ही मुँह से न कहें, किन्तु उन्हें लोगों से अपने माता-पिता का परिचय कराने में शर्म और झिझक महसूस होने लगे । माता-पिता और बच्चों में दूरियाँ बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण है ।
फिर कोई भाषा क्यों सीखता है? स्पष्ट है कि इसमें बाध्यता, उपयोगिता, भावनात्मक लगाव ये सभी बातें जुड़ी होती हैं । किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व यह है कि ’मातृभाषा’ ही सीखने के लिए सभी के लिए स्वाभाविक रूप से सबसे अधिक अनुकूल हो सकती है । और मातृभाषा के बाद हम अपनी जरूरत और रुचि के अनुसार दूसरी भाषाओं में से चुनाव कर सकते हैं ।
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एक उदाहरण :
हिन्दी से मिलती-जुलती किसी बोली में बहुत प्रसिद्ध कहावत है,
’निज-भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, ...’
मैंने इसका संस्कृत अनुवाद कुछ यूँ किया :
’निजभाषोन्नत्यर्हति, सर्वोन्नतिमूलम्’
(निज-भाषा-उन्नति-अर्हति सर्व-उन्नति-मूलम्)
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यद्यपि मैं मानता हूँ कि उपरोक्त अनुवाद में संस्कृत व्याकरण की कोई त्रुटि हो सकती है, जिसे संस्कृत के विद्वान ही इंगित और परिमार्जित कर सकते हैं , किन्तु यहाँ इसे प्रस्तुत करने का एकमात्र ध्येय यह है कि यदि किसी भाषा में आपकी स्वाभाविक रुचि है तो उसे सीखना मजबूरी या उपयोगिता के दबाव में उसे सीखने से अधिक आसान है । अपने इसी भाषा-प्रेम के चलते मैं किसी भी भाषा को समझने का यत्न करता हूँ तो अक़सर अनुभव करता हूँ कि यदि आपने पाणिनी की अष्टाध्यायी का अध्ययन किया है, तो आपको प्रायः हर भाषा में ऐसे संकेत सूत्र दिखलाई दे जाएँगे जहाँ पाणिनी आपको बरबस याद आएँगे । और वह न सिर्फ़ भाषा की बनावट और उसके व्याकरण के कारण, बल्कि उसके शब्दों के स्वनिम (phonetic form) और रूपिम (figurative form) के भी कारण । और तब आपको अनायास स्पष्ट होगा कि भाषा भाषा की शत्रु नहीं बल्कि सखी या भगिनी होती है । यह ठीक है कि हम अपनी भाषा को महत्व दें और उसके विकास के लिए प्रयत्न करें, लेकिन उसे समाज के किसी छोटे या बड़े वर्ग पर लादा जाना न तो समाज के लिए और न अपनी भाषा के लिए ही उचित है । आप चाहें या न चाहें, भाषाएँ सरिताओं की तरह होती हैं, अपने रास्ते बदलती रहती हैं, कई बार तो अपने रास्ते से पूरी तरह दूर होकर दिशा तक बदल लेती है । नदियों की भाँति वे विलुप्त भी हो जाती हैं, और अगर हम आग्रह न करें तो उनका नाम तक बदलता रहता है ।
मैंने सिंहल से लेकर बाँग्ला तक और गुजराती से लेकर उर्दू तक भारत की अधिकाँश भाषाओं को सीखने-समझने का प्रयास किया, और भारतीय के अतिरिक्त तिब्बती, नेपाली, बर्मी तथा अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन आदि विदेशी भाषाओं में भी मेरी अत्यन्त रुचि है । स्पष्ट है कि तमिल, तेलुगु तथा मलयालम, मराठी, आदि में भी मेरी दिलचस्पी है । इन सब भाषाओं के मेरे सतही या गंभीर अध्ययन के बाद मैं जिन निष्कर्षों पर पहुँचा वह यह कि ये सभी संस्कृत से घनिष्ठतः जुड़ी हैं । भाषाशास्त्रियों के लिए यह कोई नई बात न होगी । किन्तु यहाँ इसे लिखने का मेरा उद्देश्य इस ओर संकेत करना है कि तमाम भाषाई झगड़े केवल हमारी नासमझी, आधी-अधूरी जानकारी और काल्पनिक भयों के ही कारण हैं । यदि आप भारत की एक से अधिक भाषाएँ सीखते हैं, खासकर एक दक्षिण भारतीय और एक उत्तर भारतीय भाषा तो आपको स्वयं ही महसूस होगा कि भाषाएँ जल में जल की तरह मिल जाती हैं । किन्तु यदि हमारे मन में पहले से ही दूसरी भाषा के प्रति अरुचि या शत्रुता का, भय या हीन होने की भावना भर दी गई हो, तो हम इस सच्छाई से अपरिचित ही रह जाते हैं । यदि आप भाषा के दो रूपों बोली जानेवाली भाषा तथा लिखी जानेवाली भाषा, की बनावट पर ध्यान दें तो आपको स्पष्ट हो जायेगा कि भाशाओं की विविधता हमारी विरासत और समृद्धि ही है और किसी भी भाषा में सृजन दूसरी सभी भाषाओं को भी समृद्ध ही करता है । यह केवल कोरा बौद्धिक व्यायाम न होकर, उपयोगिता की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है । जैसे दो चित्रकार दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों, चित्रों की भाषा समझते हैं, और दो संगीतज्ञ भी इसी प्रकार एक दूसरे की रचनाओं को समझ पाते हैं, वैसे ही विभिन्न भाषाओं में जिनकी दिलचस्पी है, वे कभी न कभी सभी भाषाओं के मूल उत्स को पहचान ही लेते हैं, और उनके लिए भाषाएँ परस्पर शत्रु नहीं रह जातीं ।
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इंडोनेशिया के बारे में बहुत नहीं जनता, किन्तु आज (01 नवम्बर 2014) को प्रकाशित 'नईदुनिया - इंदौर' / 'ग्लैमर और कैरियर' में पढ़ा कि इंडोनेशिया की भाषा सीखने की दृष्टि से बहुत सरल है।  इससे मेरी अपनी इस समझ की पुष्टि ही हुई की संपूर्ण भारतीय महाद्वीप और सुदूर ऑस्ट्रेलिया तक की भाषाएँ संस्कृत से व्युत्पन्न हैं भाषा (बहासा) के ध्वन्यात्मक तथा रूपात्मक / लिप्यातक दोनों रूपों में।
कुछ माह पूर्व मेरा एच. पी।  का कार्ट्रिज ख़त्म हो गया था।  जब नया ख़रीदा तो उस पर लिखा देखा :
triga verna + * / tri-color + black . (triga = त्रिक, verna = वर्ण तो दृष्टव्य ही हैं , * 'काले के लिए ब्लैक का समानार्थी याद नहीं किन्तु वह संस्कृत से निकला है, इसमें संदेह के लिए कोई स्थान नहीं।
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इसलिए भाषा के बारे में मेरा सोचना यह है कि बच्चों को शुरू में मातृभाषा के ही माध्यम से पढ़ाया जाना चाहिए, और शासकीय कार्य के लिए बहुत धीरे-धीरे समय आने पर स्थानीय भाषा को प्राथमिकता देते हुए, उसके बाद ही राष्ट्रभाषा को स्वीकार्य बनाने के बारे में सोचा जाना चाहिए।  वास्तव में व्यक्तिगत रूप से तो मेरा अनुमान है कि अंग्रेज़ी को राष्ट्रभाषा के स्थान से बेदखल नहीं किया जा सकता और न उससे किसी का कोई भला होना है।  मेरा शायद अतिरंजित ख्याल यह भी है, की आज नहीं तो कल अंग्रेजी की पगडंडियाँ ही संस्कृत के आगमन के लिए मार्ग प्रशस्त करेंगी।
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(निरन्तर - भाषा का यह प्रश्न -2 )
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September 18, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -25

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास -25
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16 मार्च 2014  के आसपास यह श्रंखला शुरू हुई थी।  ध्वंस तो सृजन की सहयोगी गतिविधि है।  लेकिन उसकी अभिव्यक्ति इस तारीख के बाद अधिक प्रखर हो उठी है। ट्विटर पर एक नए फॉलोवर बने हैं।  पता नहीं क्या अपेक्षा मुझसे होगी उन्हें ! बहरहाल उनका पेज देखा तो ऐसा लगा कि वे 'राष्ट्रवाद' के प्रबल समर्थक और सेकुलरिज्म के उतने ही प्रबल विरोधी होंगे।
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पिछले साल भर कई बार इन दोनों शब्दों पर चिंतन करता रहा।  गीता पर ब्लॉग्स लिखते समय भारत पर भी बहुत बार सोचा।  अध्याय 3 का श्लोक 38 जब भी पढ़ता हूँ, जे. कृष्णमूर्ति याद आते हैं !
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'धूमेनाव्रियते वह्निः यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा  तेनेदमावृतम्।।'
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संस्कृत में 'आदर्श' का मतलब होता है आईना। आदर्श पर हमेशा विचार की धूल चढ़ जाती है । आदर्श वस्तुतः निर्मल होता है।  इतना निर्मल कि दिखलाई तक नहीं देता। फिर किसी दूसरे को उस आदर्श को दिखलाना तो लगभग असंभव ही होता है।  और जब भी विचार के माध्यम से उस आदर्श की ओर इशारा भी किया जाता है , तो विचार की धूल उस पर लग जाती है, उसे कलंकित भी कर देती है।  हाँ यह हो सकता है कि इस धूल को सावधानी से साफ़ कर दिया जाए। राष्ट्रवाद का आदर्श भी इसका अपवाद नहीं है। राष्ट्रवाद का प्रचलित अर्थ है, अपने देश को श्रेष्ठ मानना उसके प्रति गौरव अनुभव करना।  किन्तु देश क्या है? स्वाभाविक है कि इसका तात्पर्य भूमि समझा जाए। अर्थात् 'जन्मभूमि' । इस दृष्टि से देखें तो अपने देश से बाहर जन्म लेने वाले जिनके माता-पिता इस देश के नागरिक हैं, क्या इस देश को अपना न कहें? स्पष्ट है कि देश न सिर्फ भौगोलिक बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक, सामाजिक और भाषाई इकाई भी है। और एक सच्चाई भी है।
वैदिक रूप से 'राष्ट्र' का तात्पर्य है संपूर्ण भूमि अर्थात पृथ्वी।  वैदिक दृष्टि से इस भूमि की अपनी चेतन सत्ता है। देवी अथर्वण में देवी अपने बारे में कहती है :
'अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम् चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् .. …'
दूसरी ओर राज्य एक और इकाई है, जिसकी भौगोलिक सीमाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं।  किन्तु जहाँ साँस्कृतिक सीमाएँ समय के बदलने के साथ नहीं बदलतीं ऐसी एक और इकाई होती है जिसके आधार पर किसी समुदाय के 'देश' का अस्तित्व परिभाषित होता है।  स्पष्ट है कि एक ही 'देश' में अनेक भाषाई समुदाय हो सकते हैं, जिनकी साँस्कृतिक पहचान तक समान हो।
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आज 18  सितम्बर 2014 को सुबह समाचारों में सुना की स्कॉटलैंड में इस बारे में रेफरेंडम हो रहा है कि क्या
वह भौगोलिक क्षेत्र यू.के. में रहेगा या कि उससे अलग एक स्वतंत्र 'राष्ट्र' होगा?
तिब्बत के बारे में भारत की केंद्रीय सरकार की ढुलमुल नीति, कश्मीर के बारे में श्री जवाहरलाल नेहरू की इरादतन या गैर इरादतन भूल का ख़ामियाज़ा हम झेल रहे हैं। इस बारे में हमारी उदासीनता ही हमारे और संसार के विनाश का कारण है। यह ठीक है कि संसार की गति को कोई न तो दिशा दे सकता है, न कम या अधिक कर सकता है। बाँग्लादेश का जन्म इसका स्पष्ट प्रमाण है। चीन या दूसरी विस्तारवादी शक्तियाँ कितनी ही कोशिश कर लें, संसार के नक़्शे में राई-रत्ती का फ़र्क नहीं ला सकती। लेकिन यदि उन शक्तियों को इसका विश्वास है कि वे ऐसा कर सकती हैं तो यह उनकी ग़लतफ़हमी है।
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इस पोस्ट को यहीं पूर्ण करना चाहूँगा।  अभी काफी कुछ लिखना है, 'हिंदी' / 'हिन्दू' / 'भारत' / 'इण्डिया' / 'इंडिया' / 'इन्डिया' के बारे में।  वह सब अगली पोस्ट्स में।
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July 12, 2014

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 11

कल का सपना : ध्वंस का उल्लास - 11
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उन्हें मेरा 'पात्रता', 'कर्तव्य', 'अधिकार' और 'उत्तरदायित्व' का 'मॉडल' पसंद आया ।
'देखिए, इस तरह से मैंने सोचा कि जब सचमुच हम 'अधिकार' की बात करते हैं, तो इससे जुड़ी बाक़ी तीन बातों पर ध्यान देना भूल जाते हैं।  सिर्फ 'पात्रता' होने से 'अधिकार' नहीं मिल जाता।  लेकिन बोलचाल की भाषा में हम इस बुनियादी शर्त को भूल जाते हैं, या जान-बूझकर नज़रंदाज़ कर देते हैं। और ऐसा करना ही हमारी 'पात्रता' की वैधता को संदिग्ध बना देता है।'
'जी,…'
'लेकिन मैं आपके 'समाज के अवचेतन' वाली बात से ज्यादा प्रभावित हुआ। आप तो विद्वान हैं, लेकिन मैं भी इन बातों पर सोचता हूँ और समझने की क़ोशिश करता हूँ। मुझे लगता है कि आपकी इस बात पर ध्यान दिया जाना ज़रूरी है।'
'मैं इससे भी एक क़दम पीछे जाना चाहता हूँ। '
'मतलब?'
'मतलब यह कि क्या मनुष्य कुछ करने या न करने के लिए स्वतंत्र होता है?'
'वह तो वह है ही ! स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा।'
थोड़े नक़ली उत्साह से वे जवाब देते हैं। लेकिन तत्क्षण ही उन्हें अपनी बात में छिपी भूल नज़र आ जाती है।
'हाँ, यह तो मानना होगा कि आपके मॉडल में अधिकार तीसरी स्टेज पर है, इसलिए वह जन्म-सिद्ध कैसे हो सकता है?'
'मतलब स्वतंत्रता नामक कोई चीज़ वस्तुतः होती ही नहीं ?'
'जी।'
वे सोच में पड़ गए।
'और धार्मिक या राजनैतिक स्वतंत्रता?'
'धर्म तो सदैव एक स्वतंत्र तत्व है, लेकिन धार्मिक या राजनैतिक स्वतंत्रता जो वास्तव में एक ही चीज़ के दो अलग अलग नाम हैं, का तात्पर्य है किसी समुदाय या वर्ग के अधिकारों की स्वतंत्रता।'
'और  स्वतंत्रता से आपका क्या आशय है?'
'धर्म ही एकमात्र स्वतंत्र तत्व है जो सम्पूर्ण अस्तित्व की तमाम गतिविधियों को संचालित करता है।'
'और वह स्वतंत्र कैसे है?'
'बल्कि स्वतंत्र से बढ़कर, वह तो निरंकुश भी है, क्योंकि उस पर किसी दूसरे का नियंत्रण नहीं हो सकता।'
'ईश्वर?'
'क्या धर्म ही एकमात्र ईश्वर नहीं है?'
'तो क्या मनुष्य केवल उद्वेलित होने, एक दूसरे से लड़ने झगड़ने के अलावा, और कुछ नहीं कर सकता ?'
 'मनुष्य तो चाहने या न चाहने के लिए भी कहाँ स्वतंत्र  है?'
'तो क्या मनुष्य किसी बात के लिए स्वतंत्र है भी?'
'हाँ सिर्फ यह देखने के लिए कि स्वतंत्रता शब्द सीमित सत्ता पर लागू नहीं होता।'
'जी धन्यवाद, मैं बस स्तब्ध हूँ, मैंने कभी इस तरह से नहीं सोचा था।'
'यू आर ऑल्वेज़ वेलकम !'
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May 27, 2014

~~ कल का सपना / ध्वंस का उल्लास - 3 ~~

~~ कल का सपना / ध्वंस का उल्लास - 3 ~~
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सोचता हूँ ' भारतीय' और 'हिन्दू' के अर्थ और प्रयोग और प्रयोग के परिणाम में क्या अंतर है ।
वर्ष 1967 - 1968 में, जब मैं कक्षा 9 का छात्र था पहली बार इस और मेरा ध्यान गया, हालाँकि तब मैं इसे राजनीतिक बुद्धिजीवी जैसा सोचते हैं, कुछ उस ढंग से ही सोचा करता था।  अपरिपक्व तरीके से, जिन्हें किसी तथ्य की सत्यता को गहराई से देखने-समझने के लिए न तो वक्त होता है, न रुचि।  और वे अपने आसपास के वातावरण के अनुसार किसी 'आदर्श' / 'सिद्धांत' या 'लक्ष्य' की प्राप्ति को जीवन की परम उपलब्धि मानकर कभी उत्साह से तो कभी कर्तव्य से या बस अपने लिए किसी क्षेत्र-विशेष में कोई विशेष स्थान भविष्य में  बनाने के लिए श्रम-संलग्न  हो जाते हैं।  इस दृष्टि से दूसरे लोग जो ज्यादा परिपक्व बुद्धि के होते हैं, वे या तो जीवन में अपनी क्षमताओं और संभावनाओं को पहले ही टटोल लेते हैं और अपनी सीमाओं के अंतर्गत अपने लिए कोई जीवन-शैली अपनाकर खुश रहते हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश को उन्हीं दिनों पढ़ा था।  गीता को बाद के वर्षों में।  फिर यह लगा कि किसी भी ग्रन्थ को ख़ासकर आध्यात्मिक, पौराणिक / ऐतिहासिक ग्रन्थ को भी  उसके मूल रूप में ही पढ़ना चाहिए।
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जब इस प्रकार से मुझे लगा कि वास्तव में 'हिन्दू' शब्द  न तो किसी 'धर्म' के लिए प्रयुक्त किया जाता है, और न संस्कृति या समाज के लिए, बल्कि यह भारतीयता की जीवन-शैली ही अधिक है, तो मुझे यह भी लगा की फिर तो 'हिन्दू'-आधारित राजनीति हमें विभाजित और सिर्फ विभाजित ही करेगी।  लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तथाकथित धर्म-निरपेक्षता, जो पहले तो मनुष्यता / भारतीयता को हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध में बाँटने और फिर उन्हें 'समान' 'समझने' के सिद्धांत का आग्रह करती है, हमें विभाजित नहीं करती। मुझे यह भी लगा कि  इस प्रकार से हम एक ऐसे प्रश्न और समस्या को हल करने के प्रयास में हैं, जो मूलतः अस्तित्व ही नहीं रखती।
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जब  मैंने श्री  बलराज मधोक  के विचार पढ़े तो मेरा यह दृढ विचार हो गया की राष्ट्र / भारत की अखण्डता के लिए हमें 'हिंदुत्व' पर नहीं बल्कि भारतीयता पर जोर देना होगा।
चूँकि मेरा राजनीति के क्षेत्र से न तो कोई सरोकार था, न मेरे लिए यह संभव था कि मैं राजनीति में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ूँ, इसलिए अपने विचार मैंने अपने तक ही रहने दिए।
लेकिन 'भारतवर्ष' या 'भारत' से जुड़ी अपनी अस्मिता मेरे लिए जीवन का सर्वाधिक अमूल्य तत्व हो गई।
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कल जब श्री नरेंद्र मोदी जी के शपथ-ग्रहण समारोह की कमेंट्री रेडिओ पर सुनी तो एक गहन आनंद की अनुभूति हुई। आज जब नईदुनिया अख़बार में श्रवण गर्ग की रिपोर्ट पढ़ी, तो मैं सोचने लगा कि  श्री नरेंद्र मोदी  संकल्प और ऊर्जा से अपना अभियान चलाया वह किसी ईश्वरीय सत्ता के आशीर्वाद  के बिना शायद ही फलीभूत होता।  और जब मैंने पढ़ा कि किस प्रकार 'विजेता' होने पर भी उन्हें अपने राजनितिक प्रतिद्वंद्वियों को पराजित करने का जरा भी गर्व नहीं है, तो बरबस मेरा सर उनके प्रति सम्मान से झुक गया।
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 ~~ कल का सपना / ध्वंस का उल्लास - 3 ~~ © , उज्जैन 27 /05 /2014 . 
    

~~ कल का सपना / ध्वंस का उल्लास -2 ~~

~~ कल का सपना  / ध्वंस का उल्लास -2 ~~
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पिछले तीन माह से चल रहा विप्लव कल चरम को छूकर बिखर गया।
16-2-2014 को एक पोस्ट लिखी थी :
'ध्वंस का उल्लास',
उस उल्लास के महायज्ञ की पूर्णाहुति हो गई ।
मन विभोर था।
शाम को ठीक 5 :30 पर आकाशवाणी इंदौर लगाया, और बेसब्री से श्री नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमन्त्री पद के शपथ-ग्रहण समारोह के 'आँखों देखा हाल' की प्रतीक्षा करने लगा।
वैसे मेरे पास बतलाने के लिए अपना ऐसा कोई औपचारिक कोई 'परिचय' या 'परिचय-पत्र' नहीं है जिसके आधार पर मैं  भारतीय नागरिक होने का दावा कर सकूँ।  'ड्राइविंग-लाइसेंस' कुछ साल पहले लैप्स हो चुका है, राशन-कार्ड का इस्तेमाल भी पंद्रह साल से नहीं किया।  वोटर्स'-आई डी कार्ड भी कहीं ऐसी जगह रखा है जो मेरी पहुँच से बाहर है।  और राजनीति में भागीदारी से मुझे बचपन ही से सख्त परहेज था ।  इसलिए मुझे देश में चल रहे विप्लव के बारे में रुचि तो नहीं, कौतूहल अवश्य था।
रोज का अख़बार, चूँकि आता है और अखबारवाले भैया मेरे मना कर देने पर भी जबरदस्ती डाल जाते हैं और मैं सिर्फ सौजन्यतावश ही बिल का पेमेंट कर देता हूँ, इसलिए एक नज़र डाल देता हूँ।
वैसे तो पृष्ठ १ से अंतिम पृष्ठ तक यही लगता है 'हम कहाँ जा रहे हैं?' लेकिन मैं बस देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता, इसलिए चिंता करने का भी कोई मतलब नहीं। मैं नहीं जानता कि  'प्रगति' क्या है, 'विकास' और 'समृद्धि' का  पैमाना क्या है / क्या होना चाहिए।
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एक शब्द है 'हिंदुत्व'। जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा हूँ।  मेरे अपने परिवार में कई लोग हैं जो 'हिन्दू' होने में 'गर्व' अनुभव करते हैं।  अभी 16 मई से जरा पहले यू आर अनंतमूर्ति के संबंध में गिरीश कर्नाड का एक वक्तव्य पढ़ा था,  जिसका सार यह कि 'हिन्दू' कुछ नहीं होता।  उनके कहने का आशय मैं समझता हूँ। मेरा पिछले पचास से भी अधिक वर्षों से यही मत रहा है कि 'हिन्दू' कुछ नहीं होता। न 'धर्म', न 'राष्ट्रीयता'। और इसलिए अगर हम हिन्दू-मुस्लिम या ऐसे भेदों को बहस का विषय बनाते हैं तो हम उसे किसी ऐसी परिणिति तक नहीं ले जा सकते, जिससे बहस समाप्त हो जाए, कोई सर्वमान्य निष्कर्ष निकला जा सके ।
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मैंने किसी भी प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ में 'हिन्दू' शब्द नहीं देखा।  हाँ कबीरदासजी या उनके समकालीन तथा बाद के लोगों के ग्रंथों में इसके होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
मेरा अपना विश्लेषण यह है कि विष्णुपुराण तथा मनुस्मृति के सन्दर्भ में देखें तो 'आर्य' तथा आर्यावर्त दोनोँ  शब्द पृथ्वी के इस भौगोलिक क्षेत्र को जिसे वे तथा हम भी 'भारत' कहते हैं 'सुपरिभाषित' करते हैं।  और दोनों ही के अनुसार हिमालय से दक्षिण में समुद्र तक तथा पश्चिम में सिंधु नदी तक की भूमि 'आर्यावर्त' है।

"उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।"
(विष्णुपुराण)
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और इसलिए  हिन्दू कहने की बजाय मैं अपने-आपको, 'भारतीय' कहना कहलाया जाना अधिक उचित समझता हूँ।
लेकिन पिछले 500 वर्षों में भारतीयों पर एक शब्द 'हिन्दू' लादा गया जिसे हमने अपनी अस्मिता मान लिया। मुझे हालाँकि इस पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन फिर इस 'शब्द' को मुस्लिम, सिख तथा ईसाई के साथ रखकर हमारे भारतीय मन को विखंडित कर दिया गया।
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India और  Indonesia दोनों की व्युत्पत्ति 'इंदु' अर्थात् 'चन्द्रमा' से हुई है, न कि 'सिंधु' से, जैसा कि हमें बतलाया जाता रहा है। इसलिए यह संयोगमात्र नहीं है कि 'भारत' की उपरोक्त परिभाषा में भारतवर्ष की पूर्वी सीमा का उल्लेख नहीं है।  पूर्व में सुदूर ऑस्ट्रेलिया तक, तथा मध्य में सिंगापुर, कम्बोडिया, मलेशिया और दूसरे क्षेत्रों में भी 'भारतीयता' को देखा जा सकता है। पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण तो सुपरिभाषित हैं ही।  
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तात्पर्य यह कि गीता में अध्याय 2 श्लोक 63 में जैसा कहा गया है,

".... स्मृति भ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशा द्प्रणश्यति।"

इस प्रकार समस्त 'भारतीयता' की स्मृति को ही विनष्ट-भ्रष्ट कर देने के बाद 'हिन्दू' अस्मिता  / identity अस्तित्व में आई।
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"मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी, ईश्वर की शपथ ...."
".... विधि, .... "
oath-ceremony  का लाइव प्रसारण सुनना एक अद्भुत् अनुभव था।
मेरे लिए तो वह 'अव - अथ -चरमणीय ' / 'अव - अथ -च रमणीय '  ही था।
(basically / fundamentally, अत्यंत प्रारंभ से ही, मूलतः ) 
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महामहिम के आगमन के बाद बजाये जानेवाले राष्ट्रीय गान का एक एक शब्द वेद की ऋचाओं से कम न था !
अचानक ही पूरा राष्ट्रगीत स्मृति में शब्दशः गूंजने लगा।
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मैंने कितनी ही बार इस बारे में 'विद्वानों' के भिन्न भिन्न मत पढ़े हैं कि यह गीत भारत राष्ट्र की नहीं, बल्कि भारत के आंग्ल साम्राज्य के अधिनायक की प्रशस्ति में लिखा गया था। किन्तु कल जब इस गीत पर फिर से चिंतन किया तो 'जन-गण-मन' के रूप में सम्बोधित भारत राष्ट्र ही इस प्रशस्ति का अराध्य और इष्ट है, इसमें संदेह न रहा। और अधिनायक का अर्थ 'dictator' के अर्थ में निंदनीय नहीं बल्कि 'प्रथम / आदि' सूत्रधार के रूप में परमेश्वर के लिए प्रशंसात्मक रूप में ही प्रयुक्त हुआ है यह भी अनायास कौंधा।
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February 05, 2014

~~ आजकल /1 .~~

~~ आजकल  /1 .~~
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उक्त शीर्षक के अंतर्गत मैं उन विषयों पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का यत्न करूँगा जो यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से मुझसे संबंधित नहीं हैं किन्तु मुझे उद्वेलित अवश्य करते हैं क्योंकि उनका संबंध उस समाज से है, जिसमें  मैं रहता हूँ।
इसलिए वे राजनीति, कला, अर्थतंत्र, संस्कृति, साहित्य, धर्म और उन सभी गतिविधियों के बारे में हैं जो मेरे जैसे आम मनुष्य के जीवन से प्रत्यक्ष जुड़े हैं। फिल्में देखने और अखबार पढ़ने को मैं अपने वक्त की बर्बादी समझता हूँ।  फिर भी अखबार मुझे जरूरी बुराई जैसे लगते हैं।  वास्तव में मेरे  दैनिक जीवन को जाने -अनजाने जो तत्व प्रभावित करते  हैं उन तत्वों की सद्यःस्थिति के बारे में 'टच' में रहने की कुछ तो जरूरत मुझे महसूस होती ही है। सब्जियों के भाव, मौसम के हाल, वातावरण और माहौल, इन सब पर मन में कुछ प्रतिक्रियाएँ  आती हैं, उन्हें लिखना शायद मेरे लिए उपयोगी है।  मैं नहीं कह सकता कि मेरे ब्लॉग के सम्माननीय प्रेक्षक मेरे विचारों को कितना पसंद या नापसंद करते हैं, लेकिन इस बारे में कुछ करना शायद मेरे सामर्थ्य में नहीं।  'गूगल' और दूसरे भी अनेक 'प्रेक्षक' और व्यवसाय-जगत से सम्बद्ध लोग मुझे सलाह देते हैं कि क्या करने से मेरे 'ब्लॉग' पर 'ट्रैफिक' बढ़ सकेगा।  लेकिन इसमें मुझे बिलकुल ही रुचि नहीं है, इसे शायद वे नहीं समझते। क्योंकि 'लिखना' मेरी मजबूरी है, और गूगल मुझे बहुत सुविधाजनक लगता है इसलिए मैं यहाँ लिखता रहता हूँ। धन्यवाद गूगल !
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धर्म और संस्कृति
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मेरी दृष्टि में संस्कृति के चार प्रकार हैं।
पहला 'धर्म'-आधारित संस्कृति,
दूसरा 'अधर्म'-आधारित संस्कृति,
तीसरा 'धर्म-अधर्म' के मिश्रण पर आधारित संस्कृति,
और अंतिम है, 'धर्म-निरपेक्ष' संस्कृति।
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स्पष्ट है कि 'संस्कृति' शब्द के बारे में, जिसे अंग्रेज़ी में 'कल्चर' कहा जाता है, सामान्यतः विरोधाभास नहीं हैं, न राजनीतिज्ञों में न साहित्यकारों में, न विचारकों या बुद्धिजीवियों में ही।  इस प्रकार 'संस्कृति' के अनेक 'शेड्स' और प्रकार हैं। इस पर किसी को शायद ही ऐतराज होगा। 'हिन्दू-संस्कृति', 'भारतीय-संस्कृति','मिली-जुली संस्कृति', आदि शब्द प्रायः हम सुनते हैं और इन शब्दों का इस्तेमाल भी बेहिचक करते हैं। इसे ही उर्दू में 'तहज़ीब' कहते हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' शब्द तो सुना होगा।
क्या इनमें से प्रत्येक ही संस्कृति / कल्चर / तहज़ीब मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए उपरोक्त वर्गीकरण के चारों ही प्रकारों में नहीं पाई जाती ?
संभव है मेरी इस बात से  किसी को अंशतः सहमति / आपत्ति हो सकती है, किन्तु इनमें से पहला प्रकार तो सभी को मान्य होगा। क्योंकि 'धर्म-आधारित संस्कृति' के रूप में हम 'जैन-संस्कृति', 'बौद्ध संस्कृति' आदि से परिचित ही हैं।
मैं नहीं कह सकता कि 'राजपूत-संस्कृति', 'मुग़ल संस्कृति' 'सिख-संस्कृति', 'सूफी-संस्कृति' आदि का 'धर्म' से कितना सरोकार हो सकता है। ऐसा कह सकते हैं कि वे तथा उस प्रकार की दूसरी 'संस्कृतियाँ' भी 'धर्म' से स्वतंत्र अपना एक अलग रूप भी रखती हैं। 'चीनी-संस्कृति', 'रूसी' या 'जापानी', ईरानी और 'यूरोपीय' संस्कृति पर भी गौर करना यहाँ अनुचित न होगा ।  
किन्तु फिर इन विभिन्न संस्कृतियों को अपनानेवाले लोग इन्हें 'धर्म-आधारित' या 'धर्म-निरपेक्ष' स्वरूप में भी ग्रहण करते हैं।  और इसलिए 'धर्म' के पारम्परिक अर्थ में स्वीकृत उन सामाजिक तत्वों का भी समावेश इन संस्कृतियों में अनायास हो जाता है, जो 'धार्मिक-विश्वास' के रूप में जन-मानस में स्थापित हैं।
दूसरी ओर यह भी एक तथ्य है कि इन 'विश्वासों' के बीच परस्पर विरोध / विरोधाभास भी हैं ही । और इसलिए समाज कभी इन विरोधाभासों से उबर पायेगा ऐसी आशा मुझे नहीं है। क्योंकि विश्वासों के एक 'सेट' में जो 'धर्म' है, वह दूसरे किसी 'सेट' में सरासर अधर्म है । फिर ऐसे लोग भी है, जो शुद्धतः भौतिकवादी हैं, वे जीवन में शांति समरसता तो चाहते हैं, किन्तु 'धर्म' के स्थापित स्वरूप से उनका वास्ता कामचलाऊ ही होता है। वे 'विवाह' करने के लिए 'कोर्ट' जा सकते हैं, 'धर्म-परिवर्तन' कर सकते हैं या फिर इनका उपयोग अपने शुद्ध भौतिक लक्ष्यों की सिद्धि हेतु कर सकते हैं। धर्म, उनके लिए  ईश्वर, स्वर्ग-नरक, मुक्ति या पुनर्जन्म से संबंधित कोई तत्व नहीं बल्कि एक 'साधन' मात्र होता है।  वे मार्क्सिस्ट, कम्युनिस्ट, फंडामेंटलिस्ट कुछ भी हो सकते हैं।  शायद टेररिस्ट भी।  वे तथाकथित 'बुद्धिजीवी', 'समाजसेवी' या 'प्रगतिशील' 'वैज्ञानिक सोच' वाले विचारक, साहित्यकार आदि हो सकते हैं।  वे कलाकार, रंगकर्मी, 'मानवतावादी', 'अध्येता' / स्कॉलर' हो सकते हैं।  वे धुर-दक्षिणपंथी, या कट्टर वामपंथी भी हो सकते हैं।  वे 'हिसक' आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते हों यह भी संभव है।
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सवाल सिर्फ यह है  कि क्या वे सभी 'संस्कृति' से ही अनेक प्रकार से नहीं जुड़े होते?
इसलिए कुछ की दृष्टि में जो 'अधर्म' है, वह दूसरों की दृष्टि में 'अधर्म' की कोटि में न आता हो।
इसके बाद यह भी दृष्टव्य है कि सामाजिक स्तर पर 'धर्म' एक पहलू भी होता है । किसी सामाजिक गतिविधि को 'धर्म'  से संबद्ध स्वरूप भी दिया जा सकता है । तात्पर्य यह कि 'धर्म' और 'संस्कृति' सभ्यता से अविच्छिन्न होते हैं।  'सभ्यता' फिर वह मिस्र की हो, हड़प्पा या सिंधु नदी घाटी की हो या आर्य, ग्रीक अथवा रोमन हो ।
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इस प्रकार मानव-सभ्यता सर्वोपरि महत्वपूर्ण है, 'संस्कृति' और 'धर्म' शायद तुलनात्मक रूप से गौण महत्व के हैं । यदि 'सभ्यता' ही न हो तो 'धर्म' या संस्कृति की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है।
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इसलिए यदि हम 'मानव-सभ्यता' को सर्वमान्य आधारभूत महत्त्व का स्थान दें तो शायद 'धर्म' और संस्कृति से संबंधित प्रश्नों को अधिक बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।  लेकिन यदि हम 'संस्कृति' या 'धर्म' के चश्मे से आज की स्थिति को समझने का प्रयत्न करेंगे तो एक अनिश्चित और संशयपूर्ण बौद्धिक बहस में अटकने से बच नहीं सकते।
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