April 17, 2024

70 कामेच्छा और मृत्यु कामना

Question  / प्रश्न  70.

कामेच्छा और मृत्य-कामना के बीच क्या संबंध (या अन्तर) है?

How are sex-desire and death-wish related to one another? Or are they totally unrelated?

Answer  / उत्तर :

कामेच्छा की अभिव्यक्ति दो रूपों में होती है। प्रथमतः जैस कि प्रायः सभी प्राणियों में हुआ करती है। किसी भी प्राणी में काम-भावना का उन्मेष और उत्स्फूर्ति होते ही वह अपनी ही जाति, किन्तु विपरीत-लिंगीय प्राणी की ओर आकर्षित होता है। यदि पशु-पक्षियों आदि प्राणियों के व्यवहार का निरीक्षण करें तो दिखलाई देगा कि ऋतु आने पर ही ऐसा होता है, जब वे विपरीत-लिंगीय अपने जैसे किसी प्राणी के प्रति आकर्षित होते हैं। प्रायः ही वे जोड़ा बना लेते हैं और अपनी प्रकृति के और होनेवाली अपनी संतान के भविष्य की आवश्यकता के अनुसार कुछ समय तक दोनों साथ रहते हैं और संतान के पूर्ण विकसित होने तक उसकी देखभाल और रक्षा करते हैं। विशेषतः पक्षियों की स्थिति में देखा जाता है। पशुओं की स्थिति कुछ भिन्न होती है। फिर भी प्रायः सभी पशु भी जोड़ा बनाकर ही संतानोत्पत्ति के कार्य में संलग्न होते हैं और कार्य के पूर्ण होने तक एक दूसरे के साथ मिलकर कर्तव्य का निर्वाह करते हैं। पुरुष हो या स्त्री, मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी होता है जो विकृत मन और दूषित मस्तिष्क होने के कारण प्रायः काम-भावना को सुख प्राप्त करने अर्थात् कामोपभोग का सुख प्राप्त करने का साधन समझने की भूल कर बैठता है, कल्पना से ग्रस्त हो जाया करता है, और इस प्रकार के सुख का उपभोग करने के लिए उसे मर्यादा का विस्मरण भी हो जाता है। और शायद केवल इसीलिए भी सनातन धर्म के शास्त्रों में विवाह को एक धार्मिक संस्कार का रूप दिया गया है, ताकि पुरुष या स्त्री, वंश की वृद्धि और प्रजा की उत्पत्ति को एक पुण्य-कर्म और कर्तव्य के रूप में स्वीकार करे, न कि केवल कामोपभोग के सुख को प्राप्त करने का माध्यम समझ बैठे। विवाह के महत्व की ऐसी कल्पना करना तो दूर, इस प्रकार की अवधारणा तक सनातन धर्म से इतर परम्पराओं में कहीं नहीं देखी जाती। यहाँ तक कि उनमें "विवाह-विच्छेद" तक स्वीकार्य होता है। इसका मूल कारण है स्त्री को पुरुष के उपभोग करने की कोई वस्तुमात्र मान लेना, और पुरुषप्रधान समाज द्वारा स्त्री को उस दृष्टि से Use and throw की जानेवाली वस्तु की तरह मान बैठने की प्रवृत्ति। सामान्यतः भारतीय नैतिक मूल्यों का पालन करनेवाला समाज किसी भी स्त्री को कभी इस तरह असहाय नहीं छोड़ देता, बल्कि ऐसा करने या होने की स्थिति में भी यह उसे अपने कुल पर लगा कलंक ही अनुभव कर लज्जित भी होता है। फिर भी ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं जब आर्थिक कारणों से या निर्धनता के कारण कोई अपने परिवार की किसी स्त्री को असहाय भी छोड़ दिया करता हो। वैसे भी यह एक जटिल विषय तो है ही। ऐसी ही स्थिति में पड़ी हुई किसी स्त्री के मन में इस समस्या के हल, और इससे मुक्ति पाने के एकमात्र उपाय के रूप में यदि आत्महत्या करने का विचार आए तो यह आश्चर्य की बात नहीं हो सकता। 

तब यह हुई "मृत्यु कामना" ।

इस प्रकार की मृत्यु कोई नया "अनुभव" या "एक और अनुभव" तक नहीं हो सकता, जिसे "प्राप्त करने" की कल्पना या आशा तक की जा सकती हो, और जिससे दूर दूर तक किसी सुख की प्राप्ति होने की संभावना हो। 

किन्तु "मृत्यु-कामना" या आत्महत्या करने की प्रवृत्ति के पैदा होने के बहुत से और दूसरे भिन्न कारण भी अवश्य हो सकते हैं, जब मनुष्य में निराशा, अवसाद, सतत कष्टों और दुःखों, दुश्चिन्ताओं से पीड़ित, ग्रस्त और त्रस्त होने के कारण मृत्यु की कामना पैदा हो जाती हो। यह तो हो सकता है कि परिस्थितियों से विवश और विवेक से प्रेरित होकर कोई अपनी कामेच्छा पर संयम कर ले, लेकिन इससे भी कहीं अधिक कठिन होता होगा - तीव्र निराशा और अवसाद के कारण उत्पन्न हुई "मृत्यु-कामना" से प्रभावित न होना। कामेच्छा की संतुष्टि होने पर जहाँ मनुष्य को एक तृप्ति अनुभव हो सकती है, वहीं "मृत्यु-कामना" पूर्ण हो जाने पर ऐसा कुछ शायद ही हो सकता है। और विडम्बना यह भी है कि कभी कभी तो "मृत्यु-कामना" कामेच्छा की संतुष्टि न हो पाने के कारण भी उत्पन्न हो सकती है।

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(त्वरित टिप्पणी : पता नहीं यह सब मैंने क्यों लिखा!)

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