February 05, 2014

~~ आजकल /1 .~~

~~ आजकल  /1 .~~
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उक्त शीर्षक के अंतर्गत मैं उन विषयों पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का यत्न करूँगा जो यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से मुझसे संबंधित नहीं हैं किन्तु मुझे उद्वेलित अवश्य करते हैं क्योंकि उनका संबंध उस समाज से है, जिसमें  मैं रहता हूँ।
इसलिए वे राजनीति, कला, अर्थतंत्र, संस्कृति, साहित्य, धर्म और उन सभी गतिविधियों के बारे में हैं जो मेरे जैसे आम मनुष्य के जीवन से प्रत्यक्ष जुड़े हैं। फिल्में देखने और अखबार पढ़ने को मैं अपने वक्त की बर्बादी समझता हूँ।  फिर भी अखबार मुझे जरूरी बुराई जैसे लगते हैं।  वास्तव में मेरे  दैनिक जीवन को जाने -अनजाने जो तत्व प्रभावित करते  हैं उन तत्वों की सद्यःस्थिति के बारे में 'टच' में रहने की कुछ तो जरूरत मुझे महसूस होती ही है। सब्जियों के भाव, मौसम के हाल, वातावरण और माहौल, इन सब पर मन में कुछ प्रतिक्रियाएँ  आती हैं, उन्हें लिखना शायद मेरे लिए उपयोगी है।  मैं नहीं कह सकता कि मेरे ब्लॉग के सम्माननीय प्रेक्षक मेरे विचारों को कितना पसंद या नापसंद करते हैं, लेकिन इस बारे में कुछ करना शायद मेरे सामर्थ्य में नहीं।  'गूगल' और दूसरे भी अनेक 'प्रेक्षक' और व्यवसाय-जगत से सम्बद्ध लोग मुझे सलाह देते हैं कि क्या करने से मेरे 'ब्लॉग' पर 'ट्रैफिक' बढ़ सकेगा।  लेकिन इसमें मुझे बिलकुल ही रुचि नहीं है, इसे शायद वे नहीं समझते। क्योंकि 'लिखना' मेरी मजबूरी है, और गूगल मुझे बहुत सुविधाजनक लगता है इसलिए मैं यहाँ लिखता रहता हूँ। धन्यवाद गूगल !
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धर्म और संस्कृति
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मेरी दृष्टि में संस्कृति के चार प्रकार हैं।
पहला 'धर्म'-आधारित संस्कृति,
दूसरा 'अधर्म'-आधारित संस्कृति,
तीसरा 'धर्म-अधर्म' के मिश्रण पर आधारित संस्कृति,
और अंतिम है, 'धर्म-निरपेक्ष' संस्कृति।
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स्पष्ट है कि 'संस्कृति' शब्द के बारे में, जिसे अंग्रेज़ी में 'कल्चर' कहा जाता है, सामान्यतः विरोधाभास नहीं हैं, न राजनीतिज्ञों में न साहित्यकारों में, न विचारकों या बुद्धिजीवियों में ही।  इस प्रकार 'संस्कृति' के अनेक 'शेड्स' और प्रकार हैं। इस पर किसी को शायद ही ऐतराज होगा। 'हिन्दू-संस्कृति', 'भारतीय-संस्कृति','मिली-जुली संस्कृति', आदि शब्द प्रायः हम सुनते हैं और इन शब्दों का इस्तेमाल भी बेहिचक करते हैं। इसे ही उर्दू में 'तहज़ीब' कहते हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' शब्द तो सुना होगा।
क्या इनमें से प्रत्येक ही संस्कृति / कल्चर / तहज़ीब मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए उपरोक्त वर्गीकरण के चारों ही प्रकारों में नहीं पाई जाती ?
संभव है मेरी इस बात से  किसी को अंशतः सहमति / आपत्ति हो सकती है, किन्तु इनमें से पहला प्रकार तो सभी को मान्य होगा। क्योंकि 'धर्म-आधारित संस्कृति' के रूप में हम 'जैन-संस्कृति', 'बौद्ध संस्कृति' आदि से परिचित ही हैं।
मैं नहीं कह सकता कि 'राजपूत-संस्कृति', 'मुग़ल संस्कृति' 'सिख-संस्कृति', 'सूफी-संस्कृति' आदि का 'धर्म' से कितना सरोकार हो सकता है। ऐसा कह सकते हैं कि वे तथा उस प्रकार की दूसरी 'संस्कृतियाँ' भी 'धर्म' से स्वतंत्र अपना एक अलग रूप भी रखती हैं। 'चीनी-संस्कृति', 'रूसी' या 'जापानी', ईरानी और 'यूरोपीय' संस्कृति पर भी गौर करना यहाँ अनुचित न होगा ।  
किन्तु फिर इन विभिन्न संस्कृतियों को अपनानेवाले लोग इन्हें 'धर्म-आधारित' या 'धर्म-निरपेक्ष' स्वरूप में भी ग्रहण करते हैं।  और इसलिए 'धर्म' के पारम्परिक अर्थ में स्वीकृत उन सामाजिक तत्वों का भी समावेश इन संस्कृतियों में अनायास हो जाता है, जो 'धार्मिक-विश्वास' के रूप में जन-मानस में स्थापित हैं।
दूसरी ओर यह भी एक तथ्य है कि इन 'विश्वासों' के बीच परस्पर विरोध / विरोधाभास भी हैं ही । और इसलिए समाज कभी इन विरोधाभासों से उबर पायेगा ऐसी आशा मुझे नहीं है। क्योंकि विश्वासों के एक 'सेट' में जो 'धर्म' है, वह दूसरे किसी 'सेट' में सरासर अधर्म है । फिर ऐसे लोग भी है, जो शुद्धतः भौतिकवादी हैं, वे जीवन में शांति समरसता तो चाहते हैं, किन्तु 'धर्म' के स्थापित स्वरूप से उनका वास्ता कामचलाऊ ही होता है। वे 'विवाह' करने के लिए 'कोर्ट' जा सकते हैं, 'धर्म-परिवर्तन' कर सकते हैं या फिर इनका उपयोग अपने शुद्ध भौतिक लक्ष्यों की सिद्धि हेतु कर सकते हैं। धर्म, उनके लिए  ईश्वर, स्वर्ग-नरक, मुक्ति या पुनर्जन्म से संबंधित कोई तत्व नहीं बल्कि एक 'साधन' मात्र होता है।  वे मार्क्सिस्ट, कम्युनिस्ट, फंडामेंटलिस्ट कुछ भी हो सकते हैं।  शायद टेररिस्ट भी।  वे तथाकथित 'बुद्धिजीवी', 'समाजसेवी' या 'प्रगतिशील' 'वैज्ञानिक सोच' वाले विचारक, साहित्यकार आदि हो सकते हैं।  वे कलाकार, रंगकर्मी, 'मानवतावादी', 'अध्येता' / स्कॉलर' हो सकते हैं।  वे धुर-दक्षिणपंथी, या कट्टर वामपंथी भी हो सकते हैं।  वे 'हिसक' आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते हों यह भी संभव है।
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सवाल सिर्फ यह है  कि क्या वे सभी 'संस्कृति' से ही अनेक प्रकार से नहीं जुड़े होते?
इसलिए कुछ की दृष्टि में जो 'अधर्म' है, वह दूसरों की दृष्टि में 'अधर्म' की कोटि में न आता हो।
इसके बाद यह भी दृष्टव्य है कि सामाजिक स्तर पर 'धर्म' एक पहलू भी होता है । किसी सामाजिक गतिविधि को 'धर्म'  से संबद्ध स्वरूप भी दिया जा सकता है । तात्पर्य यह कि 'धर्म' और 'संस्कृति' सभ्यता से अविच्छिन्न होते हैं।  'सभ्यता' फिर वह मिस्र की हो, हड़प्पा या सिंधु नदी घाटी की हो या आर्य, ग्रीक अथवा रोमन हो ।
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इस प्रकार मानव-सभ्यता सर्वोपरि महत्वपूर्ण है, 'संस्कृति' और 'धर्म' शायद तुलनात्मक रूप से गौण महत्व के हैं । यदि 'सभ्यता' ही न हो तो 'धर्म' या संस्कृति की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है।
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इसलिए यदि हम 'मानव-सभ्यता' को सर्वमान्य आधारभूत महत्त्व का स्थान दें तो शायद 'धर्म' और संस्कृति से संबंधित प्रश्नों को अधिक बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।  लेकिन यदि हम 'संस्कृति' या 'धर्म' के चश्मे से आज की स्थिति को समझने का प्रयत्न करेंगे तो एक अनिश्चित और संशयपूर्ण बौद्धिक बहस में अटकने से बच नहीं सकते।
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