February 21, 2026

5,000 years ago!

क्या आपको पता है कि... !

आज से ठीक 5,000 वर्ष पहले भी आप इस स्थान पर आए थे?

जब उस भवन की ऊपरी मंजिल पर लिखे इस संदेश पर मेरी नजर पड़ी तो मैं चौंका। शायद बहुत से ऐसे भी लोग रहे होंगे जिन्होंने उस संदेश को पढ़ा होगा लेकिन उस पर ध्यान न दिया हो। उस समय किसी दूसरे महत्वपूर्ण काम से मैं वहाँ से जा रहा था इसलिए भी मेरे लिए वहाँ रुकना या पता लगाना मुश्किल ही था। जल्दी ही पता चल गया कि वह किसी तथाकथित धार्मिक / आध्यात्मिक संस्था -

"प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय" 

का कार्यालय था। मेरे लिए इस सबका कोई महत्व नहीं था। उन्हीं दिनों मेरे एक परिचित से मेरी मुलाकात हुई। मुझे नहीं पता था कि वे "आनंद-मार्ग" नामक इसी तरह की दूसरी एक और संस्था से जुड़े थे। वे उम्र में मुझसे दस-बारह साल बड़े थे और मुझे भी उस संस्था की ओर जाने के लिए उत्साहित करने की कोशिश कर रहे थे। तब एक दिन मुझे "आनंद-मार्ग" के दफ्तर ले गए।  वहाँ लंबे बाल और दाढ़ी मूँछों वाले लाल वस्त्रधारी एक दो व्यक्ति थे जिन्हें वे लोग "अवधूत" कह रहे थे। उनके पीछे की एक आलमारी में एक खोपड़ी जैसी कोई वस्तु दिखलाई दी। फिर वे रहस्यपूर्ण बातें करने लगे। श्मशान और साधना के बारे में। उस सबको देखकर मेरे मन में उस सबसे बहुत नफरत होने लगी। वहाँ से लौटने के बाद फिर कभी मैं उन परिचित से नहीं मिला। एक दो बार वे मेरे घर पर भी आए थे लेकिन मैंने न तो उनसे बात की, न उनकी ओर देखा भी। अपने पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई करता रहा। उस समय धर्म और अध्यात्म के बहाने ऐसे अनेक उपद्रव हो रहे थे। एक स्थान पर

"सत्य साईं बाबा"

के "चमत्कार" हो रहे थे, जहाँ पर हर गुरुवार को उनकी तस्वीरों से "भभूत" झरती रहती थी। इन सबसे मेरा मन बहुत क्षुब्ध हो चुका था और मैं बुरी तरह से उकता चुका था। और आजकल भी यू-ट्यब पर ऐसे हजारों वीडियो देखते हुए लगता है कि इस सबका क्या अंत है!

वैसे एक बात अवश्य कह सकता हूँ कि इस -

hindi-ka-blog

में यह मेरा आखरी पोस्ट है।

GOOD-BYE! 

अलविदा!

👋

*** 


THE SEVENTIES.

सत्तर का दशक

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इसी hindi-ka-blog में पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा होगा कि वर्ष 1970 में मेरी स्कूल की शिक्षा पूरी होने पर मैं एक छोटे शहर में रहने लगा जहाँ पर एकमात्र कॉलेज में ग्रैजुएशन / B. Sc. प्रथम वर्ष में मुझे  PCM विषयों में प्रवेश मिला। गाँव में स्कूल में पढ़ते रहने के समय तक मैंने कभी चप्पल नहीं पहनी थी। कभी कभी कोई करीब कर ले आता भी तो उसे पहनकर कहीं जाने पर वहाँ उसे उतारने के बाद लौटते समय फिर उसे पहनना भूल जाता था लेकिन कॉलेज में प्रवेश प्राप्त होने के बाद से चप्पल पहनना आदत बन गया। एन. सी. सी. अनिवार्यतः करना ही था और और हर छात्र को उसके लिए एक ड्रेस, कैप, बेल्ट और शूज़ भी मिलते थे लेकिन उनका उपयोग सिर्फ गुरुवार और शुक्रवार के दिन शाम के समय में परेड के लिए जाते समय करना होता था। उस छोटे शहर में वैसे कॉलेज इतना दूर नहीं था कि पैदल न जाया जा सके, लेकिन चूँकि मेरे बड़े भाई की साइकल मेरे पास थी और वह मुम्बई में  IIT  में  M. Tech  कर रहा था इसलिए साइकल का उपयोग मैं ही किया करता था। पिताजी रिटायर होने के बाद पास के अपेक्षाकृत एक बड़े शहर में गैर सरकारी स्कूल में शिक्षक का कार्य करने लगे थे। तो साइकल मेरे लिए एक अनपेक्षित गिफ्ट ही था। और इस गिफ्ट के कुछ दायित्व भी प्राप्त हुए थे जैसे आटा चक्की पर जाकर गेहूँ पिसवाना, बाजार से सामान लाना, घर के किसी दूसरे काम के लिए कहीं जाना आना आदि। तीन वर्ष उस छोटे शहर में बीत गए जिसमें से एक वर्ष यूँ ही व्यर्थ हो गया। इसके पीछे मेरी जिद भी एक बड़ी वजह थी। वह यह कि कॉलेज की शिक्षा के लिए हिन्दी माध्यम को छोड़कर अंग्रेजी माध्यम को मैंने चुना था। मुझे पहले ही पता था कि अंग्रेजी से अभ्यस्त होने के लिए एक वर्ष का sacrifice करना पड़ सकता है। और इसलिए मैं न तो निराश था और न दुःखी। फिर धक्का परेड में शामिल होकर अंततः चार वर्ष में ग्रैजुएशन कर ही लिया। अंतिम चौथे वर्ष में जब अध्ययनरत था तब एक दिन शहर के दूसरे सिरे पर स्थित एक चौराहे पर किसी भवन की ऊपरी मंजिल पर टँगे एक बोर्ड पर नजर पड़ी -

***

February 20, 2026

The Invisible Walls.

अदृश्य दीवारें

जानने और पता लगाने की मेरी प्रवृत्ति ने विज्ञान और गणित की ओर मेरा ध्यान खींचा, उसी से प्रेरित होकर मेरा ध्यान धर्म और अध्यात्म की तरफ आकर्षित हुआ। न जाने क्या बात थी कि संस्कृत के ग्रन्थ, स्तोत्र, श्लोक आदि मुझे रोमांचित कर देते थे। वैसे यह मेरा अनुमान है और एक शब्द में कहें तो मेरे "संस्कार" ही संभवतः मुझे उस दिशा में आगे ले जा रहे थे। सब कुछ जैसे पहले से लिखी स्क्रिप्ट के अनुसार घटित हो रहा था और जीवन में अनेक ऐसे अच्छे और बुरे अवसर भी आते जाते रहे जब शायद मेरी मृत्यु भी हो सकती थी। ऐसा शायद हर किसी के साथ होता है। संस्कृत भाषा के प्रति मेरा प्रबल अनुराग और आकर्षण क्यों है, यह मैं कभी नहीं समझ पाया। और मुझे याद है कि बिलकुल बचपन से ही जब मेरा यज्ञोपवीत हुआ था और पिताजी ने कुछ दिनों तक मेरे साथ गायत्री संध्या करते हुए मुझे मंत्रोच्चारण करना सिखाया था। एक मंत्र अब भी स्मृति में है -

महे रणाय चक्षसे... 

बहुत बाद में जब 2016 में केवटग्राम में ऋग्वेद का पाठ कर रहा था तब यह मंत्र दृष्टिगोचर हुआ। तब मेंने इसका सरल अर्थ किया - (हे इन्द्र!) तुम महान युद्घक्षेत्र में रण करने के लिए तेजस्वी हो।

जब बचपन में संध्योपासना करता था तब चौथी कक्षा की परीक्षा पास की थी - वर्ष था 1963, तब मेरी आयु साढ़े नौ वर्ष थी। जिस समय मेरी जन्म पत्रिका में चन्द्र की महादशा समाप्त हो रही थी और मंगल की महादशा शुरू होने जा रही थी। अवश्य ही इस महादशा परिवर्तन के साथ मेरे जीवन में बहुत उतार चढ़ाव आने लगे थे। दो साल गाँव के स्कूल में अध्ययन किया, फिर शहर के एक स्कूल में दो साल और फिर एक कस्बे के स्कूल में तीन साल। सभी सरकारी स्कूल थे। तब तक मेरी स्कूल की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और फिर शहर के एक सरकारी कॉलेज में तीन साल तक ग्रैजुएशन की शिक्षा, जिसमें पहला साल रिपीट किया। फिर दूसरे और भी बड़े शहर में ग्रैजुएशन का तीसरा साल। फिर एक साल तक पढ़ने लिखने की छुट्टी। फिर दो साल पोस्ट ग्रैजुएशन। इसके बाद फिर बारह साल जॉब करने के बाद घर के कर्तव्यों से मुक्त होकर बारह साल अंग्रेजी

"I AM THAT"

पुस्तक का अध्ययन और हिन्दी में उसके अनुवाद का कार्य करने में बीत गए। वर्ष 2001 में उक्त पुस्तक

"अहं ब्रह्मास्मि"

शीर्षक से प्रकाशित होने के बाद 2001-2002 में श्री जे.कृष्णमूर्ति के मूलतः अंग्रेजी में दिए गए -

J.Krishnamurti :Talks With Students

का मेरे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद :

छात्रों से वार्तालाप - वाराणसी 1954

राजपाल ऐंड सन्स से प्रकाशित हुआ।

उपरोक्त पुस्तक का अनुवाद करते समय इस ओर ध्यान गया कि इसमें भी श्रीमदभगवद्गीता की तरह 18 अध्याय हैं, जिनमें से प्रथम तीन प्रधान विषय से संबंधित हैं और अंतिम तीन उपसंहार की तरह!

श्रीमद्भगवद्गीता में भी अंतिम तीन अध्यायों को ग्रन्थ के उपसंहार की तरह देखना जा सकता है।

बचपन के वैदिक गायत्री संध्या से लेकर वर्ष 2016 के ऋग्वेद के पाठ और भिन्न भिन्न समय पर संस्कृत के मूल ग्रन्थों का पाठ करते हुए मैंने कभी किसी दूसरी भाषा में उनके अनुवाद और अर्थ जानने का प्रयास नहीं किया, यहाँ तक कि वाल्मीकि रामायण और स्कन्द पुराण का पाठ / अध्ययन भी मैंने इसी तरह से किया।

वाल्मीकि रामायण और स्कन्द पुराण का पाठ / अध्ययन करते समय संस्कृत व्याकरण और शब्दकोष का उपयोग कभी कभी संशय होने पर करता था।

उपरोक्त जानकारी देने का उद्देश्य यह कि मुझे अनुभव हुआ कि किसी भी ग्रन्थ का केवल मूलपाठ करना ही उसका तात्पर्य ग्रहण करने के लिए पर्याप्त है और किसी दूसरी भाषा में उसके अर्थ को समझने का प्रयास व्यर्थ का एक ऐसा कार्य है जो बुद्धि से बुद्धि में होनेवाली एक अंतहीन यात्रा ही होता है। तात्पर्य यह कि संस्कृत के समस्त शास्त्र ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका ज्ञान अदृश्य दीवारों के पीछे छुपा हुआ दो तालों में बंद है और उस पर विडम्बना यह भी कि ये दोनों ताले भी उन दीवारों की तरह अदृश्य ही हैं। पहला ताला तो संस्कृत भाषा ही है। दूसरा ताला है संस्कृत भाषा में लिखी गई रचना का आभासी अर्थ,  जो पुनः और भी अधिक भ्रमित कर सकता है। इसके सबसे अच्छे उदाहरण पर मेरा ध्यान श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ / अध्ययन करते समय गया। इन उदाहरणों पर मैंने अपने पोस्ट्स में लिखा भी है। केवल एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है -

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मादि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।

यहाँ इस उदाहरण में "वेद" क्रिया-पद "अहं" सर्वनाम के सन्दर्भ में उत्तम पुरुष एकवचन / अन्य पुरुष एकवचन के रूप में द्रष्टव्य है। यहाँ "वेद" लट् लकार के साथ लिट् लकार में भी प्रयुक्त है। इसी तरह से "अहं" सर्वनाम भी उत्तम पुरुष एकवचन के साथ अन्य पुरुष एकवचन की तरह प्रयुक्त किया गया है। सामान्य और आभासी अर्थ यह कि भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं के लिए व्यक्ति-विशेष पद "मैं" का प्रयोग कर रहे हैं, जबकि प्रच्छन्न अर्थ यह भी है कि वे इस पद का प्रयोग "आत्मा" के अर्थ में कर रहे हैं।  पूरी भगवद्गीता को मैंने जब भगवान् श्री रमण महर्षि की शिक्षाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास किया तब कहीं मेरा ध्यान इस दूसरे अदृश्य ताले पर गया। यहाँ एक बड़ी कठिनाई यह भी है कि गीता में जहाँ जहाँ "अहं" पद का प्रयोग है, वहाँ वहाँ इसका अर्थ "श्रीकृष्ण" या "ईश्वर" के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है, यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि साँख्य दर्शन में "ईश्वर" नितान्त अप्रासंगिक है। योग दर्शन में अवश्य ही समाधिपाद सूत्र २३, २४ में "ईश्वर" पद को औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है -

ईश्वरप्रणिधानाद्वा (समाधिः) ।।

- २३

और, 

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।।

- २४

इसलिए संस्कृत और वैदिक, औपनिषदिक, पौराणिक, स्मृति, इतिहास (रामायण और महाभारत) आदि ग्रन्थों में एकेश्वरवाद या अनेकदेववाद आदि का उल्लेख तक नहीं पाया जाता। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि ये ग्रन्थ नास्तिकवादी या अनीश्वरवादी हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपनिषद् जिसका नाम ही ईशावास्योपनिषद् है, ऐसी ही एक दिव्य सत्ता की मान्यता पर आधारित है। संस्कृत के भिन्न भिन्न धार्मिक आध्यात्मिक ग्रन्थ साँख्य दर्शन और योग दर्शन पर आधारित हैं और सभी विभिन्न मनुष्यों की पात्रता के अनुसार उन सभी की अपनी भिन्न भिन्न प्रतीत होनेवाली साधना-प्रणालियाँ हैं। इसलिए उसमें परस्पर विरोध या विरोधाभास तक नहीं है। वे "क्या ईश्वर है या नहीं है?" जैसे भ्रामक प्रश्नों के अनौचित्य को समझते हैं और वह एक है या अन्य, साकार है या निराकार, जैसे सतही बौद्धिक विचारों की निरर्थकता भी समझते हैं। वे इन सतही प्रश्नों के उत्तर खोजने से पहले -

"ईश्वर क्या है?"

इसे जानना और समझना चाहते हैं और वे उसके लिए ही प्रयास भी करते हैं।

***


 



February 19, 2026

P C M

Incidence or a Coincidence?

घटना, संयोग, प्रारब्ध या नियति?

बचपन से मुझे जानने और पता लगाने में कुछ अधिक ही रुचि थी। और ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि लगभग हर प्राणी में यह जन्मजात रूप से होती ही है। हर शिशु में, चाहे वह मनुष्य का या पशु का हो, पक्षी या जलचर का है। यह मूल और अबोध प्रवृत्ति आगे चलकर अपने और अपने आसपास के संसार को जानने समझने और उसमें अपने संसार में होने, उससे संबद्ध और फिर उससे फिर भी कुछ भिन्न और स्वतंत्र उसकी एक इकाई होने की मान्यता का रूप ले लेती है। यह या तो केवल अपने लिए सुरक्षित बने रहने और संसार में निरंतर अपने लिए आवश्यक उन वस्तुओं को प्राप्त करते रहने की प्रवृत्ति में बदल जाती है जो हमें निरंतर सुरक्षित और सुखी बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रतीत होती हैं। इन वस्तुओं में हमारा परिवार, लोग और उनसे हमारा संबंध भी ऐसी ही एक वस्तु होती है। शारीरिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रहने की इस प्रवृत्ति को survival instinct  कह सकते हैं। स्कूल में आठवीं बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद नौंवीं में विज्ञान या क्या संकाय में से कोई एक चुनना था। मेरी दिलचस्पी विज्ञान में थी, और चूँकि  मुझे डॉक्टर नहीं, वैज्ञानिक या और गणितज्ञ बनना था इसलिए बॉटनी ज़ूलॉजी लेने का सवाल ही नहीं था। अब बचा गणित, तो आगे जाकर इंजीनियरिंग भी लिया जा सकता था।

P -Physics, C - Chemistry  और  M - Mathematics, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र और गणित। यद्यपि तब यह कल्पना तक नहीं उठती थी कि भविष्य में नौकरी या आजीविका के प्रश्न का भी सामना करना होगा। लेकिन इन्हीं विषयों को लेकर ग्रैजुएशन और फिर गणित में पोस्ट ग्रैजुएशन कर लिया, बैंक में सम्मानप्रद नौकरी भी मिल गई और झुकाव शुरु से ही अध्यात्म की ओर था, तो बस सारा प्रयास अध्यात्म का रहस्य खोजने और समझने में लगा दिया। अभी करीब साल पहले इस बारे में सोच रहा था कि शायद बचपन में P C M को चुनने के पीछे अव्यक्त रूप से जो इच्छा मन में थी वह मूलतः अध्यात्म के प्रति  मेरी गहरी रुचि का ही संकेत था। क्योंकि गीता में वर्णित सांख्य और योग की इन दोनों निष्ठाओं से मैं अपनी उस रुचि को संबद्ध कर सकता था, अर्थात्  relate  कर पा रहा था।  Analogy  के रूप में उस दृष्टि से -

भौतिक शास्त्र - कर्म, रसायन शास्त्र - गुण और गणित - सांख्य (बुद्धि) के ही सूचक हैं, - कर्म, गुण और बुद्धि का न्यायोचित समन्वय ही धर्म और दर्शन है।

धर्म सिद्धान्त और आचरण है, दर्शन अध्यात्म है।

धर्म शरीर, मन और संसार से सुसंगति है, जबकि दर्शन आत्मा से सुसंगति  है।

*** 


February 17, 2026

LOCK AT HOME.

वनदुर्गा उपनिषद् 

बचपन में गर्मियों की दो माह की लंबी छुट्टियों के दिनों से पहले 30 अप्रैल के दिन स्कूल का अंतिम दिन होता था, और इसी दिन वार्षिक परीक्षा का परिणाम घोषित होता था। सभी बच्चों पर फेल हो जाने का डर इस तरह हावी होता था कि 29 अप्रैल का दिन कटना मुश्किल हो जाता था। उस दिन हम बच्चे एक पार्टी रखते थे और बच्चों के खेल खेलते थे। हर किसी को पुरस्कार दिया जाता था,  पहला सबसे बड़ा पुरस्कार खेल में हारनेवाले को दिया जाता था ताकि वह समझ सके कि जीवन में भाग्य और कर्म दोनों का समान महत्व है और न तो हार से निराश या दुःखी होना चाहिए और न जीत होने पर खुश होकर बहुत गर्व करना।

खेल भी कौन से? लूडो, चाइनीज़ चेकर्स जैसे घरेलू खेल। वैसे चाइनीज़ चेकर्स से बेहतर खेल होता था - अष्टा चंगा पे। ताश के खेल भी जैसे कि ट्वेंटी नाइन, गुलाम-चोर, झब्बू, खेले जाते थे। लड़कियाँ "पाचे" खेला करती थीं। "पाचे" वैसे हिन्दी / मराठी में प्रयुक्त यह शब्द संस्कृत "पांशु" का वैसा ही अपभ्रंश है, जैसा कि हिन्दी में प्रचलित "पाँसे" शब्द - कहते हैं न, 

"पाँसा पलट गया!"

ऐसा ही ताश के पत्तों का एक खेल होता था -

NOT AT HOME!

वर्ष 2010 के आसपास मुझे कहीं से मुझे एक बार एक गिफ्ट मिला था वनदुर्गा उपनिषद्। साथ ही यह दायित्व भी, कि मैं उसके संस्कृत टेक्स्ट को शुद्ध टाइपसेट कर वह टेक्स्ट वापस भेज दूँ। यहाँ से एक नया खेल शुरू हुआ। उस संस्कृत टेक्स्ट की कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही एक पंक्ति पर दृष्टि पड़ते ही मैं अटक गया और मेरी बुद्धि में यह कौंध गया कि यहाँ एक "Lock" है। सामान्यतया संस्कृत के सभी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों में ऐसे कुछ अदृश्य "लॉक" इन-बिल्ट होते हैं ताकि  कहीं किसी अनधिकारी / अपात्र को वह ज्ञान उपलब्ध न हो। ऐसा इसलिए भी आवश्यक है ताकि अनजाने में भी किसी का भी अहित न हो।

इस घटना के बाद से संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन करने के मेरे तरीके में एक आमूल-चूल और क्रांतिकारी परिवर्तन घटित हो गया।

मुझे यह भी स्पष्ट हुआ कि संस्कृत के किसी भी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों का किसी भी भाषा में अनुवाद किया जा सकना असंभव है। हाँ कोई इनका कोई मर्मज्ञ ही संभवतः इनका भाष्य शायद लिख सकता है।

अनुवाद  / translation

और

भाष्य / Commentary

के माध्यम से भी उस ग्रन्थ के मर्म की ओर केवल संकेत ही किया जा सकता है। उस रहस्य / मर्म का आविष्कार तो केवल कोई अधिकारी / पात्र ही कर सकता है।

फिर भी एक उदाहरण से इसे इस तरह से समझाया और समझा जा सकता है -

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है :

viscosity / viscose.

यह शब्द संस्कृत शब्द 

विष्कोश, विष-कोश या विष-कोष

का अपभ्रंश या व्युत्पन्न हो सकता है। इसका अर्थ है - श्यानता / श्याम जो उर्दू में शाम के रूप में प्रचलित हो गया। श्याम का दूसरा अर्थ है कृष्ण अर्थात् काला- काला अर्थात् गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यमय। 

फिर भी वह दिखाई तो देता ही है!

ईश्वर ऐसा ही एक, अनेक या एकानेक से परे मर्म, गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्य है। क्योंकि साँख्य दर्शन के अनुसार एक और अनेक "गुण" हैं और पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार गुणकर्मसमष्टि का प्रतिप्रसव कैवल्यम्

ताण्डवराया स्वामी ने शायद इसीलिए 

कैवल्य-नवनीत

नामक तमिऴ ग्रन्थ की रचना की होगी।

प्रसंगवश -

जब भी, 

रहसि स्थितः, रहिं, जैसा, अरबी भाषा का -

रहीम

शब्द मेरी आँखों के सामने आता है, सबसे पहले मेरे मन में इसका यही अर्थ द्योतित होता है। मैं यहीं रुक जाता हूँ, क्योंकि मैं समझता हूँ, कि मैं अरबी और हिब्रू भाषा के ग्रन्थों को पढ़ने के लिए अनधिकारी / अपात्र भी हूँ, क्योंकि ऐसा करना न सिर्फ अनावश्यक और अवाँछनीय बल्कि शायद विनाशकारी भी हो सकता है। और मेरे द्वारा ऐसा किया जाना मेरे

कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र और योग्यता क्षेत्र

की मर्यादा का उल्लंघन और मेरे सामर्थ्य से बाहर की वस्तु है।

और तब मैं

Not At Home / Lock At Home

कहकर चुप हो जाता हूँ।

और परमात्मा तो तो वह मर्म है जो ईश्वर से भी अधिक गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यपूर्ण है। फिर भी वह अदृश्य की तरह दिखाई तो देता ही है! और कितना भी धुँधला क्यों न हो जाए, प्रेम की तरह अनुभवगम्य भी तो होता ही है न!

याद आती हैं गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएं -

ब्रह्मराक्षस का शिष्य, विपात्र और

संभवतः उनकी ही और एक रचना यह भी है -

चाँद का मुँह टेढ़ा है।

*** 




 



February 14, 2026

VALENTINE'S DAY!

निर्वासन, निष्क्रमण,

अभिनिष्क्रमण और

महाभिनिष्क्रमण ...

Extradition, Exodus, Exile, Liberation, Abandonment and Deliverance.

मार्च 2022 में स्पष्ट हो गया था कि यहाँ से जाना है।

"आप कहाँ जाने के बारे में सोच रहे हैं?"

-मित्र ने पूछा।

"मैं कहीं जाने के बारे में नहीं, सिर्फ इतना ही सोच रहा हूँ कि यहाँ से जाना है।"

-मैंने कहा। 

उसके और मेरे सोचने में यही बुनियादी फर्क था। लोग  अकसर, जब भी कहीं जाने के बारे में सोचते हैं तो उन्हें मालूम होता है कि उन्हें फिर लौटकर यहीं आना है। बस कभी कभी ही यह भी, कि वे यहाँ, इस स्थान को हमेशा के लिए छोड़ने के बारे में सोच रहे होते हैं। जैसे जब उस समय वे किराए के मकान में रहते हों और नया जॉब या व्यवसाय करने के लिए किसी दूसरी जगह शिफ्ट होना होता है। मेरी स्थिति में यह भी संभव न था क्योंकि मुझे यह तो पता था कि इस स्थान को छोड़ना है और दूसरी किसी जगह पर रहने के लिए जाना है, लेकिन न तो इस उम्र में मैं कोई नया जॉब करने के बारे में सोच सकता था और न ही कोई व्यवसाय करने के बारे में। और मेरा मित्र तो इस पहलू पर सोच तक नहीं सकता था। मुझसे सिर्फ सतही तौर पर पूछ रहा था। फिर उसी मित्र के माध्यम से कुछ दिनों, हफ्ते दस दिनों के लिए तात्कालिक रूप से कहीं रहने की व्यवस्था हो गई, और फिर मैं पुरानी जगह लौट आया। साल भर उसी जगह अनिश्चय, असमंजस तनाव और चिन्ता में वहीं बीता। इस बीच एक पुराने मित्र मिले और तय हुआ कि वे मेरे रहने की (तात्कालिक रूप से) स्थायी व्यवस्था कर देंगे। खुद उन्होंने भी इस बारे में शायद ही कभी सोचा था। वे खुद ही अस्थिर परिस्थिति और मनःस्थिति से ग्रस्त और पीड़ित थे। उनकी तरह मैं भी उनके साथ साल-डेढ़ साल भर तक ऐसी ही स्थिति में फँसा रहा। फिर ऐसा कुछ संयोग बना कि डेढ़ साल से यहाँ रहने लगा हूँ। अभी तो लग रहा है कि संभवतः लंबे समय तक या कि शायद पूरे जीवन भर ही यहीं रहना है। वैसे भी कहीं लौटने के लिए न कोई स्थान, कारण और न ही कोई संभावना ही दूर दूर तक नजर आ रही है।

शायद यही निर्वाण है!

इति मम निर्वाणोपनिषद्।। 

***




February 11, 2026

The Agnostic.

स ही वा!

+-

"भारत में हर तीसरा व्यक्ति ज्ञानी है!"

"आप तीसरे हैं?"

"जी नहीं, मैं चौथे किस्म का हूँ।"

"मतलब?"

"मैं अज्ञेयवादी हूँ।"

"मतलब?"

"Atheist, Anti-theist, Acateleptic, Pyrrhonian, Pyrrhonist, Secular, Skeptic, Godless, Doubting Thomas, Intellectual!" 

"सही.. वा?!"

***



February 09, 2026

THE SHADOW OF LIGHT

स्मृति की पहचान : पहचान की स्मृति

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अतीत, पहचान और स्मृति यद्यपि एक ही वस्तु जीवन  के तीन आयाम हैं, और संभवतः तीनों को परिभाषित भी किया जा सकता है, तीनों ही अन्योन्याश्रित सत्य हैं और किसी कल्पित विषय के सन्दर्भ में ही अभिव्यक्त और पुनः अनभिव्यक्त होते रहते हैं। आधारभूत चेतना उन सबमें व्याप्त होते हुए भी उनसे अप्रभावित, अछूती और स्वतंत्र है, जिसमें ये तीनों ही भेद नहीं पाए जाते। जैसे

ब्रह्म - सजातीय, विजातीय और स्वगत

इन तीनों ही भेदों से रहित नित्य विद्यमान अस्तित्व है, और उसे जिस तरह से सर्वनाम के तीनों प्रकारों -

अस्मद्, युष्मद् और तत्

में से किसी एक की तरह व्यक्त या संबोधित नहीं किया जा सकता है, चेतना भी अपना प्रमाण स्वयं ही है और  उसे ही -

सन् धातु के क्त प्रत्यय सहित सत् पद से भी व्यक्त किया जाता है :

श्रीमद्भगवद्गीता -

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। 

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्तयं ह्येतदुत्तमम्।।३।।

अर्जुन उवाच :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

श्रीभगवानुवाच :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठायसंभवाम्यात्ममायया।।६।।

श्री भगवते प्रीयतां च अर्पणमस्तु।।

***


February 04, 2026

Day-Dreaming!

Hindi Poetry.

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कभी भी नींद आती है, 

कभी भी टूट जाती है, 

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी उड़ भी जाती है,

कभी तो दुःख भी आता है, 

कभी फिर लौट जाता है,

कभी खुशी भी आती है,

कभी फिर लौट जाती है,

कभी उम्मीद-नाउम्मीद,

आया जाया करते हैं,

कभी अफसोस, फिक्र या गम,

दिल पर छा जाया करते हैं!

नहीं मैं, नींद या दुःख भी,

नहीं खुशी हूँ, या गम भी,

नहीं हूँ फिक्र या अफसोस,

जो आते जाते रहते हैं,

कभी मैं सुखी, कभी मैं दुःखी,

कभी जागा,  कभी सोया, 

कभी भूखा,  कभी प्यासा, 

हँसा भी कभी, कभी रोया,

अगर हूँ मैं यह सब कुछ, 

तो क्या हूँ, भीड़ एक मैं?

या हूँ, मैं बस खालीपन,

जो न आता, न जाता है,

बस खयाल ही आता है,

बस खयाल ही जाता है,

तो क्या हूँ, खयाल ही मैं?

या हूँ बस वह खालीपन,

जो न आता, न जाता है?

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी टूट जाती है,

कभी भी नींद आती है, 

कभी भी उड़ भी जाती है,

क्या कभी मौत भी आएगी,

क्या फिर वह लौट जाएगी?

क्या जीवन भी जाएगा, 

या फिर से लौट आएगा?

क्या मैं तब खो जाऊँगा,

खुद को खोया पाऊँगा!

तो क्या वह नया जनम होगा, 

या मैं बस मिट जाऊँगा?

कभी भी सपने आते हैं, 

मगर फिर लौट जाते हैं,

कभी भी सपने आते हैं,

मगर फिर भूल जाते हैं,

कभी भी नींद आती है,

कभी भी टूट जाती है! 

***


 


     





January 21, 2026

The First and The Last Love.

हिन्दी कविता

विस्मृति-मुग्ध

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It's nice, whatever it is!

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गंध भी मत छूना मन,

पहचान भी बनाना मत,

देख लेना सिर्फ छवि,

स्मृति में तुम बसाना मत!

फिर फिर मिलेगा वह तुम्हें,

जैसे मिला हो पहली बार,

सोचना, कहना भी मत,

यह था मेरा पहला प्यार!

***