February 19, 2026

P C M

Incidence or a Coincidence?

घटना, संयोग, प्रारब्ध या नियति?

बचपन से मुझे जानने और पता लगाने में कुछ अधिक ही रुचि थी। और ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि लगभग हर प्राणी में यह जन्मजात रूप से होती ही है। हर शिशु में, चाहे वह मनुष्य का या पशु का हो, पक्षी या जलचर का है। यह मूल और अबोध प्रवृत्ति आगे चलकर अपने और अपने आसपास के संसार को जानने समझने और उसमें अपने संसार में होने, उससे संबद्ध और फिर उससे फिर भी कुछ भिन्न और स्वतंत्र उसकी एक इकाई होने की मान्यता का रूप ले लेती है। यह या तो केवल अपने लिए सुरक्षित बने रहने और संसार में निरंतर अपने लिए आवश्यक उन वस्तुओं को प्राप्त करते रहने की प्रवृत्ति में बदल जाती है जो हमें निरंतर सुरक्षित और सुखी बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रतीत होती हैं। इन वस्तुओं में हमारा परिवार, लोग और उनसे हमारा संबंध भी ऐसी ही एक वस्तु होती है। शारीरिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रहने की इस प्रवृत्ति को survival instinct  कह सकते हैं। स्कूल में आठवीं बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद नौंवीं में विज्ञान या क्या संकाय में से कोई एक चुनना था। मेरी दिलचस्पी विज्ञान में थी, और चूँकि  मुझे डॉक्टर नहीं, वैज्ञानिक या और गणितज्ञ बनना था इसलिए बॉटनी ज़ूलॉजी लेने का सवाल ही नहीं था। अब बचा गणित, तो आगे जाकर इंजीनियरिंग भी लिया जा सकता था।

P -Physics, C - Chemistry  और  M - Mathematics, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र और गणित। यद्यपि तब यह कल्पना तक नहीं उठती थी कि भविष्य में नौकरी या आजीविका के प्रश्न का भी सामना करना होगा। लेकिन इन्हीं विषयों को लेकर ग्रैजुएशन और फिर गणित में पोस्ट ग्रैजुएशन कर लिया, बैंक में सम्मानप्रद नौकरी भी मिल गई और झुकाव शुरु से ही अध्यात्म की ओर था, तो बस सारा प्रयास अध्यात्म का रहस्य खोजने और समझने में लगा दिया। अभी करीब साल पहले इस बारे में सोच रहा था कि शायद बचपन में P C M को चुनने के पीछे अव्यक्त रूप से जो इच्छा मन में थी वह मूलतः अध्यात्म के प्रति  मेरी गहरी रुचि का ही संकेत था। क्योंकि गीता में वर्णित सांख्य और योग की इन दोनों निष्ठाओं से मैं अपनी उस रुचि को संबद्ध कर सकता था, अर्थात्  relate  कर पा रहा था।  Analogy  के रूप में उस दृष्टि से -

भौतिक शास्त्र - कर्म, रसायन शास्त्र - गुण और गणित - सांख्य (बुद्धि) के ही सूचक हैं, - कर्म, गुण और बुद्धि का न्यायोचित समन्वय ही धर्म और दर्शन है।

धर्म सिद्धान्त और आचरण है, दर्शन अध्यात्म है।

धर्म शरीर, मन और संसार से सुसंगति है, जबकि दर्शन आत्मा से सुसंगति  है।

*** 


February 17, 2026

LOCK AT HOME.

वनदुर्गा उपनिषद् 

बचपन में गर्मियों की दो माह की लंबी छुट्टियों के दिनों से पहले 30 अप्रैल के दिन स्कूल का अंतिम दिन होता था, और इसी दिन वार्षिक परीक्षा का परिणाम घोषित होता था। सभी बच्चों पर फेल हो जाने का डर इस तरह हावी होता था कि 29 अप्रैल का दिन कटना मुश्किल हो जाता था। उस दिन हम बच्चे एक पार्टी रखते थे और बच्चों के खेल खेलते थे। हर किसी को पुरस्कार दिया जाता था,  पहला सबसे बड़ा पुरस्कार खेल में हारनेवाले को दिया जाता था ताकि वह समझ सके कि जीवन में भाग्य और कर्म दोनों का समान महत्व है और न तो हार से निराश या दुःखी होना चाहिए और न जीत होने पर खुश होकर बहुत गर्व करना।

खेल भी कौन से? लूडो, चाइनीज़ चेकर्स जैसे घरेलू खेल। वैसे चाइनीज़ चेकर्स से बेहतर खेल होता था - अष्टा चंगा पे। ताश के खेल भी जैसे कि ट्वेंटी नाइन, गुलाम-चोर, झब्बू, खेले जाते थे। लड़कियाँ "पाचे" खेला करती थीं। "पाचे" वैसे हिन्दी / मराठी में प्रयुक्त यह शब्द संस्कृत "पांशु" का वैसा ही अपभ्रंश है, जैसा कि हिन्दी में प्रचलित "पाँसे" शब्द - कहते हैं न, 

"पाँसा पलट गया!"

ऐसा ही ताश के पत्तों का एक खेल होता था -

NOT AT HOME!

वर्ष 2010 के आसपास मुझे कहीं से मुझे एक बार एक गिफ्ट मिला था वनदुर्गा उपनिषद्। साथ ही यह दायित्व भी, कि मैं उसके संस्कृत टेक्स्ट को शुद्ध टाइपसेट कर वह टेक्स्ट वापस भेज दूँ। यहाँ से एक नया खेल शुरू हुआ। उस संस्कृत टेक्स्ट की कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही एक पंक्ति पर दृष्टि पड़ते ही मैं अटक गया और मेरी बुद्धि में यह कौंध गया कि यहाँ एक "Lock" है। सामान्यतया संस्कृत के सभी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों में ऐसे कुछ अदृश्य "लॉक" इन-बिल्ट होते हैं ताकि  कहीं किसी अनधिकारी / अपात्र को वह ज्ञान उपलब्ध न हो। ऐसा इसलिए भी आवश्यक है ताकि अनजाने में भी किसी का भी अहित न हो।

इस घटना के बाद से संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन करने के मेरे तरीके में एक आमूल-चूल और क्रांतिकारी परिवर्तन घटित हो गया।

मुझे यह भी स्पष्ट हुआ कि संस्कृत के किसी भी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों का किसी भी भाषा में अनुवाद किया जा सकना असंभव है। हाँ कोई इनका कोई मर्मज्ञ ही संभवतः इनका भाष्य शायद लिख सकता है।

अनुवाद  / translation

और

भाष्य / Commentary

के माध्यम से भी उस ग्रन्थ के मर्म की ओर केवल संकेत ही किया जा सकता है। उस रहस्य / मर्म का आविष्कार तो केवल कोई अधिकारी / पात्र ही कर सकता है।

फिर भी एक उदाहरण से इसे इस तरह से समझाया और समझा जा सकता है -

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है :

viscosity / viscose.

यह शब्द संस्कृत शब्द 

विष्कोश, विष-कोश या विष-कोष

का अपभ्रंश या व्युत्पन्न हो सकता है। इसका अर्थ है - श्यानता / श्याम जो उर्दू में शाम के रूप में प्रचलित हो गया। श्याम का दूसरा अर्थ है कृष्ण अर्थात् काला- काला अर्थात् गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यमय। 

फिर भी वह दिखाई तो देता ही है!

ईश्वर ऐसा ही एक, अनेक या एकानेक से परे मर्म, गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्य है। क्योंकि साँख्य दर्शन के अनुसार एक और अनेक "गुण" हैं और पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार गुणकर्मसमष्टि का प्रतिप्रसव कैवल्यम्

ताण्डवराया स्वामी ने शायद इसीलिए 

कैवल्य-नवनीत

नामक तमिऴ ग्रन्थ की रचना की होगी।

प्रसंगवश -

जब भी, 

रहसि स्थितः, रहिं, जैसा, अरबी भाषा का -

रहीम

शब्द मेरी आँखों के सामने आता है, सबसे पहले मेरे मन में इसका यही अर्थ द्योतित होता है। मैं यहीं रुक जाता हूँ, क्योंकि मैं समझता हूँ, कि मैं अरबी और हिब्रू भाषा के ग्रन्थों को पढ़ने के लिए अनधिकारी / अपात्र भी हूँ, क्योंकि ऐसा करना न सिर्फ अनावश्यक और अवाँछनीय बल्कि शायद विनाशकारी भी हो सकता है। और मेरे द्वारा ऐसा किया जाना मेरे

कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र और योग्यता क्षेत्र

की मर्यादा का उल्लंघन और मेरे सामर्थ्य से बाहर की वस्तु है।

और तब मैं

Not At Home / Lock At Home

कहकर चुप हो जाता हूँ।

और परमात्मा तो तो वह मर्म है जो ईश्वर से भी अधिक गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यपूर्ण है। फिर भी वह अदृश्य की तरह दिखाई तो देता ही है! और कितना भी धुँधला क्यों न हो जाए, प्रेम की तरह अनुभवगम्य भी तो होता ही है न!

याद आती हैं गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएं -

ब्रह्मराक्षस का शिष्य, विपात्र और

संभवतः उनकी ही और एक रचना यह भी है -

चाँद का मुँह टेढ़ा है।

*** 




 



February 14, 2026

VALENTINE'S DAY!

निर्वासन, निष्क्रमण,

अभिनिष्क्रमण और

महाभिनिष्क्रमण ...

Extradition, Exodus, Exile, Liberation, Abandonment and Deliverance.

मार्च 2022 में स्पष्ट हो गया था कि यहाँ से जाना है।

"आप कहाँ जाने के बारे में सोच रहे हैं?"

-मित्र ने पूछा।

"मैं कहीं जाने के बारे में नहीं, सिर्फ इतना ही सोच रहा हूँ कि यहाँ से जाना है।"

-मैंने कहा। 

उसके और मेरे सोचने में यही बुनियादी फर्क था। लोग  अकसर, जब भी कहीं जाने के बारे में सोचते हैं तो उन्हें मालूम होता है कि उन्हें फिर लौटकर यहीं आना है। बस कभी कभी ही यह भी, कि वे यहाँ, इस स्थान को हमेशा के लिए छोड़ने के बारे में सोच रहे होते हैं। जैसे जब उस समय वे किराए के मकान में रहते हों और नया जॉब या व्यवसाय करने के लिए किसी दूसरी जगह शिफ्ट होना होता है। मेरी स्थिति में यह भी संभव न था क्योंकि मुझे यह तो पता था कि इस स्थान को छोड़ना है और दूसरी किसी जगह पर रहने के लिए जाना है, लेकिन न तो इस उम्र में मैं कोई नया जॉब करने के बारे में सोच सकता था और न ही कोई व्यवसाय करने के बारे में। और मेरा मित्र तो इस पहलू पर सोच तक नहीं सकता था। मुझसे सिर्फ सतही तौर पर पूछ रहा था। फिर उसी मित्र के माध्यम से कुछ दिनों, हफ्ते दस दिनों के लिए तात्कालिक रूप से कहीं रहने की व्यवस्था हो गई, और फिर मैं पुरानी जगह लौट आया। साल भर उसी जगह अनिश्चय, असमंजस तनाव और चिन्ता में वहीं बीता। इस बीच एक पुराने मित्र मिले और तय हुआ कि वे मेरे रहने की (तात्कालिक रूप से) स्थायी व्यवस्था कर देंगे। खुद उन्होंने भी इस बारे में शायद ही कभी सोचा था। वे खुद ही अस्थिर परिस्थिति और मनःस्थिति से ग्रस्त और पीड़ित थे। उनकी तरह मैं भी उनके साथ साल-डेढ़ साल भर तक ऐसी ही स्थिति में फँसा रहा। फिर ऐसा कुछ संयोग बना कि डेढ़ साल से यहाँ रहने लगा हूँ। अभी तो लग रहा है कि संभवतः लंबे समय तक या कि शायद पूरे जीवन भर ही यहीं रहना है। वैसे भी कहीं लौटने के लिए न कोई स्थान, कारण और न ही कोई संभावना ही दूर दूर तक नजर आ रही है।

शायद यही निर्वाण है!

इति मम निर्वाणोपनिषद्।। 

***




February 11, 2026

The Agnostic.

स ही वा!

+-

"भारत में हर तीसरा व्यक्ति ज्ञानी है!"

"आप तीसरे हैं?"

"जी नहीं, मैं चौथे किस्म का हूँ।"

"मतलब?"

"मैं अज्ञेयवादी हूँ।"

"मतलब?"

"Atheist, Anti-theist, Acateleptic, Pyrrhonian, Pyrrhonist, Secular, Skeptic, Godless, Doubting Thomas, Intellectual!" 

"सही.. वा?!"

***



February 09, 2026

THE SHADOW OF LIGHT

स्मृति की पहचान : पहचान की स्मृति

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अतीत, पहचान और स्मृति यद्यपि एक ही वस्तु जीवन  के तीन आयाम हैं, और संभवतः तीनों को परिभाषित भी किया जा सकता है, तीनों ही अन्योन्याश्रित सत्य हैं और किसी कल्पित विषय के सन्दर्भ में ही अभिव्यक्त और पुनः अनभिव्यक्त होते रहते हैं। आधारभूत चेतना उन सबमें व्याप्त होते हुए भी उनसे अप्रभावित, अछूती और स्वतंत्र है, जिसमें ये तीनों ही भेद नहीं पाए जाते। जैसे

ब्रह्म - सजातीय, विजातीय और स्वगत

इन तीनों ही भेदों से रहित नित्य विद्यमान अस्तित्व है, और उसे जिस तरह से सर्वनाम के तीनों प्रकारों -

अस्मद्, युष्मद् और तत्

में से किसी एक की तरह व्यक्त या संबोधित नहीं किया जा सकता है, चेतना भी अपना प्रमाण स्वयं ही है और  उसे ही -

सन् धातु के क्त प्रत्यय सहित सत् पद से भी व्यक्त किया जाता है :

श्रीमद्भगवद्गीता -

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। 

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्तयं ह्येतदुत्तमम्।।३।।

अर्जुन उवाच :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

श्रीभगवानुवाच :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठायसंभवाम्यात्ममायया।।६।।

श्री भगवते प्रीयतां च अर्पणमस्तु।।

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February 04, 2026

Day-Dreaming!

Hindi Poetry.

--

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी टूट जाती है, 

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी उड़ भी जाती है,

कभी तो दुःख भी आता है, 

कभी फिर लौट जाता है,

कभी खुशी भी आती है,

कभी फिर लौट जाती है,

कभी उम्मीद-नाउम्मीद,

आया जाया करते हैं,

कभी अफसोस, फिक्र या गम,

दिल पर छा जाया करते हैं!

नहीं मैं, नींद या दुःख भी,

नहीं खुशी हूँ, या गम भी,

नहीं हूँ फिक्र या अफसोस,

जो आते जाते रहते हैं,

कभी मैं सुखी, कभी मैं दुःखी,

कभी जागा,  कभी सोया, 

कभी भूखा,  कभी प्यासा, 

हँसा भी कभी, कभी रोया,

अगर हूँ मैं यह सब कुछ, 

तो क्या हूँ, भीड़ एक मैं?

या हूँ, मैं बस खालीपन,

जो न आता, न जाता है,

बस खयाल ही आता है,

बस खयाल ही जाता है,

तो क्या हूँ, खयाल ही मैं?

या हूँ बस वह खालीपन,

जो न आता, न जाता है?

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी टूट जाती है,

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी उड़ भी जाती है,

क्या कभी मौत भी आएगी,

क्या फिर वह लौट जाएगी?

क्या जीवन भी जाएगा, 

या फिर से लौट आएगा?

क्या मैं तब खो जाऊँगा,

खुद को खोया पाऊँगा!

तो क्या वह नया जनम होगा, 

या मैं बस मिट जाऊँगा?

कभी भी सपने आते हैं, 

मगर फिर लौट जाते हैं,

कभी भी सपने आते हैं,

मगर फिर भूल जाते हैं,

कभी भी नींद आती है,

कभी भी टूट जाती है! 

***


 


     





January 21, 2026

The First and The Last Love.

हिन्दी कविता

विस्मृति-मुग्ध

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It's nice, whatever it is!

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गंध भी मत छूना मन,

पहचान भी बनाना मत,

देख लेना सिर्फ छवि,

स्मृति में तुम बसाना मत!

फिर फिर मिलेगा वह तुम्हें,

जैसे मिला हो पहली बार,

सोचना, कहना भी मत,

यह था मेरा पहला प्यार!

***


January 15, 2026

AN ANALOGY

THREE PARALLELS 

अनु-अव-लोकीय 

बरमान शब्द "ब्रह्मन्" का अपभ्रंश है। नर्मदा पुराण के अनुसार स्वयंभू ब्रह्मा ने पृथ्वी पर अवतरित होने पर जब चतुर्दिक् देखा और उनके हृदय में जब कौतूहल उत्पन्न हुआ कि उनकी उत्पत्ति जिस कमल से हुई है, और वह कमल भी जिस जल में उत्पन्न हुआ है, वह जल कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ है और उससे बाहर जो आकाश क्षितिज से क्षितिज तक घिरा दिखाई देता है, वह कहाँ से कहाँ तक है, और इसी तरह वह अचल पृथ्वी भी, जो कि इस जल में डूबी होने पर भी सर्वत्र ही जिसका आश्रय और अधिष्ठान है, क्या उस पृथ्वी का कहीं कोई प्रारंंभ और / या अन्त है! तब इस कौतूहल से चकित उनकी बुद्धि ठिठककर स्तब्ध हो गई और वे सहस्र वर्षों तक के लिए इस स्तब्धता से एकीभूत होकर अत्यन्त ही उद्विग्न और व्याकुल हो उठे क्योंकि तब उनके पास न तो करने के लिए कोई कार्य था, न ही अतीत या भविष्य नामक कोई ऐसी वस्तु जो उन्हें कुछ करने के लिए अतीत की स्मृति या भविष्य की कल्पना की तरह प्रेरित कर सकती थी। तब अपने केवल अस्तित्व-मात्र होने का भान ही वह एकमात्र वस्तु था जो भान होते हुए भी न तो ज्ञान ही था और न ही अज्ञान था। अस्तित्व का भान और भान का अस्तित्व परस्पर ऐसे अभिन्न थे कि उनके बीच द्वैत नहीं दिखाई देता था। बस, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश ही थे जो उन्हें सर्वत्र व्याप्त दिखाई देते थे। सतत, निरंतर ही उद्विग्न और व्याकुल रहने के फलस्वरूप उनमें तप-रूपी अग्नि का आवेश हुआ जिससे उनका भान इन्द्रिय-ज्ञान के रूप में विभक्त और विकसित होने लगा। इस पाँच प्रकार के इन्द्रिय-संवेदनों का रूपांतरण पञ्च तन्मात्राओं में हुआ और तब अस्तित्व के भान और भान के अस्तित्व से युक्त उनकी बुद्धि कला, कल्पना, सौंदर्य और कामना ने एक स्त्री-मूर्ति का रूप लिया और उनके सम्मुख प्रकट हुई। वह स्त्री-मूर्ति भी उन्हें इस प्रकार दिखलाई दी मानो उसका भी उद्भव उनकी ही तरह किसी कमल के पुष्प से हुआ हो।

न तो ब्रह्मा के पास और न ही उस स्त्री-प्रतिमा की कोई भाषा थी, न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए 

THE BARMUDA TRIANGLE.

ब्रह्मन से बरमान, और बरमान से बरमूडा ट्रिएंगल तक.

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सितंबर 2024 से नर्मदा तट पर सातधारा ग्राम में रहते हुए एक साल और चार माह बीत चुके हैं। इस क्षेत्र का नाम सूरजकुण्ड है। गूगल मैप देखें तो उसमें सभी नदियों का catchment area देख सकते हैं। शायद वैसा ही कुछ यहाँ नर्मदा नदी के बारे में कहा जा सकता है। यहाँ अब तक नर्मदा पुराण के 25 अध्याय इस सप्ताह में पढ़ चुका हूँ। कल 25 वां पूरा हुआ। इससे पहले 2024-15 में भी स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में नर्मदा के बारे में कुछ पढ़ा था। कल मकर संक्रान्ति होने से आसपास के और दूर से भी आनेवाले श्रद्धालुओं की और तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ थी। परसों पुराने पुल पर देखा दो युवतियाँ साष्टांग प्रणाम करते हुए धीरे धीरे पुल के ऊपर से जा रही थीं। आश्चर्यचकित होकर देखता रह गया। इस पर कोई त्वरित टिप्पणी कर देना आसान है पर इस प्रकार की श्रद्धा और निष्ठा रखना अवश्य ही बहुत कठिन और दुर्लभ तपस्या भी है। संसार में ऐसे भी कुछ हैं और यहाँ ऐसे लोगों को देखकर किसी का भी हृृदय भावविव्हल हो सकता है। दूसरी ओर यहाँ आनेवाले ऐसे पर्यटक भी हैं जो बस पिकनिक मनाने और सैैर सपाटा करने के लिए आते हैं। नदी सब पर समान रूप से अपना आशीर्वाद और स्नेह लुटाते हुए अपने अनेक रूप बदलते हुए सतत बहती रहती है। मानो तो मैं गंगा माँ हूँ ना मानो तो बहता पानी!

***

January 13, 2026

THE BRAHMAN

ब्रह्मन्-अब्रह्मन्

--

ब्रह्म और अब्रह्म 

किसी भी संवाद का प्रारंभ होने के लिए आधार की तरह द्वैत, अस्तित्व पूर्व-मान्यता, अरिहार्य॓ता और अनिवार्यता की तरह आवश्यक तो होता ही है, किन्तु अस्तित्व अपना प्रमाण स्वयं ही होता है, और चूँकि द्वैत का अस्तित्व भी अस्तित्व पर ही आश्रित है, उसे किसी दूूसरे प्रमाण की आवश्यकता तथा अपेक्षा भी नहीं हो सकती। तात्पर्य यह कि अस्तित्व द्वैत और अद्वैत की सीमा से स्वतंत्र है।

विचार और विचारक युगपत और विकारशील अस्तित्व (changing phenomenal existence) ग्रहण करते हैं और युगपत ही विलीन भी होते हैं। दोनों एक ही घटना (phenomenon) के दो दृश्य पक्ष हैं। अस्तित्व, घटना न होकर अविकारी (Immutable) सत्य है।

अवधारणा का अस्तित्व,

और

अस्तित्व की अवधारणा -

अस्तित्व अपरिभाषेय है क्योंकि अस्तित्व अवधारणा नहीं बल्कि वह वास्तविकता है जिसे द्वैत और / या अद्वैत की अवधारणा के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसी तरह उस पर उसके 'एक' या 'अनेक' होने का विशेषण भी प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है।

'एक' और 'अनेक' का विचार भी अवधारणा का ही कोई शाब्दिक या व्यक्त प्रकार-मात्र होता है।

"ख्" आख्यायते यया असौ आख्या इति धात्वर्थः।

'सं' उपसर्गेण युक्त्या 'संख्या', 'सांख्य' इति भवति।

इस प्रकार सांख्य दर्शन में ब्रह्म को 'एक' और 'अनेक' से विलक्षण अपरिभाषेय वास्तविकता की तरह से निरूपित किया जाता है। सांख्य दर्शन में निरूपित यह ब्रह्म कोई अवधारणा या विचार नहीं बल्कि वह सत्य है जिसे वह सत्य, उस 'एक' और 'अनेक' से विलक्षण वह ब्रह्म ही जानता है और यह 'जानना' उसका गुण नहीं, स्वरूप है। जबकि 'एक' और 'अनेक' गुण हैं। ब्रह्म के अस्तित्व को इसीलिए सगुण या निर्गुण की तरह सोपाधिक और / या निरुपाधिक इन दोनों प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है और ब्रह्म में जब स्वयं अपने आपके दृक्-दृश्य के रूप में विभक्त होने की प्रतीति उत्पन्न होती है तो उसे चेतन ब्रह्म कहा जाता है। इसलिए ब्रह्म नित्य चेतन सत्य अस्तित्व है और इस सत्य का उद्घोष 'अहं-प्रत्यय' की तरह सर्वत्र ही प्रकट और व्यक्त भी है। इस अहं प्रत्यय को अर्थात् इस 'अहं-पद' से कौन अनभिज्ञ हो सकता है?

अत्ता और अनत्ता

संस्कृत भाषा में 'अद्' / 'अश्' धातु का प्रयोग 'खाने' की क्रिया के अर्थ में होता है। 'अदनम्' / 'अशनम्' इसी के वाचक पद हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँच तन्मात्राओं के  रूप में पाँच महाभूतों को खाया जाता है, जबकि दूसरी ओर यही पञ्च-महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि क्रमशः एक दूसरे को खा जाते है अर्थात् वे परस्पर एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं। और इस प्रकार संपूर्ण व्यक्त अव्यक्त में विलीन होता है, फिर पुनः पुनः व्यक्त रूप ग्रहण करता है - गीता के अनुसार-

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

इन्हीं पाँच स्थूल महाभूतों से रचित और इसी तरह से पाँच सूक्ष्म महाभूतों से व्याप्त देह में चेतना और पाँचों प्राणों का संयोग होने पर इस चेतना और प्राणयुक्त देह का उपभोग करनेवाला ज्ञान "मैं" अहं-प्रत्यय के रूप में व्यक्त रूप ग्रहण करता है। इसलिए इसे "अत्ता" कहा जाता है। बौद्ध दर्शन के मत में इस 'अत्ता' का अस्तित्व संदिग्ध है। इसलिए ''अनत्ता" नामक आधारभूत तत्व को ही अंतिम और वह एकमात्र अवस्था कहा जाता है जिसे "निर्वाण" की संज्ञा दी गई है। ब्रह्म में कर्तृत्व की भावना का अत्यंत अभाव होने से उसे सृष्टिकर्ता (ईश्वर) कहना भी ठीक नहीं है।

गीता अध्याय 5, श्लोक 14 के अनुसार भी :

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४॥

इति अलं - किं विस्तरेण! 

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